06-03-2026, 09:17 PM
निर्णय
खिड़की के पास बैठी आशा कॉफ़ी पीते हुए दूर क्षितिज की ओर देख रही थी; उसकी माँ नीर को ले कर बगल में कहीं गई हुई थी. आशा के पिताजी भी रोज़ की तरह ही अपने रिटायर्ड दोस्तों से मिलने शाम को निकल जाया करते थे --- खुद भी रिटायर्ड और दोस्त भी ----- मस्त महफ़िल जमती थी सबकी.
घर में रह गई अकेली आशा ‘सिरररप सिरररप’ से कॉफ़ी की चुस्कियाँ ले रही और किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी....
‘क्या करूँ... ऐसी बेहूदगी भरा ऑफर... पिता के उम्र के होकर भी शर्म नहीं आई उन्हें. ये मर्दजात ऐसे क्यों होते हैं? क्यों हमेशा हम महिलाओं को, लड़कियों को बिस्तर पर लाने का सोचते हैं? इतनी ठरक क्यों होती है इनमें? क्या इनकी ठरक के लिए भी हम ज़िम्मेदार हैं? क्या हमारी कुछ आदतें, कुछ तरीके ही इनमें ठरक जगाने का, इनके ठरक में आग लगाने का काम करती हैं?’
तभी आशा को कुछ याद आया...
याद आया कि रणधीर बाबू के साथ बात करते समय कैसे उसका पल्लू उसके सीने से हट गया था… और, और उस समय कैसे रणधीर बाबू आँखें झपकना क्या, अपनी लार गटकना तक भूल गए थे. ये सीन याद आते ही आशा 'ही ही' करके हँस पड़ी. पर तुरंत ही खुद को सँभाल ली; कोई देखेगा तो क्या सोचेगा…?
मन घृणा से भरा हुआ था उसका.
सोच रही थी,
‘कैसी विचित्र दुनिया है--- थोड़ी हमदर्दी के बदले क्या-क्या नहीं माँगा जाता. अब तो सवाल ही नहीं उठता की मैं उनके पास जाऊँ…. कितना नीच है…. साला.’
‘साला’ शब्द मन में आते ही सिर को दो-तीन झटके देकर हिलाई….
‘हे भगवान ! ये क्या अनाप शनाप बोल रही हूँ मन ही मन --- उफ्फ्फ़ --- इस आदमी ने तो मूड और दिमाग के साथ साथ मन को भी मैला कर दिया है — धत्त…’
कप प्लेट धो कर रख देने के बाद आशा घर के दूसरे कामों में लग गई; रणधीर बाबू की बातों को लगभग भूल ही चुकी थी वह.
अचानक से उसका ध्यान टेबल पर रखे तीन-चार एप्लिकेशन फॉर्म पर गया. 3 - 4 कॉलेज के एडमिशन फॉर्म थे वह सब. नीर के लिए --- पर उन कॉलेजों की फ़ीस इतनी ज़्यादा थी कि आशा की हिम्मत ही जवाब दे गई थी. हालाँकि उसके पापा के पास पैसे तो बहुत हैं और देने के लिए भी राज़ी थे पर आशा को यह पसंद नहीं था कि उसके रिटायर्ड पापा उसके बेटे के कॉलेज के खर्चों का निर्वहन करें.
उन सभी फॉर्म को हाथों में लिए सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई. नीर को किसी बढ़िया कॉलेज में एडमिशन कराने की इच्छा एकबार फिर से हिलोरें मार कर मन की सीमाओं से पार जाने लगीं. अच्छे-अच्छे यूनिफार्म पहना कर कॉलेज भेजने की, रोज़ स्वादिष्ट टिफ़िन बना कर नीर का लंच बॉक्स तैयार करने की, उसे बस स्टॉप तक छोड़ने जाना या फ़िर हो सके तो ख़ुद ही कॉलेज ले जाना और ले आना ; ये सभी पहले दम तोड़ चुकीं हसरतें एकबार फ़िर से जिंदा होने लगीं.
उन्हीं फॉर्म्स में से एक फॉर्म पर नज़र ठिठकी उसकी;
फॉर्म के टॉप पर एक नाम प्रिंट था;
************************** कॉलेज
थोड़े बहुत बदलाव के साथ इस नाम के 4 कॉलेज हैं पूरे शहर में और चारों ही सिर्फ़ एक ही आदमी के थे….
‘रणधीर सिन्हा… उर्फ़…. रणधीर बाबू!!’
एकेडमिक के हिसाब से चारों ही कॉलेज बहुत ही अच्छे हैं और नीर के लिए भी बहुत ही अच्छे रहेंगे ये कॉलेज….
पर,
एडमिशन और एकेडमिक फीस में तो बहुत खर्चा है.
अतिरेक चिंता में आशा सिर पे हाथ रख कुर्सी के बैकरेस्ट पे पीठ सटा कर बैठ गई.
कुछ देर कई तरह के विचार उसके दिमाग में आते - जाते रहे. इन्हीं विचारों में एक विचार बचपन में पढ़े एक संस्कृत सुभाषितानि से याद किया हुआ था... 'जो माँ - बाप अपने बच्चों को साक्षर नहीं बनाते व उचित शिक्षा नहीं दिलाते वो अपने ही संतान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं!'
इस एक विचार ने थोड़ी देर आशा को विचलित किए रखा... लेकिन फिर उसके बाद वो अचानक से सीधी हो कर बैठ गई.
‘कुछ भी हो, मैं नीर का एडमिशन एक अच्छे कॉलेज में करा कर ही रहूँगी.…(एक फॉर्म को उठाकर देखते हुए).... जॉब भी और एडमिशन भी.’
इतना बड़बड़ाने के तुरंत बाद ही,
आशा के दोनों आँखों से चार बूँद आँसू गिरे,
चेहरा थोड़ा कठोर हुआ उसका….
कुछ ठान लिया उसने….
अपने हैंडबैग से एक पेन निकाल लाई और फटाफट फॉर्म भरने लगी.
स्पष्टतः उसने एक ऐसा निर्णय ले लिया था जो आगे उसकी ज़िंदगी को बहुत हद तक बदल देने वाला था.
जारी है.....
……………………………..
खिड़की के पास बैठी आशा कॉफ़ी पीते हुए दूर क्षितिज की ओर देख रही थी; उसकी माँ नीर को ले कर बगल में कहीं गई हुई थी. आशा के पिताजी भी रोज़ की तरह ही अपने रिटायर्ड दोस्तों से मिलने शाम को निकल जाया करते थे --- खुद भी रिटायर्ड और दोस्त भी ----- मस्त महफ़िल जमती थी सबकी.
घर में रह गई अकेली आशा ‘सिरररप सिरररप’ से कॉफ़ी की चुस्कियाँ ले रही और किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी....
‘क्या करूँ... ऐसी बेहूदगी भरा ऑफर... पिता के उम्र के होकर भी शर्म नहीं आई उन्हें. ये मर्दजात ऐसे क्यों होते हैं? क्यों हमेशा हम महिलाओं को, लड़कियों को बिस्तर पर लाने का सोचते हैं? इतनी ठरक क्यों होती है इनमें? क्या इनकी ठरक के लिए भी हम ज़िम्मेदार हैं? क्या हमारी कुछ आदतें, कुछ तरीके ही इनमें ठरक जगाने का, इनके ठरक में आग लगाने का काम करती हैं?’
तभी आशा को कुछ याद आया...
याद आया कि रणधीर बाबू के साथ बात करते समय कैसे उसका पल्लू उसके सीने से हट गया था… और, और उस समय कैसे रणधीर बाबू आँखें झपकना क्या, अपनी लार गटकना तक भूल गए थे. ये सीन याद आते ही आशा 'ही ही' करके हँस पड़ी. पर तुरंत ही खुद को सँभाल ली; कोई देखेगा तो क्या सोचेगा…?
मन घृणा से भरा हुआ था उसका.
सोच रही थी,
‘कैसी विचित्र दुनिया है--- थोड़ी हमदर्दी के बदले क्या-क्या नहीं माँगा जाता. अब तो सवाल ही नहीं उठता की मैं उनके पास जाऊँ…. कितना नीच है…. साला.’
‘साला’ शब्द मन में आते ही सिर को दो-तीन झटके देकर हिलाई….
‘हे भगवान ! ये क्या अनाप शनाप बोल रही हूँ मन ही मन --- उफ्फ्फ़ --- इस आदमी ने तो मूड और दिमाग के साथ साथ मन को भी मैला कर दिया है — धत्त…’
कप प्लेट धो कर रख देने के बाद आशा घर के दूसरे कामों में लग गई; रणधीर बाबू की बातों को लगभग भूल ही चुकी थी वह.
अचानक से उसका ध्यान टेबल पर रखे तीन-चार एप्लिकेशन फॉर्म पर गया. 3 - 4 कॉलेज के एडमिशन फॉर्म थे वह सब. नीर के लिए --- पर उन कॉलेजों की फ़ीस इतनी ज़्यादा थी कि आशा की हिम्मत ही जवाब दे गई थी. हालाँकि उसके पापा के पास पैसे तो बहुत हैं और देने के लिए भी राज़ी थे पर आशा को यह पसंद नहीं था कि उसके रिटायर्ड पापा उसके बेटे के कॉलेज के खर्चों का निर्वहन करें.
उन सभी फॉर्म को हाथों में लिए सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई. नीर को किसी बढ़िया कॉलेज में एडमिशन कराने की इच्छा एकबार फिर से हिलोरें मार कर मन की सीमाओं से पार जाने लगीं. अच्छे-अच्छे यूनिफार्म पहना कर कॉलेज भेजने की, रोज़ स्वादिष्ट टिफ़िन बना कर नीर का लंच बॉक्स तैयार करने की, उसे बस स्टॉप तक छोड़ने जाना या फ़िर हो सके तो ख़ुद ही कॉलेज ले जाना और ले आना ; ये सभी पहले दम तोड़ चुकीं हसरतें एकबार फ़िर से जिंदा होने लगीं.
उन्हीं फॉर्म्स में से एक फॉर्म पर नज़र ठिठकी उसकी;
फॉर्म के टॉप पर एक नाम प्रिंट था;
************************** कॉलेज
थोड़े बहुत बदलाव के साथ इस नाम के 4 कॉलेज हैं पूरे शहर में और चारों ही सिर्फ़ एक ही आदमी के थे….
‘रणधीर सिन्हा… उर्फ़…. रणधीर बाबू!!’
एकेडमिक के हिसाब से चारों ही कॉलेज बहुत ही अच्छे हैं और नीर के लिए भी बहुत ही अच्छे रहेंगे ये कॉलेज….
पर,
एडमिशन और एकेडमिक फीस में तो बहुत खर्चा है.
अतिरेक चिंता में आशा सिर पे हाथ रख कुर्सी के बैकरेस्ट पे पीठ सटा कर बैठ गई.
कुछ देर कई तरह के विचार उसके दिमाग में आते - जाते रहे. इन्हीं विचारों में एक विचार बचपन में पढ़े एक संस्कृत सुभाषितानि से याद किया हुआ था... 'जो माँ - बाप अपने बच्चों को साक्षर नहीं बनाते व उचित शिक्षा नहीं दिलाते वो अपने ही संतान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं!'
इस एक विचार ने थोड़ी देर आशा को विचलित किए रखा... लेकिन फिर उसके बाद वो अचानक से सीधी हो कर बैठ गई.
‘कुछ भी हो, मैं नीर का एडमिशन एक अच्छे कॉलेज में करा कर ही रहूँगी.…(एक फॉर्म को उठाकर देखते हुए).... जॉब भी और एडमिशन भी.’
इतना बड़बड़ाने के तुरंत बाद ही,
आशा के दोनों आँखों से चार बूँद आँसू गिरे,
चेहरा थोड़ा कठोर हुआ उसका….
कुछ ठान लिया उसने….
अपने हैंडबैग से एक पेन निकाल लाई और फटाफट फॉर्म भरने लगी.
स्पष्टतः उसने एक ऐसा निर्णय ले लिया था जो आगे उसकी ज़िंदगी को बहुत हद तक बदल देने वाला था.
जारी है.....
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