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Incest खेल ससुर बहु का
थोड़ी देर दोनो वैसे ही पड़े रहे, फिर राजासाहब उसके उपर से उतर कर उसकी बगल मे लेट गये। मेनका भी करवट ले उनकी बाहों मे आ गयी  और  उनके सीने पर सर रख दिया। राजासाहब उसके बाल सहला रहे थे  और  बीच-2 मे उसके सर पर चूम रहे थे। मेनका उनके सीने के बालों मे उंगलिया फिरा रही थी। मैत्री की प्रस्तुति


थोड़ी देर बाद मनेका उठ कर बैठ गयी, उसका ध्यान अपनी चूची पर गया जहाँ राजासाहब ने थोड़ी देर पहले जम कर चूसा था। अब वहा पर एक बड़ा सा निशान पड़ गया था।

"क्या देख रही हो?" राजासाहब ने लेते-2 ही पूछा।

"आपकी कारस्तानी।" मेनका बनावटी गुस्से से बोली।

"अब ये ऐसी खूबसूरत होंगी तो कारस्तानी तो ऐसी ही होगी।" राजासाहब उठ कर उस जगह पर हाथ फिराते हुए बोले।

"आप भी ना!", मेनका ने उनका हाथ एक तरफ कर दिया।
मैत्री की रचना

"ये क्या आप-आप लगा रखा है। आज से तुम हमे सिर्फ़ तुम कह कर पुकरोगी।" राजासाहब ने उसे फिर अपनी बाहों मे भर लिया।

"आज क्या हो गया है आपको,ये... ।"

"-..फिर आप! तुम कहो।"


मेनका के गाल लाल हो गये, "प्लीज़ क्यू सता रहे हैं?"

"क्यू सता रहे हो? तुम्हे हमारी कसम चलो ऐसे बोल कर दिखाओ।"

"ये बात-बात पे अपनी कसम क्यू देते है?"

"फिर आप।"

"अच्छा बाबा! तुम...क्या तुम बात-2 पर कसम देने लगते हो?"

"हो गया। अब नही देंगे।"


दोनो हंस पड़े।,
 
"ये कारस्तानी पसंद आई?",उन्होने उस निशान को सहलाते हुए पूछा। जवाब ने मेनका ने मुस्कुराते हुए हां मे सर हिला दिया।

"तब हम आपको एक और कारस्तानी दिखाते हैं।", राजासाहब उठे  और  मेनका के कुछ बोलने से पहले अपने वॉक-इन क्लॉज़ेट खोल उसके अंदर चले गये। थोड़ी देर बाद बाहर आए तो उनके हाथ मे 2 डब्बे थे।


वो मेनका के पास आकर बैठ गये।एक डब्बा उसको दिया,"खोलो।"

मेनका ने डब्बा खोला तो उसकी आँखें चौंधिया गयी,अंदर हीरो का एक बहुत बेशक़ीमती जड़औ हार जगमगा रहा था।

"ये मेनकासिंग के लिए है जिसके इनवॅल्युवबल कॉंट्रिब्यूशन के बदौलत राजकुल ग्रूप डील कर पाया।"

"पर इतने कीमती तोहफे की क्या ज़रूरत थी?"

"ये तुमसे किमती नही है।", राजासाहब ने हार उठा कर उसके गले मे पहना दिया।,

"अब ये दूसरा डिब्बा खोलो।"

उसको खोलते ही अंदर से एक गोल्ड चैन निकली जिसमे एक  हीरे का पेंडेंट लटका था। पेंडेंट मे हीरे से 'एम' बना था और 'एम' के बीच के 'वी' से एक सीधी लाइन नीचे निकल कर 'Y' बना रही थी। जब तक कोई बहुत गौर से नही देखता तो उसे कभी नही पता चलता कि पेंडेंट मे दोनो लेटर्स एम और Y हैं। दूर से तो बस लगता था जैसे की एम बना है।

"
और ये हमारी जान के लिए उसे हमारे प्यार का पहला तोहफा।", और वो चैन भी उसके गले मे डाल दी।


मेनका की आँखो मे खुशी के आँसू भर आए और वो आगे बढ़ कर अपने ससुर के गले लग गयी  और  सुबकने लगी।

"
अरे क्या हुआ?"

"
घबराईए मत।- आइ मीन घबराव मत, ये खुशी के आँसू हैं।", राजासाहब हंसते हुए उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरने लगे।

"
हमने भी तुम्हारे लिए कुछ लिया है। हमारे कमरे मे रखा है। बस अभी लेकर आते हैं।"


राजासाहब ने चाभी से दरवाज़ा खोला  और  दोनो वैसे ही नंगे स्टडी के अंदर आ गये। राजासाहब ने लाइट जलाई तो मेनका पूरी स्टडी को ध्यान से देखने लगी। चारों तरफ शेल्व्स मे ज़मीन से छत तक किताबें भरी थी। बीच-बिच मे राजासाहब के पुरखों के पोरट्रेट्स लगे थे। कमरे के बीच मे एक बड़ा स्टडी डेस्क था और उसके पीछे एक लेदर-बॅक चेर।


राजासाहब कमरे के एक  कोने मे चले गये। उस कोने मे बुक-शेल्फ मे से वो किताबें निकालने लगे। मेनका हैरत से देख रही थी और समझने की नाकाम कोशिश कर रही थी। राजासाहब ने दस किताबें खिच-खीच कर निकाल दी। फिर मेनका को इशारे से बुलाया, मेनका वहा पहुँची तो देखा कि उस खाली जगह मे शेल्फ के पीछे का लकड़ी का हिस्सा दिख रहा था। उसने सवालिया नज़रो से अपने ससुर की तरफ देखा। राजासाहब ने मुस्कुराते हुए अपनी स्टडी से एक  पेन-नाइफ उठाई  और  शेल्फ के उस पिछले हिस्से की लकड़ी के दोनो सिरों पर जहा किताबें थी उपर से नीचे तक फिराया  और  वो लकड़ी का बोर्ड गिर पड़ा।

मेनका चौंक पड़ी तो राजासाहब हंस पड़े, "ये लूज बोर्ड है  और  ये देखो इसके पीछे क्या है।" मैत्री द्वारा लिखित

पीछे एक छोटी-सी तिजोरी नज़र आ रही थी। राजासाहब ने उसका कॉंबिनेशन लॉक  खोला  और  उसके अंदर से एक काग़ज़ों का पुलिंदा निकाला। उस पुलिंदे को ले कर राजासाहब मेनका का हाथ पकड़ कर डेस्क के पीचे लेदर बॅक चेर की तरफ चले गये। उस पर बैठ कर उन्होने मेनका की कमर मे अपना बाया हाथ डाला  और  उसे  अपनी गोद मे बिठा लिया। उसने भी अपनी दाई बाँह अपने ससुर के गले मे डाल दी।

"
हम जो आपको बताने जा रहे हैं उसे जान ने का हक़ केवल महल के राजा को होता है। ये राजा की मर्ज़ी है कि इस बात को कब वो अपने सबसे बड़े बेटे, यानी की  भावी राजकुमार को बताता है। हमने तो सोचा था कि डील फाइनल होते ही विश्वा को बताएँगे पर हमारी बदक़िस्मती कि वो कमज़ोर निकला और...यूधवीर तो हमे पहले ही छोड़ कर जा चुका है।", राजासाहब खामोश हो गये।


मेनका ने भी बिना कुछ बोले बस उनके बालों मे हाथ फिराने लगी।

राजासाहब ने फिर कहना शुरू किया, "ये उस वक़्त की बात है जब रजवाड़े ख़तम हो रहे थे और  सारी रियासतें हिन्दुस्तान मे मिलाई जाने वाली थी। हमारे पिताजी को इस बात की भनक काफ़ी पहले लग गयी  और  वो समझ गये कि अब हमारा  वक़्त सचमुच ख़तम होने वाला है। इस पूरे राज्य मे हमारी काफ़ी ज़मीन  और  प्रॉपर्टी थी। इतनी जितनी कि कोई कभी सोच भी नही सकता। उन्होने धीरे-धीरे सारी प्रॉपर्टी को इस तरह बेचा कि किसी को ज़रा भी शक़ नही हुआ। जब भारत सरकार ने उन्हे हिन्दुस्तान मे मिलने को कहा तो वो झट से राज़ी हो गये।", मेनका गौर से उनकी बात सुन रही थी।



आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत
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RE: खेल ससुर बहु का - by maitripatel - 06-03-2026, 06:54 PM



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