09-03-2026, 10:27 PM
(This post was last modified: 09-03-2026, 10:29 PM by rajeshpawar2749. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
ऑफिस से लौटते समय किमाया के चेहरे पर आज एक अलग ही चमक थी। जैसे दिन भर की थकान के बावजूद मन के भीतर कोई मीठी खुशी छुपी हो।
स्कूटर आँगन में रोककर उसने धीरे से घर का दरवाज़ा खोला।
“माँ… मैं आ गई,” उसने आवाज़ लगाई।
रसोई से कल्याणी की आवाज़ आई—
“आ गई बेटा? पहले फ्रेश हो जाओ, फिर आना।”
किमाया अपने कमरे में चली गई। ठंडे पानी से मुँह धोकर और कपड़े बदलकर जब वह कुछ देर बाद रसोई में आई, तो वहाँ एक प्यारा-सा घरेलू दृश्य था।
कल्याणी चूल्हे पर रात का खाना बना रही थीं।
शांति देवी पास में खड़ी बर्तन साफ कर रही थीं।
किमाया तुरंत सिंक के पास आई और प्लेटें निकालकर मेज़ पर लगाने लगी।
शांति देवी ने तुरंत रोक दिया—
“अरे बेटा, अभी-अभी ऑफिस से आई हो। पहले थोड़ा आराम कर लो। कुछ खा लो।”
किमाया मुस्कुराई—
“दादी, काम करने से ही तो आराम मिलता है।”
कल्याणी ने मज़ाक में कहा—
“मम्मीजी, आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। इन्हें बस अपने फिगर की पड़ी रहती है। ज़रा सा खा लिया तो लगेगा मोटी हो जाएँगी।”
शांति देवी ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“अरे बेटा, पतले बदन से थोड़ा भरा हुआ शरीर ही अच्छा लगता है।”
किमाया ने तुरंत हँसते हुए जवाब दिया—
“दादी, उसे भरा हुआ नहीं… मोटा कहते हैं।”
कल्याणी ने सिर हिलाते हुए कहा—
“आजकल के बच्चों से बहस करना ही बेकार है।”
तभी दरवाज़े की आवाज़ आई। रोहन घर में घुसा—बैग कंधे पर और हाथ में मोबाइल।
वह अपने दोस्तों से फोन पर अभी भी मैच की बात कर रहा था—
“अरे यार, अगले मैच में मैं ओपनिंग ही करूँगा… हाँ हाँ, वही स्ट्रेट ड्राइव वाला शॉट…”
किमाया ने उसे देखते ही पूछा—
“तो जनाब, आज का मैच कैसा रहा?”
रोहन ने जल्दी से जवाब दिया—
“ठीक था… 17 बॉल में 24 रन बनाए। एक कैच और एक रन-आउट भी किया। टीम जीत गई।”
“वाह!” किमाया खुश होकर बोली।
रोहन ने बस मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सीधे अपने कमरे में चला गया।
किमाया ने तुरंत माँ और दादी की ओर मुड़कर कहा—
“आपको पता है, आज रोहन की वजह से टीम जीती है!”
कल्याणी गर्व से मुस्कुराईं।
कल्याणी ने आवाज़ लगाई—
“रोहन! इधर आओ, पहले कुछ खा लो।”
रोहन वापस आया और टेबल पर बैठ गया। कल्याणी ने उसके सामने नाश्ता रख दिया।
साथ ही उन्होंने किमाया से कहा—
“और तुम भी बैठो। कुछ खा लो।”
“माँ, मुझे भूख नहीं है,” किमाया बोली।
“थोड़ा सा तो खा लो,” कल्याणी ने प्यार से ज़ोर दिया।
किमाया आखिर मान गई।
रोहन खाते-खाते भी मोबाइल पर अपने दोस्तों से अगले मैच की योजना बना रहा था।
कल्याणी ने तुरंत टोका—
“रोहन, खाने के समय मोबाइल पर बात मत किया करो।”
“ओके माँ,” उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
जल्दी-जल्दी नाश्ता खत्म किया और फिर कमरे में चला गया।
अब रसोई में फिर तीनों महिलाएँ मिलकर रात के खाने की तैयारी करने लगीं।
कल्याणी सब्ज़ी में तड़का लगा रही थीं।
किमाया रोटियाँ बेल रही थी।
शांति देवी दाल के लिए मसाले तैयार कर रही थीं।
बातों-बातों में समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।
रात 9:30 बजे सब लोग डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हुए।
राजेश भी कोर्ट से लौट चुके थे।
सबके सामने गरम-गरम खाना परोसा गया—दाल, सब्ज़ी, रोटी और चावल।
खाना शुरू होते ही बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया।
राजेश ने पूछा—
“आज सबका दिन कैसा रहा?”
रोहन तुरंत बोला—
“पापा, आज हमारा मैच था और हम जीत गए!”
राजेश मुस्कुराए—
“अच्छा! फिर तो आज टीम को पार्टी देनी पड़ेगी।”
किमाया ने अपने ऑफिस की मीटिंग के बारे में बताया।
कल्याणी ने फिर कहा—
“और आज हम बागान भी गए थे। मजदूरों से बात हुई और मैंने अकाउंट की फाइल भी ले आई है।”
राजेश ने सिर हिलाया—
“अच्छा किया। कल बैठकर देखते हैं।”
शांति देवी बस सबको सुनती हुई मुस्कुरा रही थीं।
खाना खत्म होते ही राजेश और रोहन टीवी के सामने बैठ गए।
रोहन तुरंत स्पोर्ट्स चैनल लगा बैठा।
“पापा, देखिए यह शॉट,” वह उत्साह से बोला।
उधर घर की महिलाएँ फिर रसोई में व्यस्त हो गईं—
बर्तन धोना, खाना समेटना, सब कुछ व्यवस्थित करना।
जब काम खत्म हुआ, तब कल्याणी, शांति देवी और किमाया आँगन में निकल आईं।
रात की हवा ठंडी और सुकूनभरी थी। ऊपर आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे।
तीनों धीरे-धीरे टहलने लगीं।
कभी घर की बातें, कभी रिश्तेदारों की चर्चा, कभी वीकेंड की पिकनिक का उत्साह।
कुछ देर बाद जब वे वापस घर के भीतर आईं, तो देखा—
राजेश और रोहन दोनों अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
घर में फिर वही गहरी शांति उतर आई।
किमाया ने माँ और दादी को “गुड नाइट” कहा और अपने कमरे में चली गई। कमरे की लाइट हल्की थी, खिड़की से आती चाँदनी कमरे के फर्श पर फैल रही थी।
तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल वाइब्रेट करने लगा।
उसने मोबाइल निकाला और स्क्रीन देखी… वही नाम।
किमाया हल्के से मुस्कुराई और बिस्तर पर बैठकर चैट खोल ली।
वह:
“लगता है मैडम आज बहुत बिज़ी थीं।”
किमाया:
“हाँ… और कोई इंतज़ार भी कर रहा था चाय के लिए।”
वह:
“अरे! मैं तो बस चाय पीने आया था।”
किमाया:
“हाँ हाँ… मुझे पता है। चाय बहाना था।”
वह:
“तो असली वजह क्या थी?”
किमाया:
“तुम ही बताओ।”
कुछ सेकंड टाइपिंग दिखती रही।
वह:
“शायद… तुम्हारे साथ थोड़ी देर बातें करने का मन था।”
किमाया ने हल्की हँसी के साथ रिप्लाई किया—
“अच्छा? तो अब रोज़ चाय पीनी पड़ेगी।”
वह:
“अगर साथ तुम्हारा हो तो रोज़।”
किमाया ने तुरंत छेड़ा—
“इतनी जल्दी फ्लर्ट मत करो।”
वह:
“अरे नहीं, मैं तो बहुत शरीफ हूँ।”
किमाया:
“हाँ, आज देखा था कितने शरीफ हो।”
वह:
“क्या देखा?”
किमाया:
“जब चायवाले अंकल ने पूछा – ‘दो कप?’ तो तुमने बिना पूछे हाँ कह दिया।”
वह:
“अरे, मुझे पता था तुम मना नहीं करोगी।”
किमाया:
“इतना कॉन्फिडेंस?”
वह:
“तुम्हें समझना मुश्किल नहीं है।”
किमाया ने एक स्माइली भेज दी।
फिर बात धीरे-धीरे घर की ओर मुड़ गई।
वह:
“तुम्हारा परिवार बहुत प्यारा लगता है।”
किमाया:
“हाँ… दादी बहुत स्वीट हैं। और माँ… मेरी बेस्ट फ्रेंड।”
वह:
“और भाई?”
किमाया:
“क्रिकेट का पागल।”
दोनों हँसते रहे।
लगभग एक घंटा ऐसे ही हँसी-मजाक और एक-दूसरे की टाँग खींचने में निकल गया।
आखिर में उसने लिखा—
“अब सो जाओ, नहीं तो कल ऑफिस में सोती रहोगी।”
किमाया:
“तुम भी सो जाओ।”
वह:
“गुड नाइट।”
किमाया:
“गुड नाइट… और हाँ… कल चाय?”
वह:
“पक्का।”
किमाया मुस्कुराते हुए फोन बंद कर बिस्तर पर लेट गई।
उधर शांति देवी अपने कमरे में आ चुकी थीं।
उन्होंने अलमारी से भगवान की छोटी-सी किताब निकाली और बिस्तर पर बैठकर पढ़ने लगीं।
धीरे-धीरे उनकी आँखें भारी होने लगीं।
करीब दस मिनट बाद उन्होंने किताब बंद की, भगवान को प्रणाम किया और सो गईं।
रोहन तो मैच की थकान से पहले ही गहरी नींद में डूब चुका था।
उसके कमरे में अभी भी क्रिकेट बैट दीवार से टिकाकर रखा था।
राजेश अपने कमरे में कल्याणी का इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही कल्याणी रसोई का काम निपटाकर कमरे में आई, राजेश ने किताब एक तरफ रख दी।
"कल्याणी, आज जब मैं कोर्ट में था, तब भी सोच रहा था कि तुम घर, बच्चे, और मेरा बागान कितनी बखूबी संभालती हो। सच में, तुम इस घर की नींव हो," राजेश ने उसके करीब आते हुए कहा।
कल्याणी ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, "और आप इस घर की छत। छत मज़बूत न हो, तो दीवारें क्या करेंगी?"
राजेश ने बड़े प्यार से कल्याणी को अपनी बाहों में भर लिया। थकान के बावजूद दोनों के बीच एक गहरा आकर्षण उमड़ रहा था। राजेश के हाथ कल्याणी के बदन पर थिरकने लगे। उन्होंने बड़े अधिकार और प्रेम के साथ कल्याणी के स्तनों को स्पर्श किया और उन्हें जोर से दबाया। कल्याणी के मुँह से एक हल्की सी 'आह' निकली—वह दर्द तो था, पर उस दर्द में एक मीठी उत्तेजना और समर्पण की महक थी। कल्याणी का रोम-रोम जाग उठा। उसने राजेश को ज़ोर से गले लगा लिया (Hug) और दोनों एक लंबे, गहरे और भावुक चुंबन में खो गए। कमरा उनकी गर्म साँसों और आपसी प्रेम की खुशबू से भर गया।
कुछ देर बाद, जब दोनों शांत हुए, तो राजेश ने धीरे से कहा, "कल्याणी, आज मन कर रहा है कि थोड़ी व्हिस्की हो जाए।"
कल्याणी ने प्यार से उनके गाल को छुआ और कहा, "नहीं, आज आप बहुत थके हुए हैं। कल पक्का पी लेना, मैं मना नहीं करूँगी।"
राजेश: "ठीक है, पर कल तुम्हें मेरी कंपनी देनी होगी।"
कल्याणी: "आप मुझे सच में बिगाड़ देंगे! खैर, ठीक है... पर कल आते वक्त मेरे लिए एक चिल्ड बियर लेते आना। और हाँ, कल रात के डिनर में मैं आपकी पसंद का 'कुर्गी नॉन-वेज' बनाऊँगी।"
राजेश ने मुस्कुराकर सहमति दी। कल्याणी अब राजेश के चौड़े सीने पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी। दोनों के बीच अभी भी धीमी आवाज़ में कल की ट्रिप और बच्चों के भविष्य को लेकर बातें चल रही थीं। धीरे-धीरे कल्याणी की आँखें भारी होने लगीं और वह राजेश की छाती पर ही सो गई।
राजेश ने उसके सिर पर बड़े दुलार से हाथ फेरा और छत की ओर देखते हुए सोचा, "मैं कितना खुशकिस्मत हूँ कि मुझे इतनी ज़िम्मेदार और प्यार करने वाली पत्नी मिली।" इसी सुखद अहसास के साथ, राजेश भी गहरी नींद की आगोश में समा गए। 'अनंत शांति निवास' अब पूरी तरह से 'अनंत शांति' में डूबा हुआ था।
स्कूटर आँगन में रोककर उसने धीरे से घर का दरवाज़ा खोला।
“माँ… मैं आ गई,” उसने आवाज़ लगाई।
रसोई से कल्याणी की आवाज़ आई—
“आ गई बेटा? पहले फ्रेश हो जाओ, फिर आना।”
किमाया अपने कमरे में चली गई। ठंडे पानी से मुँह धोकर और कपड़े बदलकर जब वह कुछ देर बाद रसोई में आई, तो वहाँ एक प्यारा-सा घरेलू दृश्य था।
कल्याणी चूल्हे पर रात का खाना बना रही थीं।
शांति देवी पास में खड़ी बर्तन साफ कर रही थीं।
किमाया तुरंत सिंक के पास आई और प्लेटें निकालकर मेज़ पर लगाने लगी।
शांति देवी ने तुरंत रोक दिया—
“अरे बेटा, अभी-अभी ऑफिस से आई हो। पहले थोड़ा आराम कर लो। कुछ खा लो।”
किमाया मुस्कुराई—
“दादी, काम करने से ही तो आराम मिलता है।”
कल्याणी ने मज़ाक में कहा—
“मम्मीजी, आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। इन्हें बस अपने फिगर की पड़ी रहती है। ज़रा सा खा लिया तो लगेगा मोटी हो जाएँगी।”
शांति देवी ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“अरे बेटा, पतले बदन से थोड़ा भरा हुआ शरीर ही अच्छा लगता है।”
किमाया ने तुरंत हँसते हुए जवाब दिया—
“दादी, उसे भरा हुआ नहीं… मोटा कहते हैं।”
कल्याणी ने सिर हिलाते हुए कहा—
“आजकल के बच्चों से बहस करना ही बेकार है।”
तभी दरवाज़े की आवाज़ आई। रोहन घर में घुसा—बैग कंधे पर और हाथ में मोबाइल।
वह अपने दोस्तों से फोन पर अभी भी मैच की बात कर रहा था—
“अरे यार, अगले मैच में मैं ओपनिंग ही करूँगा… हाँ हाँ, वही स्ट्रेट ड्राइव वाला शॉट…”
किमाया ने उसे देखते ही पूछा—
“तो जनाब, आज का मैच कैसा रहा?”
रोहन ने जल्दी से जवाब दिया—
“ठीक था… 17 बॉल में 24 रन बनाए। एक कैच और एक रन-आउट भी किया। टीम जीत गई।”
“वाह!” किमाया खुश होकर बोली।
रोहन ने बस मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सीधे अपने कमरे में चला गया।
किमाया ने तुरंत माँ और दादी की ओर मुड़कर कहा—
“आपको पता है, आज रोहन की वजह से टीम जीती है!”
कल्याणी गर्व से मुस्कुराईं।
कल्याणी ने आवाज़ लगाई—
“रोहन! इधर आओ, पहले कुछ खा लो।”
रोहन वापस आया और टेबल पर बैठ गया। कल्याणी ने उसके सामने नाश्ता रख दिया।
साथ ही उन्होंने किमाया से कहा—
“और तुम भी बैठो। कुछ खा लो।”
“माँ, मुझे भूख नहीं है,” किमाया बोली।
“थोड़ा सा तो खा लो,” कल्याणी ने प्यार से ज़ोर दिया।
किमाया आखिर मान गई।
रोहन खाते-खाते भी मोबाइल पर अपने दोस्तों से अगले मैच की योजना बना रहा था।
कल्याणी ने तुरंत टोका—
“रोहन, खाने के समय मोबाइल पर बात मत किया करो।”
“ओके माँ,” उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
जल्दी-जल्दी नाश्ता खत्म किया और फिर कमरे में चला गया।
अब रसोई में फिर तीनों महिलाएँ मिलकर रात के खाने की तैयारी करने लगीं।
कल्याणी सब्ज़ी में तड़का लगा रही थीं।
किमाया रोटियाँ बेल रही थी।
शांति देवी दाल के लिए मसाले तैयार कर रही थीं।
बातों-बातों में समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।
रात 9:30 बजे सब लोग डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हुए।
राजेश भी कोर्ट से लौट चुके थे।
सबके सामने गरम-गरम खाना परोसा गया—दाल, सब्ज़ी, रोटी और चावल।
खाना शुरू होते ही बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया।
राजेश ने पूछा—
“आज सबका दिन कैसा रहा?”
रोहन तुरंत बोला—
“पापा, आज हमारा मैच था और हम जीत गए!”
राजेश मुस्कुराए—
“अच्छा! फिर तो आज टीम को पार्टी देनी पड़ेगी।”
किमाया ने अपने ऑफिस की मीटिंग के बारे में बताया।
कल्याणी ने फिर कहा—
“और आज हम बागान भी गए थे। मजदूरों से बात हुई और मैंने अकाउंट की फाइल भी ले आई है।”
राजेश ने सिर हिलाया—
“अच्छा किया। कल बैठकर देखते हैं।”
शांति देवी बस सबको सुनती हुई मुस्कुरा रही थीं।
खाना खत्म होते ही राजेश और रोहन टीवी के सामने बैठ गए।
रोहन तुरंत स्पोर्ट्स चैनल लगा बैठा।
“पापा, देखिए यह शॉट,” वह उत्साह से बोला।
उधर घर की महिलाएँ फिर रसोई में व्यस्त हो गईं—
बर्तन धोना, खाना समेटना, सब कुछ व्यवस्थित करना।
जब काम खत्म हुआ, तब कल्याणी, शांति देवी और किमाया आँगन में निकल आईं।
रात की हवा ठंडी और सुकूनभरी थी। ऊपर आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे।
तीनों धीरे-धीरे टहलने लगीं।
कभी घर की बातें, कभी रिश्तेदारों की चर्चा, कभी वीकेंड की पिकनिक का उत्साह।
कुछ देर बाद जब वे वापस घर के भीतर आईं, तो देखा—
राजेश और रोहन दोनों अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
घर में फिर वही गहरी शांति उतर आई।
किमाया ने माँ और दादी को “गुड नाइट” कहा और अपने कमरे में चली गई। कमरे की लाइट हल्की थी, खिड़की से आती चाँदनी कमरे के फर्श पर फैल रही थी।
तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल वाइब्रेट करने लगा।
उसने मोबाइल निकाला और स्क्रीन देखी… वही नाम।
किमाया हल्के से मुस्कुराई और बिस्तर पर बैठकर चैट खोल ली।
वह:
“लगता है मैडम आज बहुत बिज़ी थीं।”
किमाया:
“हाँ… और कोई इंतज़ार भी कर रहा था चाय के लिए।”
वह:
“अरे! मैं तो बस चाय पीने आया था।”
किमाया:
“हाँ हाँ… मुझे पता है। चाय बहाना था।”
वह:
“तो असली वजह क्या थी?”
किमाया:
“तुम ही बताओ।”
कुछ सेकंड टाइपिंग दिखती रही।
वह:
“शायद… तुम्हारे साथ थोड़ी देर बातें करने का मन था।”
किमाया ने हल्की हँसी के साथ रिप्लाई किया—
“अच्छा? तो अब रोज़ चाय पीनी पड़ेगी।”
वह:
“अगर साथ तुम्हारा हो तो रोज़।”
किमाया ने तुरंत छेड़ा—
“इतनी जल्दी फ्लर्ट मत करो।”
वह:
“अरे नहीं, मैं तो बहुत शरीफ हूँ।”
किमाया:
“हाँ, आज देखा था कितने शरीफ हो।”
वह:
“क्या देखा?”
किमाया:
“जब चायवाले अंकल ने पूछा – ‘दो कप?’ तो तुमने बिना पूछे हाँ कह दिया।”
वह:
“अरे, मुझे पता था तुम मना नहीं करोगी।”
किमाया:
“इतना कॉन्फिडेंस?”
वह:
“तुम्हें समझना मुश्किल नहीं है।”
किमाया ने एक स्माइली भेज दी।
फिर बात धीरे-धीरे घर की ओर मुड़ गई।
वह:
“तुम्हारा परिवार बहुत प्यारा लगता है।”
किमाया:
“हाँ… दादी बहुत स्वीट हैं। और माँ… मेरी बेस्ट फ्रेंड।”
वह:
“और भाई?”
किमाया:
“क्रिकेट का पागल।”
दोनों हँसते रहे।
लगभग एक घंटा ऐसे ही हँसी-मजाक और एक-दूसरे की टाँग खींचने में निकल गया।
आखिर में उसने लिखा—
“अब सो जाओ, नहीं तो कल ऑफिस में सोती रहोगी।”
किमाया:
“तुम भी सो जाओ।”
वह:
“गुड नाइट।”
किमाया:
“गुड नाइट… और हाँ… कल चाय?”
वह:
“पक्का।”
किमाया मुस्कुराते हुए फोन बंद कर बिस्तर पर लेट गई।
उधर शांति देवी अपने कमरे में आ चुकी थीं।
उन्होंने अलमारी से भगवान की छोटी-सी किताब निकाली और बिस्तर पर बैठकर पढ़ने लगीं।
धीरे-धीरे उनकी आँखें भारी होने लगीं।
करीब दस मिनट बाद उन्होंने किताब बंद की, भगवान को प्रणाम किया और सो गईं।
रोहन तो मैच की थकान से पहले ही गहरी नींद में डूब चुका था।
उसके कमरे में अभी भी क्रिकेट बैट दीवार से टिकाकर रखा था।
राजेश अपने कमरे में कल्याणी का इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही कल्याणी रसोई का काम निपटाकर कमरे में आई, राजेश ने किताब एक तरफ रख दी।
"कल्याणी, आज जब मैं कोर्ट में था, तब भी सोच रहा था कि तुम घर, बच्चे, और मेरा बागान कितनी बखूबी संभालती हो। सच में, तुम इस घर की नींव हो," राजेश ने उसके करीब आते हुए कहा।
कल्याणी ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, "और आप इस घर की छत। छत मज़बूत न हो, तो दीवारें क्या करेंगी?"
राजेश ने बड़े प्यार से कल्याणी को अपनी बाहों में भर लिया। थकान के बावजूद दोनों के बीच एक गहरा आकर्षण उमड़ रहा था। राजेश के हाथ कल्याणी के बदन पर थिरकने लगे। उन्होंने बड़े अधिकार और प्रेम के साथ कल्याणी के स्तनों को स्पर्श किया और उन्हें जोर से दबाया। कल्याणी के मुँह से एक हल्की सी 'आह' निकली—वह दर्द तो था, पर उस दर्द में एक मीठी उत्तेजना और समर्पण की महक थी। कल्याणी का रोम-रोम जाग उठा। उसने राजेश को ज़ोर से गले लगा लिया (Hug) और दोनों एक लंबे, गहरे और भावुक चुंबन में खो गए। कमरा उनकी गर्म साँसों और आपसी प्रेम की खुशबू से भर गया।
कुछ देर बाद, जब दोनों शांत हुए, तो राजेश ने धीरे से कहा, "कल्याणी, आज मन कर रहा है कि थोड़ी व्हिस्की हो जाए।"
कल्याणी ने प्यार से उनके गाल को छुआ और कहा, "नहीं, आज आप बहुत थके हुए हैं। कल पक्का पी लेना, मैं मना नहीं करूँगी।"
राजेश: "ठीक है, पर कल तुम्हें मेरी कंपनी देनी होगी।"
कल्याणी: "आप मुझे सच में बिगाड़ देंगे! खैर, ठीक है... पर कल आते वक्त मेरे लिए एक चिल्ड बियर लेते आना। और हाँ, कल रात के डिनर में मैं आपकी पसंद का 'कुर्गी नॉन-वेज' बनाऊँगी।"
राजेश ने मुस्कुराकर सहमति दी। कल्याणी अब राजेश के चौड़े सीने पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी। दोनों के बीच अभी भी धीमी आवाज़ में कल की ट्रिप और बच्चों के भविष्य को लेकर बातें चल रही थीं। धीरे-धीरे कल्याणी की आँखें भारी होने लगीं और वह राजेश की छाती पर ही सो गई।
राजेश ने उसके सिर पर बड़े दुलार से हाथ फेरा और छत की ओर देखते हुए सोचा, "मैं कितना खुशकिस्मत हूँ कि मुझे इतनी ज़िम्मेदार और प्यार करने वाली पत्नी मिली।" इसी सुखद अहसास के साथ, राजेश भी गहरी नींद की आगोश में समा गए। 'अनंत शांति निवास' अब पूरी तरह से 'अनंत शांति' में डूबा हुआ था।


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