14-03-2026, 07:22 PM
मैं जल्दी से कमरे से बाहर निकला।
दरवाज़ा बंद करते ही सीढ़ियाँ उतरने लगा—लिफ्ट का इंतज़ार करने का समय नहीं था।
दिल धड़क रहा था—जोर-जोर से।
चेहरा अभी भी गीला था—सैंडी के रस, अलोक जी के रस, लार—सब मिलकर।
मैंने शर्ट के आस्तीन से पोंछा—लेकिन वो खुशबू... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।
कमरे के दरवाज़े पर पहुँचा।
कार्ड लगाया।
दरवाज़ा खुला।
नेहा अंदर थी—पूरी तरह तैयार।
बाल बाँधे हुए, मेकअप हल्का सा, बैग पैक करके तैयार।
वो सोफे पर बैठी थी—हाथ गोद में, नज़र नीचे।
मैंने उसे देखा।
वो चुप थी।
कोई सवाल नहीं।
कोई गुस्सा नहीं।
बस... चुप।
मैंने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की।
"सॉरी... देर हो गई।
रिसेप्शन पर बहुत टाइम लगा... फिर लोकल मार्केट गया... चेरी पिकिंग के बारे में पूछने।"
नेहा ने सिर ऊपर किया।
उसकी आँखें... थोड़ी लाल थीं।
जैसे रोई हो।
उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई भावना नहीं।
"कोई बात नहीं।
मुझे घर जाना है।
अब... बस घर।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... सिर हिलाया।
फोन उठाया।
रूम सर्विस को कॉल किया—लगेज़ लेने के लिए।
वही लड़का आया—जिसने कल नेहा को टॉपलेस देखा था।
उसने मुस्कुराया—एक छोटी, जानकार वाली मुस्कान।
नेहा ने नज़र नहीं मिलाई।
वो सोफे पर बैठी रही—नज़र नीचे।
मैं चेकआउट के फॉर्म भरने लगा।
नेहा चुपचाप बैठी रही।
लड़के ने लगेज़ उठाया।
हम बाहर निकले।
लिफ्ट में नेहा मेरे बगल में खड़ी थी।
उसकी पायल हल्की-सी बज रही थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
वो हाथ नहीं छुड़ाया।
लेकिन... कोई जवाब भी नहीं दिया।
लॉबी में पहुँचे।
बिल सेटल किया।
कार बाहर थी।
लॉबी में नेहा सोफे पर बैठी थी—जींस और टी-शर्ट में, साधारण लेकिन खूबसूरत।
बाल खुले हुए, चेहरा थोड़ा थका हुआ, लेकिन आँखें साफ़, चुपचाप फोन स्क्रॉल कर रही थी।
डेविड और विशाल लॉबी के दूसरे कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।
वे धीमे-धीमे बात कर रहे थे—विस्परिंग, लेकिन इतना कि पास बैठे लोग सुन न सकें।
उनकी हँसी छोटी-छोटी, गंदी, जानकार वाली।
विशाल ने पहले बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।
"यार... जो कल हमने बम फोड़ा था... अब जो बम हमारे पास है... वो तो और ज़्यादा आवाज़ करेगा।"
डेविड ने
नेहा सुन रही थी।
उसकी आँखें फोन पर थीं—लेकिन कान उन पर थे।
वो सब समझ रही थी—हर शब्द।
बालकनी में... वो सब देखा था।
डेविड और विशाल के नंगे लुंड—मोटे, भारी, लटकते हुए।
सैंडी के चेहरे पर तपतपाते हुए।
दी-गंदी गालियाँ देते हुए।
वो सब... नेहा ने देखा था।
उसकी साँसें तेज़ हुई थीं।
उसकी जांघें काँपी थीं।
और... ये दोनों... उसकी तुलना सैंडी से कर रहे थे।
"बम फोड़ा था"... "अब ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा"।
नेहा का चेहरा स्ट्रेट था।
कोई एक्सप्रेशन नहीं।
न गुस्सा।
न शर्म।
न मुस्कान।
बस... एक खाली, शांत चेहरा।
उसकी आँखें फोन पर टिकी हुईं—लेकिन वो सब सुन रही थी।
डेविड ने फिर धीमे से कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली भूख।
अब... सोच... अगर ये... हमारे सामने घुटनों पर बैठ जाए... हम दोनों... एक साथ।
सैंडी से भी ज़्यादा... आवाज़ आएगी।"
नेहा ने फोन बंद किया।
धीरे से उठी।
उसकी पायल हल्की-सी बजी।
वो दोनों की तरफ नहीं देखी।
बस... चुपचाप बाहर की तरफ चल पड़ी।
नेहा लॉबी में खड़ी थी—जींस और टी-शर्ट में, बैग कंधे पर, बाहर जाने की तैयारी में।
उसकी कमर सीधी, लेकिन चलते वक्त उसकी गांड हल्की-सी लहरा रही थी—साधारण, लेकिन आकर्षक।
डेविड और विशाल लॉबी के कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।
उनकी आँखें उसकी गांड पर टिकी हुई थीं—भूखी, गंदी, जैसे वो उसे निगल जाना चाहते हों।
डेविड ने विशाल के कान में फुसफुसाया—आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ़ पास वाले सुन सकें।
"यार... अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"
दोनों ने एक साथ हँसी—छोटी, गंदी, जानकार वाली हँसी।
नेहा ने आखिरी शब्द सुने—"ठीक से चल भी नहीं पाएगी"।
उसका कदम एक पल के लिए रुक गया।
उसकी पीठ सीधी हो गई—कोई एक्सप्रेशन नहीं, बस एक छोटा सा झटका।
वो मुड़ी नहीं।
बस... बाहर की तरफ बढ़ गई।
मैं पीछे-पीछे आया—उसके साथ।
डेविड और विशाल ने मुझे देखा।
दोनों ने हाथ हिलाया—एक मज़ाकिया, "बाय" वाला जेस्चर।
जैसे कह रहे हों—"अभी तो जा... लेकिन जल्दी ही मिलेंगे।"
मैंने भी हल्का सा हाथ हिलाया—बिना मुस्कुराए।
फिर नेहा के साथ बाहर निकला।
कार के पास पहुँचे।
नेहा ने दरवाज़ा खोला—पीछे की सीट पर बैठ गई।
मैं ड्राइवर सीट पर।
इंजन स्टार्ट किया।
कार चल पड़ी।
कार में सन्नाटा था।
केवल इंजन की हल्की गड़गड़ाहट, एसी की सिसकारी, और कभी-कभी नेहा की साड़ी की सरसराहट जब वो खिड़की की तरफ मुड़ती।
मैं ड्राइव कर रहा था—आँखें सड़क पर, लेकिन दिमाग कहीं और।
पिछले 24 घंटे... जैसे कोई सपना हो... या कोई बुरा मजाक।
वेटर ने नेहा को टॉपलेस देखा था।
मैंने देखा था... और मुझे अच्छा लगा था।
उसकी नजरें नेहा के स्तनों पर टिकीं... और मैंने उसे रोका नहीं।
बल्कि... मैंने एंजॉय किया।
फिर... ऑर्गी में शामिल हो गया।
डेविड, विशाल, अलोक ... सैंडी के साथ।
मैंने लगभग सैंडी को चोदा था—इंस्टा मॉडल, जिसे देखकर कल्पना करता था।
लेकिन... कभी सच में नहीं छुआ।
फिर... अपनी ही पत्नी के साथ... लाइव सेक्स सीन देखा।
नेहा... मेरी मासूम नेहा... बालकनी
डेविड और विशाल के नंगे लुंड देख रही थी।
उसकी साँसें तेज़ थीं... जांघें काँप रही थीं।
वो सब... मैंने देखा था।
फिर... अपमान।
सैंडी ने मुझे "चूत का भिखारी" कहा।
अलोक जी ने कहा—"नन्हू"।
मैंने चाटा—उनका कम, उसकी चूत से।
मेरा कम फर्श पर... और मैंने साफ़ किया।
उनके हँसने की आवाज़ अभी भी कानों में गूंज रही थी।
नेहा खिड़की की तरफ देख रही थी।
बाहर की सड़कें धुंधली हो रही थीं—कार की स्पीड से, या आँखों में आते पानी से।
वो चुप थी।
बहुत चुप।
उसके मन में... एक तूफान चल रहा था।
नेहा के मन की बातें...
वो बूढ़ा आदमी... अलोक।
रिसेप्शन पर... ब्रेकफास्ट पर... वो मुझे देखकर मुस्कुराया था।
"क्या आप किसी एजेंसी से आई हैं?"
उसने पूछा था।
उसकी आँखों में वो भूख... वो लालच... जैसे मैं कोई चीज़ हूँ... कोई सामान।
उसे लगा... मैं वो लड़की हूँ... जो पैसे लेकर आती है।
प्रॉस्टिट्यूट।
उसे लगा... मैं सैंडी हूँ।
उसने सोचा... मैं उसके साथ रूम में... बालकनी में... उसके दोस्तों के साथ... चुदूँगी।
चीप ... बहुत चीप आदमी।
और मैं... मैंने उसकी उँगलियों को छुआ था।
उसके हाथ पर... हल्का-सा स्पर्श।
मैंने शरमाई थी।
हँसी थी।
क्यों?
क्यों मैंने उसे रोका नहीं?
क्यों मैंने उसकी बातों पर हँसकर जवाब दिया?
अब... वो लोग मेरे बारे में बात कर रहे थे।
"बम फोड़ा था..."
"ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा..."
"अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो कल ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"
मैंने सुना।
हर शब्द सुना।
मेरी गांड पर उनकी नज़रें... जैसे वो मुझे निगल जाना चाहते हों।
मुझे... सैंडी समझ रहे थे।
मुझे... चीप ... नखरे वाली... लेकिन अलोक जी से लाइन पर लाई जा सकती हूँ।
मैंने सोचा... अगर मैं सैंडी होती... तो क्या होता?
उनके सामने घुटनों पर... उनके लुंड... मेरे मुँह में... चेहरे पर...
और मैं... खुश होती?
मैं... हँसती?
मैं... आहें भरती?
मुझे... अच्छा लग रहा था।
सोचते हुए... मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं।
मेरी जांघें काँप रही थीं।
मैं... खुद को रोक नहीं पा रही थी।
लेकिन... सैम... मेरे मासूम सैम।
वो क्या सोचेंगे?
अगर उन्हें पता चले... कि मैंने क्या सुना... क्या सोचा...
वो... क्या सोचेंगे मेरे बारे में?
कि मैं... सस्ती हूँ?
कि मैं... किसी और के लिए तरस रही हूँ?
कि मैं... उनकी बीवी नहीं... बस... एक औरत हूँ... जो बड़े लुंड देखकर शरमा जाती है?
कार चलती रही।
सन्नाटा अब इतना गहरा हो चुका था कि बाहर की हवा की आवाज़ भी कम लग रही थी।
मैंने दाएँ हाथ से शर्ट की जेब टटोली।
कार्ड अभी भी वहाँ था—काला, मोटा, चिकना।
अलोक
केवल एक नंबर।
फार्महाउस इन्विटेशन्स ओनली।
ये कार्ड... ये एकमात्र चीज़ थी जो साबित कर रही थी कि जो हुआ... वो सपना नहीं था।
वरना सब... एक भयानक, गंदा, उत्तेजक सपना लगता।
बाकी सब... धुंधले, असली लगने वाले सपने जैसे।
मेरे पास अब क्या बचा था?
सैंडी की याद—उसकी ठंडी मुस्कान, उसकी कड़वी हँसी, उसकी चूत की गर्मी मेरी जीभ पर, उसका "चूत का भिखारी" कहना।
ये कार्ड—जो मेरी जेब में जल रहा था।
होटल की लॉन्ड्री बैग—जिसमें नेहा की लाल लेस वाली ब्रा और पैंटी थीं।
उन पर अब 5-6 अलग-अलग आदमियों का कम था अभी भी ट्रॉली में था, पीछे की सीट पर।
नेहा को पता नहीं था।
या शायद... पता था।
और ये लंबा सन्नाटा सड़क पर।
जैसे तूफ़ान आने से पहले की शांति।
Chapter 2 – समाप्त।
अगला अध्याय – हमारा अतीत
( मेरा अतीत... नेहा का अतीत... हमारी ट्रेनिंग... इस अलग दुनिया से पहली मुलाकात... थोड़ा बाई-क्यूरियस... थोड़ा इनसेस्ट... और आखिर में... पति का अंत )
दरवाज़ा बंद करते ही सीढ़ियाँ उतरने लगा—लिफ्ट का इंतज़ार करने का समय नहीं था।
दिल धड़क रहा था—जोर-जोर से।
चेहरा अभी भी गीला था—सैंडी के रस, अलोक जी के रस, लार—सब मिलकर।
मैंने शर्ट के आस्तीन से पोंछा—लेकिन वो खुशबू... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।
कमरे के दरवाज़े पर पहुँचा।
कार्ड लगाया।
दरवाज़ा खुला।
नेहा अंदर थी—पूरी तरह तैयार।
बाल बाँधे हुए, मेकअप हल्का सा, बैग पैक करके तैयार।
वो सोफे पर बैठी थी—हाथ गोद में, नज़र नीचे।
मैंने उसे देखा।
वो चुप थी।
कोई सवाल नहीं।
कोई गुस्सा नहीं।
बस... चुप।
मैंने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की।
"सॉरी... देर हो गई।
रिसेप्शन पर बहुत टाइम लगा... फिर लोकल मार्केट गया... चेरी पिकिंग के बारे में पूछने।"
नेहा ने सिर ऊपर किया।
उसकी आँखें... थोड़ी लाल थीं।
जैसे रोई हो।
उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई भावना नहीं।
"कोई बात नहीं।
मुझे घर जाना है।
अब... बस घर।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... सिर हिलाया।
फोन उठाया।
रूम सर्विस को कॉल किया—लगेज़ लेने के लिए।
वही लड़का आया—जिसने कल नेहा को टॉपलेस देखा था।
उसने मुस्कुराया—एक छोटी, जानकार वाली मुस्कान।
नेहा ने नज़र नहीं मिलाई।
वो सोफे पर बैठी रही—नज़र नीचे।
मैं चेकआउट के फॉर्म भरने लगा।
नेहा चुपचाप बैठी रही।
लड़के ने लगेज़ उठाया।
हम बाहर निकले।
लिफ्ट में नेहा मेरे बगल में खड़ी थी।
उसकी पायल हल्की-सी बज रही थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
वो हाथ नहीं छुड़ाया।
लेकिन... कोई जवाब भी नहीं दिया।
लॉबी में पहुँचे।
बिल सेटल किया।
कार बाहर थी।
लॉबी में नेहा सोफे पर बैठी थी—जींस और टी-शर्ट में, साधारण लेकिन खूबसूरत।
बाल खुले हुए, चेहरा थोड़ा थका हुआ, लेकिन आँखें साफ़, चुपचाप फोन स्क्रॉल कर रही थी।
डेविड और विशाल लॉबी के दूसरे कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।
वे धीमे-धीमे बात कर रहे थे—विस्परिंग, लेकिन इतना कि पास बैठे लोग सुन न सकें।
उनकी हँसी छोटी-छोटी, गंदी, जानकार वाली।
विशाल ने पहले बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।
"यार... जो कल हमने बम फोड़ा था... अब जो बम हमारे पास है... वो तो और ज़्यादा आवाज़ करेगा।"
डेविड ने
नेहा सुन रही थी।
उसकी आँखें फोन पर थीं—लेकिन कान उन पर थे।
वो सब समझ रही थी—हर शब्द।
बालकनी में... वो सब देखा था।
डेविड और विशाल के नंगे लुंड—मोटे, भारी, लटकते हुए।
सैंडी के चेहरे पर तपतपाते हुए।
दी-गंदी गालियाँ देते हुए।
वो सब... नेहा ने देखा था।
उसकी साँसें तेज़ हुई थीं।
उसकी जांघें काँपी थीं।
और... ये दोनों... उसकी तुलना सैंडी से कर रहे थे।
"बम फोड़ा था"... "अब ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा"।
नेहा का चेहरा स्ट्रेट था।
कोई एक्सप्रेशन नहीं।
न गुस्सा।
न शर्म।
न मुस्कान।
बस... एक खाली, शांत चेहरा।
उसकी आँखें फोन पर टिकी हुईं—लेकिन वो सब सुन रही थी।
डेविड ने फिर धीमे से कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली भूख।
अब... सोच... अगर ये... हमारे सामने घुटनों पर बैठ जाए... हम दोनों... एक साथ।
सैंडी से भी ज़्यादा... आवाज़ आएगी।"
नेहा ने फोन बंद किया।
धीरे से उठी।
उसकी पायल हल्की-सी बजी।
वो दोनों की तरफ नहीं देखी।
बस... चुपचाप बाहर की तरफ चल पड़ी।
नेहा लॉबी में खड़ी थी—जींस और टी-शर्ट में, बैग कंधे पर, बाहर जाने की तैयारी में।
उसकी कमर सीधी, लेकिन चलते वक्त उसकी गांड हल्की-सी लहरा रही थी—साधारण, लेकिन आकर्षक।
डेविड और विशाल लॉबी के कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।
उनकी आँखें उसकी गांड पर टिकी हुई थीं—भूखी, गंदी, जैसे वो उसे निगल जाना चाहते हों।
डेविड ने विशाल के कान में फुसफुसाया—आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ़ पास वाले सुन सकें।
"यार... अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"
दोनों ने एक साथ हँसी—छोटी, गंदी, जानकार वाली हँसी।
नेहा ने आखिरी शब्द सुने—"ठीक से चल भी नहीं पाएगी"।
उसका कदम एक पल के लिए रुक गया।
उसकी पीठ सीधी हो गई—कोई एक्सप्रेशन नहीं, बस एक छोटा सा झटका।
वो मुड़ी नहीं।
बस... बाहर की तरफ बढ़ गई।
मैं पीछे-पीछे आया—उसके साथ।
डेविड और विशाल ने मुझे देखा।
दोनों ने हाथ हिलाया—एक मज़ाकिया, "बाय" वाला जेस्चर।
जैसे कह रहे हों—"अभी तो जा... लेकिन जल्दी ही मिलेंगे।"
मैंने भी हल्का सा हाथ हिलाया—बिना मुस्कुराए।
फिर नेहा के साथ बाहर निकला।
कार के पास पहुँचे।
नेहा ने दरवाज़ा खोला—पीछे की सीट पर बैठ गई।
मैं ड्राइवर सीट पर।
इंजन स्टार्ट किया।
कार चल पड़ी।
कार में सन्नाटा था।
केवल इंजन की हल्की गड़गड़ाहट, एसी की सिसकारी, और कभी-कभी नेहा की साड़ी की सरसराहट जब वो खिड़की की तरफ मुड़ती।
मैं ड्राइव कर रहा था—आँखें सड़क पर, लेकिन दिमाग कहीं और।
पिछले 24 घंटे... जैसे कोई सपना हो... या कोई बुरा मजाक।
वेटर ने नेहा को टॉपलेस देखा था।
मैंने देखा था... और मुझे अच्छा लगा था।
उसकी नजरें नेहा के स्तनों पर टिकीं... और मैंने उसे रोका नहीं।
बल्कि... मैंने एंजॉय किया।
फिर... ऑर्गी में शामिल हो गया।
डेविड, विशाल, अलोक ... सैंडी के साथ।
मैंने लगभग सैंडी को चोदा था—इंस्टा मॉडल, जिसे देखकर कल्पना करता था।
लेकिन... कभी सच में नहीं छुआ।
फिर... अपनी ही पत्नी के साथ... लाइव सेक्स सीन देखा।
नेहा... मेरी मासूम नेहा... बालकनी
डेविड और विशाल के नंगे लुंड देख रही थी।
उसकी साँसें तेज़ थीं... जांघें काँप रही थीं।
वो सब... मैंने देखा था।
फिर... अपमान।
सैंडी ने मुझे "चूत का भिखारी" कहा।
अलोक जी ने कहा—"नन्हू"।
मैंने चाटा—उनका कम, उसकी चूत से।
मेरा कम फर्श पर... और मैंने साफ़ किया।
उनके हँसने की आवाज़ अभी भी कानों में गूंज रही थी।
नेहा खिड़की की तरफ देख रही थी।
बाहर की सड़कें धुंधली हो रही थीं—कार की स्पीड से, या आँखों में आते पानी से।
वो चुप थी।
बहुत चुप।
उसके मन में... एक तूफान चल रहा था।
नेहा के मन की बातें...
वो बूढ़ा आदमी... अलोक।
रिसेप्शन पर... ब्रेकफास्ट पर... वो मुझे देखकर मुस्कुराया था।
"क्या आप किसी एजेंसी से आई हैं?"
उसने पूछा था।
उसकी आँखों में वो भूख... वो लालच... जैसे मैं कोई चीज़ हूँ... कोई सामान।
उसे लगा... मैं वो लड़की हूँ... जो पैसे लेकर आती है।
प्रॉस्टिट्यूट।
उसे लगा... मैं सैंडी हूँ।
उसने सोचा... मैं उसके साथ रूम में... बालकनी में... उसके दोस्तों के साथ... चुदूँगी।
चीप ... बहुत चीप आदमी।
और मैं... मैंने उसकी उँगलियों को छुआ था।
उसके हाथ पर... हल्का-सा स्पर्श।
मैंने शरमाई थी।
हँसी थी।
क्यों?
क्यों मैंने उसे रोका नहीं?
क्यों मैंने उसकी बातों पर हँसकर जवाब दिया?
अब... वो लोग मेरे बारे में बात कर रहे थे।
"बम फोड़ा था..."
"ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा..."
"अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो कल ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"
मैंने सुना।
हर शब्द सुना।
मेरी गांड पर उनकी नज़रें... जैसे वो मुझे निगल जाना चाहते हों।
मुझे... सैंडी समझ रहे थे।
मुझे... चीप ... नखरे वाली... लेकिन अलोक जी से लाइन पर लाई जा सकती हूँ।
मैंने सोचा... अगर मैं सैंडी होती... तो क्या होता?
उनके सामने घुटनों पर... उनके लुंड... मेरे मुँह में... चेहरे पर...
और मैं... खुश होती?
मैं... हँसती?
मैं... आहें भरती?
मुझे... अच्छा लग रहा था।
सोचते हुए... मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं।
मेरी जांघें काँप रही थीं।
मैं... खुद को रोक नहीं पा रही थी।
लेकिन... सैम... मेरे मासूम सैम।
वो क्या सोचेंगे?
अगर उन्हें पता चले... कि मैंने क्या सुना... क्या सोचा...
वो... क्या सोचेंगे मेरे बारे में?
कि मैं... सस्ती हूँ?
कि मैं... किसी और के लिए तरस रही हूँ?
कि मैं... उनकी बीवी नहीं... बस... एक औरत हूँ... जो बड़े लुंड देखकर शरमा जाती है?
कार चलती रही।
सन्नाटा अब इतना गहरा हो चुका था कि बाहर की हवा की आवाज़ भी कम लग रही थी।
मैंने दाएँ हाथ से शर्ट की जेब टटोली।
कार्ड अभी भी वहाँ था—काला, मोटा, चिकना।
अलोक
केवल एक नंबर।
फार्महाउस इन्विटेशन्स ओनली।
ये कार्ड... ये एकमात्र चीज़ थी जो साबित कर रही थी कि जो हुआ... वो सपना नहीं था।
वरना सब... एक भयानक, गंदा, उत्तेजक सपना लगता।
बाकी सब... धुंधले, असली लगने वाले सपने जैसे।
मेरे पास अब क्या बचा था?
सैंडी की याद—उसकी ठंडी मुस्कान, उसकी कड़वी हँसी, उसकी चूत की गर्मी मेरी जीभ पर, उसका "चूत का भिखारी" कहना।
ये कार्ड—जो मेरी जेब में जल रहा था।
होटल की लॉन्ड्री बैग—जिसमें नेहा की लाल लेस वाली ब्रा और पैंटी थीं।
उन पर अब 5-6 अलग-अलग आदमियों का कम था अभी भी ट्रॉली में था, पीछे की सीट पर।
नेहा को पता नहीं था।
या शायद... पता था।
और ये लंबा सन्नाटा सड़क पर।
जैसे तूफ़ान आने से पहले की शांति।
Chapter 2 – समाप्त।
अगला अध्याय – हमारा अतीत
( मेरा अतीत... नेहा का अतीत... हमारी ट्रेनिंग... इस अलग दुनिया से पहली मुलाकात... थोड़ा बाई-क्यूरियस... थोड़ा इनसेस्ट... और आखिर में... पति का अंत )


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