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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
दवा की रगड़

 
अगली सुबह का सूरज खिड़की के पर्दों को चीरता हुआ डाइनिंग टेबल पर अपनी चमक बिखेर रहा था। सरताज अपनी वर्दी की शर्ट के बटन बंद करते हुए अखबार पढ़ने में मशगूल था, जबकि मीरा काले रंग के एक रेशमी नाइटरोब में वहां आई। वह रोब मीरा के शरीर के उभारों से इस कदर चिपका हुआ था कि उसकी गर्भावस्था की शुरुआती गोलाई और सुडौल बदन साफ झलक रहा था।

 
किचन के दरवाजे पर खड़ा शेर अपनी गंदी नज़रों से उस काले लिबास में लिपटे 'खजाने' को देख रहा था। उसने बड़ी चालाकी से दूध के गिलास में उस नई दवा की एक चुटकी मिला दी और टेबल की तरफ बढ़ा।

 
सरताज: (अखबार से नज़रें हटाए बिना) "मीरा, आज रात शायद मुझे आने में थोड़ी देर हो जाए। शहर के बाहरी इलाके में एक रेड डालनी है।"

 
मीरा: (कुर्सी खींचकर बैठते हुए, हल्की सुस्ती के साथ) "फिर वही काम... आप अपनी सेहत का बिल्कुल ख्याल नहीं रखते। कल दोपहर भी आप कितनी हड़बड़ी में आए थे।"

 
सरताज: (मुस्कराते हुए मीरा की तरफ देखता है) "कल की बात और थी जान... कल तो तुम्हारी फिक्र खींच लाई थी। वैसे, आज तुम्हारी तबीयत कैसी है? कल को तो तुम बड़ी 'फॉर्म' में थीं।"

 
मीरा: (शर्माकर नज़रें झुकाते हुए) "सरताज! धीरे बोलिए... शेर यहीं कहीं होगा।"

 
तभी शेर ट्रे लेकर पास आता है।

 
शेर: "जी साब, नाश्ता तैयार है। मेमसाहब, ये आपके लिए केसर वाला गरमा-गरम दूध... डॉक्टर साब ने कहा था कि सुबह ये आपके लिए बहुत ज़रूरी है।"

 
शेर ने दूध का गिलास मीरा के ठीक सामने रखा। सफेद दूध के भीतर वह ज़हरीली प्यास घुल चुकी थी।
मीरा: "शुक्रिया शेर। तुम जाकर बाहर की सफाई देख लो।"

 
शेर: (झुककर) "जी मेमसाहब।"

 
शेर पीछे हट गया, लेकिन वह दूर नहीं गया। वह वहीं कोने में खड़ा होकर दीवार की ओट से मीरा के होंठों और उस गिलास के मिलन का इंतज़ार करने लगा।

 
सरताज: "दूध पी लो मीरा, आजकल तुम्हें ताकत की ज़रूरत है। वैसे आज इस काले रोब में तुम कयामत लग रही हो। मेरा तो मन कर रहा है कि ड्यूटी कैंसिल कर दूँ।"

 
मीरा: (हँसते हुए दूध का गिलास उठाती है) "हटाओ भी… आप बस बातें बनाना जानते हैं।"

 
मीरा ने गिलास उठाया और एक ही बार में आधा दूध गटक गई।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: "पी लो मेमसाब... गट-गट करके पी लो। ये दूध नहीं, इस शेर की हवस का बुलावा है। अब से कुछ देर बाद जब ये कतरा-कतरा आपके खून में मिलेगा, तो आपके इस काले रेशमी लिबास के अंदर आग लग जाएगी। फिर देखना, ये दरोगा जी की बातें आपको कितनी फीकी लगती हैं।"

 
मीरा: (गिलास टेबल पर रखते हुए) "अजीब स्वाद है आज दूध का… थोड़ा कसैला सा।"

 
सरताज: "शायद केसर ज्यादा गिर गया होगा। चलो, मैं अब निकलता हूँ। अपना ख्याल रखना।"

 
सरताज उठा और मीरा के माथे को चूमकर बाहर की तरफ निकल गया।

 
मीरा वहीं बैठी रही, उसे महसूस हुआ कि उसके कानों के पीछे और गर्दन पर अचानक से एक गरम लहर दौड़ गई है। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि दूध की आखिरी बूंद के साथ ही उसके जिस्म की बर्बादी का काउंटडाउन शुरू हो चुका है।

 
शेर अंधेरे कोने में खड़ा अपनी उंगलियां मरोड़ रहा था। उसकी आँखें मीरा के उन स्तनों पर टिकी थीं जो भारीपन की वजह से नाइटरोब के भीतर और भी ज्यादा उभर आए थे।
 

मीरा कुर्सी से उठी, लेकिन उसे हल्का सा चक्कर महसूस हुआ। दवा का वह 'लावा' अब उसकी नसों में दौड़ने लगा था।

 
मीरा: (बुदबुदाते हुए) "उफ़... इतनी गर्मी क्यों लग रही है अचानक? अभी तो पंखा चल रहा है।"

 
उसने अपने नाइटरोब की बेल्ट थोड़ी ढीली की। रेशमी कपड़ा जैसे ही उसके जिस्म से हटा, उसकी गोरी और मखमली छाती का ऊपरी हिस्सा बाहर झलकने लगा। दवा ने अपना काम शुरू कर दिया था—मीरा के स्तनों में एक अजीब सा भारीपन और खिंचाव महसूस होने लगा। उसके निप्पल्स उस काले कपड़े के नीचे सख्त होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे।

 
तभी शेर दबे पाँव पास आया। उसके चेहरे पर वही 'वफादार' मुखौटा था, पर आँखों में वहशी चमक।

 
शेर: (धीमी और भारी आवाज़ में) "मेमसाब… आप ठीक तो हैं? चेहरा एकदम तमतमाया हुआ लग रहा है आपका।"

 
मीरा ने शेर की तरफ देखा। आज उसे शेर की आवाज़ में एक अजीब सी मर्दानगी महसूस हुई, जिसने उसके पेट के निचले हिस्से में एक सिहरन पैदा कर दी। दवा उसके होश और हया के बीच की दीवार को कमज़ोर कर रही थी।

 
मीरा: (साँस फूलते हुए) "पता नहीं शेर... अचानक बहुत बेचैनी हो रही है। जैसे... जैसे पूरे बदन में बिजली दौड़ रही हो।"

 
शेर: (करीब आते हुए, इतनी करीब कि मीरा उसकी मर्दाना गंध महसूस कर सके) "लाइए मेमसाब, मैं थोड़ा पंखा तेज़ कर देता हूँ। या फिर... अगर आप कहें तो मैं आपके सिर की मालिश कर दूँ? दरोगा साहब कहते थे कि आपको थकान जल्दी हो जाती है।"

 
मीरा का मन किया कि मना कर दे, पर उसके शरीर के भीतर की आग उसे कुछ और ही कह रही थी। उसे शेर का वह सांवला और गठीला जिस्म अपनी तरफ खींचता हुआ महसूस हुआ। उसे याद आया कि कैसे उसने 'सपने' में एक मज़बूत मर्द को अपने ऊपर महसूस किया था।

 
मीरा [मन ही मन]: 'ये मैं क्या सोच रही हूँ? ये तो सिर्फ नौकर है... पर इसके हाथ... कितने बड़े और मज़बूत हैं। अगर ये मुझे छुए तो...'

 
मीरा ने खुद को झटक दिया, पर उसकी जांघों के बीच एक गीलापन सा महसूस होने लगा था। वह दवा अपनी पहली जीत हासिल कर चुकी थी।

 
मीरा: (काँपती आवाज़ में) "नहीं शेर... तुम... तुम जाकर अपना काम करो। मैं कमरे में जाकर लेटती हूँ।"

 
वह लड़खड़ाते हुए कमरे की तरफ बढ़ी। उसका काला नाइटरोब उसकी चाल के साथ उसके कूल्हों पर इस तरह रगड़ खा रहा था कि मीरा को हर कदम पर एक तीखी उत्तेजना महसूस हो रही थी।

 
शेर वहीं खड़ा उसे जाते हुए देख रहा था। उसने अपनी पैंट के ऊपर से ही अपने अंग को सहलाया जो अब पूरी तरह से जाग चुका था।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: "जाओ मेमसाब, बिस्तर पर जाकर तड़पो। अभी तो सिर्फ एक चुटकी गई है, और आपकी ये हालत है। वो काला रेशम आज आपकी आग को और भड़काएगा। जब आप बिस्तर की चादरों को हवस में मरोड़ेंगी, तब आपको याद आएगा कि असली शांति इस शेर की बाहों में ही मिलेगी। कल की खुराक और बढ़ेगी… और फिर आप खुद इस कुत्ते के पास आएंगी।"

मीरा बेडरूम में पहुँची और धप्प से बिस्तर पर गिर गई। उसने अपनी आँखें बंद कीं, तो उसे फिर से वही स्पर्श महसूस होने लगा। उसने अनजाने में ही अपना हाथ अपने उभरे हुए स्तनों पर रखा और उन्हें भींच लिया।

 
मीरा: (सिसकते हुए) "आह... सरताज... आप कहाँ हैं... मुझे बहुत... बहुत अजीब लग रहा है..."

 
पर उसके दिमाग में सरताज की धुंधली तस्वीर के पीछे शेर का वह सांवला चेहरा उभरने लगा था।
 
---------
 
देवता आज सच में शेर के पक्ष में थे। किस्मत ने अपना सबसे बड़ा पासा फेंक दिया था, और वह सीधा शेर की झोली में जा गिरा।

 
आराम करने के बाद मीरा ने स्नान किया और नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी। दवा का असर अभी भी उसके जिस्म में एक धीमी आंच की तरह सुलग रहा था।

 
रसोई की मद्धिम रोशनी में मीरा अकेली खड़ी थी, उसकी पीठ दरवाजे की तरफ थी। वह नीली साड़ी उसके सुडौल और मदहोश कर देने वाले जिस्म पर इस कदर लिपटी थी जैसे कोई कामुक लता किसी पेड़ से लिपटी हो। चूल्हे की गर्मी और शरीर के भीतर दौड़ रहे दवा के लावे की वजह से पसीना उसके बदन पर मोतियों की तरह चमक रहा था। गीली साड़ी उसके भारी कूल्हों से चिपककर उनकी गोलाई को और भी कामुक तरीके से उभार रही थी।

 
उसका ब्लाउज सिर्फ नाम का था—पूरी पीठ नंगी, बस दो पतली डोरियां उस गोरेपन को संभाले हुए थीं, जो किसी भी पल टूटने को बेताब लग रही थीं।

 
शेर कोने में छिपा यह सब देख रहा था। उसकी सांवली हथेलियाँ कांप रही थीं और आँखें  मीरा के बदन को फाड़ रही थीं। उसकी रगों में वह आग थी जो अब मर्यादा की हर सीमा लांघने को तैयार थी। मीरा की हर गहरी सांस के साथ उसके स्तन ब्लाउज के भीतर ऊपर-नीचे हो रहे थे। शेर की जीभ सूख गई थी; वह कल्पना कर रहा था कि कैसे उन डोरियों को दांतों से खींचकर खोल दे और मीरा का वह रेशमी बदन उसके हाथों में पिघल जाए।

 
और तभी, किस्मत ने अपना सबसे घातक खेल खेला। एक तेज और तीखी चीख ने रसोई की खामोशी को चीर दिया।

 
मीरा: "आआ आह!"

 
मीरा अचानक चीखी और काउंटर से इस तरह पीछे हटी जैसे उसने कोई मौत देख ली हो। उसके नंगे पैरों के पास से एक काला कॉकरोच तेजी से सरकता हुआ निकला। कीड़ों से मीरा की दहशत इतनी पुरानी और गहरी थी कि उस पल उसका दिमाग सुन्न हो गया। उस बदहवासी और डर के मारे उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और पीछे की तरफ घूमी… और सीधा शेर के इंतज़ार करते हुए चट्टान जैसे मजबूत सीने से जा टकराई।

 
वक्त जैसे थम गया।
 
टकराते ही मीरा के वे भरे-भरे और सुडौल स्तन शेर के सीने में किसी नरम मखमली गोले की तरह धंस गए। वे कलश शेर की सख्त छाती के दबाव से फैल गए। मीरा की बाहें डर के मारे बेतहाशा उठीं और किसी बेल की तरह शेर के गले में कस गईं। उसकी उंगलियां खौफ के मारे शेर के नंगे और गठीले कंधों में गड़ गईं।

 
शेर एक पत्थर का बुत बन गया—उस अहसास के झटके से जो उसकी रगों में करंट बनकर दौड़ा था। मीरा का पूरा तपा हुआ बदन उसके जिस्म से चिपक गया था। उसकी रेशमी जांघें शेर की सख्त जांघों से सटी थीं, उसकी कोमल कमर शेर के पेट से दबी हुई थी, और वे सुडौल स्तन... वे तो जैसे शेर के सीने में समा जाने को बेताब थे। शेर साफ महसूस कर रहा था—मीरा के निप्पल्स दवा की गर्मी और उत्तेजना से पत्थर की तरह सख्त होकर शेर की कमीज के आर-पार उसके सीने में चुभ रहे थे।

 
शेर: (भारी और दबी हुई आवाज़ में) "घबराइए मत मेमसाब… मैं हूँ यहाँ।"

 
मीरा: (कांपती हुई आवाज़ में, शेर की गर्दन में मुँह छिपाकर बुदबुदाई) "वो... वो कॉकरोच था शेर! मुझे... मुझे उनसे बहुत डर लगता है। वो काले, घिनौने... और कितनी तेज़ भागते हैं!"

 
शेर [आंतरिक संवाद]: "वाह रे किस्मत! आज तो देवता भी इस कुत्ते पर मेहरबान हैं। मेमसाब, आप कीड़े से डर रही हैं, पर आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आप किस दरिंदे की गिरफ्त में आ गई हैं। आपके ये पहाड़... उफ़, कितने गरम और नरम हैं। इनके भीतर की तड़प मुझे अपनी शर्ट के आर-पार महसूस हो रही है।"

 
मीरा ने अभी भी अपनी आँखें बंद कर रखी थीं। उसे शेर की मर्दाना खुशबू और उसके शरीर की गर्मी एक साथ महसूस हो रही थी। दवा का असर अब उसे एक अजीब सा सुकून देने लगा था—उसे शेर की बाहों में एक अनजानी सुरक्षा और उत्तेजना का अहसास हो रहा था।

 
मीरा एक बार फिर सिहर उठी और अनजाने में उसने शेर को और कसकर पकड़ लिया। उसकी गर्म साँसें शेर की गर्दन पर किसी दहकते अंगारे की तरह लग रही थीं। शेर की बाहें उसके गिर्द कस गईं।

 
उसका एक हाथ मीरा की नंगी निचली पीठ पर फिसला। पसीने से भीगी वह मखमली त्वचा शेर के खुरदरे स्पर्श के नीचे पिघलने लगी। शेर की उंगलियाँ ब्लाउज की डोरी के ठीक नीचे रुक गईं और आहिस्ता-आहिस्ता वहाँ गोल-गोल घूमने लगीं।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'उफ़... मेमसाब, आपकी ये चमड़ी तो मक्खन से भी ज़्यादा चिकनी है। मेरी उंगलियाँ ठीक उस गाँठ पर हैं जहाँ से आपकी इज़्ज़त का दरवाज़ा खुलता है। बस एक खिंचाव... सिर्फ एक सेकंड, और ये नीला रेशम आपके इस गोरे बदन से जुदा हो जाएगा। ये पसीने की महक मुझे पागल कर रही है।'

 
शेर ने जुर्रत की और अपनी एक उंगली को बड़ी सफाई से ब्लाउज की ऊपरी डोरी के फंदे के नीचे घुसा दिया। उसने महसूस किया कि डोरी कितनी आसानी से खुल सकती है।

 
मीरा: (एक लंबी और गहरी आह भरते हुए) "आह... शेर... तुम... तुम ये क्या..."

 
दवा के असर ने मीरा की चेतना को धुंधला कर दिया था। उसे शेर का वह खुरदरा स्पर्श अब डर नहीं, बल्कि एक मीठा सुकून देने लगा था। उसके जिस्म के हर रोम-रोम में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी।

 
शेर: (मीरा के कान के ठीक पास झुककर, अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए) "सावधान, मेमसाब। आप इस हालत में... ऐसे गिरना बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। आखिर मैं हूँ न... आपकी रक्षा के लिए।"

 
शेर ने 'रक्षा' शब्द पर ज़ोर दिया, लेकिन उसका दूसरा हाथ अब मीरा की कमर को दबाते हुए उसे अपने और करीब खींच चुका था। मीरा का उभरा हुआ और सुडौल बदन शेर के सख्त जिस्म से पूरी तरह पीस गया। उसके स्तन, जो पहले से ही दवा की वजह से भारी और संवेदनशील हो चुके थे, शेर की छाती से लगकर और भी कड़े हो गए।

 
मीरा [मन ही मन]: 'मेरा बदन इतना क्यों तप रहा है? शेर के हाथ... इतने खुरदरे हैं, फिर भी मुझे इतना अच्छा क्यों लग रहा है? ऐसा लग रहा है जैसे मेरी नसों में खून नहीं, कोई नशा दौड़ रहा हो। मुझे इसे रोकना चाहिए... पर... पर हिम्मत नहीं हो रही।'

 
शेर ने महसूस किया कि मीरा की जांघें उसकी जांघों से रगड़ खा रही हैं। उसने मौका देखकर अपनी कमर को हल्का सा आगे धकेला। साड़ी के पतले कपड़े के आर-पार मीरा को शेर की मर्दानगी का वह सख्त उभार महसूस हुआ। मीरा के भीतर एक ज्वालामुखी सा फटा, उसकी आँखें मुँद गईं और उसने एक बेबस सिसकी ली।

 
शेर: "मेमसाब... देखिए, आप कितनी कांप रही हैं। आपकी धड़कनें... मेरे सीने में छेद कर देंगी।?"

 
शेर की उंगलियाँ अब डोरी को हल्के से खींच रही थीं, जैसे वह मीरा के सब्र का आखिरी धागा तोड़ देना चाहता हो। उसे अपनी छाती पर मीरा के उन सख्त निप्पल्स की चुभन महसूस हो रही थी, जो किसी पत्थर की कली की तरह उसे उकसा रहे थे।

 
वो कल्पना कर रहा था कि कैसे वो ब्लाउज की डोरियां खोल दे, और उन सख्त चूचियों को अपने मुंह में भर ले—चूस ले, काट ले, तब तक जब तक मीरा तड़प न उठे।

 
तभी शेर की नज़र नीचे ज़मीन पर गई—वही काला कॉकरोच एक बार फिर मीरा के नंगे पैरों के पास से तेज़ी से गुज़रा। शेर के होंठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसे देखकर कोई भी सिहर जाए।

 
शेर: (आवाज़ में शहद जैसी मिठास और भेड़िये जैसी भूख लिए) "मेमसाब... देखिए! वो शैतान फिर से आपके पैरों के पास आ गया है।"

 
उसके शब्द सुनते ही मीरा का जिस्म एक झटके से उछला। डर और दवा के नशे में धुत मीरा ने अनजाने में शेर की गर्दन को और भी ज़ोर से जकड़ लिया और अपना चेहरा उसकी छाती में दफ़ना दिया।

 
यही वो इजाज़त थी जिसकी उसे ज़रूरत थी। यही वो इशारा था जिसका वो भूखा था। बिना एक पल गंवाए, शेर झुका और एक ही झटके में उसे अपनी बाहों में उठा लिया—उसकी मजबूत बाजू एक उसकी जांघों के नीचे, साड़ी के अंदर उसकी नंगी त्वचा को छू रही थी। उंगलियां नंगी  जांघों के बीच सरक गईं।

 
दूसरा हाथ उसकी नंगी पीठ पर, ब्लाउज की डोरी को दबाता हुआ। मीरा का पूरा वजन उसके ऊपर था—उसके स्तन अब भी उसके सीने से दबे, लेकिन अब और गहराई से। शेर चलते समय हल्के से हिलता है, ताकि मीरा का बदन उसके बदन से रगड़ खाए—स्तन ऊपर-नीचे, जांघें फैलती हुईं

 
 
मीरा: (हाँफते हुए, बदहवास) "शेर! मुझे... मुझे बहुत डर लग रहा है। वो कहाँ गया? वो अभी मेरे पैर के पास था ना?"

 
शेर: (मीरा के कान के पास अपनी गर्म और भारी साँसें छोड़ते हुए) "बस मेमसाहिब... घबराइए मत। मैं हूँ ना... मैं आपको उस शैतान से बचा रहा हूँ।"

 
शेर रसोई से बाहर धुंधले गलियारे की तरफ बढ़ने लगा। चलते समय वह जानबूझकर अपने शरीर को इस तरह झटका दे रहा था कि मीरा के सुडौल स्तन उसके सीने से बुरी तरह रगड़ खाएं।

 
शेर [आंतरिक विचार]: 'हाय... कितनी सुडौल है उसकी छाती... मेरे सीने से चिपकी है पूरी तरह। ये ब्लाउज तो सिर्फ नाम का है... एक झटका दूं तो... सब कुछ हाथ में होगा। ये डोरियां... ये पसीना... ये कंपन... बस एक कदम और... तेरी जांघों के बीच की वो गर्माहट... मेरी उंगलियां महसूस कर रही हैं। उफ्फ, कितनी नरम... जैसे कोई गुप्त फूल। मन करता है अभी उंगली डाल दूं, घुमा दूं—देखूं कितनी तड़पती है तू।'

 
गलियारे के अंधेरे में शेर की जुर्रत और बढ़ गई। उसका एक हाथ मीरा की नंगी निचली पीठ पर लिपटा हुआ था और दूसरा हाथ जाँघों के बीच लापरवाही से हरकत कर रहा था। उसकी उंगलियाँ  मीरा की योनि के मुहाने के करीब रेंग रही थीं। मीरा सिहर उठती, पर दवा के नशे और डर की वजह से उसे लग रहा था कि यह सब बस उसे गिरने से बचाने के लिए है।

 
शेर का 7 इंच का वह सख्त अंग पैंट के भीतर फड़क रहा था और मीरा की कमर से बार-बार टकराकर उसे अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा था।

 
तभी मीरा के ज़हन में होश की एक हल्की सी लहर कौंधी। उसे अहसास हुआ कि यह स्पर्श अब सिर्फ 'सहारा' नहीं रह गया है। शर्म की एक गहरी सुर्खी उसके चेहरे पर दौड़ गई।

 
मीरा: (आवाज़ में एक दबी हुई थरथराहट और सूखी फुसफुसाहट) "शेर... अब... अब मुझे नीचे उतारो। मैं ठीक हूँ।"

 
शेर ने उसकी आवाज़ सुनी, पर उसने अनसुना कर दिया। उसने उलटे अपनी बाहों को और कस लिया, जिससे मीरा के भरे हुए स्तन उसकी छाती में पूरी तरह पिस गए।
 
 
वो महसूस कर रहा था—मीरा की चूचियां उसके सीने से रगड़ खा रही हैं, ब्लाउज का कपड़ा पतला, जैसे कोई बाधा नहीं।

 
शेर: "अभी नहीं मेमसाब... अभी वो कीड़ा बाहर ही घूम रहा है। आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दरोगा साहब ने मुझे दी है।"

 
मीरा को शेर की हर धड़कन और उसकी मर्दाना उत्तेजना अपने बदन के आर-पार महसूस हो रही थी। दवा का असर अब मीरा को पूरी तरह से समर्पण की ओर धकेल रहा था।

 
शेर: (उसके कान की लौ के पास, एकदम नज़दीक फुसफुसाते हुए) "आप अभी भी काँप रही हैं, मेमसाहिब। आप नीचे गिर जाएंगी... और आपकी हालत ऐसी नहीं कि मैं ख़तरा लूँ। मैं बस देखभाल कर रहा हूँ।"

 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तेरी यह कँपकँपी डर की नहीं, हवस की है! तेरी चूचियाँ मेरे सीने से चिपककर पत्थर हो गई हैं, और तेरी गर्मी मेरी जाँघों के बीच उतर रही है। तू डर से चिपकी है… और मैं इस बेशर्म आगोश में तुझे और कस रहा हूँ। तुझे क्या पता, तू अभी किस आग पर बैठी है!'

 
शेर का हाथ उसकी नंगी निचली पीठ पर बड़ी धीमी गति से फिरा। वह उसे तसल्ली देने का नाटक कर रहा था, लेकिन असल में वह उसकी मखमली त्वचा के हर ज़र्रे को अपनी उंगलियों से नाप रहा था।

 
मीरा: (अपनी बची-कुची ताक़त लगाकर) "बस... बस हो गया शेर। अब उतारो मुझे... मैं ठीक हूँ।"

 
शेर ने हुक्म तो माना, लेकिन बड़ी चालाकी से। उसने मीरा को नीचे उतारने से पहले एक बार और अपने सीने से ज़ोर से चिपकाया। मीरा के भारी स्तनों की पूरी गहराई शेर की छाती पर पीस गई। उसकी चूचियां और भी सख्त होकर शेर की शर्ट में चुभने लगीं।

 
फिर, वह धीरे-धीरे उसे नीचे उतारने लगा। मीरा का रेशमी बदन इंच-दर-इंच शेर के सख्त और गठीले जिस्म से रगड़ खाता हुआ नीचे फिसला। वह पतला सा ब्लाउज उस आग लगा देने वाली रगड़ के सामने कोई हिफाज़त नहीं कर पा रहा था। डोरियों पर एक ज़ोरदार तनाव पड़ा, जिससे वे मीरा की पीठ पर और कस गईं और उसकी साँस गले में ही अटक गई।

 
शेर की उंगलियां उसकी जांघों के बीच से सरकती हुई उसकी गीली योनि के मुहाने को हल्के से सहला गईं। दवा के असर में मीरा की योनि से एक रसीला द्रव बह निकला था, जिसे महसूस करते ही मीरा शर्म से पानी-पानी हो गई।

 
जैसे ही मीरा के पैरों ने जमीन को छुआ, वह किसी बिजली के झटके की तरह पीछे हटी। उसके हाथ फौरन अपनी छाती पर चले गए, जहाँ उसे अभी भी शेर के सीने की सख्ती महसूस हो रही थी। चूचियां अभी भी उत्तेजना और रगड़ की वजह से दर्द कर रही थीं।

 
मीरा: (हकलाती हुई, आवाज़ एकदम पतली) "मैं... मैं माफ़ी चाहती हूँ शेर। मेरा मतलब... मैं बस डर गई थी... वो कीड़ा..."

 
शेर: (बड़ी शालीनता से, आँखों में आँखें डालकर) "कोई बात नहीं, मेमसाहिब। आप पूरी तरह से महफ़ूज़ हैं। मैं अभी बाकी का काम देखता हूँ।"

 
मीरा ने अपनी बाँहों को अपनी छाती पर और कस लिया और बिना पीछे मुड़े अपने कमरे की तरफ भाग गई। उसे अपनी पीठ पर शेर की भूखी नज़रों की तपिश महसूस हो रही थी।

 
शेर वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर एक जीत भरी मुस्कान थी।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तेरी यह शर्म ही अब मेरा सबसे बड़ा हथियार है। तेरी छाती की गरमाहट अभी भी मेरी छाती पर है। मैं जानता हूँ मीरा, तूने हटने की कोशिश नहीं की थी... तू भी उस रगड़ का मज़ा ले रही थी।'

 
वो वहाँ से चला गया… लेकिन अंदर, वो किसी भट्टी की तरह सुलग रहा था।

 
उसका जिस्म तनाव से लोहे की तरह अकड़ा हुआ था, और उसने अपने जबड़े भिंच रखे थे।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: "उफ्फ... साली क्या झटके से आकर टकराई थी! भाई साहब... उसकी पूरी की पूरी छाती मेरे सीने में धंस गई थी... ऐसा लगा जैसे उसकी चूची का दाना तक अकड़कर मेरे जिस्म में चुभ गया हो! वो सख्त, गर्म नोक... जैसे कोई आग का तीर। मन करता है अभी चूस लूं, काट लूं—जब तक दूध न टपके।"

 
वही एक पल, वही एक एहसास उसके जेहन में किसी लूप की तरह बार-बार घूम रहा था—कैसे उसके नरम, सुडौल स्तन उसके सीने में पिचक गए थे, और वो ब्लाउज का कपड़ा इतना महीन था कि उसका होना न होना बराबर था। वो कल्पना करता—कैसे वो मीरा को दीवार से सटा ले, उसके ब्लाउज की डोरियां खोल दे, और उन भरे हुए चुचियों को अपनी मुट्ठी में भर ले—मसल ले, चूस ले, तब तक जब तक मीरा की चीख न निकल जाए।

 
शेर [वासना में डूबा हुआ]: "और वो प्यासी कमर... फिसलकर सीधी मेरी उंगलियों के नीचे आ गई थी... पसीने से भीग कर उसकी पीठ रेशम की तरह चमक रही थी… कसम से, जन्नत का रास्ता उसी गीली, चिकनी ढलान से गुजरता है। वो जांघों के बीच की वो जगह... मेरी उंगलियां अभी भी वो गर्माहट महसूस कर रही हैं। उफ्फ, कितनी मुलायम, कितनी गीली... जैसे कोई शहद का चश्मा। अगली बार... मैं उंगली नहीं, कुछ और डालूँगा।"

 
उसकी हाथ की मुट्ठी भींच गई। उसे याद आया कि जब उसका जिस्म उससे टकराया था तो उसके मुँह से कैसी नरम, दबी हुई सिसकी निकली थी। उसकी बाहें कितनी आसानी से, कितनी क़ुदरती तौर पर उसके गले में लिपट गई थीं।

 
शेर [निर्णय लेते हुए]: "वो माँगे या ना माँगे... एक बार जिस्म से जिस्म जुड़ गया, तो अब बदन को सब याद रहेगा। आज तो वो बस गिर कर चिपकी है... अगला मौक़ा मिला, तो मैं ख़ुद उसे अपनी आग में खींच लूँगा।"

 
कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। मीरा बिस्तर के किनारे पर बैठी थी। संगमरमर का ठंडा फ़र्श उसके पैरों के नीचे जलता हुआ महसूस हो रहा था।

 
मीरा ने अपने चेहरे को अपनी हथेलियों में छिपा लिया, उसका दिमाग उन चंद लम्हों को बार-बार दोहरा रहा था।

 
मीरा [स्वयं से]: "पागल... बेवकूफ़ औरत! एक मामूली से कीड़े के लिए... मैंने ऐसी बेवकूफ़ी की? मैं उसके ऊपर गिर पड़ी। नहीं... सच तो ये है कि मैं उससे लिपट गई! एक नौकर से!"

 
उसने अपनी बाँहों को अपने सीने पर कस लिया, लेकिन उन उभरे हुए स्तनों पर शेर की सख्त छाती की रगड़ का अहसास मिटाना नामुमकिन था। सब कुछ उस स्पर्श से दाग़दार हो चुका था।

 
मीरा: (आवाज़ में सिहरन के साथ) "और उसके हाथ… उसके हाथ कहाँ थे उस वक्त?"

 
उसने अपनी आँखें बंद कीं, और खुद को मजबूर किया कि वह उस पल का एक ठंडे और बेरहम विश्लेषण के साथ सामना करे।

 
मीरा [आंतरिक विश्लेषण]: "पहला हाथ... पीठ पर था। उसकी हथेली की वह डरावनी गर्मी... हाँ, उसने मेरी रीढ़ की हड्डी पर नीचे की ओर दबाव दिया था। क्या वह गिरती हुई औरत को सँभालने के लिए ज़रूरी था? शायद।"

 
लेकिन दूसरा हाथ...

 
जैसे ही उसने उस दूसरे हाथ के बारे में सोचा, उसके पेट में एक बर्फ़ीली ठंड की लहर दौड़ गई।

 
दवा का असर अभी भी उसके खून में था, जो उस याद को और भी ज़्यादा सजीव बना रहा था।

 
मीरा [निर्णायक क्षण]: "वो हाथ सिर्फ़ मेरी जाँघ के नीचे नहीं था। वो दोनों जाँघों के बीच था! उसकी मज़बूत, मोटी उँगलियाँ मेरी नाज़ुक और अंदरूनी जाँघ की त्वचा को छू रही थीं... लगभग मेरी योनि के करीब!"
 
मीरा ने तेज़ी से आँखें खोलीं। शर्म और दहशत की एक नई लहर ने उसे अपनी चपेट में ले लिया।
 
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 09-03-2026, 05:12 AM



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