06-03-2026, 09:13 PM
भाग ३:-
सरेंडर
ऑफर
“ओह नहीं, नहीं... ये क्या कह रहे हैं आप?? नहीं, सर, मैं ऐसी-वैसी नहीं हूँ. मुझे जॉब चाहिए — पर मैं कोई ऐसी औरत नहीं हूँ जो इतना नीचे गिर जाए! माफ़ कीजिए; मुझसे नहीं हो पाएगा.”
“कूल डाउन आशा... मैंने बस तुम्हें एक ऑफर दिया है… इसका मतलब ये नहीं की तुम्हें ऐसा कुछ करना ही है --- ऐसा नहीं की तुम अगर नहीं करोगी तो तुम्हें जॉब नहीं मिलेगी,... मिलेगी, पर प्रमोशन नहीं मिलेगा, इंसेंटिव नहीं मिलेगी, एक्सटेंडेड हॉलीडेज नहीं मिलेंगे... और भी कई चीज़ें हैं जो तुम्हें नहीं मिल पाएँगी…….”
आशा ने बीच में ही टोकते हुए पूछा,
“पर मैं ही क्यों? अभी-अभी आपने कहा था कि मेरी क्वालिफिकेशन सारी सही हैं और आपके यहाँ 2-3 पोजीशन्स खाली हैं… और तो और मैंने आज ही आपसे मुलाकात की और आज ही आप मुझे ऐसा ऑफर कर रहे हैं— क्यों?!!”
अविश्वास से भरे उसके कंठस्वर बरबस ही ऊँचे हो चले थे --- और ऊँचे आवाज़ में कोई रणधीर बाबू से बात करे ये रणधीर बाबू को बिल्कुल पसंद नहीं था. अपने कर्मजीवन के आरंभ से रणधीर बाबू ने जो पत्थर-तोड़ मेहनत की है, उसी का परिणाम है की आज वो शहर के उन चंद रसूखदार प्रभावशाली लोगों में से हैं जो अपने एक इशारे से पूरा सिस्टम हिला दे; तो फिर कोई ऐसा व्यक्ति किसी भी ऐरे - गैरे का प्रतिरोध, प्रतिवाद क्यों सुनेगा... वो भी उसी के सामने ऊँचे आवाज़ में...?
“लो योर वोइस डाउन, आशा. मुझे ऊँची आवाज़ बिल्कुल पसंद नहीं. हाँ, मैंने कहा है कि इस एक शर्त को मान लेने पर तुम्हें जॉब मिल जाएगी. और तुम ही क्यों? तुम्हें क्यों ऑफर दे रहा हूँ... क्या, क्यों, कैसे... ये सब घर जाकर सोचना. आई डोंट लाइक टू एक्सप्लेन माइसेल्फ! और अगर शर्त मंज़ूर हो, तो आज से तीन दिन बाद, ****** हाई कॉलेज में दिन के 11:00 – 1:00 के बीच आ कर मिलना, ओके?? नाउ यू मे गो.”
आशा को अब बहुत तेज़ गुस्सा आने लगा…
गुस्से से नथुने फूलने - सिकुड़ने लगे.
उसी दावानल वाले गुस्से में ही वह उठने को हुई की एकाएक उसकी नज़र अपने जिस्म के ऊपरी हिस्से पर गई --- पल्ला अपने स्थान से हटा हुआ था और दाईं चूची का ऊपरी हिस्सा गोल हो कर हद से अधिक बाहर की ओर निकला हुआ था!
गुस्से को एक पल के लिए भूल, स्त्री सुलभ लज्जा से आशा ने झट से अपनी आँचल को ठीक किया. ठीक करते समय उसने तिरछी नज़र से रणधीर बाबू की ओर देखा... रणधीर बाबू एकटक दृष्टि से उसके वक्षों की ओर ही नज़र जमाए हुए हैं. उन की नज़रों में नर्म गदराए माँस पिंडों को पाने की बेइंतेहा ललक और प्रतिक्षण उनके चेहरे पर आते - जाते वासना के बादल को देख पल भर में दो वैचारिक प्रतिक्रियाएं हुईं आशा के मन में...
पहला तो ये कि वह एक बार फ़िर अपनी ही शारीरिक गठन और ख़ूबसूरती पर; होंठों के कोने पर कुटिल मुस्कान लिए, गर्व कर बैठी...
दूसरा, अभी इस गर्वीले क्षण का वो आनंद ले; उससे पहले ही उसे रणधीर बाबू के द्वारा दिए गए शर्त वाली बात याद आ गई और याद आते ही उसका मन अटूट बेबसी और कड़वाहट से भर गया.
वह तेज़ी से उठी; नीर को साथ ली और पैर पटकते हुए चली गई. बाहर निकलने से पहले एकबार के लिए वह ज़रा सा सिर घूमा कर पीछे देखी --- रणधीर बाबू बड़ी हसरत से उसकी गोल, उभरे हुए नितम्बों को देख रहा था... उनके चेहरे और आँखों से ऐसा लगा मानो वो साँस लेना तक भूल गए हैं!
एकटक...
एक दृष्टि...
अपलक भाव से देखते हुए...........
जारी है....
………………………………….
“कूल डाउन आशा... मैंने बस तुम्हें एक ऑफर दिया है… इसका मतलब ये नहीं की तुम्हें ऐसा कुछ करना ही है --- ऐसा नहीं की तुम अगर नहीं करोगी तो तुम्हें जॉब नहीं मिलेगी,... मिलेगी, पर प्रमोशन नहीं मिलेगा, इंसेंटिव नहीं मिलेगी, एक्सटेंडेड हॉलीडेज नहीं मिलेंगे... और भी कई चीज़ें हैं जो तुम्हें नहीं मिल पाएँगी…….”
आशा ने बीच में ही टोकते हुए पूछा,
“पर मैं ही क्यों? अभी-अभी आपने कहा था कि मेरी क्वालिफिकेशन सारी सही हैं और आपके यहाँ 2-3 पोजीशन्स खाली हैं… और तो और मैंने आज ही आपसे मुलाकात की और आज ही आप मुझे ऐसा ऑफर कर रहे हैं— क्यों?!!”
अविश्वास से भरे उसके कंठस्वर बरबस ही ऊँचे हो चले थे --- और ऊँचे आवाज़ में कोई रणधीर बाबू से बात करे ये रणधीर बाबू को बिल्कुल पसंद नहीं था. अपने कर्मजीवन के आरंभ से रणधीर बाबू ने जो पत्थर-तोड़ मेहनत की है, उसी का परिणाम है की आज वो शहर के उन चंद रसूखदार प्रभावशाली लोगों में से हैं जो अपने एक इशारे से पूरा सिस्टम हिला दे; तो फिर कोई ऐसा व्यक्ति किसी भी ऐरे - गैरे का प्रतिरोध, प्रतिवाद क्यों सुनेगा... वो भी उसी के सामने ऊँचे आवाज़ में...?
“लो योर वोइस डाउन, आशा. मुझे ऊँची आवाज़ बिल्कुल पसंद नहीं. हाँ, मैंने कहा है कि इस एक शर्त को मान लेने पर तुम्हें जॉब मिल जाएगी. और तुम ही क्यों? तुम्हें क्यों ऑफर दे रहा हूँ... क्या, क्यों, कैसे... ये सब घर जाकर सोचना. आई डोंट लाइक टू एक्सप्लेन माइसेल्फ! और अगर शर्त मंज़ूर हो, तो आज से तीन दिन बाद, ****** हाई कॉलेज में दिन के 11:00 – 1:00 के बीच आ कर मिलना, ओके?? नाउ यू मे गो.”
आशा को अब बहुत तेज़ गुस्सा आने लगा…
गुस्से से नथुने फूलने - सिकुड़ने लगे.
उसी दावानल वाले गुस्से में ही वह उठने को हुई की एकाएक उसकी नज़र अपने जिस्म के ऊपरी हिस्से पर गई --- पल्ला अपने स्थान से हटा हुआ था और दाईं चूची का ऊपरी हिस्सा गोल हो कर हद से अधिक बाहर की ओर निकला हुआ था!
गुस्से को एक पल के लिए भूल, स्त्री सुलभ लज्जा से आशा ने झट से अपनी आँचल को ठीक किया. ठीक करते समय उसने तिरछी नज़र से रणधीर बाबू की ओर देखा... रणधीर बाबू एकटक दृष्टि से उसके वक्षों की ओर ही नज़र जमाए हुए हैं. उन की नज़रों में नर्म गदराए माँस पिंडों को पाने की बेइंतेहा ललक और प्रतिक्षण उनके चेहरे पर आते - जाते वासना के बादल को देख पल भर में दो वैचारिक प्रतिक्रियाएं हुईं आशा के मन में...
पहला तो ये कि वह एक बार फ़िर अपनी ही शारीरिक गठन और ख़ूबसूरती पर; होंठों के कोने पर कुटिल मुस्कान लिए, गर्व कर बैठी...
दूसरा, अभी इस गर्वीले क्षण का वो आनंद ले; उससे पहले ही उसे रणधीर बाबू के द्वारा दिए गए शर्त वाली बात याद आ गई और याद आते ही उसका मन अटूट बेबसी और कड़वाहट से भर गया.
वह तेज़ी से उठी; नीर को साथ ली और पैर पटकते हुए चली गई. बाहर निकलने से पहले एकबार के लिए वह ज़रा सा सिर घूमा कर पीछे देखी --- रणधीर बाबू बड़ी हसरत से उसकी गोल, उभरे हुए नितम्बों को देख रहा था... उनके चेहरे और आँखों से ऐसा लगा मानो वो साँस लेना तक भूल गए हैं!
एकटक...
एक दृष्टि...
अपलक भाव से देखते हुए...........
जारी है....
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