10-03-2026, 03:22 PM
राजकुल ग्रूप के ऑफीस के कान्फरेन्स हॉल मे राजासाहब अपने एंप्लायीस को डील के बारे मे और डील के पैसों से उन्हे मिलने वाले बोनस के बारे मे बता रहे थे," और अब एक आखरी अनाउन्स्मेंट, अभी तक कंपनी का केवल एक वाइस-प्रेसीडेंट था कुंवर विश्वजीत सिंग पर आज से दो वी.पी होंगे और दूसरी वी.पी होंगी कुँवारानी मेनका सिंग।"
तालियों की गड़गढ़त से हॉल गूँज उठा, “आज के बाद अगर हम ऑफीस मे ना हो तो हमारी जगह आप कुँवारानी को ही अपना सबसे बड़ा बॉस समझिए ये सारी बातें थी जो कि आपका जानना ज़रूरी था। अगले 2-3 दीनो मे बोनस की रकम आपके सॅलरी अकाउंट्स मे जमा करा दी जाएगी। थॅंक यू।"
मीटिंग के बाद मेनका राजासाहब के ऑफीस चेंबर मे बैठी थी,"क्या ज़रूरत है हमे वी.पी बनाने की?"
"अरे भाई,वैसे ही तुम एक वी.पी की सारी ज़िम्मेदारियाँ उठाती हो तो बना भी दिया।",पास आकर उसे चेर से उठाया और बाहों मे कस लिया।
"क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा।",मेनका छूटने की कोशिश करने लगी। चेहरे पर घबराहट और शर्म के मिले-जुले भाव थे। मैत्री की प्रस्तुति.
"हमारे ऑफीस मे बिना हमारी इजाज़त के कोई नही आ सकता।",राजासाहब ने उसके होठ चूम लिए।
"प्लीज़,यश मुझे डर लग रहा है। पागल मत बनो, ऑफीस है किसी को पता चल गया तो ग़ज़ब हो जाएगा।"
"हम पर भरोसा रखो,तुमसे ज़्यादा तुम्हारी फ़िक्र हम करते हैं।" और एक बार फिर उसके होंठ चूमने लगे। उन्होने अपने हाथों से नीचे से उसकी साड़ी उठानी शुरू कर दी। मेनका फिर कसमसाई,"प्लीज़",पर राजासाहब ने उसे अनसुना करते हुए साड़ी कमर तक उठा दी और अपने हाथों से उसकी पेंटी मे कसी गांड की फांको को मसलने लगे।
वैसे ही उसकी गांड पकड़ कर चूमते हुए उन्होने उसे डेस्क पर बैठा दिया और खुद उसके सामने चेर पर बैठ गये और एक झटके मे उसकी पेंटी उतार दी। मेनका कुछ कह पाती इस से पहले ही उसकी जांगे उसके ससुर के कंधे पे थी और उनके होठ उसकी चूत पे जा लगे।
"ऊओ...ऊ...",मेनका की सिसकारी निकल गयी। उसने अपनी जांघों मे अपने ससुर को भीच लिया और अपने हाथों से उनके सर को अपनी चूत पर दबाने लगी। राजासाहब के मुँह ने उसकी चूत को चाटना,चूमना औरचूसना चालू कर दिया और हाथ उसकी ब्लाउस मे कसी धाये को दबाने लगे।
मेनका को और क्या चाहिए था, मेनका मस्त हो गयी पर मन के किसी कोने मे पकड़े जाने का डर भी था। वो जल्दी से जल्दी झड़ना चाहती थी और राजासाहब इसमे उसकी पूरी मदद कर रहे थे। थोड़ी ही देर मे मेनका ने अपनी गांड डेस्क से उठा दी और अपने होठ काट अपनी सिसकारियों को ज़ब्त करते हुए अपने ससुर का मुँह अपने हाथों से अपनी चूत पे और दबा दिया और उसकी चूत ने ससुर के मुह में अपने चुतरस का प्रसाद दे दिया।
राजासाहब उठे,अपनी पॅंट खोली और अपना लंड निकाल कर डेस्क पर बैठी मेनका की गीली चूत मे डाल दिया। लंड घुसते ही मेनका उनसे लिपट गयी औरउनके धक्कों का मज़ा उठाने लगी,थोड़ी ही देर मे उसकी गांड फिर हिलने लगी। उसके होठ अपने ससुर के होठों से लगे थे और हाथ उनके पूरे शरीर पर फिर रहे थे। राजासाहब ने अपने हाथ नीचे से उसकी गांड पर कस दिए थे।दोनो चुदाई मे पूरी तरह डूब गये और थोड़ी ही देर मे दोनो के शरीर झटके खा कर झड़ गये।
दोनो वैसे ही लिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे कि राजासाहब का मोबाइल बजा। मैत्री की लेखनी.
दोस्तों बस आज के लिए यही तक फिर मिलेंगे तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत।
तालियों की गड़गढ़त से हॉल गूँज उठा, “आज के बाद अगर हम ऑफीस मे ना हो तो हमारी जगह आप कुँवारानी को ही अपना सबसे बड़ा बॉस समझिए ये सारी बातें थी जो कि आपका जानना ज़रूरी था। अगले 2-3 दीनो मे बोनस की रकम आपके सॅलरी अकाउंट्स मे जमा करा दी जाएगी। थॅंक यू।"
मीटिंग के बाद मेनका राजासाहब के ऑफीस चेंबर मे बैठी थी,"क्या ज़रूरत है हमे वी.पी बनाने की?"
"अरे भाई,वैसे ही तुम एक वी.पी की सारी ज़िम्मेदारियाँ उठाती हो तो बना भी दिया।",पास आकर उसे चेर से उठाया और बाहों मे कस लिया।
"क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा।",मेनका छूटने की कोशिश करने लगी। चेहरे पर घबराहट और शर्म के मिले-जुले भाव थे। मैत्री की प्रस्तुति.
"हमारे ऑफीस मे बिना हमारी इजाज़त के कोई नही आ सकता।",राजासाहब ने उसके होठ चूम लिए।
"प्लीज़,यश मुझे डर लग रहा है। पागल मत बनो, ऑफीस है किसी को पता चल गया तो ग़ज़ब हो जाएगा।"
"हम पर भरोसा रखो,तुमसे ज़्यादा तुम्हारी फ़िक्र हम करते हैं।" और एक बार फिर उसके होंठ चूमने लगे। उन्होने अपने हाथों से नीचे से उसकी साड़ी उठानी शुरू कर दी। मेनका फिर कसमसाई,"प्लीज़",पर राजासाहब ने उसे अनसुना करते हुए साड़ी कमर तक उठा दी और अपने हाथों से उसकी पेंटी मे कसी गांड की फांको को मसलने लगे।
वैसे ही उसकी गांड पकड़ कर चूमते हुए उन्होने उसे डेस्क पर बैठा दिया और खुद उसके सामने चेर पर बैठ गये और एक झटके मे उसकी पेंटी उतार दी। मेनका कुछ कह पाती इस से पहले ही उसकी जांगे उसके ससुर के कंधे पे थी और उनके होठ उसकी चूत पे जा लगे।
"ऊओ...ऊ...",मेनका की सिसकारी निकल गयी। उसने अपनी जांघों मे अपने ससुर को भीच लिया और अपने हाथों से उनके सर को अपनी चूत पर दबाने लगी। राजासाहब के मुँह ने उसकी चूत को चाटना,चूमना औरचूसना चालू कर दिया और हाथ उसकी ब्लाउस मे कसी धाये को दबाने लगे।
मेनका को और क्या चाहिए था, मेनका मस्त हो गयी पर मन के किसी कोने मे पकड़े जाने का डर भी था। वो जल्दी से जल्दी झड़ना चाहती थी और राजासाहब इसमे उसकी पूरी मदद कर रहे थे। थोड़ी ही देर मे मेनका ने अपनी गांड डेस्क से उठा दी और अपने होठ काट अपनी सिसकारियों को ज़ब्त करते हुए अपने ससुर का मुँह अपने हाथों से अपनी चूत पे और दबा दिया और उसकी चूत ने ससुर के मुह में अपने चुतरस का प्रसाद दे दिया।
राजासाहब उठे,अपनी पॅंट खोली और अपना लंड निकाल कर डेस्क पर बैठी मेनका की गीली चूत मे डाल दिया। लंड घुसते ही मेनका उनसे लिपट गयी औरउनके धक्कों का मज़ा उठाने लगी,थोड़ी ही देर मे उसकी गांड फिर हिलने लगी। उसके होठ अपने ससुर के होठों से लगे थे और हाथ उनके पूरे शरीर पर फिर रहे थे। राजासाहब ने अपने हाथ नीचे से उसकी गांड पर कस दिए थे।दोनो चुदाई मे पूरी तरह डूब गये और थोड़ी ही देर मे दोनो के शरीर झटके खा कर झड़ गये।
दोनो वैसे ही लिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे कि राजासाहब का मोबाइल बजा। मैत्री की लेखनी.
दोस्तों बस आज के लिए यही तक फिर मिलेंगे तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)