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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
शेर की शरारत भरी ताने
 
अगली सुबह की वह सुनहरी धूप मीरा के लिविंग रूम में बिछी हुई थी। मीरा सोफे पर बैठी चाय की चुस्कियां ले रही थी, लेकिन उसका मन कल की उस सिहरन में ही अटका हुआ था।
 
उसने आज एक महीन, हल्की हरी शिफॉन की साड़ी पहनी थी। साड़ी का पल्लू कंधे पर लापरवाही से सिमटा हुआ था, जिससे उसके ब्लाउज की तंग फिटिंग और भी उभर कर आ रही थी। रेशमी कपड़े के नीचे उसके सुडौल स्तनों का उभार साफ झलक रहा था, जो हर सांस के साथ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसकी गर्दन पर आई हल्की सी पसीने की बूंदें धूप में चमक रही थीं, और कल की घटना की याद ने उसके गालों पर एक गहरी गुलाबी रंगत बिखेर दी थी।

 
तभी शेर किचन से बाहर आया। उसके हाथ में नाश्ते की ट्रे थी, लेकिन उसकी भूखी नजरें सीधे मीरा के जिस्म के उन हिस्सों पर टिकी थीं जो साड़ी की मर्यादा को चुनौती दे रहे थे।

 
उसकी हथेलियों में अभी भी कल का वो अहसास ताजा था—मीरा के जिस्म की वो मखमली नरमी और उसकी धड़कनें। शेर के चेहरे पर एक कुटिल और कामुक मुस्कान थी। उसे पता था कि आज की सुबह कल से भी ज्यादा 'खास' होने वाली है, क्योंकि उसने मीरा की चाय में चुपके से दवा की एक और भारी खुराक मिला दी थी। वह दवा, जो धीरे-धीरे मीरा के खून में घुल रही थी, उसकी झिझक को खत्म कर उसकी नसों में एक अनजानी आग फूंकने वाली थी।

 
शेर: (ट्रे को मेज पर धीरे से रखते हुए) "मेमसाब... आज तो चेहरा सुबह-सुबह ही किसी कश्मीरी सेब जैसा लाल हो रहा है। रात को नींद ठीक से नहीं आई क्या? या फिर... ख्वाबों में भी वही कॉकरोच नजर आ रहा था?"

 
मीरा: (नजरें झुकाए हुए, अपनी चाय का घूंट भरते हुए—वही चाय जिसमें नशा घुल चुका था) "शेर... बस करो। कल की बात को बार-बार मत छेड़ो। मैं... मैं सच में बहुत शर्मिंदा हूं। मुझे समझ नहीं आया कि मैं उस वक्त क्या कर रही थी।"

 
शेर: (थोड़ा और करीब झुककर, ताकि वह मीरा के शरीर की खुशबू और उसके ब्लाउज से झांकती गहरी दरार को करीब से देख सके) "अरे मेमसाब, शर्मिंदगी कैसी? वो तो बड़ा ही... हसीन पल था। एक नन्हा सा कीड़ा और आप शेरनी की तरह चीखकर सीधे मेरे सीने से आ लगीं। सच कहूं तो, मैंने कभी सोचा नहीं था कि इतनी बड़ी मेमसाब के अंदर इतना डरपोक, लेकिन इतना 'गर्म' और प्यारा बच्चा छिपा है।"

 
मीरा ने चाय का एक और बड़ा घूंट भरा। उसे महसूस होने लगा कि कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया है। उसके सिर में एक हल्की सी झनझनाहट होने लगी । उसने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और पहली बार शेर को एक 'नौकर' की तरह नहीं, बल्कि एक हट्टे-कट्टे, चौड़े कंधों वाले मर्द की तरह देखा

 
मीरा: (आवाज में एक अजीब सी थराहट के साथ) "शेर! तुम... तुम हद से बाहर जा रहे हो। वो बस एक डर का पल था... मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया।"

 
शेर: (अपनी आवाज को और भी कामुक बनाते हुए) "डर का पल? मेमसाब, आप तो मेरे बदन से ऐसे चिपक गई थीं जैसे कोई बेल पेड़ से लिपट जाती है। आपकी वो कांपन... उफ्फ! मैं तो डर गया था कि कहीं आपका दिल धड़क-धड़क कर मेरे सीने के पार न निकल जाए। और आपके वो... (रुककर, अपनी नजरें मीरा के स्तनों पर टिकाते हुए) आपके वो रसीले, भारी अंग... मेरे सीने पर ऐसे दबे थे जैसे कोई मखमली गद्दियां हों। मुझे तो डर लग रहा था कि आपके उस तंग ब्लाउज के हुक कहीं मेरा सीना छूते ही टूट न जाएं। सच कहूं मेमसाब, कल के बाद से मेरी हथेलियों में वो नरमी अभी भी महसूस हो रही है..."

 
दवा का असर अब मीरा पर हावी होने लगा था। उसे गुस्सा आने के बजाय शेर की इन अश्लील बातों में एक अजीब सा मज़ा आने लगा था। उसे महसूस हुआ कि उसकी चोली के अंदर उसके अंग सख्त हो रहे हैं।

 
मीरा: (कांपते हाथों से अपना चेहरा ढकते हुए, उसकी सांसें अब फूलने लगी थीं) "शेर! बस... बस करो अब! ये तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? शर्म नहीं आती तुम्हें अपनी मेमसाब से ऐसी बातें करते हुए? मैं... मैं उस पल को याद करके ही मरी जा रही हूं और तुम..."

 
शेर: (हल्के से हंसा, वह मीरा के इतना करीब आ गया कि उसकी गर्म सांसें मीरा के गले को छू रही थीं) "अरे मेमसाब... इसमें शर्म कैसी? मैं तो बस उस हकीकत का शुक्रगुजार हूं जो कल घटी। उस कमबख्त कॉकरोच का तो मुझ पर बड़ा अहसान है, वरना मुझ जैसा मामूली नौकर... आपकी इस मखमली काया को छूने का ख्वाब भी कैसे देख पाता? उस पल जब आप मुझ पर गिरीं, तो लगा जैसे आसमान से कोई अप्सरा सीधे मेरी बाहों में उतर आई हो।"

 
मीरा: (उसका चेहरा अब शर्म से ज्यादा उस अनजानी दवा की गर्मी से तप रहा था। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन शेर की मौजूदगी ने उसे सोफे पर ही जकड़ रखा था) "शेर... रुक जाओ! वह... वह बस एक हादसा था। तुमने मेरी मदद की, उसके लिए शुक्रिया... लेकिन ये बातें... ये जिस्म की बातें... प्लीज, मत करो। मेरा जी घबरा रहा है।"

 
शेर ने देखा कि मीरा की हालत अब बदल रही थी। दवा अपना काम कर रही थी।

 
शेर की आंखें मीरा के चेहरे पर टिकी हुई थीं—उसकी लाली, उसकी कांपती सांसें, और ब्लाउज में उभरे हुए चुचियों की वो गोलाई जो अभी भी तेज-तेज ऊपर-नीचे हो रही थी।

 
शेर ने एक पल के लिए अपनी चाल बदली। उसने चेहरा थोड़ा झुकाया, जैसे वह अपनी 'गुस्ताखी' पर शर्मिंदा हो।

 
शेर: (एकदम धीमी, टूटी हुई और भारी आवाज में) "माफ करना मेमसाहिब... मैं तो बस भावनाओं में बह गया था। सच तो ये है कि जब कल रात आप उस तरह बेतहाशा मेरे सीने से लिपट गईं... आपकी वो गर्मी, वो खुशबू... तो मुझे लगा जैसे दो साल बाद मेरी बीवी मेरी बाहों में लौट आई हो। मैं परदेस में कितना अकेला हूं, मेमसाब... घर से दूर, औरत के सुख से दूर... उस पल आपकी उस सिहरन और आपके बदन के उस उभार ने मुझे अहसास दिलाया कि कोई अपना है मेरे पास।"

 
मीरा: (अपने कानों पर हाथ रखते हुए, जैसे वो खुद को शेर की बातों से बचाना चाहती हो, पर उसका शरीर कुछ और ही चाह रहा था) "शेर... प्लीज! मैं... मैं ये सब नहीं सुन सकती। तुम्हें... तुम्हें अपनी हद नहीं भूलनी चाहिए। देखो मेरी हालत... मैं कितनी शर्मिंदा हूं... बस करो..."

 
वो एक पल रुका, फिर और नरम होकर बोला—

 
शेर: "गलती से... मेरे हाथ कहीं गलत जगह लग गए हों... तो... माफ कर देना मेमसाहिब। मैं... मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया। बस... आप इतनी डरी हुई थीं… मैंने सोचा सहारा दूं… लेकिन... शायद मेरी तरफ से गलती हो गई। मुझे... मुझे माफ कर दीजिए।"

 
उसने सिर और नीचा कर लिया—जैसे वो सच में शर्मिंदा हो। लेकिन उसकी आंखें चुपके से मीरा की चुचियों पर, उसकी कमर पर, उसकी कांपती जांघों पर फिर रही थीं। वो जानता था कि उसकी ये "मासूमियत" मीरा के मन में और ज्यादा उलझन पैदा करेगी।
 
 
मीरा: (अभी भी कांपती हुई, लेकिन अब थोड़ी कम आवाज में) "शेर... प्लीज... बस करो। मैं... मैं समझ गई। वो हादसा था। तुमने... तुमने मुझे बचाया। लेकिन... लेकिन अब ये सब बातें... मत करो। मैं... मैं बहुत शर्मिंदा हूं।"

 
मीरा कमरे से बाहर निकलने ही वाली थी कि शेर ने एक बार फिर आवाज लगाई—धीमी।

 
शेर: (एक हंसी के साथ, उसकी नजरें मीरा के नितंबों के उभार पर टिकी थीं) "वैसे मेमसाहिब... एक बात तो सोचिए। अगर सरताज साहब को ये पता चल गया कि उनकी नाजुक और सलीकेदार बीवी एक मामूली कॉकरोच से इतना डरती है... कि वो खुद को संभालने के लिए एक नौकर की बाहों में समा गई? वो भी इतनी बुरी तरह चिपककर... कि उनके बीच हवा जाने की भी जगह नहीं बची थी... तो वो क्या सोचेंगे?"

 
शेर के इन शब्दों ने मीरा के अंदर जैसे एक धमाका कर दिया। अपमान, हवस और दवा के नशे का एक ऐसा सैलाब उमड़ा कि उसकी आंखों में पानी भर आया।

 
वह बिजली की तेजी से मुड़ी, उसकी हरी शिफॉन की साड़ी का पल्लू उसके सुडौल कंधे से सरक कर नीचे गिर गया, जिससे उसके तंग ब्लाउज में कैद स्तनों का उभार और भी नग्नता से शेर के सामने आ गया।

 
मीरा: (गुस्से और शर्म से थरथराते हुए, उसकी आवाज में एक अजीब सी मादकता थी) "शेर! तेरी ये मजाल! अब... अब तू नहीं बचेगा!"

 
वह एक पागलपन की स्थिति में शेर की तरफ झपटी। उसका चेहरा सिंदूरी लाल हो चुका था और भारी सांसों के कारण उसका सीना बेतहाशा ऊपर-नीचे हो रहा था। वह शेर के बिल्कुल करीब पहुंची और अपने छोटे-छोटे, नरम हाथों से उसकी पत्थर जैसी सख्त छाती पर मुक्के बरसाने लगी।

 
मीरा: (पागलों की तरह मारते हुए, हर प्रहार के साथ उसका शरीर शेर के और करीब खिंच रहा था) "तू... तू बहुत ज्यादा बोल रहा है! चुप कर! मैं... मैं तुझे कच्चा चबा जाऊंगी! सरताज को सब बता दूंगी! तू... तू मेरी गरिमा के बारे में ऐसी अश्लील बातें कैसे कर सकता है! नीच... कमीने!"

 
उसके कोमल मुक्के शेर की चौड़ी और बालों से भरी छाती पर पड़ रहे थे, लेकिन शेर को दर्द नहीं, बल्कि एक जिस्मानी लज्जत महसूस हो रही थी। शेर ने अपने हाथ पीछे बांध लिए और सीना तानकर खड़ा हो गया, ताकि मीरा के हाथों का हर स्पर्श उसे और करीब से महसूस हो। वह अपनी गहरी, मर्दाना आवाज में धीमे-धीमे हंस रहा था।

 
शेर: (उसकी आंखों में हवस की आग दहक रही थी) "अरे मेमसाहिब... मारिए... और मारिए! आपके ये मखमली हाथ जब मेरे सीने को छूते हैं, तो लगता है जैसे कोई फूल बरस रहे हों। आप गुस्से में और भी ज्यादा कयामत लगती हैं।"

 
मीरा अब बेकाबू हो रही थी। वह शेर के कंधों और बाहों पर प्रहार कर रही थी, लेकिन उसका अपना शरीर थकान और नशे से ढीला पड़ता जा रहा था। हर बार जब वह मुक्का मारती, उसके ब्लाउज में कैद उसके भारी स्तन एक हिंसक लहर की तरह उछलते, जिसे शेर अपनी भूखी नजरों से पी रहा था। साड़ी का कपड़ा अब उसके बदन से लगभग हट चुका था, और केवल वह तंग ब्लाउज ही उसकी मर्यादा और शेर के बीच खड़ा था।

 
मीरा: (हाफते हुए, थकावट से उसकी आवाज और भी भारी और गीली हो गई थी) "तू... तू शैतान का बच्चा है! मैं... मैं सच में सरताज को बता दूंगी... तू... तू मेरा मजाक उड़ा रहा है... तूने मुझे छुआ... तूने..."

 
मीरा के प्रहार अब धीमे पड़ गए थे और वह लगभग शेर के सीने पर ढहने वाली थी। दवा के असर ने उसके गुस्से को एक बेबस समर्पण में बदलना शुरू कर दिया था।

 
शेर ने अब धीरे से उसके दोनों कलाई पकड़ लिए—नरम, लेकिन मजबूत पकड़ में। वो उसे और करीब खींच लाया—इतना कि मीरा का बदन फिर से उसके सीने से लग गया।

 
शेर: (उसकी आंखों में देखते हुए) "मेमसाहिब... गुस्सा मत कीजिए। मैं तो बस... आपकी वो प्यारी शर्म देख रहा था। और सच कहूं... आप जब गुस्से में भी इतनी खूबसूरत लगती हैं... तो मेरा दिल और तेज धड़कने लगता है।"

 
मीरा ने अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश की—लेकिन शेर की पकड़ मजबूत थी। उसका चेहरा अब और करीब था—उसकी सांस मीरा के होंठों पर लग रही थी। मीरा की आंखें चौड़ी हो गईं—गुस्सा अब डर और एक अजीब सी उत्तेजना में बदल रहा था।

 
शेर: (धीमी, गहरी आवाज में, लेकिन अब एक हल्की शरारत के साथ) "वैसे एक बात पूछूं, मेमसाहिब... आप सरताज साहब को क्या बताओगी?"

 
मीरा एक पल के लिए ठिठक गई। उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। वो समझ गई कि शेर ने उसकी बात को पलट दिया है—अब वो खुद उलझन में पड़ गई थी। उसने गुस्से से सिर हिलाया, लेकिन आवाज में अब वो दृढ़ता नहीं थी।

 
मीरा: (हकलाते हुए, आवाज कमजोर पड़ती हुई) "मैं... मैं उन्हें सब बताऊंगी... कि तू... तूने मेरे साथ... ऐसी... ऐसी बातें कीं... कि... कि मैं... मैं..."

 
शेर ने मीरा की कलाइयों पर अपनी पकड़ और भी पुख्ता कर ली। दवा का असर अब मीरा के दिमाग पर पूरी तरह छा चुका थाथा।

 
शेर: (एकदम करीब आकर, अपनी आवाज को धीमा और गहरा बनाते हुए) "और क्या-क्या बताओगी मेमसाहिब? क्या ये भी बताओगी कि एक छोटे से कीड़े की वजह से आप इस कदर मेरी बाहों में समा गई थीं..."
(बोलते हुए शेर ने अचानक अपना जिस्म आगे किया और मीरा को सटाते हुए अपना पूरा भार उसके नरम बदन पर डाल दिया, ठीक वैसे ही जैसे कल हुआ था।)

 
शेर: "...कि आपकी ये उखड़ी हुई सांसें मेरी गर्दन को झुलसा रही थीं? क्या ये बताओगी कि आपके ये रसीले और भारी अंग... (शेर ने जानबूझकर अपना सख्त सीना मीरा के चूचियां पर रगड़ा)... मेरे सीने पर दबकर इस कदर सख्त हो गए थे कि मुझे उनकी नोक अपनी कमीज के पार महसूस हो रही थी? जैसे वो मुझे पुकार रहे हों?"

 
मीरा ने एक गहरी आह भरी, उसका सिर पीछे की ओर झुक गया। शेर रुका नहीं, उसने अपनी एक टांग मीरा की दोनों जांघों के बीच फंसा दी, जिससे मीरा की साड़ी का घेरा तन गया।

 
शेर: (उसकी आंखों में हवस की आग जलाते हुए) "क्या सरताज साहब को ये बताओगी कि आपकी ये पतली और रेशमी कमर... (शेर ने अपनी एक हथेली पीछे ले जाकर मीरा के कूल्हों के ठीक ऊपर रखी और उसे अपनी ओर जोर से भींचा)... मेरी हथेलियों पर किसी मछली की तरह फिसल रही थी? और जब मेरा हाथ गलती से... (उसने अपनी टांग का दबाव मीरा की जांघों के बीच बढ़ाया)... आपकी इन गोरी रानों के बीच के उस गर्म हिस्से को छू गया था, तो आप डर से नहीं बल्कि एक अनजानी प्यास से कांप रही थीं?"

 
मीरा का बदन अब दवा और शेर की इस हरकत से पूरी तरह पिघल चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह शेर को धक्का दे या उसे और जोर से थाम ले।

 
आप ये सब सरताज साहब को बताओगी?

 
मीरा: (रोते हुए, लेकिन गुस्से में) "बस कर... शेर... प्लीज... मैं... मैं सरताज को कुछ नहीं बताऊंगी... लेकिन तू... तू अब ये सब मत बोल...."

 
वो धीरे से पीछे हटा।  

 
मीरा का रोम-रोम दवा के नशे और शेर के उस ज़बरदस्त स्पर्श से थरथरा रहा था। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू समेटा, लेकिन उसकी उंगलियां इतनी बेदम थीं कि रेशमी कपड़ा बार-बार उसके सुडौल कंधे से फिसल रहा था।

 
शेर: (नरम होकर) "मेमसाहिब... सॉरी। दिल से माफ़ी मांगता हूं। मैं तो बस... ज़रा सा मज़ाक कर रहा था। मुझे नहीं पता था कि मेरी बातें आपके दिल को इस कदर चीर देंगी। आप इतना गुस्सा मत होइए… देखिए, अब मैं ज़ुबान पर ताला लगा लेता हूं।"

 
मीरा के कदम बेडरूम की तरफ बढ़ रहे थे। वह रुकी, उसकी सांसें अब भी भारी थीं और दवा के कारण उसके चेहरे पर एक अजीब सी लाली और आंखों में हल्की खुमारी थी। उसने पलटकर शेर को देखा—उसकी नजरों में गुस्सा तो था, लेकिन वह अब उस नशे के आगे घुटने टेक रहा था।

 
शेर: (अपनी मुस्कान को थोड़ा और गहरा करते हुए) "वैसे मेमसाहिब... अगर बुरा न मानें तो एक बात पूछूं? ये कॉकरोच वाला डर... ये कब से आपके इस खूबसूरत बदन में घर कर गया है? इतनी बहादुर मेमसाहिब और एक छोटा सा कीड़ा?"

 
मीरा ने उसे घूरा, लेकिन उस घूरने में अब वो सख्ती नहीं थी। शेर की नज़रों का जादू और चाय में घुला वो ज़हर उसे निढाल कर रहा था। उसने पास की दीवार का सहारा लिया, क्योंकि उसके पैर अब उसका बोझ उठाने से इनकार कर रहे थे।

 
मीरा: (आंखें नीची करके, पुरानी याद में खोकर) "बचपन से... बचपन से ही डरती हूं। एक बार... एक बार दो कॉकरोच मेरे पैरों पर चढ़ गए थे। मैं सो रही थी... रात को... और वो... वो मेरी टांगों पर दौड़ने लगे। उनकी वो तेज, ठंडी, चिपचिपी दौड़... पैरों पर... इतनी घिनौनी... इतनी डरावनी... मैं चीख पड़ी थी। मां आई थी... लेकिन वो सनसनी... वो क्रिपी फीलिंग... आज भी याद है। तब से... बस देखते ही डर लग जाता है।"

 
शेर ने धीरे से सिर हिलाया—जैसे वो समझ रहा हो।

 
शेर ने सिर और नीचा कर लिया—जैसे वो सच में बहुत शर्मिंदा हो।

 
शेर: (आवाज में पछतावा और मासूमियत का मिश्रण, सिर झुकाए हुए) "मेमसाहिब... सॉरी। सच में सॉरी। आप कहो तो मैं कान पकड़ लेहूँ… सच में। असल में मैं तो बस ये बात फिर से लाना चाहता था... ताकि आप मेरे बारे में कोई गलत फीलिंग न रखें। कल आप अचानक से मेरी बाहों में आ गईं… और मैं... मैं क्या करूं... आप हो ही इतनी खूबसूरत कि कोई मुर्दा ही होगा, जो रिएक्ट न करे। फिर मैं तो वैसे ही दो साल से अपनी बीवी से दूर हूं... अकेला... तो वो पल... वो गर्माहट... वो स्पर्श... मुझे लगा जैसे कोई अपना है मेरे पास। गलती हो गई... शायद मेरे हाथ कहीं गलत जगह लग गए… लेकिन जानबूझकर नहीं… मैं बस आपकी मदद करना चाहता था।"

 
वो एक पल रुका। फिर धीरे से अपना दायां कान पकड़ लिया—जैसे बच्चे कॉलेज में सजा पाते हैं। उसकी आंखें नीची थीं, लेकिन चुपके से मीरा के चेहरे पर, उसके कांपते होंठों पर, उसके ब्लाउज में उभरे हुए चुचियों पर नजर डाल रहा था।

 
शेर: (कान पकड़े हुए, आवाज में अब और ज्यादा मासूमियत) "देखिए... कान पकड़ लिया। अब आप गुस्सा मत कीजिए। मैं... मैं सच में बहुत शर्मिंदा हूं। आप इतनी अच्छी हैं... इतनी प्यारी... । बस... आप मेरे बारे में बुरा मत सोचिए। मैं... मैं आपका नौकर हूँ… आपकी सेवा में हूं।"

 
मीरा अभी भी दीवार से टिकी हुई थी। उसका चेहरा लाल था—शर्म से, गुस्से से, और अब एक अजीब सी उलझन से। शेर की ये "मासूमियत" उसे और कन्फ्यूज कर रही थी।

 
 
मीरा: (आवाज में अब गुस्सा कम, लेकिन शर्म ज्यादा) "शेर... तू... तू सच में शर्मिंदा है? या... या फिर ये सब... मजाक है? मैं... मैं समझ नहीं पा रही... तू... तू ऐसे क्यों बोल रहा है?"

 
शेर ने कान छोड़ा। उसने धीरे से सिर उठाया—अब उसकी आंखें मीरा की आंखों में थीं। उसकी आवाज अब और गहरी, लेकिन अभी भी "मासूम" थी।

 
शेर: (धीरे-धीरे, जैसे कोई राज खोल रहा हो) "मेमसाहिब... मैं मजाक नहीं कर रहा। मैं सच कह रहा हूं। दो साल से मैं अकेला हूं... अपनी बीवी को छूया नहीं... उसके स्पर्श को महसूस नहीं किया। कल... जब आप मेरी बाहों में आईं... आपका वो बदन... वो गर्माहट... वो नरमी... मुझे लगा जैसे... जैसे मेरी बीवी मेरे पास है। मैं... मैं इंसान हूं... मर्द हूं। आप इतनी खूबसूरत... इतनी नरम... इतनी गरम... कोई भी मर्द रिएक्ट करेगा। लेकिन मैंने... मैंने कुछ गलत नहीं किया। बस... वो पल... वो मेरे लिए बहुत खास था। अगर आपको बुरा लगा... तो सच में सॉरी। लेकिन... आपकी वो सिहरन... वो कांपन... वो मेरी याद में कैद है।"

 
मीरा ने आंखें बंद कर लीं। उसके गालों पर आंसू बह रहे थे। वो समझ नहीं पा रही थी—शेर की बातें सच लग रही थीं... लेकिन साथ ही बहुत खतरनाक भी।

 
मीरा: (बहुत कमजोर, रोते हुए) "शेर... बस... अब मत बोल... मैं... मैं समझ गई। मुझे अकेला छोड़ दे।"

 
शेर ने एक पल उसे देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।

 
मीरा अपने बेडरूम में दाखिल हुई और कांपते हाथों से दरवाजा बंद कर लिया। वह बिस्तर के किनारे ढह सी गई। दवा का असर अब उसके दिमाग के तर्कों को कुचल रहा था और उसके जिस्म की दबी हुई आग को सहानुभूति की चादर ओढ़ा रहा था।

 
उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया, लेकिन बंद आंखों के पीछे उसे शेर का वह मासूमियत भरा चेहरा और चौड़ा सीना ही नजर आ रहा था।

 
मीरा (आंतरिक संवाद): "हे वाहेगुरु... ये मुझे क्या हो गया है? मैं क्यों इतनी विचलित हूं? शेर... शेर की बातें... वो बार-बार कानों में क्यों गूंज रही हैं? 'दो साल से बीवी से दूर हूं'... 'मर्द हूं'... हां, वो सच ही तो कह रहा था। वो कोई पत्थर तो नहीं है। एक परदेसी आदमी, अपनों से दूर, और मैं... मैं कल पागलों की तरह उसके बदन से जा लिपटी। मेरी चूचियां उसके सीने में धंस गईं, मेरी जांघें उसकी जांघों की गर्मी महसूस कर रही थीं... और उसका हाथ... (मीरा ने एक गहरी और लंबी सांस ली, उसके स्तन ब्लाउज के अंदर और सख्त हो गए)… उसका हाथ जो मेरी जांघों के बीच की उस नाजुक जगह को छू गया था... वो यकीनन एक हादसा ही रहा होगा।"

 
मीरा ने तकिये को जोर से अपने सीने से लगा लिया। जैसे-जैसे चाय में घुली दवा अपना रंग दिखा रही थी, मीरा का शरीर एक अजीब सी जंग लड़ने लगा था।

 
मीरा (सिसकते हुए, वाहेगुरु को याद करते हुए): "सच्चे पातिशाह... मुझे राह दिखाओ। मैं सरताज से प्यार करती हूं... सौ फीसदी करती हूं। वो मेरे पति हैं, मेरा सब कुछ हैं। फिर... फिर मेरा ये बदन शेर के करीब जाते ही ऐसे बागी क्यों हो जाता है? क्यों शेर की उस भारी आवाज को सुनकर मेरी रगों में लावा बहने लगता है? क्यों जब वो मुझे छूता है—चाहे वो गलती से ही क्यों न हो—तो मुझे एक ऐसी लज्जत महसूस होती है जो सरताज के साथ भी कभी महसूस नहीं हुई? क्या मैं इतनी गिर गई हूं? नहीं... मैं एक वफादार पत्नी हूं।"

 
मीरा बिस्तर पर लेट गई और खुद को तकिये में समेट लिया। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी योनि और जांघों के बीच एक गीलापन और भारीपन बढ़ता जा रहा है।

 
मीरा (खुद को समझाते हुए): "मीरा, तू बहुत गलत थी। शेर एक नेक इंसान है। उसने ज्योति का ख्याल रखा, घर संभाला… चंदन जी ने उस पर भरोसा किया था। उसने तो कान पकड़ कर माफी भी मांगी। वो गरीब आदमी अपनी मजबूरी बता रहा था और मैं उसे शैतान समझ बैठी। उसका हाथ... वो बस मुझे गिरने से बचा रहा था। अब मैं उसे गलत नहीं समझूंगी। वो बस एक मददगार है... एक अकेला मर्द, जिसे बस थोड़ी सी हमदर्दी चाहिए। मुझे उसे माफ कर देना चाहिए।"

 
वो बिस्तर पर लेट गई। उसने तकिया गले से लगाया—जैसे खुद को सांत्वना दे रही हो।

 
बाहर गलियारे में शेर खड़ा था—दरवाजे के पास। उसने सब सुना था। उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई थी।

 
शेर [आंतरिक संवाद, विजयी अंदाज में]: "अब तू खुद को कोस रही है... अब तू मुझे अच्छा इंसान समझ रही है... अब तेरा मन मेरे खिलाफ नहीं लड़ेगा। तूने खुद को कन्विंस कर लिया कि मैं निर्दोष हूं... कि वो पल हादसा था। तेरा अपराधबोध... तेरी शर्म... तेरी ये मासूमियत... सब मुझे और करीब ला रही है। जल्द ही... तू खुद मेरे पास आएगी।"

 
वो धीरे से मुड़ा और किचन की तरफ चला गया—अगली चाल की तैयारी में।
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 16-03-2026, 07:43 AM



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