12-03-2026, 10:56 AM
अभी भी बिस्तर के किनारे पर बैठी थी—उसकी जांघें हल्की-सी खुलीं,
मैं खड़ा था—दिल में एक गहरा दर्द, जैसे कोई चाकू चुभ गया हो।
कल रात... वो मेरे साथ हँसी थी।
मेरे लुंड को छुआ था।
मेरे कम को चाटा था।
मेरे चेहरे पर मुस्कुराई थी।
मुझे लगा था... शायद कुछ कनेक्शन है।
शायद कुछ स्पेशल।
शायद वो... मुझे थोड़ा-सा भी पसंद करती है।
लेकिन आज... उसका व्यवहार बता रहा था—ये सब प्रोफेशनल था।
बस काम।
बस डील।
मैं... बस एक क्लाइंट था।
एक और आदमी।
उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया—अलोक की तरफ।
उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर गईं।
अलोक के बॉल्स... बड़े, भारी, जैसे दो गुलाब जामुन।
ट्रिम्ड बाल—काले, लेकिन सफेद बाल भी साफ़ दिख रहे थे।
उसने उन्हें कप किया—पूरी हथेली से, कसकर।
उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन गहराई से।
अलोक की साँस भारी हो गई—एक छोटी सी गुर्राहट।
फिर... सैंडी ने मेरी तरफ देखा।
उसने इशारा किया—उँगली से—अलोक के बॉल्स की तरफ।
जैसे "देख... ये असली हैं।"
फिर... उसने अपना बायाँ हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।
मेरे बॉल्स पर।
उसकी उँगलियाँ मेरे बॉल्स को कप कर रही थीं—टाइट ग्रिप।
मेरे बॉल्स छोटे थे—उसकी हथेली में आसानी से आ गए।
उसने दबाया—जोर से।
दर्द हुआ—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।
मैंने आह भरी—"आह्ह..."
उसने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—एक पल के लिए।
फिर छोड़ दिया।
मेरा लुंड हिल गया—दर्द से।
वो हँसी—एक छोटी, ठंडी हँसी।
सैंडी ने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—उसकी उँगलियाँ अब पूरी तरह कस गईं, जैसे कोई वाइस हो।
"आआह्ह..."
मेरे मुँह से एक तेज़, दर्द भरी आह निकली।
दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखें झपक गईं।
मेरी टाँगें काँपने लगीं—मैं पीछे हटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि मैं हिल नहीं पा रहा था।
वो मेरी तरफ देख रही थी—उसकी आँखें चमक रही थीं, मुस्कान अब और गहरी, और क्रूर हो गई।
उसने दबाव और बढ़ाया—धीरे-धीरे, जानबूझकर।
मेरा चेहरा लाल हो गया—दर्द से, शर्म से।
"प्लीज़... प्लीज़... नो... नो... नो..."
मैंने बड़बड़ाया—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।
मेरा लुंड अब पूरी तरह ढीला था—दर्द ने सब कुछ खत्म कर दिया।
मेरी आँखें गीली हो गईं—शर्म से, अपमान से।
तभी... सैंडी ने ग्रिप ढीला किया।
उसकी उँगलियाँ अब हल्की-हल्की रगड़ रही थीं—दर्द कम हो गया, लेकिन जलन अभी भी बाकी थी।
वो हँसी—एक छोटी, ठंडी, कड़वी हँसी।
फिर... अलोक भी हँसा।
पहली बार... अलोक ने हँसा।
उसकी हँसी भारी, गहरी, जानवर जैसी।
दोनों एक साथ हँस रहे थे—मेरी तरफ देखकर, जैसे कोई मज़ाक हो।
जैसे मैं कोई जोक हूँ।
अलोक ने सिगरेट सुलगाई।
पहली कश ली—गहराई से, धुआँ फेफड़ों में भरते हुए।
फिर धीरे से बाहर छोड़ा—धुआँ मेरे चेहरे पर आया, गाढ़ा, कड़वा।
वो मेरी तरफ देख रहा था—आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली नज़र।
पहली बार... उसने मेरी तरफ मुड़कर कुछ कहा।
"तो तूने सोचा था... सैंडी कल रात की तरह करेगी... तुझे चोदने देगी?"
उसने सिगरेट होंठों से हटाई, धुआँ फिर छोड़ा।
"वो मेरी कुत्ती है... और वो जानती है... कब चाटना है... और कब काटना है, भेनचोद।"
वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
वो चुप थी—बस साँस ले रही थी, थकी हुई, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं।
अलोक ने सिगरेट फिर कश ली।
फिर बोला—आवाज़ में अब कोई मज़ाक नहीं, बस... सच्चाई।
"कल रात वो इसलिए सब कर रही थी... क्योंकि मुझे पता था तू उसका पति है।
मुझे पता था... तू मुझे नेहा से मिलवा सकता है।
तू... एक रास्ता था।
एक टूल था।
लेकिन अब... तू मेरे लिए कोई काम का नहीं रहा।
तू... बेकार हो गया।
तो अब... सैंडी तुझे छुएगी नहीं।
तेरा लुंड... वो देखेगी भी नहीं।
क्योंकि... तू अब... मेरे लिए कुछ नहीं है।
"कुत्ती" शब्द कमरे में गूंजा—एक छोटा, तेज़, कड़वा शब्द।
सैंडी ने आँखें उठाईं।
उसके चेहरे पर... एक मुस्कान फैल गई।
नहीं... कोई शर्म नहीं।
न कोई गुस्सा।
बस... एक गहरी, प्यार भरी, संतुष्ट मुस्कान।
जैसे किसी ने उसे कोई इनाम दिया हो।
जैसे किसी ने उसे उसकी असली जगह याद दिलाई हो—और वो उस जगह पर गर्व महसूस कर रही हो।
वो धीरे से झुकी।
अलोक की छाती की तरफ।
उसने होंठ अलोक के सीने पर रख दिए—एक गहरा, प्यार भरा किस।
उसकी जीभ हल्के से छू गई—जैसे कोई पुरस्कार स्वीकार कर रही हो।
"My master ..." उसने धीरे से फुसफुसाया—आवाज़ में कोई शर्म नहीं, बस... एक गहरी, आज्ञाकारी खुशी।
उसने अलोक की छाती पर फिर किस किया—इस बार और गहरा, और लंबा।
उसकी आँखें बंद हो गईं—जैसे वो इस पल में खो गई हो।
अलोक ने हल्के से हँसा—एक संतुष्ट, जानवर जैसी हँसी।
उसने सैंडी के बालों में हाथ फेरा—प्यार से, लेकिन मालिक की तरह।
"good Bitch ..."
"क्या देख रहा है भोसड़ीके... वो तेरी कभी नहीं हो सकती... चाहे तू कितना भी पैसे दे दे?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... खड़ा रहा।
फिर मेरी तरफ देखा—उसकी आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं।
"जानता है क्यों?"
मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ काँप रही थी।
"क्यों?"
अलोक ने मेरे लुंड की तरफ देखा—एक पल।
फिर हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
"क्योंकि... ये।"
उसने मेरे छोटे लुंड की तरफ इशारा किया—जैसे कोई बेकार चीज़ हो।
"औरत असली कुत्ती तब बनती है... जब उसे कुत्ती की तरह चोदा जाए।
असली मर्द से।
असली लुंड से।
न कि... इस नन्हू से।"
सैंडी ने "नन्हू" सुनकर हल्की-सी गुदगुदी वाली हँसी निकाली—एक छोटी, ठंडी हँसी।
फिर चुप हो गई।
उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुईं—बिना पलक झपकाए।
उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई—एक घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।
अलोक ने सिगरेट की एक और कश ली—धीरे से, जैसे वो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा हो।
फिर... उसने फिर पूछा—आवाज़ में वही ठंडी, क्रूर धमकी।
"कितना समय हो गया तेरी शादी को... फिर से बता।"
मैं चुप रहा।
मेरा मुँह सूख गया था।
मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था।
तभी... सैंडी का हाथ फिर मेरे बॉल्स पर गया।
उसकी उँगलियाँ कस गईं—धीरे-धीरे, लेकिन जानबूझकर।
दर्द फिर से शुरू हो गया—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।
मैं तुरंत बोल पड़ा—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।
"छह महीने..."
अलोक ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।
"हाहा... फ्रेश चूत... अभी तो हनीमून पीरियड है... वो अभी शिकायत नहीं करेगी।
लेकिन कुछ समय बाद... जब उसे बड़े लुंड दिखेंगे... तब वो अपने एक्स-बॉयफ्रेंड को याद करेगी... या अपने बॉस को... जिससे ब्लोजॉब देकर नौकरी ली होगी।"
उसकी बातें मेरे दिमाग में चाकू की तरह उतर रही थीं।
मैं सोच रहा था—ये आदमी अमीर है... ये सब उसके पास है...।
या... ये बस एक पोर्नो मूवी का सीन बना रहा है... सब कुछ झूठ... सब कुछ बनावटी।
लेकिन... एक बात मेरी नज़र से नहीं छुपी।
नेहा।
वो बालकनी में देख रही थी।
सैंडी के जाने के बाद भी
उसकी आँखें... डेविड और विशाल के लुंड पर टिकी हुई थीं।
बड़े लुंड पर।
मोटे, भारी, लटकते हुए।
उसने देखा था—बिना पलक झपकाए।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
उसकी जांघें काँप रही थीं।
और अब... वो मेरे दिमाग में थी।
नेहा।
मेरी नेहा।
क्या वो भी... कभी... सोचेगी... कि मैं... काफी नहीं हूँ?
क्या वो भी... बड़े लुंड को देखकर... याद करेगी... किसी और को?
वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं, बस... एक साफ़, बेरहम फैसला।
"मैं देखना चाहता था... कि तू अपनी बीवी को कुतिया बना सकता है कि नहीं।
पहले तू चोदे... फिर तेरे दोस्त शामिल हों... फिर और... फिर और।
ये सब... मैंने इसलिए किया।
इसलिए तुझे दोस्त बनाना चाहा था।
ताकि नेहा... मेरे सामने आए।
ताकि मैं उसे... सिखाऊँ... असली मज़ा क्या होता है।"
वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
"लेकिन... तेरे लुंड को देखकर... सब साफ़ हो गया।
तू कभी नहीं बना सकता उसे अपनी कुतिया ।
वो कभी तेरी आज्ञा नहीं मानेगी।
अलोक ने सिगरेट की आखिरी कश ली—फिर उसे राखदान में ठोक दिया।
धुआँ अभी भी हवा में लहरा रहा था, मेरे चेहरे पर चिपक रहा था।
वो मेरी तरफ देख रहा था—उसकी आँखें अब और सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली सच्चाई।
वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस... एक गहरा, बेरहम फैसला।
"हालाँकि... तेरी बीवी में... अच्छी कुतिया बनने की पूरी काबिलियत है।
मुझे शायद तेरी ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी उसे ट्रेन करने की।"
वो रुका—एक पल के लिए।
फिर मुस्कुराया—एक छोटी, कड़वी मुस्कान।
"वो नेचुरल कुतिया है।
तूने खुद देखा था... ब्रेकफास्ट टेबल पर।
जब मैंने कहा था... कि मैं उसे होटल शूट के लिए सुपरमॉडल समझ बैठा था... वो कैसे हँस रही थी... शरमा रही थी... उसके गाल लाल हो गए थे।
और उसने... मेरे हाथ को छुआ था।
हल्के से... लेकिन जानबूझकर।
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर रुकी थीं... एक सेकंड ज़्यादा।
वो... पहले से ही तैयार थी।
बस... एक छोटा सा झूठ... एक छोटा सा फेक शूट... थोड़ा सा समय... और थोड़ा सा ट्रेनिंग... इस मॉन्स्टर से।"
उसने अपना लुंड पकड़ा—जो अभी भी हार्ड था, मोटा, भारी, चमकता हुआ।
उसने उसे हल्के से हिलाया—मेरी तरफ इशारा करते हुए।
"ये... ये उसे सिखाएगा।
कैसे आज्ञा माननी है।
कैसे घुटनों पर बैठना है।
कैसे चाटना है।
कैसे काटना है।
तेरी नेहा... वो भी... कुछ ही दिनों में... मेरे सामने घुटनों पर बैठेगी।
"फिर... तेरी नेहा को... मेरे लुंड की ताकत का पता चलेगा।
वो सुख... जो तूने कभी उसे नहीं दिया... वो उसे मिलेगा।
वो मेरे लुंड के लिए तरसेगी।
वो तुझसे गिड़गिड़ाएगी... कि मुझे अलोक भाई के फार्महाउस ले चलो।
वहाँ... उसे और लुंड मिलेंगे।
डेविड का... विशाल का... और भी।
वो... अच्छी गुलाम बनेगी।
हमारे लिए खाना बनाएगी... और किचन में मेरे कुक से चुदेगी।
गार्डन में... मेरे माली से... खुली हवा में... चुदेगी।
सर्वेंट क्वार्टर में... उनके गंदे बिस्तर पर... सोएगी।
और तू... बस... देखता रहेगा।
वो तुझे... तभी चाहिएगी... जब वो रंडी की तरह बेरहमी से चुदकर थक जाएगी।
तब... वो तुझसे... अपनी चूत चटवाएगी।
तेरी जीभ... उसकी चूत पर।
बस... इतना ही।
तेरा काम... बस इतना ही रहेगा।"
सैंडी ने अलोक की छाती पर सिर रखा—उसकी जीभ अलोक के निप्पल पर थी, धीरे-धीरे चाट रही थी।
उसका दायाँ हाथ अलोक के लुंड पर था—ऊपर-नीचे, कसकर।
उसका बायाँ हाथ... मेरे बॉल्स पर था—हल्का-सा छू रहा था, लेकिन कोई दबाव नहीं।
बस... एक हल्की सी छुअन—जैसे वो कह रही हो—"देख... मैं छू सकती हूँ... लेकिन तुझे कुछ नहीं दूँगी।"
मैं नहीं समझ पा रहा था—ये अपमान... ये शर्म... ये सब... फिर भी मुझे उत्तेजित कर रहा था।
मेरा लुंड... अब पूरी तरह हार्ड था।
फड़क रहा था।
अलोक के शब्दों में "चूत चटवाएगी" आया।
सैंडी के शरीर में एक झटका लगा।
जैसे कोई कोड एक्टिवेट हो गया हो।
उसकी जीभ अलोक के निप्पल से हट गई।
उसने धीरे से एक पैर ज़मीन से उठाया—बिस्तर पर रख दिया।
दूसरा पैर अभी भी ज़मीन पर था।
उसकी जांघें अब पूरी तरह खुल गईं—चूत अब साफ़, खुली, मेरे सामने।
पहले सिर्फ़ एक लाइन दिख रही थी... अब पूरी चूत—लाल, सूजी हुई, गीली, चमकती हुई।
उसने अपना बायाँ हाथ मेरे बॉल्स से हटाया।
फिर मेरे सिर पर ले आई।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में उलझ गईं—कसकर।
उसने मेरा सिर नीचे खींचा—एक आदेश की तरह।
"चाट..."
उसकी आवाज़ में अब कोई हँसी नहीं थी।
बस... एक साफ़, ठंडा आदेश।
मेरा सिर उसकी चूत के सामने था।
उसकी खुशबू—गर्म, मीठी।
मैंने जीभ निकाली—धीरे से।
उसकी चूत पर रखी।
उसका रस मेरी जीभ पर लगा—गाढ़ा, नमकीन, गर्म।
मैं अब लगभग घुटनों पर था... मेरा चेहरा सैंडी की चूत के ठीक सामने।
मैं खड़ा था—दिल में एक गहरा दर्द, जैसे कोई चाकू चुभ गया हो।
कल रात... वो मेरे साथ हँसी थी।
मेरे लुंड को छुआ था।
मेरे कम को चाटा था।
मेरे चेहरे पर मुस्कुराई थी।
मुझे लगा था... शायद कुछ कनेक्शन है।
शायद कुछ स्पेशल।
शायद वो... मुझे थोड़ा-सा भी पसंद करती है।
लेकिन आज... उसका व्यवहार बता रहा था—ये सब प्रोफेशनल था।
बस काम।
बस डील।
मैं... बस एक क्लाइंट था।
एक और आदमी।
उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया—अलोक की तरफ।
उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर गईं।
अलोक के बॉल्स... बड़े, भारी, जैसे दो गुलाब जामुन।
ट्रिम्ड बाल—काले, लेकिन सफेद बाल भी साफ़ दिख रहे थे।
उसने उन्हें कप किया—पूरी हथेली से, कसकर।
उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन गहराई से।
अलोक की साँस भारी हो गई—एक छोटी सी गुर्राहट।
फिर... सैंडी ने मेरी तरफ देखा।
उसने इशारा किया—उँगली से—अलोक के बॉल्स की तरफ।
जैसे "देख... ये असली हैं।"
फिर... उसने अपना बायाँ हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।
मेरे बॉल्स पर।
उसकी उँगलियाँ मेरे बॉल्स को कप कर रही थीं—टाइट ग्रिप।
मेरे बॉल्स छोटे थे—उसकी हथेली में आसानी से आ गए।
उसने दबाया—जोर से।
दर्द हुआ—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।
मैंने आह भरी—"आह्ह..."
उसने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—एक पल के लिए।
फिर छोड़ दिया।
मेरा लुंड हिल गया—दर्द से।
वो हँसी—एक छोटी, ठंडी हँसी।
सैंडी ने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—उसकी उँगलियाँ अब पूरी तरह कस गईं, जैसे कोई वाइस हो।
"आआह्ह..."
मेरे मुँह से एक तेज़, दर्द भरी आह निकली।
दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखें झपक गईं।
मेरी टाँगें काँपने लगीं—मैं पीछे हटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि मैं हिल नहीं पा रहा था।
वो मेरी तरफ देख रही थी—उसकी आँखें चमक रही थीं, मुस्कान अब और गहरी, और क्रूर हो गई।
उसने दबाव और बढ़ाया—धीरे-धीरे, जानबूझकर।
मेरा चेहरा लाल हो गया—दर्द से, शर्म से।
"प्लीज़... प्लीज़... नो... नो... नो..."
मैंने बड़बड़ाया—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।
मेरा लुंड अब पूरी तरह ढीला था—दर्द ने सब कुछ खत्म कर दिया।
मेरी आँखें गीली हो गईं—शर्म से, अपमान से।
तभी... सैंडी ने ग्रिप ढीला किया।
उसकी उँगलियाँ अब हल्की-हल्की रगड़ रही थीं—दर्द कम हो गया, लेकिन जलन अभी भी बाकी थी।
वो हँसी—एक छोटी, ठंडी, कड़वी हँसी।
फिर... अलोक भी हँसा।
पहली बार... अलोक ने हँसा।
उसकी हँसी भारी, गहरी, जानवर जैसी।
दोनों एक साथ हँस रहे थे—मेरी तरफ देखकर, जैसे कोई मज़ाक हो।
जैसे मैं कोई जोक हूँ।
अलोक ने सिगरेट सुलगाई।
पहली कश ली—गहराई से, धुआँ फेफड़ों में भरते हुए।
फिर धीरे से बाहर छोड़ा—धुआँ मेरे चेहरे पर आया, गाढ़ा, कड़वा।
वो मेरी तरफ देख रहा था—आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली नज़र।
पहली बार... उसने मेरी तरफ मुड़कर कुछ कहा।
"तो तूने सोचा था... सैंडी कल रात की तरह करेगी... तुझे चोदने देगी?"
उसने सिगरेट होंठों से हटाई, धुआँ फिर छोड़ा।
"वो मेरी कुत्ती है... और वो जानती है... कब चाटना है... और कब काटना है, भेनचोद।"
वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
वो चुप थी—बस साँस ले रही थी, थकी हुई, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं।
अलोक ने सिगरेट फिर कश ली।
फिर बोला—आवाज़ में अब कोई मज़ाक नहीं, बस... सच्चाई।
"कल रात वो इसलिए सब कर रही थी... क्योंकि मुझे पता था तू उसका पति है।
मुझे पता था... तू मुझे नेहा से मिलवा सकता है।
तू... एक रास्ता था।
एक टूल था।
लेकिन अब... तू मेरे लिए कोई काम का नहीं रहा।
तू... बेकार हो गया।
तो अब... सैंडी तुझे छुएगी नहीं।
तेरा लुंड... वो देखेगी भी नहीं।
क्योंकि... तू अब... मेरे लिए कुछ नहीं है।
"कुत्ती" शब्द कमरे में गूंजा—एक छोटा, तेज़, कड़वा शब्द।
सैंडी ने आँखें उठाईं।
उसके चेहरे पर... एक मुस्कान फैल गई।
नहीं... कोई शर्म नहीं।
न कोई गुस्सा।
बस... एक गहरी, प्यार भरी, संतुष्ट मुस्कान।
जैसे किसी ने उसे कोई इनाम दिया हो।
जैसे किसी ने उसे उसकी असली जगह याद दिलाई हो—और वो उस जगह पर गर्व महसूस कर रही हो।
वो धीरे से झुकी।
अलोक की छाती की तरफ।
उसने होंठ अलोक के सीने पर रख दिए—एक गहरा, प्यार भरा किस।
उसकी जीभ हल्के से छू गई—जैसे कोई पुरस्कार स्वीकार कर रही हो।
"My master ..." उसने धीरे से फुसफुसाया—आवाज़ में कोई शर्म नहीं, बस... एक गहरी, आज्ञाकारी खुशी।
उसने अलोक की छाती पर फिर किस किया—इस बार और गहरा, और लंबा।
उसकी आँखें बंद हो गईं—जैसे वो इस पल में खो गई हो।
अलोक ने हल्के से हँसा—एक संतुष्ट, जानवर जैसी हँसी।
उसने सैंडी के बालों में हाथ फेरा—प्यार से, लेकिन मालिक की तरह।
"good Bitch ..."
"क्या देख रहा है भोसड़ीके... वो तेरी कभी नहीं हो सकती... चाहे तू कितना भी पैसे दे दे?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... खड़ा रहा।
फिर मेरी तरफ देखा—उसकी आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं।
"जानता है क्यों?"
मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ काँप रही थी।
"क्यों?"
अलोक ने मेरे लुंड की तरफ देखा—एक पल।
फिर हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
"क्योंकि... ये।"
उसने मेरे छोटे लुंड की तरफ इशारा किया—जैसे कोई बेकार चीज़ हो।
"औरत असली कुत्ती तब बनती है... जब उसे कुत्ती की तरह चोदा जाए।
असली मर्द से।
असली लुंड से।
न कि... इस नन्हू से।"
सैंडी ने "नन्हू" सुनकर हल्की-सी गुदगुदी वाली हँसी निकाली—एक छोटी, ठंडी हँसी।
फिर चुप हो गई।
उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुईं—बिना पलक झपकाए।
उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई—एक घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।
अलोक ने सिगरेट की एक और कश ली—धीरे से, जैसे वो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा हो।
फिर... उसने फिर पूछा—आवाज़ में वही ठंडी, क्रूर धमकी।
"कितना समय हो गया तेरी शादी को... फिर से बता।"
मैं चुप रहा।
मेरा मुँह सूख गया था।
मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था।
तभी... सैंडी का हाथ फिर मेरे बॉल्स पर गया।
उसकी उँगलियाँ कस गईं—धीरे-धीरे, लेकिन जानबूझकर।
दर्द फिर से शुरू हो गया—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।
मैं तुरंत बोल पड़ा—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।
"छह महीने..."
अलोक ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।
"हाहा... फ्रेश चूत... अभी तो हनीमून पीरियड है... वो अभी शिकायत नहीं करेगी।
लेकिन कुछ समय बाद... जब उसे बड़े लुंड दिखेंगे... तब वो अपने एक्स-बॉयफ्रेंड को याद करेगी... या अपने बॉस को... जिससे ब्लोजॉब देकर नौकरी ली होगी।"
उसकी बातें मेरे दिमाग में चाकू की तरह उतर रही थीं।
मैं सोच रहा था—ये आदमी अमीर है... ये सब उसके पास है...।
या... ये बस एक पोर्नो मूवी का सीन बना रहा है... सब कुछ झूठ... सब कुछ बनावटी।
लेकिन... एक बात मेरी नज़र से नहीं छुपी।
नेहा।
वो बालकनी में देख रही थी।
सैंडी के जाने के बाद भी
उसकी आँखें... डेविड और विशाल के लुंड पर टिकी हुई थीं।
बड़े लुंड पर।
मोटे, भारी, लटकते हुए।
उसने देखा था—बिना पलक झपकाए।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
उसकी जांघें काँप रही थीं।
और अब... वो मेरे दिमाग में थी।
नेहा।
मेरी नेहा।
क्या वो भी... कभी... सोचेगी... कि मैं... काफी नहीं हूँ?
क्या वो भी... बड़े लुंड को देखकर... याद करेगी... किसी और को?
वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं, बस... एक साफ़, बेरहम फैसला।
"मैं देखना चाहता था... कि तू अपनी बीवी को कुतिया बना सकता है कि नहीं।
पहले तू चोदे... फिर तेरे दोस्त शामिल हों... फिर और... फिर और।
ये सब... मैंने इसलिए किया।
इसलिए तुझे दोस्त बनाना चाहा था।
ताकि नेहा... मेरे सामने आए।
ताकि मैं उसे... सिखाऊँ... असली मज़ा क्या होता है।"
वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।
"लेकिन... तेरे लुंड को देखकर... सब साफ़ हो गया।
तू कभी नहीं बना सकता उसे अपनी कुतिया ।
वो कभी तेरी आज्ञा नहीं मानेगी।
अलोक ने सिगरेट की आखिरी कश ली—फिर उसे राखदान में ठोक दिया।
धुआँ अभी भी हवा में लहरा रहा था, मेरे चेहरे पर चिपक रहा था।
वो मेरी तरफ देख रहा था—उसकी आँखें अब और सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली सच्चाई।
वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस... एक गहरा, बेरहम फैसला।
"हालाँकि... तेरी बीवी में... अच्छी कुतिया बनने की पूरी काबिलियत है।
मुझे शायद तेरी ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी उसे ट्रेन करने की।"
वो रुका—एक पल के लिए।
फिर मुस्कुराया—एक छोटी, कड़वी मुस्कान।
"वो नेचुरल कुतिया है।
तूने खुद देखा था... ब्रेकफास्ट टेबल पर।
जब मैंने कहा था... कि मैं उसे होटल शूट के लिए सुपरमॉडल समझ बैठा था... वो कैसे हँस रही थी... शरमा रही थी... उसके गाल लाल हो गए थे।
और उसने... मेरे हाथ को छुआ था।
हल्के से... लेकिन जानबूझकर।
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर रुकी थीं... एक सेकंड ज़्यादा।
वो... पहले से ही तैयार थी।
बस... एक छोटा सा झूठ... एक छोटा सा फेक शूट... थोड़ा सा समय... और थोड़ा सा ट्रेनिंग... इस मॉन्स्टर से।"
उसने अपना लुंड पकड़ा—जो अभी भी हार्ड था, मोटा, भारी, चमकता हुआ।
उसने उसे हल्के से हिलाया—मेरी तरफ इशारा करते हुए।
"ये... ये उसे सिखाएगा।
कैसे आज्ञा माननी है।
कैसे घुटनों पर बैठना है।
कैसे चाटना है।
कैसे काटना है।
तेरी नेहा... वो भी... कुछ ही दिनों में... मेरे सामने घुटनों पर बैठेगी।
"फिर... तेरी नेहा को... मेरे लुंड की ताकत का पता चलेगा।
वो सुख... जो तूने कभी उसे नहीं दिया... वो उसे मिलेगा।
वो मेरे लुंड के लिए तरसेगी।
वो तुझसे गिड़गिड़ाएगी... कि मुझे अलोक भाई के फार्महाउस ले चलो।
वहाँ... उसे और लुंड मिलेंगे।
डेविड का... विशाल का... और भी।
वो... अच्छी गुलाम बनेगी।
हमारे लिए खाना बनाएगी... और किचन में मेरे कुक से चुदेगी।
गार्डन में... मेरे माली से... खुली हवा में... चुदेगी।
सर्वेंट क्वार्टर में... उनके गंदे बिस्तर पर... सोएगी।
और तू... बस... देखता रहेगा।
वो तुझे... तभी चाहिएगी... जब वो रंडी की तरह बेरहमी से चुदकर थक जाएगी।
तब... वो तुझसे... अपनी चूत चटवाएगी।
तेरी जीभ... उसकी चूत पर।
बस... इतना ही।
तेरा काम... बस इतना ही रहेगा।"
सैंडी ने अलोक की छाती पर सिर रखा—उसकी जीभ अलोक के निप्पल पर थी, धीरे-धीरे चाट रही थी।
उसका दायाँ हाथ अलोक के लुंड पर था—ऊपर-नीचे, कसकर।
उसका बायाँ हाथ... मेरे बॉल्स पर था—हल्का-सा छू रहा था, लेकिन कोई दबाव नहीं।
बस... एक हल्की सी छुअन—जैसे वो कह रही हो—"देख... मैं छू सकती हूँ... लेकिन तुझे कुछ नहीं दूँगी।"
मैं नहीं समझ पा रहा था—ये अपमान... ये शर्म... ये सब... फिर भी मुझे उत्तेजित कर रहा था।
मेरा लुंड... अब पूरी तरह हार्ड था।
फड़क रहा था।
अलोक के शब्दों में "चूत चटवाएगी" आया।
सैंडी के शरीर में एक झटका लगा।
जैसे कोई कोड एक्टिवेट हो गया हो।
उसकी जीभ अलोक के निप्पल से हट गई।
उसने धीरे से एक पैर ज़मीन से उठाया—बिस्तर पर रख दिया।
दूसरा पैर अभी भी ज़मीन पर था।
उसकी जांघें अब पूरी तरह खुल गईं—चूत अब साफ़, खुली, मेरे सामने।
पहले सिर्फ़ एक लाइन दिख रही थी... अब पूरी चूत—लाल, सूजी हुई, गीली, चमकती हुई।
उसने अपना बायाँ हाथ मेरे बॉल्स से हटाया।
फिर मेरे सिर पर ले आई।
उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में उलझ गईं—कसकर।
उसने मेरा सिर नीचे खींचा—एक आदेश की तरह।
"चाट..."
उसकी आवाज़ में अब कोई हँसी नहीं थी।
बस... एक साफ़, ठंडा आदेश।
मेरा सिर उसकी चूत के सामने था।
उसकी खुशबू—गर्म, मीठी।
मैंने जीभ निकाली—धीरे से।
उसकी चूत पर रखी।
उसका रस मेरी जीभ पर लगा—गाढ़ा, नमकीन, गर्म।
मैं अब लगभग घुटनों पर था... मेरा चेहरा सैंडी की चूत के ठीक सामने।


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