13-03-2026, 12:22 AM
सुबह के 6:30 बजे कमरे में रखी अलार्म घड़ी की हल्की-सी ट्रिन… ट्रिन… की आवाज़ गूँज उठी।
“अनंत शांति निवास” की एक नई सुबह शुरू हो चुकी थी।
कल्याणी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। कुछ पल तक वह वैसे ही लेटी रही, फिर हाथों से आँखें मलते हुए उठकर बैठ गई। कमरे की खिड़की से आती हल्की सुनहरी रोशनी कमरे में फैल रही थी।
उसे अचानक पिछली रात की बातें याद आ गईं—
राजेश की प्यार भरी बातें, उसका स्नेहिल स्पर्श और उसकी सच्ची प्रशंसा।
वह सब याद करते ही कल्याणी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसके मन में एक गहरी संतुष्टि थी।
उसने मन ही मन सोचा—
“सच में… मैं कितनी खुशकिस्मत हूँ।”
बिस्तर से उठने से पहले उसने आँखें बंद कीं और धीरे से भगवान का नाम लिया।
फिर उसकी नज़र बगल में सो रहे राजेश पर पड़ी।
राजेश अभी भी गहरी और निश्चिंत नींद में थे। उनके चेहरे पर वही शांत भाव था जो एक संतुष्ट इंसान के चेहरे पर होता है।
कल्याणी हल्के से झुकी और उनके गाल पर एक प्यार भरी पप्पी दे दी।
फिर धीरे-धीरे उनके बालों पर हाथ फेरते हुए मन ही मन सोचने लगी—
“मैं सच में कितनी भाग्यशाली हूँ…
इस दुनिया में कितने लोग अपनी पत्नी को बस एक जिम्मेदारी समझते हैं।
लेकिन राजेश… वह हर पल मुझे यह एहसास दिलाते हैं कि मैं उनके लिए कितनी खास हूँ।”
कुछ पल वह ऐसे ही उन्हें देखती रही।
फिर उसने अलमारी खोली, अपनी साड़ी और बाकी कपड़े निकाले और बिस्तर पर रख दिए।
इसके बाद वह नहाने के लिए वॉशरूम चली गई।
जब वह 20 मिनट बाद वॉशरूम से बाहर आई, तो नज़ारा कुछ और ही था। कल्याणी सिर्फ एक तौलिए में लिपटी हुई थी। उसके गीले बाल कंधों पर बिखरे थे और पानी की नन्हीं बूंदें उसके बदन से फिसलकर तौलिए की परतों में समा रही थीं। कमरे की ठंडी हवा में नहाने के साबुन की भीनी महक घुली हुई थी।
राजेश की आँखें खुलीं, तो सामने अपनी पत्नी के इस नैसर्गिक रूप को देखकर उनकी नींद कहीं काफूर हो गई।
राजेश: "गुड मॉर्निंग, जानू।" (उनकी आवाज़ में रात की खुमारी अभी भी बाकी थी)।
कल्याणी: (मुस्कुराते हुए) "गुड मॉर्निंग, बाबू।"
राजेश की नज़रें कल्याणी के भीगे बदन, उसके खुले गोरे कंधों और तौलिए से बाहर झलकती उसकी सुडौल जांघों पर ठहर गईं। एक मर्द के लिए उसकी पत्नी का शरीर कभी पुराना नहीं होता; वह हर रोज़ एक नई किताब की तरह लगता है।
राजेश: "ज़रा पास तो आओ..." (उन्होंने अपनी चादर हटाते हुए शरारत भरी नज़रों से उसे देखा)।
कल्याणी: "मैं जानती हूँ ये पास बुलाना किसलिए है। पर अभी नहीं, बहुत काम है बाबा!"
राजेश ने बच्चों जैसा मुँह बनाया, "शादी से पहले लगता था कि पत्नी अपनी होगी, पर यहाँ तो 'अपॉइंटमेंट' लेना पड़ता है। ज़माने भर का ख्याल है, बस इस गरीब पति के लिए वक्त नहीं।"
कल्याणी हँस पड़ी, पर जैसे ही वह अपनी साड़ी उठाने के लिए मुड़ी, उसने देखा कि राजेश ने चादर हटा दी थी और अपनी जागृत उत्तेजना को धीरे-धीरे सहला रहे थे।
कल्याणी: (थोड़ा शर्माते हुए) "शर्म करो! दो जवान बच्चों के बाप हो, सुबह-सुबह ये क्या शुरू कर दिया?"
राजेश: (मज़ाकिया अंदाज़ में) "मरीज़ की हालत खराब है डॉक्टर साहिबा! और इसका इलाज तो बस आपके पास है, पर आप हैं कि ड्यूटी जॉइन ही नहीं कर रहीं।"
कल्याणी का मन भी राजेश की इस मासूम ज़िद और उनके पौरुष के आगे पिघलने लगा। उसे अहसास हुआ कि राजेश का यह आकर्षण ही तो उनके रिश्ते की ताज़गी है। उसने साड़ी वापस बेड पर रखी और धीरे से राजेश के पास बैठ गई।
राजेश: "इलाज नहीं सही, तो कम से कम 'नर्स'ही कुछ मदद कर दे।"
कल्याणी ने एक शरारती मुस्कान के साथ उनकी आँखों में झाँका। उसे अपने पति की इच्छा का मान रखना बखूबी आता था।
कल्याणी: "ठीक है... पर ध्यान रहे, ये नर्स सिर्फ आपकी 'पट्टी' (Masturbation) करेगी। अगर पूरा 'ऑपरेशन' (Sex) करवाना है, तो रात तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। मंज़ूर है?"
राजेश की आँखों में चमक आ गई, "पूरी तरह मंज़ूर है!"
कल्याणी ने धीरे से अपना कोमल हाथ राजेश के पुरुषत्व के ऊपर रखा और अपनी कलाइयों के हुनर से उनकी उत्तेजना को सहलाने लगी। राजेश ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक लंबी गहरी साँस ली। कल्याणी की उंगलियों का वह जादुई स्पर्श राजेश के शरीर में बिजली की तरह दौड़ रहा था। कमरे में सिर्फ उनकी भारी होती साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। कल्याणी ने बड़े ही सलीके और प्यार से राजेश को उस चरम सुख की ओर पहुँचाया, जो एक पुरुष अपनी अर्धांगिनी से चाहता है।
कुछ ही पलों में राजेश के शरीर में एक थरथराहट हुई और उन्होंने असीम शांति का अनुभव किया। कल्याणी ने उन्हें धीरे से चूमा और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब खुश? अब डॉक्टर को ड्यूटी पर जाने दें?"
राजेश ने उसे ज़ोर से अपनी बाहों में भींच लिया, "तुम वाकई में दुनिया की सबसे अच्छी डॉक्टर और नर्स दोनों हो।"
कल्याणी मुस्कुराई, अपना तौलिया सँभाला और जल्दी-जल्दी नहाने के लिए वॉशरूम चली गई । बाहर आई तैयार होने लगी। 'अनंत शांति निवास' में सुबह का यह निजी अध्याय अब समाप्त हो चुका था और अब ज़िम्मेदारियों का दिन इंतज़ार कर रहा था।
“अनंत शांति निवास” की एक नई सुबह शुरू हो चुकी थी।
कल्याणी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। कुछ पल तक वह वैसे ही लेटी रही, फिर हाथों से आँखें मलते हुए उठकर बैठ गई। कमरे की खिड़की से आती हल्की सुनहरी रोशनी कमरे में फैल रही थी।
उसे अचानक पिछली रात की बातें याद आ गईं—
राजेश की प्यार भरी बातें, उसका स्नेहिल स्पर्श और उसकी सच्ची प्रशंसा।
वह सब याद करते ही कल्याणी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसके मन में एक गहरी संतुष्टि थी।
उसने मन ही मन सोचा—
“सच में… मैं कितनी खुशकिस्मत हूँ।”
बिस्तर से उठने से पहले उसने आँखें बंद कीं और धीरे से भगवान का नाम लिया।
फिर उसकी नज़र बगल में सो रहे राजेश पर पड़ी।
राजेश अभी भी गहरी और निश्चिंत नींद में थे। उनके चेहरे पर वही शांत भाव था जो एक संतुष्ट इंसान के चेहरे पर होता है।
कल्याणी हल्के से झुकी और उनके गाल पर एक प्यार भरी पप्पी दे दी।
फिर धीरे-धीरे उनके बालों पर हाथ फेरते हुए मन ही मन सोचने लगी—
“मैं सच में कितनी भाग्यशाली हूँ…
इस दुनिया में कितने लोग अपनी पत्नी को बस एक जिम्मेदारी समझते हैं।
लेकिन राजेश… वह हर पल मुझे यह एहसास दिलाते हैं कि मैं उनके लिए कितनी खास हूँ।”
कुछ पल वह ऐसे ही उन्हें देखती रही।
फिर उसने अलमारी खोली, अपनी साड़ी और बाकी कपड़े निकाले और बिस्तर पर रख दिए।
इसके बाद वह नहाने के लिए वॉशरूम चली गई।
जब वह 20 मिनट बाद वॉशरूम से बाहर आई, तो नज़ारा कुछ और ही था। कल्याणी सिर्फ एक तौलिए में लिपटी हुई थी। उसके गीले बाल कंधों पर बिखरे थे और पानी की नन्हीं बूंदें उसके बदन से फिसलकर तौलिए की परतों में समा रही थीं। कमरे की ठंडी हवा में नहाने के साबुन की भीनी महक घुली हुई थी।
राजेश की आँखें खुलीं, तो सामने अपनी पत्नी के इस नैसर्गिक रूप को देखकर उनकी नींद कहीं काफूर हो गई।
राजेश: "गुड मॉर्निंग, जानू।" (उनकी आवाज़ में रात की खुमारी अभी भी बाकी थी)।
कल्याणी: (मुस्कुराते हुए) "गुड मॉर्निंग, बाबू।"
राजेश की नज़रें कल्याणी के भीगे बदन, उसके खुले गोरे कंधों और तौलिए से बाहर झलकती उसकी सुडौल जांघों पर ठहर गईं। एक मर्द के लिए उसकी पत्नी का शरीर कभी पुराना नहीं होता; वह हर रोज़ एक नई किताब की तरह लगता है।
राजेश: "ज़रा पास तो आओ..." (उन्होंने अपनी चादर हटाते हुए शरारत भरी नज़रों से उसे देखा)।
कल्याणी: "मैं जानती हूँ ये पास बुलाना किसलिए है। पर अभी नहीं, बहुत काम है बाबा!"
राजेश ने बच्चों जैसा मुँह बनाया, "शादी से पहले लगता था कि पत्नी अपनी होगी, पर यहाँ तो 'अपॉइंटमेंट' लेना पड़ता है। ज़माने भर का ख्याल है, बस इस गरीब पति के लिए वक्त नहीं।"
कल्याणी हँस पड़ी, पर जैसे ही वह अपनी साड़ी उठाने के लिए मुड़ी, उसने देखा कि राजेश ने चादर हटा दी थी और अपनी जागृत उत्तेजना को धीरे-धीरे सहला रहे थे।
कल्याणी: (थोड़ा शर्माते हुए) "शर्म करो! दो जवान बच्चों के बाप हो, सुबह-सुबह ये क्या शुरू कर दिया?"
राजेश: (मज़ाकिया अंदाज़ में) "मरीज़ की हालत खराब है डॉक्टर साहिबा! और इसका इलाज तो बस आपके पास है, पर आप हैं कि ड्यूटी जॉइन ही नहीं कर रहीं।"
कल्याणी का मन भी राजेश की इस मासूम ज़िद और उनके पौरुष के आगे पिघलने लगा। उसे अहसास हुआ कि राजेश का यह आकर्षण ही तो उनके रिश्ते की ताज़गी है। उसने साड़ी वापस बेड पर रखी और धीरे से राजेश के पास बैठ गई।
राजेश: "इलाज नहीं सही, तो कम से कम 'नर्स'ही कुछ मदद कर दे।"
कल्याणी ने एक शरारती मुस्कान के साथ उनकी आँखों में झाँका। उसे अपने पति की इच्छा का मान रखना बखूबी आता था।
कल्याणी: "ठीक है... पर ध्यान रहे, ये नर्स सिर्फ आपकी 'पट्टी' (Masturbation) करेगी। अगर पूरा 'ऑपरेशन' (Sex) करवाना है, तो रात तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। मंज़ूर है?"
राजेश की आँखों में चमक आ गई, "पूरी तरह मंज़ूर है!"
कल्याणी ने धीरे से अपना कोमल हाथ राजेश के पुरुषत्व के ऊपर रखा और अपनी कलाइयों के हुनर से उनकी उत्तेजना को सहलाने लगी। राजेश ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक लंबी गहरी साँस ली। कल्याणी की उंगलियों का वह जादुई स्पर्श राजेश के शरीर में बिजली की तरह दौड़ रहा था। कमरे में सिर्फ उनकी भारी होती साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। कल्याणी ने बड़े ही सलीके और प्यार से राजेश को उस चरम सुख की ओर पहुँचाया, जो एक पुरुष अपनी अर्धांगिनी से चाहता है।
कुछ ही पलों में राजेश के शरीर में एक थरथराहट हुई और उन्होंने असीम शांति का अनुभव किया। कल्याणी ने उन्हें धीरे से चूमा और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब खुश? अब डॉक्टर को ड्यूटी पर जाने दें?"
राजेश ने उसे ज़ोर से अपनी बाहों में भींच लिया, "तुम वाकई में दुनिया की सबसे अच्छी डॉक्टर और नर्स दोनों हो।"
कल्याणी मुस्कुराई, अपना तौलिया सँभाला और जल्दी-जल्दी नहाने के लिए वॉशरूम चली गई । बाहर आई तैयार होने लगी। 'अनंत शांति निवास' में सुबह का यह निजी अध्याय अब समाप्त हो चुका था और अब ज़िम्मेदारियों का दिन इंतज़ार कर रहा था।


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