12-03-2026, 11:02 AM
उसकी जांघें पूरी तरह फैली हुईं ।
मेरी जीभ पहले से ही काम कर रही थी—क्लिट पर गोल-गोल, फिर अंदर तक... उसका रस मेरी जीभ पर फैल रहा था—नमकीन, गर्म, चिपचिपा।
हर चाट के साथ वो और ज़्यादा रस दे रही थी।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में कसी हुई थीं—मेरा सिर नीचे दबा रही थीं, ठीक जहाँ वो चाहती थीं।
उसकी आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं—बस एक गहरी, भूखी हल्की गुर्राहट।
मेरा एक हाथ मेरे लुंड पर था—रॉक हार्ड, फड़कता हुआ।
मैं उसे सहला रहा था—धीमे-धीमे ऊपर-नीचे, हर स्ट्रोक के साथ और सख्त होता जा रहा था।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।
तभी सैंडी ने एक लंबी, गहरी आह भरी—"आआह्ह्ह्ह..."
उसने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया—अलोक जी के लुंड की तरफ।
उसने उसे पकड़ा—कसकर, पूरी मुट्ठी में।
फिर धीरे से खींचा—अलोक जी को और करीब लाया।
अलोक जी की जांघें मेरी जांघों से छू गईं—गर्म, बालों वाली, भारी।
उनका लुंड अब मेरे सिर के ठीक ऊपर था—मोटा, भारी, चमकता हुआ।
सैंडी ने अपना मुँह खोला।
उसने अलोक जी का लुंड अंदर लिया—धीरे से, होंठ फैलाकर, गले तक।
उसकी जीभ हेड पर घूम रही थी—चाट रही थी, चूस रही थी।
ऊपर से... गीली चूसने की आवाज़ें आ रही थीं—चक... चक... चक...
और नीचे... मेरा मुँह अभी भी उसकी चूत पर था।
मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ, अंदर उँगलियाँ, रस पीता रहा।
लोक जी ने सैंडी के बाल पकड़ लिए—मुट्ठी भर बाल, कसकर।
उन्होंने उसका सिर पीछे खींचा—फिर जोर से आगे धकेला।
उनका मोटा, भारी लुंड उसके मुँह में पूरी तरह घुस गया—गले तक।
घोक... घोल... घोक...
मुँह से वो गीली, चिपचिपी आवाज़ें आ रही थीं—हर धक्के के साथ।
सैंडी का मुँह खुला हुआ था—होंठ फैले हुए, लार बह रही थी।
उसकी लार... मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
गर्म, चिपचिपी, मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, मेरी जीभ पर—जो अभी भी उसकी चूत पर थी।
मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ घुमाता रहा, अंदर उँगलियाँ डालता रहा, अलोक जी का रस चाटता रहा।
सैंडी की साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में ढीली पड़ गईं—वो दम घुट रहा था।
अलोक जी ने एक और गहरा धक्का दिया—लुंड गले तक, नाक उसके पेट से लग गई।
फिर... उन्होंने सिर छोड़ा।
सैंडी पीछे हटी—लुंड बाहर निकला।
उसने जोर से खाँसा—खाँसी, साँस लेने की कोशिश।
लार उसके होंठों से, ठोड़ी से बह रही थी—मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
वो साँस ले रही थी—जोर-जोर से।
फिर... मुस्कुराई।
एक थकी हुई, लेकिन संतुष्ट मुस्कान।
अलोक जी ने पूछा—आवाज़ में मालिक वाली ठंडक।
"कैसा लगा कुतिया ?"
सैंडी ने सिर हिलाया—हाँ में।
उसकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी—खाँसी के बाद।
"हम्म्म..."
अलोक जी ने मेरी तरफ देखा।
फिर सैंडी से पूछा—मेरे बारे में।
"और ये?"
सैंडी ने मेरी तरफ देखा—एक पल।
फिर धीरे से बोली—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक सच्चाई।
"अच्छा काम कर रहा है... बहुत अच्छा।"
अलोक जी ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।
"हाँ... ये चूतिए... चूत चाटने में ही बेहतर होते हैं।
चोदने में नहीं... बस... चाटने में।"
सैंडी भी हँसी—एक छोटी
मैं चाटता रहा।
मेरा लुंड... मेरे हाथ में... फड़क रहा था।
मैं सहला रहा था—तेज़-तेज़।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।
अलोक ने अपना लुंड—प्रीकम और सैंडी की लार से चमकता हुआ—उसके चेहरे पर रगड़ा।
धीरे-धीरे, जानबूझकर, जैसे कोई मालिक अपनी कुत्ती को सहला रहा हो।
फिर प्लेफुल अंदाज़ में बोले—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत, लेकिन नीचे से गहरी धमकी।
"बता... क्या पसंद करेगी?
मैं तुझे चोदूँ... या ये चूतिया तुझे चाटे?"
सैंडी ने हल्के से हँसी—एक छोटी, शरारती हँसी।
फिर अलोक जी की आँखों में देखकर बोली—आवाज़ में नखरे।
"ये..."
हम सब जानते थे वो क्या चुनेगी।
लेकिन वो जानबूझकर अलोक जी को चिढ़ा रही थी।
अलोक जी की आँखें सिकुड़ गईं।
"अच्छा... भेन की लोड़ी..."
उन्होंने सैंडी के बाल पकड़े—जोर से, आक्रामक तरीके से।
उसका सिर पीछे खींचा।
फिर अपना लुंड उसके चेहरे पर जोर से टैप किया—एक... दो... तीन बार।
फिर बिना रुके... फिर से उसके मुँह में घुसा दिया।
घोक... घोल... घोक...
रफ़... बेरहम।
उसका लुंड गले तक जा रहा था।
सैंडी की आँखें पानी से भर गईं—लेकिन वो रुकी नहीं।
उसकी लार बह रही थी—जोर-जोर से, मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
मेरा चेहरा अब पूरी तरह गीला था—उसकी लार, अलोक जी का प्रीकम, सब मिलकर।
मैं चाटता रहा।
मेरी जीभ उसकी क्लिट पर तेज़ हो गई—गोल-गोल, चूसते हुए।
उँगलियाँ अंदर-बाहर—गहरे, तेज़।
उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक बड़ा ऑर्गेज़्म आने वाला था।
मेरा हाथ मेरे लुंड पर था—तेज़-तेज़ सहला रहा था।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और सख्त कर रहा था।
सैंडी की आहें अब ऊँची हो गईं—मुँह में लुंड होने के बावजूद।
"हम्म्म... आह्ह..."
फिर... वो पहले झड़ी।
उसकी चूत सिकुड़ गई—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म।
उसका रस मेरी जीभ पर बहा—जोर से, गाढ़ा, गर्म।
मैं चाटता रहा—हर बूँद, हर ड्रॉप।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर काँप रही थीं।
दूसरा... मैं था।
मेरा हाथ तेज़ हो गया—लुंड फड़क रहा था।
मैंने आखिरी स्ट्रोक दिया—जोर से।
मेरा कम फर्श पर गिरा—गाढ़ा, सफेद, चमकता हुआ।
मैं थककर पीछे झुक गया—साँसें तेज़।
तीसरा... अलोक जी।
उन्होंने सैंडी के बाल और कस लिए।
एक आखिरी, गहरा धक्का—गले तक।
फिर... रुक गए।
उनका लुंड फड़का—जोर से।
उन्होंने सब उसके मुँह में छोड़ दिया—गाढ़ा, भरपूर।
सैंडी ने सब लिया... बिना छोड़े।
उसकी गाल फूल गए
अलोक जी ने बाहर निकाला।
सैंडी ने साँस ली—खाँसी, फिर मुस्कुराई।
उसकी ठोड़ी पर थोड़ा सा कम था—वो जीभ से चाट लिया।
अलोक जी ने मेरी तरफ देखा—फिर सैंडी की तरफ।
मैं उठ खड़ा हुआ।
कम से कम 45 मिनट हो चुके थे।
नेहा को बोला था—15 मिनट में आता हूँ।
और अब... ये सब...
मेरा लुंड अभी भी हल्का सा फड़क रहा था—कम करने के बाद भी।
मैंने जल्दी से पजामा ऊपर किया।
चेहरा अभी भी सैंडी के रस से गीला था—उसकी चूत का रस, अलोक जी का रस, लार—सब मिलकर मेरी ठोड़ी, गाल, होंठों पर चिपका हुआ।
मैंने हाथ से पोंछा—लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।
अलोक जी ने मुझे देखा।
बिना कुछ बोले... अपना पर्स निकाला।
एक कार्ड निकाला—काला, मोटा, सिर्फ़ एक नंबर और नाम।
उन्होंने वो कार्ड मेरी जेब में सरका दिया—बिना एक शब्द बोले।
फिर... बस... मुस्कुराए।
वो पुरानी वाली मुस्कान।
मैं सैंडी की तरफ झुका।
उसका मुँह अभी भी बंद था—अलोक जी का कम अभी भी उसके मुँह में था।
वो निगल नहीं रही थी।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
मैंने उसे गले लगाया—एक आखिरी बार।
उसका बदन गर्म था—पसीने से तर।
मैंने उसके होंठों पर हल्का-सा किस किया—बस होंठ छुए।
वो स्थिर रही—कोई जवाब नहीं।
लेकिन उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगी।
मैं पीछे हटा।
तभी... अलोक जी की आवाज़ आई—ठंडी, लेकिन मज़ाक वाली।
"भेनचोद... ये कौन साफ़ करेगा?"
उन्होंने फर्श पर इशारा किया—मेरा कम।
सफेद, चमकता हुआ, फर्श पर फैला हुआ।
मैंने एक सेकंड रुका।
फिर... कमरे में पड़ा हुआ हैंड टॉवल उठाया।
घुटनों पर बैठ गया।
अपना कम साफ़ करने लगा—धीरे-धीरे, शर्म से।
तभी... सैंडी ने अपना मुँह खोला।
अलोक जी का कम उसके मुँह से बाहर गिरा—गाढ़ा, सफेद, फर्श पर।
वो हँसी—एक छोटी, थकी हुई हँसी।
अलोक जी ने फिर कहा—आदेश की तरह।
"इसे भी साफ़ कर।"
मैंने साफ़ किया।
उनका कम... मेरा कम... सब।
फर्श अब साफ़ था।
अलोक जी ने फिर हँसा।
"गुड बॉय... ये तेरी ड्यूटी होगी... अगर तू मेरे फार्महाउस आएगा।"
सैंडी भी हँसी—उसकी हँसी थकी हुई, लेकिन संतुष्ट।
मैं उठा।
एक आखिरी बार सैंडी की तरफ देखा—उसका नंगा बदन, गोरी स्किन, लाल निशान, गीली चूत।
फिर अलोक जी के लुंड की तरफ—अभी भी आधा सख्त, मोटा, भारी।
मेरा... छोटा, ढीला।
मैंने कुछ नहीं कहा।
पीछे मुड़ा।
दरवाज़ा खोला।
बाहर निकला।
मेरी जीभ पहले से ही काम कर रही थी—क्लिट पर गोल-गोल, फिर अंदर तक... उसका रस मेरी जीभ पर फैल रहा था—नमकीन, गर्म, चिपचिपा।
हर चाट के साथ वो और ज़्यादा रस दे रही थी।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में कसी हुई थीं—मेरा सिर नीचे दबा रही थीं, ठीक जहाँ वो चाहती थीं।
उसकी आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं—बस एक गहरी, भूखी हल्की गुर्राहट।
मेरा एक हाथ मेरे लुंड पर था—रॉक हार्ड, फड़कता हुआ।
मैं उसे सहला रहा था—धीमे-धीमे ऊपर-नीचे, हर स्ट्रोक के साथ और सख्त होता जा रहा था।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।
तभी सैंडी ने एक लंबी, गहरी आह भरी—"आआह्ह्ह्ह..."
उसने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया—अलोक जी के लुंड की तरफ।
उसने उसे पकड़ा—कसकर, पूरी मुट्ठी में।
फिर धीरे से खींचा—अलोक जी को और करीब लाया।
अलोक जी की जांघें मेरी जांघों से छू गईं—गर्म, बालों वाली, भारी।
उनका लुंड अब मेरे सिर के ठीक ऊपर था—मोटा, भारी, चमकता हुआ।
सैंडी ने अपना मुँह खोला।
उसने अलोक जी का लुंड अंदर लिया—धीरे से, होंठ फैलाकर, गले तक।
उसकी जीभ हेड पर घूम रही थी—चाट रही थी, चूस रही थी।
ऊपर से... गीली चूसने की आवाज़ें आ रही थीं—चक... चक... चक...
और नीचे... मेरा मुँह अभी भी उसकी चूत पर था।
मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ, अंदर उँगलियाँ, रस पीता रहा।
लोक जी ने सैंडी के बाल पकड़ लिए—मुट्ठी भर बाल, कसकर।
उन्होंने उसका सिर पीछे खींचा—फिर जोर से आगे धकेला।
उनका मोटा, भारी लुंड उसके मुँह में पूरी तरह घुस गया—गले तक।
घोक... घोल... घोक...
मुँह से वो गीली, चिपचिपी आवाज़ें आ रही थीं—हर धक्के के साथ।
सैंडी का मुँह खुला हुआ था—होंठ फैले हुए, लार बह रही थी।
उसकी लार... मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
गर्म, चिपचिपी, मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, मेरी जीभ पर—जो अभी भी उसकी चूत पर थी।
मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ घुमाता रहा, अंदर उँगलियाँ डालता रहा, अलोक जी का रस चाटता रहा।
सैंडी की साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में ढीली पड़ गईं—वो दम घुट रहा था।
अलोक जी ने एक और गहरा धक्का दिया—लुंड गले तक, नाक उसके पेट से लग गई।
फिर... उन्होंने सिर छोड़ा।
सैंडी पीछे हटी—लुंड बाहर निकला।
उसने जोर से खाँसा—खाँसी, साँस लेने की कोशिश।
लार उसके होंठों से, ठोड़ी से बह रही थी—मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
वो साँस ले रही थी—जोर-जोर से।
फिर... मुस्कुराई।
एक थकी हुई, लेकिन संतुष्ट मुस्कान।
अलोक जी ने पूछा—आवाज़ में मालिक वाली ठंडक।
"कैसा लगा कुतिया ?"
सैंडी ने सिर हिलाया—हाँ में।
उसकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी—खाँसी के बाद।
"हम्म्म..."
अलोक जी ने मेरी तरफ देखा।
फिर सैंडी से पूछा—मेरे बारे में।
"और ये?"
सैंडी ने मेरी तरफ देखा—एक पल।
फिर धीरे से बोली—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक सच्चाई।
"अच्छा काम कर रहा है... बहुत अच्छा।"
अलोक जी ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।
"हाँ... ये चूतिए... चूत चाटने में ही बेहतर होते हैं।
चोदने में नहीं... बस... चाटने में।"
सैंडी भी हँसी—एक छोटी
मैं चाटता रहा।
मेरा लुंड... मेरे हाथ में... फड़क रहा था।
मैं सहला रहा था—तेज़-तेज़।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।
अलोक ने अपना लुंड—प्रीकम और सैंडी की लार से चमकता हुआ—उसके चेहरे पर रगड़ा।
धीरे-धीरे, जानबूझकर, जैसे कोई मालिक अपनी कुत्ती को सहला रहा हो।
फिर प्लेफुल अंदाज़ में बोले—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत, लेकिन नीचे से गहरी धमकी।
"बता... क्या पसंद करेगी?
मैं तुझे चोदूँ... या ये चूतिया तुझे चाटे?"
सैंडी ने हल्के से हँसी—एक छोटी, शरारती हँसी।
फिर अलोक जी की आँखों में देखकर बोली—आवाज़ में नखरे।
"ये..."
हम सब जानते थे वो क्या चुनेगी।
लेकिन वो जानबूझकर अलोक जी को चिढ़ा रही थी।
अलोक जी की आँखें सिकुड़ गईं।
"अच्छा... भेन की लोड़ी..."
उन्होंने सैंडी के बाल पकड़े—जोर से, आक्रामक तरीके से।
उसका सिर पीछे खींचा।
फिर अपना लुंड उसके चेहरे पर जोर से टैप किया—एक... दो... तीन बार।
फिर बिना रुके... फिर से उसके मुँह में घुसा दिया।
घोक... घोल... घोक...
रफ़... बेरहम।
उसका लुंड गले तक जा रहा था।
सैंडी की आँखें पानी से भर गईं—लेकिन वो रुकी नहीं।
उसकी लार बह रही थी—जोर-जोर से, मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
मेरा चेहरा अब पूरी तरह गीला था—उसकी लार, अलोक जी का प्रीकम, सब मिलकर।
मैं चाटता रहा।
मेरी जीभ उसकी क्लिट पर तेज़ हो गई—गोल-गोल, चूसते हुए।
उँगलियाँ अंदर-बाहर—गहरे, तेज़।
उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक बड़ा ऑर्गेज़्म आने वाला था।
मेरा हाथ मेरे लुंड पर था—तेज़-तेज़ सहला रहा था।
अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और सख्त कर रहा था।
सैंडी की आहें अब ऊँची हो गईं—मुँह में लुंड होने के बावजूद।
"हम्म्म... आह्ह..."
फिर... वो पहले झड़ी।
उसकी चूत सिकुड़ गई—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म।
उसका रस मेरी जीभ पर बहा—जोर से, गाढ़ा, गर्म।
मैं चाटता रहा—हर बूँद, हर ड्रॉप।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर काँप रही थीं।
दूसरा... मैं था।
मेरा हाथ तेज़ हो गया—लुंड फड़क रहा था।
मैंने आखिरी स्ट्रोक दिया—जोर से।
मेरा कम फर्श पर गिरा—गाढ़ा, सफेद, चमकता हुआ।
मैं थककर पीछे झुक गया—साँसें तेज़।
तीसरा... अलोक जी।
उन्होंने सैंडी के बाल और कस लिए।
एक आखिरी, गहरा धक्का—गले तक।
फिर... रुक गए।
उनका लुंड फड़का—जोर से।
उन्होंने सब उसके मुँह में छोड़ दिया—गाढ़ा, भरपूर।
सैंडी ने सब लिया... बिना छोड़े।
उसकी गाल फूल गए
अलोक जी ने बाहर निकाला।
सैंडी ने साँस ली—खाँसी, फिर मुस्कुराई।
उसकी ठोड़ी पर थोड़ा सा कम था—वो जीभ से चाट लिया।
अलोक जी ने मेरी तरफ देखा—फिर सैंडी की तरफ।
मैं उठ खड़ा हुआ।
कम से कम 45 मिनट हो चुके थे।
नेहा को बोला था—15 मिनट में आता हूँ।
और अब... ये सब...
मेरा लुंड अभी भी हल्का सा फड़क रहा था—कम करने के बाद भी।
मैंने जल्दी से पजामा ऊपर किया।
चेहरा अभी भी सैंडी के रस से गीला था—उसकी चूत का रस, अलोक जी का रस, लार—सब मिलकर मेरी ठोड़ी, गाल, होंठों पर चिपका हुआ।
मैंने हाथ से पोंछा—लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।
अलोक जी ने मुझे देखा।
बिना कुछ बोले... अपना पर्स निकाला।
एक कार्ड निकाला—काला, मोटा, सिर्फ़ एक नंबर और नाम।
उन्होंने वो कार्ड मेरी जेब में सरका दिया—बिना एक शब्द बोले।
फिर... बस... मुस्कुराए।
वो पुरानी वाली मुस्कान।
मैं सैंडी की तरफ झुका।
उसका मुँह अभी भी बंद था—अलोक जी का कम अभी भी उसके मुँह में था।
वो निगल नहीं रही थी।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
मैंने उसे गले लगाया—एक आखिरी बार।
उसका बदन गर्म था—पसीने से तर।
मैंने उसके होंठों पर हल्का-सा किस किया—बस होंठ छुए।
वो स्थिर रही—कोई जवाब नहीं।
लेकिन उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगी।
मैं पीछे हटा।
तभी... अलोक जी की आवाज़ आई—ठंडी, लेकिन मज़ाक वाली।
"भेनचोद... ये कौन साफ़ करेगा?"
उन्होंने फर्श पर इशारा किया—मेरा कम।
सफेद, चमकता हुआ, फर्श पर फैला हुआ।
मैंने एक सेकंड रुका।
फिर... कमरे में पड़ा हुआ हैंड टॉवल उठाया।
घुटनों पर बैठ गया।
अपना कम साफ़ करने लगा—धीरे-धीरे, शर्म से।
तभी... सैंडी ने अपना मुँह खोला।
अलोक जी का कम उसके मुँह से बाहर गिरा—गाढ़ा, सफेद, फर्श पर।
वो हँसी—एक छोटी, थकी हुई हँसी।
अलोक जी ने फिर कहा—आदेश की तरह।
"इसे भी साफ़ कर।"
मैंने साफ़ किया।
उनका कम... मेरा कम... सब।
फर्श अब साफ़ था।
अलोक जी ने फिर हँसा।
"गुड बॉय... ये तेरी ड्यूटी होगी... अगर तू मेरे फार्महाउस आएगा।"
सैंडी भी हँसी—उसकी हँसी थकी हुई, लेकिन संतुष्ट।
मैं उठा।
एक आखिरी बार सैंडी की तरफ देखा—उसका नंगा बदन, गोरी स्किन, लाल निशान, गीली चूत।
फिर अलोक जी के लुंड की तरफ—अभी भी आधा सख्त, मोटा, भारी।
मेरा... छोटा, ढीला।
मैंने कुछ नहीं कहा।
पीछे मुड़ा।
दरवाज़ा खोला।
बाहर निकला।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)