06-03-2026, 09:30 PM
एक नए आरंभ का आरंभ!
अगले ही दिन,
नहा धो कर, अच्छे से तैयार होकर; माँ - बाबूजी का आशीर्वाद ले ऑटो से सीधे ****************** कॉलेज जा पहुँची ---- अर्थात रणधीर बाबू का कॉलेज!
रजिस्टर में नाम, पता और आने का उद्देश्य लिखने के बाद पेरेंट्स कम गेस्ट्स वेटिंग रूम में करीब आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ा उसे.
पियून आया और,
“साहब बुला रहे हैं”
कहकर चला गया...
सोफ़ा चेयर के दोनों आर्मरेस्ट पर अपने दोनों हाथ टिकाए सीधी बैठ,
एक लंबी साँस छोड़ी और फिर उतनी ही लंबी साँस ली उसने...
फ़िर सीधी उठ खड़ी हुई और सधी चाल से उस कमरे से बाहर निकली --- उसको इस बात की ज़रा सी भी भनक नहीं लगी कि उस कमरे में ही दीवारों पर लगे दो छोटे सीसीटीवी कैमरों से उस पर नज़र रखी जा रही थी.
भनक लगती भी तो कैसे, पूरे समय किन्हीं और ख्यालों में खोई रही वह बेचारी.
पियून उसे लेकर सीढ़ियों से होता हुआ, एक लम्बी गैलरी पार कर एक कमरे के बंद दरवाज़े के ठीक सामने पहुँचा... बगल दीवार में लगी एक छोटी सी कॉल बेल नुमा एक बेल को बजाया --- २ सेकंड में ही अन्दर से एक मीठी सी बेल बजने की आवाज़ आई. अब पियून ने दरवाज़े को हल्का धक्का दिया और फिर उसे पूरा खोल कर ख़ुद साइड में खड़ा हो गया और अपने बाएँ हाथ से अन्दर की तरफ़ इशारा कर आशा से मौन अनुरोध किया; अंदर आने को --- आशा कँपकँपाए होंठ और काँपते पैरों से अन्दर प्रविष्ट हुई. उसका मन किसी अंजान हरकत को लेकर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था.
अंदर एक बड़ी सी मेज़ की दूसरी तरफ़, रणधीर बाबू एक फ़ाइल को पढ़ने में डूबा हुआ था;
पियून ने एकबार बड़े अदब से ‘सर’ कहा...
फ़ाइल में घुसा रणधीर ने बिना सिर उठाए ही ‘म्मम्मम; हम्म्म्म..’ कहा.
आशा चेहरे पर शंकित भाव लिए सिर घुमा कर पीछे पियून की ओर देखी. पियून भी आशा को देखा और कँधे उचकाकर इशारे में ये बताने की कोशिश किया कि वह इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता है.
तब आशा ने ही अपने नर्वसनेस पर थोड़ा काबू पाते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा सख्त और ऊँचा करते हुए कहा,
“ग... गुड मोर्निंग सर…”
इस बार रणधीर ने फ़ाइल हाथों में लिए ही आँखें ज़रा ऊपर किया --- करीब 5-6 सेकंड्स आशा की ओर अपने गोल सुनहरे फ्रेम से देखता रहा. आँखों पर जैसे उसे भरोसा ही नहीं हो रहा हो. उसकी ड्रीमलेडी उसके सामने खड़ी है आज! --- अभी --- वही ड्रीमलेडी जो कुछ दिन पहले ही उसके घर से गुस्से से निकल आई थी उसका ऑफर सुनकर --- जिसके बारे में इतने दिनों से सोच-सोच कर, तन जाने वाले अपने बूढ़े लंड को मुठ मार कर शांत करता आ रहा था. आशा को सिर्फ़ सोचने भर से ही उसका बूढा लंड न जाने कैसे खुद ही, अभी-अभी जवानी के दहलीज पर पाँव रखने वाले किसी टीनएजर के लंड के माफ़िक टनटना कर, रणधीर बाबू के पैंट हो या लुंगी, उसके अंदर आगे की ओर तन जाया करता है --- सख्त - फूला – फनफनाता हुआ --- साँस लेने के लिए रणधीर बाबू के पैंट के अंदर से निकल आने को बेताब सा हो छटपटाने सा लगता लंड ऐसे पेश आता जैसे की उस समय अगर कोई भी महिला सामने आ जाए तो फ़िर चोद के ही उसका काम तमाम कर दे.
'ससुरी ये लंड चीज़ ही ऐसी है!'
इसी सनक में रणधीर बाबू ने न जाने इतने ही दिनों में कितनी ही हाई क्लास कॉल गर्ल्स - कॉल वाइव्स – एस्कॉर्ट्स और कितने ही वेश्याओं को रगड़-रगड़ कर चोद चुका था पर उसे वो सुख नहीं मिला जो उसे आशा के नंगे जिस्म को कल्पना मात्र करते हुए मुठ मारने में मिल रहा था.
और आज वही स्वप्नपरी उसके सामने उसी के ऑफिस में खड़ी है !
रणधीर बाबू के चश्मे का ग्लास हल्के भूरे रंग का था और कुछ दूरी पर खड़ा कोई भी शख्स इस बात को कन्फर्म कभी नहीं कर सकता कि रणधीर बाबू अगर उसे देख रहा है तो एक्सेक्ट्ली उसकी नज़रें हैं कहाँ ......
और यही हुआ आशा के साथ भी,
वो बेचारी ये सोच रही है की रणधीर बाबू उसे देख रहे हैं पर वास्तव में उनकी नज़रें सिर्फ़ और सिर्फ़ आशा के सामने की ओर उभर कर तने विशाल, पुष्ट चूचियों पर अटकी हुई हैं!
फ़ाइल के एक कागज़ को उसने इस तरह से भींच लिया मानो वो कागज़ न होकर आशा की वही पुष्ट, नर्म, गदराई चूचियों में से एक हो.
खैर,
खुद को तुरंत सँभालते हुए रणधीर बाबू ने अपना गला खँखारा और कहा,
"अरे! इतने दिन बाद… प्लीज हैव ए सीट…"
बड़ी होशियारी से रणधीर बाबू ने आशा का नाम नहीं लिया क्योंकि अगर उसने नाम लिया होता तो ‘आशा जी’ कह कर संबोधित करना पड़ता जोकि उसे पसंद नहीं था क्योंकि आशा ने पहले अपने तेवर दिखाते हुए उसे ‘ना’ कर चुकी थी और अगर उसने सिर्फ ‘आशा’ कहा होता तो इससे वहाँ उपस्थित पियून को ये शक हो जाता कि रणधीर बाबू इस औरत को पहले से जानते हैं और ये बात वो पियून दूसरों में फ़ैला देता जो बाद में एक बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है.
आशा सामने की कुर्सी को सरका के बैठ गई.
पियून जाने - जाने को हो रहा था पर जा नहीं रहा देख कर, रणधीर बाबू ने आँखों के इशारों से पियून को वहाँ से जाने का आदेश दिया.
पियून सलाम ठोककर चला गया.
रणधीर बाबू ने कुछ देर यूँही मुस्करा कर, चेहरे पर रौनक वाली हँसी लिए आशा के साथ इधर - उधर की फोर्मालिटी वाली बातें करते रहे; पहुँचे हुए खिलाड़ी हैं वो ऐसे खेलों में --- अच्छे से जानते हैं की आशा अभी घबराई हुई है और अगर अचानक से ऐसी - वैसी कोई बात छेड़ी जाए तो बात शायद हद से अधिक बिगड़ जाए --- हालाँकि इस शहर में कोई माई का लाल है नहीं जो रणधीर बाबू से पंगा ले ले --- रही बात कॉलेज के लेडी टीचर्स की तो; जितनी भी लेडी टीचर्स हैं --- सब की सब रणधीर बाबू के बिस्तर तक का सफ़र पहले ही पूरी कर चुकी हैं.
आशा ने तिरछी नज़रों से पूरे रूम का जल्दी से मुआयना किया,
आलिशान रूम है रणधीर बाबू का....
चारों ओर सुंदर नक्काशी वाले मार्बल्स, ग्लास के प्लेट्स, खिड़की पर सुंदर गमलों में मनी प्लांट्स और ऐसे ही दूसरे प्लांट्स की मौजूदगी, कमरे में फैली एक मीठी, भीनी सी सुगंध... सब मिलकर माहौल को एक अलग ही ढंग दे रहे हैं.
टेबल पर रखे एक स्टैंड लैंप को ठीक करते हुए आशा की तरफ़ पैनी निगाह डालते हुए रणधीर बाबू ने पूछा,
"सो.... आर यू रेडी??"
"ऊंह...!"
आशा चिंहुकी... रणधीर बाबू की ओर सवालिया नज़रों से देखी और मतलब समझते ही लाज से आँखें झुका ली.....
आदतन, अपने पल्लू को थोड़ा ठीक की...
और उसके ऐसा करते ही,
रणधीर बाबू की नज़रें फ़िर से आशा के पुष्ट वक्षस्थल पर जा टिकीं जो पिछले कुछ दिनों से उसके आशा के प्रति आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु रहा है
रणधीर बाबू के नज़रों का लक्ष्य समझने में देरी नहीं हुई आशा से...
और समझते ही तुरंत और भी ज़्यादा शर्मा गई…
रणधीर की अत्यंत वासना युक्त निगाहें….
और उन निगाहों से अंदर तक नहाती चली जाती आशा का सारा जिस्म का रक्त तो मानो स्वयं ही उत्तेजना का उफ़ान मारने लगा; उत्तेजना किस चीज़ का... नर्वस होने का, किसी अनहोनी का या फिर कामोत्तेजना का! चेहरे का सारा रक्त जैसे उसके गालों में इकट्ठा होकर उसके मुखरे को और भी गुलाबी बनाने लगा.
पता नहीं कैसे;
पर एक बाप के उम्र के आदमी के द्वारा खुद के यूँ मुआयना किए जाने से अब आशा के तन-मन में कुछ गुदगुदी होने लगी --- ख़ुद को ऐसे विचारों से घिरने से रोक तो रही थी अंदर ही अंदर; पर रह - रह कर मन में उठने वाले काम-तरंगों पर उसका कोई नियंत्रण रह ही नहीं पा रहा था.
"आई सेड, आर यू रेडी... आशा??" मेज़ पर अपने दोनों कोहनियों को टिका कर आशा की तरफ़ आगे की ओर झुकते हुए रणधीर बाबू ने पूछा.
यूँ तो दोनों के बीच दो हाथ से भी ज़्यादा की दूरी है, फ़िर भी आशा को ऐसा एहसास हुआ की जैसे रणधीर बाबू वाकई उसपर झुक गए हैं!
"ज..ज.. जी सर... आई एम रेडी."
"पूरी बात साफ़ साफ़ बोलो आशा..."
रणधीर बाबू ने अबकी बार थोड़ा कड़क और रौबीले अंदाज़-ओ-आवाज़ में कहा.
शर्म और डर का मिश्रित भाव चेहरे पर लिए, नज़रें नीचे कर के आशा दोबारा बोली,
"मैं तैयार हूँ आपके हर एक आदेश को बिना शर्त और बिना किसी रोक-टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए…"
"मैं यहाँ हूँ आशा --- यहाँ --- मेरी तरफ़ देखकर अभी-अभी कही गई बातों को दोहराओ." उसकी ऐसी स्थिति का और अधिक आनंद लेने के लिए रणधीर बाबू ने कहा.
'मादर...' मन ही मन आशा रणधीर बाबू को बहुत सुंदर - सुंदर कुछेक शब्दों से पुरस्कृत करने वाली थी लेकिन फ़िलहाल के लिए खुद पे कंट्रोल कर ली.
एक साँस छोड़ते हुए वो रणधीर बाबू की ओर देखी --- और दोहराई,
"सर, मैं, आशा मुखर्जी, तैयार हूँ आपके हरेक आदेश को बिना शर्त और बिना के रोक टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए."
रणधीर मुस्कराया...
आशा के शर्म और संकोच की दीवार में थोड़ी ही सही, पर आख़िरकार एक दरार डाल पाया... पर अभी भी उसे एक संदेह है की कुछ ही दिनों पहले गुस्सैल तेवर दिखाने वाली महिला अचानक से आज समर्पण क्यों कर रही है??
"ह्म्म्म, कुछ तो गड़बड़ है, दया." वह सोचा.
"आज यहाँ कैसे?" रणधीर बाबू ने पूछा.
काँपते लहजे में, गर्दन के पीछे जमते पसीने को बड़ी निपुणता से पल्लू से हटाते हुए आशा ने उत्तर दिया,
"सर, दो काम से आई हूँ... एक तो मुझे जॉब के लिए अप्लाई करना है और दूसरा, अपने बेटे का एडमिशन इसी कॉलेज में करवाना है."
"ओह! पर उस दिन तो सिर्फ़ जॉब के लिए आई थी?" चकित रणधीर ने तुरंत सवाल दागा.
"जी सर, नीर के लिए कोई बढ़िया कॉलेज नहीं मिल रहा और इस कॉलेज का काफी नाम है. इसलिए सोची कि अगर मेरा जॉब और उसका एडमिशन दोनों एक ही कॉलेज में हो जाएँ तो बहुत ही अच्छा होगा. वो नज़रों के सामने तो रहेगा, तो उसकी पढ़ाई और ओवरऑल एक्टिविटीज़ पर ध्यान दे सकूँगी."
"उसपे ध्यान देने के चक्कर में कहीं तुम्हारा काम प्रभावित हुआ तो?" ये सवाल रणधीर बाबू द्वारा पूछना बनता था.
"नहीं सर, आई प्रॉमिस. ऐसा कभी नहीं होगा… आई शैल मैनेज इट वैरी वेल." उतावलेपन पर थोड़ी दृढ़ता से जवाब दिया उसने.
"तुम्हें यहाँ जॉब चाहिए और तुम्हारे बेटे को एडमिशन और मेरा क्या…?" इस प्रश्न को अधूरा छोड़ते हुए रणधीर ने आशा की ओर मतलबी निगाहों से देखा.
"आप जो बोलें सर." आशा ने भी अस्पष्ट प्रत्युत्तर दिया.
"मेरा हर कहना मानोगी?" रणधीर बाबू ने एक सीधा, कंफर्म सवाल किया.
"जी सर… हर कहना मानूँगी."
रणधीर बाबू ने टेबल के दराज से एक सादा कागज़ निकाला और आशा की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"इसमें अपना पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर लिख कर दो और साथ ही यह भी लिख कर दो कि तुम अपने पूरे होशोहवास में मेरा हर कंडीशन स्वीकार कर रही हो और जॉइनिंग के बाद से मेरा हर कहना मानोगी --- जब कहूँ --- जो कहूँ --- जैसा कहूँ."
इस पूरे "इंटरव्यू" की दशा और दिशा क्या होने वाली है और भविष्य में उसके लिए संभवतः क्या - क्या रखा हो सकता है ये सब एक क्षण में समझते देर नहीं लगी आशा को. इस कॉलेज में रणधीर बाबू के साथ उसका भविष्य किसी सिनेमा की भाँति उसी एक क्षण में उसकी आँखों में तैर -सा गया. सिहर उठी वह; लेकिन वो तो Every Possible Worst case Scenario के लिए तैयार हो कर ही आई थी... इसलिए अब आगे बिना कुछ सोचे कागज़ लपक कर ले ली और पेन निकाल कर वह सब लिख दी जो रणधीर बाबू ने अभी - अभी लिखने के लिए कहा.
सब लिखने के बाद कागज़ वापस दी.
रणधीर बाबू ने कागज़ पर लिखे एक-एक शब्द को बड़े ध्यान से पढ़ा और पढ़ने के बाद मुस्कराया.
आशा की ओर देखा और बोला,
"ह्म्म्म; ओके, पर यहाँ का इंटरव्यू तो देना पड़ेगा तुम्हें --- तैयार हो?"
"जी सर."
"पक्का??" रणधीर ने फ़िर सवाल किया
"जी सर." आशा ने वही जवाब दोहराया पर इस बार जवाब कुछ इस लहजे में दी जैसे की उसे थोड़ा - बहुत अंदाज़ा हो गया की क्या और कैसा "इंटरव्यू" अब शुरू होने वाला है.
रणधीर बाबू मुस्कराए --- अपने सीट पर ठीक से बैठे और एक हाथ पैंट के ऊपर से ही धीरे-धीरे सख्त हो रहे लंड को सहलाए.
"प्रॉमिस याद है न? और कागज़ पर खुद के लिखे एक-एक शब्द?"
"जी सर....’’ आशा झेंपते हुए आँखें नीची करके बोली.
आशा का यह जवाब सुनते ही रणधीर बाबू के चेहरे पर पहले से ही मौजूद मुस्कान अब और अधिक खिल गई और साथ ही साथ आँखों में टीनएजर्स जैसी उतावली एक अलग चमक आ गई.
उत्तेजना में लंड को दोबार ज़ोर से रगड़ दिया.
टेलीकॉम पे एक बटन प्रेस कर रिसेप्शन में ऑर्डर दिया,
"कैंसिल ऑल माय अपॉइंटमेंट्स --- नो गेस्ट्स --- नो पैरेंट्स --- नो पिओंस.नोबडी! ओके? इज़ दैट क्लियर??"
"यस सर—क्रिस्टल क्लियर!" दूसरी तरफ़ से किसी लड़की की मीठी सी आवाज़ आई.
कॉल डिसकनेक्ट कर आशा की ओर देखा अब रणधीर बाबू ने --- होंठों पर वही कुटिल मुस्कान वापस आ गई.
ज़िप खोला,
लंड निकाला,
और मसलने लगा --- टेबल के नीचे --- और आशा को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं --- वैसे भी अंदाज़ा का करेगी क्या --- मन से तो वह रणधीर बाबू के आगे 'सरेंडर' कर ही चुकी है --- अब तो बस तन .................
"तो मिस आशा, इंटरव्यू शुरू करते हैं!!" चहकते हुए बोले, रणधीर बाबू.
जारी रहेगा.....
....................................................
अगले ही दिन,
नहा धो कर, अच्छे से तैयार होकर; माँ - बाबूजी का आशीर्वाद ले ऑटो से सीधे ****************** कॉलेज जा पहुँची ---- अर्थात रणधीर बाबू का कॉलेज!
रजिस्टर में नाम, पता और आने का उद्देश्य लिखने के बाद पेरेंट्स कम गेस्ट्स वेटिंग रूम में करीब आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ा उसे.
पियून आया और,
“साहब बुला रहे हैं”
कहकर चला गया...
सोफ़ा चेयर के दोनों आर्मरेस्ट पर अपने दोनों हाथ टिकाए सीधी बैठ,
एक लंबी साँस छोड़ी और फिर उतनी ही लंबी साँस ली उसने...
फ़िर सीधी उठ खड़ी हुई और सधी चाल से उस कमरे से बाहर निकली --- उसको इस बात की ज़रा सी भी भनक नहीं लगी कि उस कमरे में ही दीवारों पर लगे दो छोटे सीसीटीवी कैमरों से उस पर नज़र रखी जा रही थी.
भनक लगती भी तो कैसे, पूरे समय किन्हीं और ख्यालों में खोई रही वह बेचारी.
पियून उसे लेकर सीढ़ियों से होता हुआ, एक लम्बी गैलरी पार कर एक कमरे के बंद दरवाज़े के ठीक सामने पहुँचा... बगल दीवार में लगी एक छोटी सी कॉल बेल नुमा एक बेल को बजाया --- २ सेकंड में ही अन्दर से एक मीठी सी बेल बजने की आवाज़ आई. अब पियून ने दरवाज़े को हल्का धक्का दिया और फिर उसे पूरा खोल कर ख़ुद साइड में खड़ा हो गया और अपने बाएँ हाथ से अन्दर की तरफ़ इशारा कर आशा से मौन अनुरोध किया; अंदर आने को --- आशा कँपकँपाए होंठ और काँपते पैरों से अन्दर प्रविष्ट हुई. उसका मन किसी अंजान हरकत को लेकर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था.
अंदर एक बड़ी सी मेज़ की दूसरी तरफ़, रणधीर बाबू एक फ़ाइल को पढ़ने में डूबा हुआ था;
पियून ने एकबार बड़े अदब से ‘सर’ कहा...
फ़ाइल में घुसा रणधीर ने बिना सिर उठाए ही ‘म्मम्मम; हम्म्म्म..’ कहा.
आशा चेहरे पर शंकित भाव लिए सिर घुमा कर पीछे पियून की ओर देखी. पियून भी आशा को देखा और कँधे उचकाकर इशारे में ये बताने की कोशिश किया कि वह इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता है.
तब आशा ने ही अपने नर्वसनेस पर थोड़ा काबू पाते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा सख्त और ऊँचा करते हुए कहा,
“ग... गुड मोर्निंग सर…”
इस बार रणधीर ने फ़ाइल हाथों में लिए ही आँखें ज़रा ऊपर किया --- करीब 5-6 सेकंड्स आशा की ओर अपने गोल सुनहरे फ्रेम से देखता रहा. आँखों पर जैसे उसे भरोसा ही नहीं हो रहा हो. उसकी ड्रीमलेडी उसके सामने खड़ी है आज! --- अभी --- वही ड्रीमलेडी जो कुछ दिन पहले ही उसके घर से गुस्से से निकल आई थी उसका ऑफर सुनकर --- जिसके बारे में इतने दिनों से सोच-सोच कर, तन जाने वाले अपने बूढ़े लंड को मुठ मार कर शांत करता आ रहा था. आशा को सिर्फ़ सोचने भर से ही उसका बूढा लंड न जाने कैसे खुद ही, अभी-अभी जवानी के दहलीज पर पाँव रखने वाले किसी टीनएजर के लंड के माफ़िक टनटना कर, रणधीर बाबू के पैंट हो या लुंगी, उसके अंदर आगे की ओर तन जाया करता है --- सख्त - फूला – फनफनाता हुआ --- साँस लेने के लिए रणधीर बाबू के पैंट के अंदर से निकल आने को बेताब सा हो छटपटाने सा लगता लंड ऐसे पेश आता जैसे की उस समय अगर कोई भी महिला सामने आ जाए तो फ़िर चोद के ही उसका काम तमाम कर दे.
'ससुरी ये लंड चीज़ ही ऐसी है!'
इसी सनक में रणधीर बाबू ने न जाने इतने ही दिनों में कितनी ही हाई क्लास कॉल गर्ल्स - कॉल वाइव्स – एस्कॉर्ट्स और कितने ही वेश्याओं को रगड़-रगड़ कर चोद चुका था पर उसे वो सुख नहीं मिला जो उसे आशा के नंगे जिस्म को कल्पना मात्र करते हुए मुठ मारने में मिल रहा था.
और आज वही स्वप्नपरी उसके सामने उसी के ऑफिस में खड़ी है !
रणधीर बाबू के चश्मे का ग्लास हल्के भूरे रंग का था और कुछ दूरी पर खड़ा कोई भी शख्स इस बात को कन्फर्म कभी नहीं कर सकता कि रणधीर बाबू अगर उसे देख रहा है तो एक्सेक्ट्ली उसकी नज़रें हैं कहाँ ......
और यही हुआ आशा के साथ भी,
वो बेचारी ये सोच रही है की रणधीर बाबू उसे देख रहे हैं पर वास्तव में उनकी नज़रें सिर्फ़ और सिर्फ़ आशा के सामने की ओर उभर कर तने विशाल, पुष्ट चूचियों पर अटकी हुई हैं!
फ़ाइल के एक कागज़ को उसने इस तरह से भींच लिया मानो वो कागज़ न होकर आशा की वही पुष्ट, नर्म, गदराई चूचियों में से एक हो.
खैर,
खुद को तुरंत सँभालते हुए रणधीर बाबू ने अपना गला खँखारा और कहा,
"अरे! इतने दिन बाद… प्लीज हैव ए सीट…"
बड़ी होशियारी से रणधीर बाबू ने आशा का नाम नहीं लिया क्योंकि अगर उसने नाम लिया होता तो ‘आशा जी’ कह कर संबोधित करना पड़ता जोकि उसे पसंद नहीं था क्योंकि आशा ने पहले अपने तेवर दिखाते हुए उसे ‘ना’ कर चुकी थी और अगर उसने सिर्फ ‘आशा’ कहा होता तो इससे वहाँ उपस्थित पियून को ये शक हो जाता कि रणधीर बाबू इस औरत को पहले से जानते हैं और ये बात वो पियून दूसरों में फ़ैला देता जो बाद में एक बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है.
आशा सामने की कुर्सी को सरका के बैठ गई.
पियून जाने - जाने को हो रहा था पर जा नहीं रहा देख कर, रणधीर बाबू ने आँखों के इशारों से पियून को वहाँ से जाने का आदेश दिया.
पियून सलाम ठोककर चला गया.
रणधीर बाबू ने कुछ देर यूँही मुस्करा कर, चेहरे पर रौनक वाली हँसी लिए आशा के साथ इधर - उधर की फोर्मालिटी वाली बातें करते रहे; पहुँचे हुए खिलाड़ी हैं वो ऐसे खेलों में --- अच्छे से जानते हैं की आशा अभी घबराई हुई है और अगर अचानक से ऐसी - वैसी कोई बात छेड़ी जाए तो बात शायद हद से अधिक बिगड़ जाए --- हालाँकि इस शहर में कोई माई का लाल है नहीं जो रणधीर बाबू से पंगा ले ले --- रही बात कॉलेज के लेडी टीचर्स की तो; जितनी भी लेडी टीचर्स हैं --- सब की सब रणधीर बाबू के बिस्तर तक का सफ़र पहले ही पूरी कर चुकी हैं.
आशा ने तिरछी नज़रों से पूरे रूम का जल्दी से मुआयना किया,
आलिशान रूम है रणधीर बाबू का....
चारों ओर सुंदर नक्काशी वाले मार्बल्स, ग्लास के प्लेट्स, खिड़की पर सुंदर गमलों में मनी प्लांट्स और ऐसे ही दूसरे प्लांट्स की मौजूदगी, कमरे में फैली एक मीठी, भीनी सी सुगंध... सब मिलकर माहौल को एक अलग ही ढंग दे रहे हैं.
टेबल पर रखे एक स्टैंड लैंप को ठीक करते हुए आशा की तरफ़ पैनी निगाह डालते हुए रणधीर बाबू ने पूछा,
"सो.... आर यू रेडी??"
"ऊंह...!"
आशा चिंहुकी... रणधीर बाबू की ओर सवालिया नज़रों से देखी और मतलब समझते ही लाज से आँखें झुका ली.....
आदतन, अपने पल्लू को थोड़ा ठीक की...
और उसके ऐसा करते ही,
रणधीर बाबू की नज़रें फ़िर से आशा के पुष्ट वक्षस्थल पर जा टिकीं जो पिछले कुछ दिनों से उसके आशा के प्रति आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु रहा है
रणधीर बाबू के नज़रों का लक्ष्य समझने में देरी नहीं हुई आशा से...
और समझते ही तुरंत और भी ज़्यादा शर्मा गई…
रणधीर की अत्यंत वासना युक्त निगाहें….
और उन निगाहों से अंदर तक नहाती चली जाती आशा का सारा जिस्म का रक्त तो मानो स्वयं ही उत्तेजना का उफ़ान मारने लगा; उत्तेजना किस चीज़ का... नर्वस होने का, किसी अनहोनी का या फिर कामोत्तेजना का! चेहरे का सारा रक्त जैसे उसके गालों में इकट्ठा होकर उसके मुखरे को और भी गुलाबी बनाने लगा.
पता नहीं कैसे;
पर एक बाप के उम्र के आदमी के द्वारा खुद के यूँ मुआयना किए जाने से अब आशा के तन-मन में कुछ गुदगुदी होने लगी --- ख़ुद को ऐसे विचारों से घिरने से रोक तो रही थी अंदर ही अंदर; पर रह - रह कर मन में उठने वाले काम-तरंगों पर उसका कोई नियंत्रण रह ही नहीं पा रहा था.
"आई सेड, आर यू रेडी... आशा??" मेज़ पर अपने दोनों कोहनियों को टिका कर आशा की तरफ़ आगे की ओर झुकते हुए रणधीर बाबू ने पूछा.
यूँ तो दोनों के बीच दो हाथ से भी ज़्यादा की दूरी है, फ़िर भी आशा को ऐसा एहसास हुआ की जैसे रणधीर बाबू वाकई उसपर झुक गए हैं!
"ज..ज.. जी सर... आई एम रेडी."
"पूरी बात साफ़ साफ़ बोलो आशा..."
रणधीर बाबू ने अबकी बार थोड़ा कड़क और रौबीले अंदाज़-ओ-आवाज़ में कहा.
शर्म और डर का मिश्रित भाव चेहरे पर लिए, नज़रें नीचे कर के आशा दोबारा बोली,
"मैं तैयार हूँ आपके हर एक आदेश को बिना शर्त और बिना किसी रोक-टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए…"
"मैं यहाँ हूँ आशा --- यहाँ --- मेरी तरफ़ देखकर अभी-अभी कही गई बातों को दोहराओ." उसकी ऐसी स्थिति का और अधिक आनंद लेने के लिए रणधीर बाबू ने कहा.
'मादर...' मन ही मन आशा रणधीर बाबू को बहुत सुंदर - सुंदर कुछेक शब्दों से पुरस्कृत करने वाली थी लेकिन फ़िलहाल के लिए खुद पे कंट्रोल कर ली.
एक साँस छोड़ते हुए वो रणधीर बाबू की ओर देखी --- और दोहराई,
"सर, मैं, आशा मुखर्जी, तैयार हूँ आपके हरेक आदेश को बिना शर्त और बिना के रोक टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए."
रणधीर मुस्कराया...
आशा के शर्म और संकोच की दीवार में थोड़ी ही सही, पर आख़िरकार एक दरार डाल पाया... पर अभी भी उसे एक संदेह है की कुछ ही दिनों पहले गुस्सैल तेवर दिखाने वाली महिला अचानक से आज समर्पण क्यों कर रही है??
"ह्म्म्म, कुछ तो गड़बड़ है, दया." वह सोचा.
"आज यहाँ कैसे?" रणधीर बाबू ने पूछा.
काँपते लहजे में, गर्दन के पीछे जमते पसीने को बड़ी निपुणता से पल्लू से हटाते हुए आशा ने उत्तर दिया,
"सर, दो काम से आई हूँ... एक तो मुझे जॉब के लिए अप्लाई करना है और दूसरा, अपने बेटे का एडमिशन इसी कॉलेज में करवाना है."
"ओह! पर उस दिन तो सिर्फ़ जॉब के लिए आई थी?" चकित रणधीर ने तुरंत सवाल दागा.
"जी सर, नीर के लिए कोई बढ़िया कॉलेज नहीं मिल रहा और इस कॉलेज का काफी नाम है. इसलिए सोची कि अगर मेरा जॉब और उसका एडमिशन दोनों एक ही कॉलेज में हो जाएँ तो बहुत ही अच्छा होगा. वो नज़रों के सामने तो रहेगा, तो उसकी पढ़ाई और ओवरऑल एक्टिविटीज़ पर ध्यान दे सकूँगी."
"उसपे ध्यान देने के चक्कर में कहीं तुम्हारा काम प्रभावित हुआ तो?" ये सवाल रणधीर बाबू द्वारा पूछना बनता था.
"नहीं सर, आई प्रॉमिस. ऐसा कभी नहीं होगा… आई शैल मैनेज इट वैरी वेल." उतावलेपन पर थोड़ी दृढ़ता से जवाब दिया उसने.
"तुम्हें यहाँ जॉब चाहिए और तुम्हारे बेटे को एडमिशन और मेरा क्या…?" इस प्रश्न को अधूरा छोड़ते हुए रणधीर ने आशा की ओर मतलबी निगाहों से देखा.
"आप जो बोलें सर." आशा ने भी अस्पष्ट प्रत्युत्तर दिया.
"मेरा हर कहना मानोगी?" रणधीर बाबू ने एक सीधा, कंफर्म सवाल किया.
"जी सर… हर कहना मानूँगी."
रणधीर बाबू ने टेबल के दराज से एक सादा कागज़ निकाला और आशा की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"इसमें अपना पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर लिख कर दो और साथ ही यह भी लिख कर दो कि तुम अपने पूरे होशोहवास में मेरा हर कंडीशन स्वीकार कर रही हो और जॉइनिंग के बाद से मेरा हर कहना मानोगी --- जब कहूँ --- जो कहूँ --- जैसा कहूँ."
इस पूरे "इंटरव्यू" की दशा और दिशा क्या होने वाली है और भविष्य में उसके लिए संभवतः क्या - क्या रखा हो सकता है ये सब एक क्षण में समझते देर नहीं लगी आशा को. इस कॉलेज में रणधीर बाबू के साथ उसका भविष्य किसी सिनेमा की भाँति उसी एक क्षण में उसकी आँखों में तैर -सा गया. सिहर उठी वह; लेकिन वो तो Every Possible Worst case Scenario के लिए तैयार हो कर ही आई थी... इसलिए अब आगे बिना कुछ सोचे कागज़ लपक कर ले ली और पेन निकाल कर वह सब लिख दी जो रणधीर बाबू ने अभी - अभी लिखने के लिए कहा.
सब लिखने के बाद कागज़ वापस दी.
रणधीर बाबू ने कागज़ पर लिखे एक-एक शब्द को बड़े ध्यान से पढ़ा और पढ़ने के बाद मुस्कराया.
आशा की ओर देखा और बोला,
"ह्म्म्म; ओके, पर यहाँ का इंटरव्यू तो देना पड़ेगा तुम्हें --- तैयार हो?"
"जी सर."
"पक्का??" रणधीर ने फ़िर सवाल किया
"जी सर." आशा ने वही जवाब दोहराया पर इस बार जवाब कुछ इस लहजे में दी जैसे की उसे थोड़ा - बहुत अंदाज़ा हो गया की क्या और कैसा "इंटरव्यू" अब शुरू होने वाला है.
रणधीर बाबू मुस्कराए --- अपने सीट पर ठीक से बैठे और एक हाथ पैंट के ऊपर से ही धीरे-धीरे सख्त हो रहे लंड को सहलाए.
"प्रॉमिस याद है न? और कागज़ पर खुद के लिखे एक-एक शब्द?"
"जी सर....’’ आशा झेंपते हुए आँखें नीची करके बोली.
आशा का यह जवाब सुनते ही रणधीर बाबू के चेहरे पर पहले से ही मौजूद मुस्कान अब और अधिक खिल गई और साथ ही साथ आँखों में टीनएजर्स जैसी उतावली एक अलग चमक आ गई.
उत्तेजना में लंड को दोबार ज़ोर से रगड़ दिया.
टेलीकॉम पे एक बटन प्रेस कर रिसेप्शन में ऑर्डर दिया,
"कैंसिल ऑल माय अपॉइंटमेंट्स --- नो गेस्ट्स --- नो पैरेंट्स --- नो पिओंस.नोबडी! ओके? इज़ दैट क्लियर??"
"यस सर—क्रिस्टल क्लियर!" दूसरी तरफ़ से किसी लड़की की मीठी सी आवाज़ आई.
कॉल डिसकनेक्ट कर आशा की ओर देखा अब रणधीर बाबू ने --- होंठों पर वही कुटिल मुस्कान वापस आ गई.
ज़िप खोला,
लंड निकाला,
और मसलने लगा --- टेबल के नीचे --- और आशा को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं --- वैसे भी अंदाज़ा का करेगी क्या --- मन से तो वह रणधीर बाबू के आगे 'सरेंडर' कर ही चुकी है --- अब तो बस तन .................
"तो मिस आशा, इंटरव्यू शुरू करते हैं!!" चहकते हुए बोले, रणधीर बाबू.
जारी रहेगा.....
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