06-03-2026, 06:48 PM
हर धक्के के साथ मेनका उनके लंड के टोपे को अपनी कोख पे लगता महसूस कर रही थी और उसे इतना मज़ा आ रहा था की पुछो मत। तभी राजासाहब ने वैसे ही उसकी चूची चूस्ते हुए फिर से एक ज़ोर का धक्का मारा तो उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया, वो उचक कर अपने ससुर से चिपक गयी उनका जिस्म भी झटके खाने लगा और उसने उनके लंड से च्छूटता पानी अपनी चूत मे भरता महसूस किया।
यहाँ से आगे..............
थोड़ी देर दोनो वैसे ही पड़े रहे, फिर राजासाहब उसके उपर से उतर कर उसकी बगल मे लेट गये। मेनका भी करवट ले उनकी बाहों मे आ गयी और उनके सीने पर सर रख दिया। राजासाहब उसके बाल सहला रहे थे और बीच-2 मे उसके सर पर चूम रहे थे। मेनका उनके सीने के बालों मे उंगलिया फिरा रही थी।
थोड़ी देर बाद मनेका उठ कर बैठ गयी, उसका ध्यान अपनी चूची पर गया जहाँ राजासाहब ने थोड़ी देर पहले जम कर चूसा था। अब वहा पर एक बड़ा सा निशान पड़ गया था।
"क्या देख रही हो?" राजासाहब ने लेते-2 ही पूछा।
"आपकी कारस्तानी।" मेनका बनावटी गुस्से से बोली। मैत्री की प्रस्तुति
"अब ये ऐसी खूबसूरत होंगी तो कारस्तानी तो ऐसी ही होगी।" राजासाहब उठ कर उस जगह पर हाथ फिराते हुए बोले।
"आप भी ना!", मेनका ने उनका हाथ एक तरफ कर दिया।
"ये क्या आप-आप लगा रखा है। आज से तुम हमे सिर्फ़ तुम कह कर पुकरोगी।" राजासाहब ने उसे फिर अपनी बाहों मे भर लिया।
"आज क्या हो गया है आपको,ये... ।"
"-..फिर आप! तुम कहो।"
मेनका के गाल लाल हो गये, "प्लीज़ क्यू सता रहे हैं?"
"क्यू सता रहे हो? तुम्हे हमारी कसम चलो ऐसे बोल कर दिखाओ।"
"ये बात-बात पे अपनी कसम क्यू देते है?"
"फिर आप।"
"अच्छा बाबा! तुम...क्या तुम बात-2 पर कसम देने लगते हो?"
"हो गया। अब नही देंगे।"
दोनो हंस पड़े।,
"ये कारस्तानी पसंद आई?",उन्होने उस निशान को सहलाते हुए पूछा। जवाब ने मेनका ने मुस्कुराते हुए हां मे सर हिला दिया।
"तब हम आपको एक और कारस्तानी दिखाते हैं।", राजासाहब उठे और मेनका के कुछ बोलने से पहले अपने वॉक-इन क्लॉज़ेट खोल उसके अंदर चले गये। थोड़ी देर बाद बाहर आए तो उनके हाथ मे 2 डब्बे थे।
वो मेनका के पास आकर बैठ गये।एक डब्बा उसको दिया,"खोलो।"
मेनका ने डब्बा खोला तो उसकी आँखें चौंधिया गयी,अंदर हीरो का एक बहुत बेशक़ीमती जड़औ हार जगमगा रहा था।
"ये मेनकासिंग के लिए है जिसके इनवॅल्युवबल कॉंट्रिब्यूशन के बदौलत राजकुल ग्रूप डील कर पाया।" मैत्री द्वारा लिखित
"पर इतने कीमती तोहफे की क्या ज़रूरत थी?"
"ये तुमसे किमती नही है।", राजासाहब ने हार उठा कर उसके गले मे पहना दिया।,
"अब ये दूसरा डिब्बा खोलो।"
उसको खोलते ही अंदर से एक गोल्ड चैन निकली जिसमे एक हीरे का पेंडेंट लटका था। पेंडेंट मे हीरे से 'एम' बना था और 'एम' के बीच के 'वी' से एक सीधी लाइन नीचे निकल कर 'Y' बना रही थी। जब तक कोई बहुत गौर से नही देखता तो उसे कभी नही पता चलता कि पेंडेंट मे दोनो लेटर्स एम और Y हैं। दूर से तो बस लगता था जैसे की एम बना है।
"और ये हमारी जान के लिए उसे हमारे प्यार का पहला तोहफा।", और वो चैन भी उसके गले मे डाल दी।
मेनका की आँखो मे खुशी के आँसू भर आए और वो आगे बढ़ कर अपने ससुर के गले लग गयी और सुबकने लगी।
"अरे क्या हुआ?"
"घबराईए मत।- आइ मीन घबराव मत, ये खुशी के आँसू हैं।", राजासाहब हंसते हुए उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरने लगे।
"हमने भी तुम्हारे लिए कुछ लिया है। हमारे कमरे मे रखा है। बस अभी लेकर आते हैं।"
कहानी जारी है कही जाइएगा नहीं.....
मैत्री..........
यहाँ से आगे..............
थोड़ी देर दोनो वैसे ही पड़े रहे, फिर राजासाहब उसके उपर से उतर कर उसकी बगल मे लेट गये। मेनका भी करवट ले उनकी बाहों मे आ गयी और उनके सीने पर सर रख दिया। राजासाहब उसके बाल सहला रहे थे और बीच-2 मे उसके सर पर चूम रहे थे। मेनका उनके सीने के बालों मे उंगलिया फिरा रही थी।
थोड़ी देर बाद मनेका उठ कर बैठ गयी, उसका ध्यान अपनी चूची पर गया जहाँ राजासाहब ने थोड़ी देर पहले जम कर चूसा था। अब वहा पर एक बड़ा सा निशान पड़ गया था।
"क्या देख रही हो?" राजासाहब ने लेते-2 ही पूछा।
"आपकी कारस्तानी।" मेनका बनावटी गुस्से से बोली। मैत्री की प्रस्तुति
"अब ये ऐसी खूबसूरत होंगी तो कारस्तानी तो ऐसी ही होगी।" राजासाहब उठ कर उस जगह पर हाथ फिराते हुए बोले।
"आप भी ना!", मेनका ने उनका हाथ एक तरफ कर दिया।
"ये क्या आप-आप लगा रखा है। आज से तुम हमे सिर्फ़ तुम कह कर पुकरोगी।" राजासाहब ने उसे फिर अपनी बाहों मे भर लिया।
"आज क्या हो गया है आपको,ये... ।"
"-..फिर आप! तुम कहो।"
मेनका के गाल लाल हो गये, "प्लीज़ क्यू सता रहे हैं?"
"क्यू सता रहे हो? तुम्हे हमारी कसम चलो ऐसे बोल कर दिखाओ।"
"ये बात-बात पे अपनी कसम क्यू देते है?"
"फिर आप।"
"अच्छा बाबा! तुम...क्या तुम बात-2 पर कसम देने लगते हो?"
"हो गया। अब नही देंगे।"
दोनो हंस पड़े।,
"ये कारस्तानी पसंद आई?",उन्होने उस निशान को सहलाते हुए पूछा। जवाब ने मेनका ने मुस्कुराते हुए हां मे सर हिला दिया।
"तब हम आपको एक और कारस्तानी दिखाते हैं।", राजासाहब उठे और मेनका के कुछ बोलने से पहले अपने वॉक-इन क्लॉज़ेट खोल उसके अंदर चले गये। थोड़ी देर बाद बाहर आए तो उनके हाथ मे 2 डब्बे थे।
वो मेनका के पास आकर बैठ गये।एक डब्बा उसको दिया,"खोलो।"
मेनका ने डब्बा खोला तो उसकी आँखें चौंधिया गयी,अंदर हीरो का एक बहुत बेशक़ीमती जड़औ हार जगमगा रहा था।
"ये मेनकासिंग के लिए है जिसके इनवॅल्युवबल कॉंट्रिब्यूशन के बदौलत राजकुल ग्रूप डील कर पाया।" मैत्री द्वारा लिखित
"पर इतने कीमती तोहफे की क्या ज़रूरत थी?"
"ये तुमसे किमती नही है।", राजासाहब ने हार उठा कर उसके गले मे पहना दिया।,
"अब ये दूसरा डिब्बा खोलो।"
उसको खोलते ही अंदर से एक गोल्ड चैन निकली जिसमे एक हीरे का पेंडेंट लटका था। पेंडेंट मे हीरे से 'एम' बना था और 'एम' के बीच के 'वी' से एक सीधी लाइन नीचे निकल कर 'Y' बना रही थी। जब तक कोई बहुत गौर से नही देखता तो उसे कभी नही पता चलता कि पेंडेंट मे दोनो लेटर्स एम और Y हैं। दूर से तो बस लगता था जैसे की एम बना है।
"और ये हमारी जान के लिए उसे हमारे प्यार का पहला तोहफा।", और वो चैन भी उसके गले मे डाल दी।
मेनका की आँखो मे खुशी के आँसू भर आए और वो आगे बढ़ कर अपने ससुर के गले लग गयी और सुबकने लगी।
"अरे क्या हुआ?"
"घबराईए मत।- आइ मीन घबराव मत, ये खुशी के आँसू हैं।", राजासाहब हंसते हुए उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरने लगे।
"हमने भी तुम्हारे लिए कुछ लिया है। हमारे कमरे मे रखा है। बस अभी लेकर आते हैं।"
कहानी जारी है कही जाइएगा नहीं.....
मैत्री..........


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