09-03-2026, 10:24 PM
कुर्ग की हरियाली के बीच स्थित “अनंत शांति निवास” केवल एक घर नहीं, भावनाओं का आश्रय था। इस घर का नाम राजेश ने अपने माता-पिता के नाम पर रखा था—पिता अनंत, जो अब इस दुनिया में नहीं थे, और माँ शांति देवी, जो अपने नाम के अनुरूप सौम्य और शांत स्वभाव की थीं।
शांति देवी वैसी सास थीं, जो बहू को परखने या परखाने में विश्वास नहीं रखती थीं। उनके लिए बहू घर की लक्ष्मी थी। इसलिए उनके और कल्याणी के बीच रिश्ता केवल सास-बहू का नहीं, बल्कि माँ-बेटी जैसा अपनापन लिए था।
राजेश पेशे से एक सफल वकील थे। अदालत की तेज़-तर्रार बहसों के बीच भी उनका स्वभाव संतुलित रहता। साथ ही, नारियल और कॉफी के बागानों का साइड बिज़नेस भी वे संभालते थे। हिसाब-किताब और प्रबंधन में उनकी पत्नी कल्याणी हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती थीं।
कल्याणी अपने नाम की तरह मंगलमयी स्वभाव वाली थीं—संस्कारी, स्नेहमयी, एक आदर्श पत्नी और दो बच्चों की सच्ची मार्गदर्शक माँ।
उनकी बेटी किमाया, सुंदर, विनम्र और समझदार। पिछले वर्ष उसने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया था और एक साल पहले ही नौकरी शुरू की थी। नौकरी पर जाने से पहले माँ की मदद करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। इसलिए कल्याणी और किमाया केवल माँ-बेटी ही नहीं, बल्कि सच्ची सहेलियाँ भी थीं।
रोहन घर का चंचल बेटा था। शरारती ज़रूर, पर व्यवहार में विनम्र और माता-पिता के अनुशासन में रहने वाला। क्रिकेट उसका पहला प्यार था। कॉलेज के दूसरे अंतिम वर्ष में पढ़ रहा रोहन अपने कॉलेज टीम का उभरता खिलाड़ी था।
सुबह की हल्की सुनहरी किरणें नाडुमुट्टम से भीतर उतर रही थीं। तुलसी के पत्तों पर ओस चमक रही थी।
कल्याणी स्नान कर, गीले बालों को हल्के से पीछे करते हुए सबसे पहले देवघर में पहुँचीं। उन्होंने दीपक जलाया, अगरबत्ती लगाई और धीरे से बोलीं—
“हे भगवान, आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो।”
फिर आरती की थाली सजाकर, फूल चढ़ाकर वे रसोई की ओर बढ़ीं।
रसोई में पहुँचते ही उन्होंने देखा—किमाया पहले से तैयार खड़ी है। किमाया ने ऑफिस जाने के लिए एक शालीन सा कुर्ता पहना था
“अरे, बेटा! आज फिर मुझसे पहले?” कल्याणी ने मुस्कराकर कहा।
किमाया हँस पड़ी—
“माँ, आप रोज़ कहती हैं कि मुझे आराम करना चाहिए, पर मैं जानती हूँ कि आपके साथ काम करना ही मेरा असली मॉर्निंग मेडिटेशन है।”
कल्याणी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बस, ऐसे ही मुस्कुराती रहो। ऑफिस में भी खुद को ज़्यादा थकाना मत।”
किमाया ने चाय चढ़ाते हुए कहा—
“माँ, आज शाम को जल्दी आ जाऊँगी। आपके साथ बागान का हिसाब भी देखना है।”
“हाँ, और तेरे पापा को भी समझाना है कि हर काम खुद मत किया करें,” कल्याणी ने हल्के से आँखें तरेरते हुए कहा।
दोनों हँस पड़ीं। रसोई में बर्तनों की हल्की आवाज़ और उनकी हँसी मिलकर घर को जीवंत बना रही थी।
उधर बैठक में राजेश किसी कानूनी दस्तावेज़ को लेकर फोन पर बात कर रहे थे।
“जी, शर्मा जी, मैंने फाइल पूरी देख ली है। लेकिन क्लॉज़ नंबर सात में एक बदलाव ज़रूरी है।”
फोन के दूसरी ओर से आवाज़ आई—
“राजेश जी, अगर आप कह रहे हैं तो हम संशोधन करवा देते हैं, पर समय कम है।”
राजेश ने गंभीर स्वर में कहा—
“कानून में जल्दबाज़ी नहीं चलती, शर्मा जी। एक छोटी-सी गलती आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है। आप ड्राफ्ट मुझे दोपहर तक भेज दीजिए, मैं कोर्ट जाने से पहले देख लूँगा।”
“ठीक है, राजेश जी। आपका अनुभव ही हमारा भरोसा है।”
राजेश हल्का-सा मुस्कुराए—
“धन्यवाद। हम दोनों का लक्ष्य एक ही है—सही और सुरक्षित निर्णय।”
फोन रखते हुए उनकी नज़र खिड़की से बाहर फैले नारियल के बागान पर गई।
शांति देवी स्नान कर देवघर में बैठी थीं। हाथ में माला, आँखें बंद, चेहरा शांत।
“हे विष्णु भगवान, मेरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखना। बच्चों के जीवन में प्रेम और समझ बनी रहे।”
उनकी आवाज़ धीमी थी, पर भाव गहरे। आरती के बाद उन्होंने घंटी बजाई—उसकी मधुर ध्वनि पूरे घर में गूँज उठी।
उधर अपने कमरे के बाथरूम में रोहन नहाते हुए ज़ोर से गा रहा था—
“दिल चाहता है… क्रिकेट खेलना…”
फिर खुद ही हँस पड़ा—
“आज तो प्रैक्टिस में शतक मारूँगा!”
कल्याणी ने बाहर से आवाज़ लगाई—
“रोहन! गाना अच्छा है, पर पानी बचाकर इस्तेमाल करो।”
“जी माँ!” भीतर से जवाब आया।
धीरे-धीरे पूरा घर जाग चुका था।
रसोई से आती खुशबू, देवघर की घंटी, फोन पर होती जिम्मेदार बातें, और रोहन की शरारती आवाज़—सब मिलकर “अनंत शांति निवास” की सुबह को पूर्ण बना रहे थे।
रसोई में कल्याणी और किमाया ने मिलकर नाश्ते की तैयारी पूरी कर ली थी—गरमागरम डोसा, खुशबूदार सांभर और नरम, फूले हुए अप्पम। तवे पर फैलते डोसे की सिसकारी और सांभर में पड़ते तड़के की छन-छन मानो सुबह की मधुर धुन बन गई थी। नारियल की ताज़ी चटनी पीसकर कटोरी में सजाई गई थी।
रसोई से उठती घी और करीपत्ते की महक पूरे घर में फैल रही थी। उसी समय देवघर से आती धूप और अगरबत्ती की सुगंध वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। दोनों खुशबुएँ मिलकर ऐसा आभास दे रही थीं, जैसे घर में केवल भोजन ही नहीं, प्रेम भी परोसा जा रहा हो।
किमाया ने सुंदर स्टील की थालियाँ सजा दीं। बीच में सांभर का बड़ा कटोरा, बगल में नारियल चटनी, और एक टोकरी में ताजे डोसे। अप्पम को सफेद कपड़े से ढककर गरम रखा गया।
सबसे पहले शांति देवी आकर कुर्सी पर बैठीं।
“वाह, आज तो रसोई से ही मन तृप्त हो गया,” उन्होंने मुस्कराकर कहा।
रोहन दौड़ता हुआ आया—
“माँ, आज तो होटल जैसा नाश्ता है!”
पीछे से राजेश भी फाइल बंद करते हुए आ बैठे।
“लगता है आज कोर्ट जाने से पहले ही मेरा दिन बन गया,” उन्होंने हँसते हुए कहा।
कल्याणी ने सबको परोसते हुए स्नेह से कहा—
“पहले गरम-गरम खा लीजिए, फिर बातें कीजिए।”
नाश्ते के बाद कल्याणी ने सबके लिए ताज़ी फिल्टर कॉफी बनाई। उसकी गाढ़ी सुगंध जैसे पूरे वातावरण को सजीव कर रही थी।
राजेश ने पहला घूंट लेते हुए आँखें बंद कर लीं—
“कल्याणी, सच कहूँ तो हमारी बागान की कॉफी का स्वाद कहीं और नहीं मिलता।”
कल्याणी हल्के से मुस्कुराईं—
“इस बार की फसल अच्छी है। मैंने कल ही हिसाब देखा, अगर ऐसे ही रहा तो हम नया प्रोसेसिंग यूनिट भी सोच सकते हैं।”
राजेश ने आश्चर्य से देखा—
“तुमने तो पूरा प्लान बना लिया!”
“आप कोर्ट के केस संभालिए, बागान का हिसाब मैं देख लूँगी,” उसने आत्मविश्वास से कहा।
राजेश ने स्नेह भरी दृष्टि से कहा—
“तुम्हारे बिना ये सब संभव नहीं था, कल्याणी। तुम सच में मेरी सबसे बड़ी ताकत हो।”
कल्याणी ने धीमे से उत्तर दिया—
“और आप मेरा विश्वास।”
दोनों की मुस्कान में वर्षों की साझेदारी और सम्मान झलक रहा था।
उधर किमाया ने उत्साह से कहा—
“दादी, इस वीकेंड कहीं घूमने चलें? बहुत दिनों से सब साथ में बाहर नहीं गए।”
शांति देवी ने अप्पम का टुकड़ा तोड़ते हुए पूछा—
“कहाँ जाने का विचार है, बेटा?”
रोहन तुरंत बोल पड़ा—
“दादी, पास वाली पहाड़ी पर जो झरना है, वहाँ चलते हैं! मैं कैमरा भी ले जाऊँगा। और शाम को क्रिकेट भी खेलेंगे।”
किमाया ने हँसते हुए कहा—
“तुम्हें तो हर जगह क्रिकेट ही खेलना है!”
“अरे दीदी, प्रकृति के बीच खेलना अलग ही मज़ा देता है,” रोहन ने उत्साह से कहा।
शांति देवी ने सोचते हुए कहा—
“झरने पर जाना अच्छा रहेगा। पर सब सुबह-सुबह चलेंगे, ताकि धूप तेज़ न हो। मैं प्रसाद भी बना लूँगी।”
किमाया ने प्यार से उनका हाथ थाम लिया—
“दादी, आप भी हमारे साथ बैठकर फोटो खिंचवाएँगी।”
शांति देवी मुस्कुराईं—
“अगर तुम सब साथ हो, तो हर जगह तीर्थ बन जाती है।”
उसी समय राजेश ने बातचीत सुनते हुए कहा—
“तो तय रहा, इस वीकेंड पूरा परिवार पिकनिक पर जाएगा। मैं भी कोर्ट का काम पहले ही निपटा लूँगा।”
रोहन उछल पड़ा—
“येस! इस बार फैमिली मैच भी होगा!”
कल्याणी ने सबको देखते हुए कहा—
“ठीक है, पर एक शर्त—सब लोग तैयारी में मदद करेंगे।”
“जी मैडम!” सबने एक साथ कहा, और हँसी से पूरा कमरा गूँज उठा।
शांति देवी वैसी सास थीं, जो बहू को परखने या परखाने में विश्वास नहीं रखती थीं। उनके लिए बहू घर की लक्ष्मी थी। इसलिए उनके और कल्याणी के बीच रिश्ता केवल सास-बहू का नहीं, बल्कि माँ-बेटी जैसा अपनापन लिए था।
राजेश पेशे से एक सफल वकील थे। अदालत की तेज़-तर्रार बहसों के बीच भी उनका स्वभाव संतुलित रहता। साथ ही, नारियल और कॉफी के बागानों का साइड बिज़नेस भी वे संभालते थे। हिसाब-किताब और प्रबंधन में उनकी पत्नी कल्याणी हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती थीं।
कल्याणी अपने नाम की तरह मंगलमयी स्वभाव वाली थीं—संस्कारी, स्नेहमयी, एक आदर्श पत्नी और दो बच्चों की सच्ची मार्गदर्शक माँ।
उनकी बेटी किमाया, सुंदर, विनम्र और समझदार। पिछले वर्ष उसने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया था और एक साल पहले ही नौकरी शुरू की थी। नौकरी पर जाने से पहले माँ की मदद करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। इसलिए कल्याणी और किमाया केवल माँ-बेटी ही नहीं, बल्कि सच्ची सहेलियाँ भी थीं।
रोहन घर का चंचल बेटा था। शरारती ज़रूर, पर व्यवहार में विनम्र और माता-पिता के अनुशासन में रहने वाला। क्रिकेट उसका पहला प्यार था। कॉलेज के दूसरे अंतिम वर्ष में पढ़ रहा रोहन अपने कॉलेज टीम का उभरता खिलाड़ी था।
सुबह की हल्की सुनहरी किरणें नाडुमुट्टम से भीतर उतर रही थीं। तुलसी के पत्तों पर ओस चमक रही थी।
कल्याणी स्नान कर, गीले बालों को हल्के से पीछे करते हुए सबसे पहले देवघर में पहुँचीं। उन्होंने दीपक जलाया, अगरबत्ती लगाई और धीरे से बोलीं—
“हे भगवान, आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो।”
फिर आरती की थाली सजाकर, फूल चढ़ाकर वे रसोई की ओर बढ़ीं।
रसोई में पहुँचते ही उन्होंने देखा—किमाया पहले से तैयार खड़ी है। किमाया ने ऑफिस जाने के लिए एक शालीन सा कुर्ता पहना था
“अरे, बेटा! आज फिर मुझसे पहले?” कल्याणी ने मुस्कराकर कहा।
किमाया हँस पड़ी—
“माँ, आप रोज़ कहती हैं कि मुझे आराम करना चाहिए, पर मैं जानती हूँ कि आपके साथ काम करना ही मेरा असली मॉर्निंग मेडिटेशन है।”
कल्याणी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बस, ऐसे ही मुस्कुराती रहो। ऑफिस में भी खुद को ज़्यादा थकाना मत।”
किमाया ने चाय चढ़ाते हुए कहा—
“माँ, आज शाम को जल्दी आ जाऊँगी। आपके साथ बागान का हिसाब भी देखना है।”
“हाँ, और तेरे पापा को भी समझाना है कि हर काम खुद मत किया करें,” कल्याणी ने हल्के से आँखें तरेरते हुए कहा।
दोनों हँस पड़ीं। रसोई में बर्तनों की हल्की आवाज़ और उनकी हँसी मिलकर घर को जीवंत बना रही थी।
उधर बैठक में राजेश किसी कानूनी दस्तावेज़ को लेकर फोन पर बात कर रहे थे।
“जी, शर्मा जी, मैंने फाइल पूरी देख ली है। लेकिन क्लॉज़ नंबर सात में एक बदलाव ज़रूरी है।”
फोन के दूसरी ओर से आवाज़ आई—
“राजेश जी, अगर आप कह रहे हैं तो हम संशोधन करवा देते हैं, पर समय कम है।”
राजेश ने गंभीर स्वर में कहा—
“कानून में जल्दबाज़ी नहीं चलती, शर्मा जी। एक छोटी-सी गलती आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है। आप ड्राफ्ट मुझे दोपहर तक भेज दीजिए, मैं कोर्ट जाने से पहले देख लूँगा।”
“ठीक है, राजेश जी। आपका अनुभव ही हमारा भरोसा है।”
राजेश हल्का-सा मुस्कुराए—
“धन्यवाद। हम दोनों का लक्ष्य एक ही है—सही और सुरक्षित निर्णय।”
फोन रखते हुए उनकी नज़र खिड़की से बाहर फैले नारियल के बागान पर गई।
शांति देवी स्नान कर देवघर में बैठी थीं। हाथ में माला, आँखें बंद, चेहरा शांत।
“हे विष्णु भगवान, मेरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखना। बच्चों के जीवन में प्रेम और समझ बनी रहे।”
उनकी आवाज़ धीमी थी, पर भाव गहरे। आरती के बाद उन्होंने घंटी बजाई—उसकी मधुर ध्वनि पूरे घर में गूँज उठी।
उधर अपने कमरे के बाथरूम में रोहन नहाते हुए ज़ोर से गा रहा था—
“दिल चाहता है… क्रिकेट खेलना…”
फिर खुद ही हँस पड़ा—
“आज तो प्रैक्टिस में शतक मारूँगा!”
कल्याणी ने बाहर से आवाज़ लगाई—
“रोहन! गाना अच्छा है, पर पानी बचाकर इस्तेमाल करो।”
“जी माँ!” भीतर से जवाब आया।
धीरे-धीरे पूरा घर जाग चुका था।
रसोई से आती खुशबू, देवघर की घंटी, फोन पर होती जिम्मेदार बातें, और रोहन की शरारती आवाज़—सब मिलकर “अनंत शांति निवास” की सुबह को पूर्ण बना रहे थे।
रसोई में कल्याणी और किमाया ने मिलकर नाश्ते की तैयारी पूरी कर ली थी—गरमागरम डोसा, खुशबूदार सांभर और नरम, फूले हुए अप्पम। तवे पर फैलते डोसे की सिसकारी और सांभर में पड़ते तड़के की छन-छन मानो सुबह की मधुर धुन बन गई थी। नारियल की ताज़ी चटनी पीसकर कटोरी में सजाई गई थी।
रसोई से उठती घी और करीपत्ते की महक पूरे घर में फैल रही थी। उसी समय देवघर से आती धूप और अगरबत्ती की सुगंध वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। दोनों खुशबुएँ मिलकर ऐसा आभास दे रही थीं, जैसे घर में केवल भोजन ही नहीं, प्रेम भी परोसा जा रहा हो।
किमाया ने सुंदर स्टील की थालियाँ सजा दीं। बीच में सांभर का बड़ा कटोरा, बगल में नारियल चटनी, और एक टोकरी में ताजे डोसे। अप्पम को सफेद कपड़े से ढककर गरम रखा गया।
सबसे पहले शांति देवी आकर कुर्सी पर बैठीं।
“वाह, आज तो रसोई से ही मन तृप्त हो गया,” उन्होंने मुस्कराकर कहा।
रोहन दौड़ता हुआ आया—
“माँ, आज तो होटल जैसा नाश्ता है!”
पीछे से राजेश भी फाइल बंद करते हुए आ बैठे।
“लगता है आज कोर्ट जाने से पहले ही मेरा दिन बन गया,” उन्होंने हँसते हुए कहा।
कल्याणी ने सबको परोसते हुए स्नेह से कहा—
“पहले गरम-गरम खा लीजिए, फिर बातें कीजिए।”
नाश्ते के बाद कल्याणी ने सबके लिए ताज़ी फिल्टर कॉफी बनाई। उसकी गाढ़ी सुगंध जैसे पूरे वातावरण को सजीव कर रही थी।
राजेश ने पहला घूंट लेते हुए आँखें बंद कर लीं—
“कल्याणी, सच कहूँ तो हमारी बागान की कॉफी का स्वाद कहीं और नहीं मिलता।”
कल्याणी हल्के से मुस्कुराईं—
“इस बार की फसल अच्छी है। मैंने कल ही हिसाब देखा, अगर ऐसे ही रहा तो हम नया प्रोसेसिंग यूनिट भी सोच सकते हैं।”
राजेश ने आश्चर्य से देखा—
“तुमने तो पूरा प्लान बना लिया!”
“आप कोर्ट के केस संभालिए, बागान का हिसाब मैं देख लूँगी,” उसने आत्मविश्वास से कहा।
राजेश ने स्नेह भरी दृष्टि से कहा—
“तुम्हारे बिना ये सब संभव नहीं था, कल्याणी। तुम सच में मेरी सबसे बड़ी ताकत हो।”
कल्याणी ने धीमे से उत्तर दिया—
“और आप मेरा विश्वास।”
दोनों की मुस्कान में वर्षों की साझेदारी और सम्मान झलक रहा था।
उधर किमाया ने उत्साह से कहा—
“दादी, इस वीकेंड कहीं घूमने चलें? बहुत दिनों से सब साथ में बाहर नहीं गए।”
शांति देवी ने अप्पम का टुकड़ा तोड़ते हुए पूछा—
“कहाँ जाने का विचार है, बेटा?”
रोहन तुरंत बोल पड़ा—
“दादी, पास वाली पहाड़ी पर जो झरना है, वहाँ चलते हैं! मैं कैमरा भी ले जाऊँगा। और शाम को क्रिकेट भी खेलेंगे।”
किमाया ने हँसते हुए कहा—
“तुम्हें तो हर जगह क्रिकेट ही खेलना है!”
“अरे दीदी, प्रकृति के बीच खेलना अलग ही मज़ा देता है,” रोहन ने उत्साह से कहा।
शांति देवी ने सोचते हुए कहा—
“झरने पर जाना अच्छा रहेगा। पर सब सुबह-सुबह चलेंगे, ताकि धूप तेज़ न हो। मैं प्रसाद भी बना लूँगी।”
किमाया ने प्यार से उनका हाथ थाम लिया—
“दादी, आप भी हमारे साथ बैठकर फोटो खिंचवाएँगी।”
शांति देवी मुस्कुराईं—
“अगर तुम सब साथ हो, तो हर जगह तीर्थ बन जाती है।”
उसी समय राजेश ने बातचीत सुनते हुए कहा—
“तो तय रहा, इस वीकेंड पूरा परिवार पिकनिक पर जाएगा। मैं भी कोर्ट का काम पहले ही निपटा लूँगा।”
रोहन उछल पड़ा—
“येस! इस बार फैमिली मैच भी होगा!”
कल्याणी ने सबको देखते हुए कहा—
“ठीक है, पर एक शर्त—सब लोग तैयारी में मदद करेंगे।”
“जी मैडम!” सबने एक साथ कहा, और हँसी से पूरा कमरा गूँज उठा।


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