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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
आहिस्ता-आहिस्ता बहकाना -2
 
करीम की नज़रें सबसे पहले अनीता के चिकने और संगमरमर जैसे गोरे पेट पर थमीं, जो डर और उत्तेजना के मारे अंदर-बाहर हो रहा था। उसके ठीक बीच में अनीता की गहरी और गोल नाभि  थी, जिसमें पसीने की एक नन्ही बूंद चमक रही थी। करीम की लार टपकने को थी।

 
उसकी निगाहें और नीचे उतरीं, जहाँ अनीता की भीगी हुई लाल पैंटी  ने उसके गुप्त अंग को कस रखा था। उस महीन कपड़े के ऊपर से ही अनीता का उभार साफ नजर आ रहा था, और गीलेपन के कारण पैंटी का कपड़ा उस दरार में धँसकर एक स्पष्ट  कैमल टो  बना रहा था, जो करीम को पागल करने के लिए काफी था।

 
अनीता की नंगी जांघें बिना किसी दाग-धब्बे के इतनी चिकनी और पुष्ट थीं कि मद्धम उजाले में चमक रही थीं। करीम ने झुककर अपनी आँखों को उन जांघों के करीब लाया, जैसे वह उस बेदाग गोराई की खुशबू लेना चाहता हो।

 
करीम (अपनी उंगली अनीता की जांघ पर फिराते हुए): "उफ़... कसम खुदा की बेटी, ई जो आपकी जांघों का निखार है न, ई तो कलेजे में खंजर की तरह उतर रहा है। इतनी साफ... इतनी सुथरी... और ई जो आपकी जांघों के बीच ई नमी दिख रही है ना, ई बता रही है कि मालकिन तैयार है!"

 
अनीता शर्म और उत्तेजना के मारे अपनी जांघों को आपस में सटाने लगी, लेकिन करीम ने मजबूती से उन्हें पकड़ लिया।

 
करीम (गहरी साँस भरते हुए): "हाय अल्लाह... ई पेट है या मखमल की चादर? और ई जो आपकी नाभि का कुआँ है न मालकिन, ई तो सीधे कयामत की तरफ ले जाता है।"

 
करीम ने बिना देरी किए अपनी गीली और गरम ज़ुबान अनीता की नाभि के घेरे पर रख दी। जैसे ही उसकी ज़ुबान की नोक उस गहरी नाभि के अंदर धँसी, अनीता का पेट अंदर की ओर सिकुड़ गया और उसके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली— "ओह्ह्ह करीम!" करीम ने अपनी ज़ुबान को वहाँ गोल-गोल घुमाया और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगा।

उसकी ज़ुबान अब अनीता की उन नंगी और पुष्ट जांघों पर रेंग रही थी। जहाँ-जहाँ उसकी ज़ुबान जाती है, वहाँ एक गीली लकीर बन जाती है। उसने अनीता की एक जांघ को अपने हाथों में भरकर उसे चूमना और चाटना शुरू किया। उन बेदाग और चिकनी जांघों का स्वाद करीम को मदहोश कर रहा था।

 
करीम अब जांघों के उस संगम तक पहुँच चुका था जहाँ वह लाल पैंटी अब पूरी तरह पारदर्शी और गीली हो चुकी थी। उस कपड़े के ऊपर से ही अनीता की योनि की गर्मी करीम के चेहरे को झुलसा रही थी।

 
करीम (हौले से फुसफुसाते हुए): "अब ई जो आखिरी पर्दा है बेटी, इसे भी हट जाने दो... ताकि ई करीम अपनी इस जन्नत का असली दीदार कर सके।"

 
करीम ने अपनी दोनों उंगलियां पैंटी के किनारों में फँसाईं और बहुत धीरे से, उसे अनीता की जांघों से नीचे सरकाना शुरू किया। जैसे-जैसे कपड़ा नीचे सरक रहा था, अनीता की सुडौल और सुथरी जंघाओं के बीच का वह सबसे गुप्त हिस्सा नंगा हो रहा था।

 
जैसे ही पैंटी फर्श पर गिरी, अनीता का वह नंगा और कामुक हिस्सा करीम की आँखों के सामने था। वह हिस्सा पूरी तरह से साफ, सुथरा और उत्तेजना के कारण शहद की तरह गीला होकर चमक रहा था।

 
करीम (हैरत के मारे आँखें फाड़कर): "कसम उस खुदा की... हमने ई कभी ना सोचा था कि कोई चीज़ इतनी खूबसूरत भी हो सकती है। ई तो एकदम कुदरत का करिश्मा है! देखो तो कइसे ई जन्नत पसीने और रस से तरबतर होकर हमारा स्वागत कर रही है।"

 
करीम ने अपनी गर्दन आगे बढ़ाई और अपनी नाक उस गीले हिस्से के बिल्कुल करीब ले जाकर उस तीखी और मदहोश कर देने वाली खुशबू को अपने भीतर भरा, जिसने उसे पूरी तरह से जानवर बना दिया।

 
करीम का चेहरा अब उन दो गोरी जांघों के बीच पूरी तरह समाने को तैयार था। 
 
 
करीम ने अपनी दोनों हथेलियों से अनीता की उन भारी और चिकनी जांघों को पूरी ताकत से बाहर की ओर फैला दिया, ताकि वह उस 'गुप्त खजाने' का जर्रा-जर्रा देख सके। कोठरी के मद्धम उजाले में अनीता का वह सबसे निजी हिस्सा किसी बेशकीमती हीरे की तरह चमक उठा।

 
अनीता की योनि पूरी तरह से साफ और चिकनी  थी, जैसे किसी कलाकार ने संगमरमर को तराशा हो। वहाँ एक भी बाल का निशान नहीं था, जिससे उसकी खाल की वह मखमली गोराई और भी निखरकर आ रही थी। उत्तेजना के कारण उस हिस्से की रंगत गहरी गुलाबी हो चुकी थी।

 
करीम की आँखें उस नन्हीं और गुलाबी कली पर जाकर टिक गईं, जो उन मांसल परतों के बीच से बाहर की ओर झाँक रही थी। वह कली पूरी तरह से कड़ी हो चुकी थी और अनीता की बढ़ती हुई प्यास के कारण पारदर्शी शहद जैसे तरल से भीग कर चमक रही थी।

 
करीम (हैरत और दीवानगी में डूबी आवाज़ में): "उफ़... कसम खुदा की बेटी, ई तो इंसान का बनाया हुआ नहीं हो सकता। देखो तो सही, ई गुलाबी कली कइसे हमें चिढ़ा रही है… कइसे ई रस टपक रहा है जैसे किसी सावन की पहली फुहार हो। ई जो सुथरापन है न आपका, ई तो हमें कत्ल कर देगा, मालकिन!"

 
करीम से अब और सब्र नहीं हुआ। उसने अपनी आँखें बंद की और अपना पूरा चेहरा उन दो गोरी जांघों के संगम में धँसा दिया।

 
जैसे ही उसकी गर्म और खुरदरी ज़ुबान ने उस गुलाबी कली को पहली बार छुआ, अनीता का पूरा शरीर से ऊपर उछल गया। उसके मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो गहरी कामुकता में डूबी हुई थी।

 
अनीता (काँपते हुए): "आह्ह्ह… करीम! वंहा... वंहा मत... उफ़्फ़... ये क्या कर रहे हो... आhh!"

 
करीम ने अपनी ज़ुबान की नोक से उस गुलाबी कली को सहलाना और हल्के-हल्के झटके देना शुरू किया। वह उसे अपनी ज़ुबान के बीच लेकर चूसने लगा, जिससे अनीता की जांघें थरथराने लगीं। करीम की ज़ुबान उस गीली दरार के ऊपर से नीचे तक रेंग रही थी, वह उस बहते हुए 'अमृत' की एक-एक बूंद को अपनी ज़ुबान पर समेट रहा था।

 
करीम (मुँह वहीं रखे हुए, दबी आवाज़ में): "बेटी, ई रस तो अंगूर की शराब से भी ज्यादा नशीला है। आज तो ई गरीब ई गुलाबी कली को तब तक चखेगा जब तक आपकी जांघें ढीली ना पड़ जाएं।"

 
अनीता का हाथ करीम के सिर पर था, वह कभी उसे दूर ढकेलती तो कभी और करीब खींच लेती। उसके शरीर का हर रोम-रोम अब उस चरम सुख की ओर बढ़ रहा था जिसे करीम अपनी ज़ुबान से पैदा कर रहा था।

 
करीम अब समझ चुका था कि अनीता पूरी तरह पिघल चुकी है। वह धीरे से पीछे हटा, उसकी दाढ़ी और मुँछें अनीता के रस से पूरी तरह भीग चुकी थीं। उसने खड़े होकर अपनी लुंगी की गिरह खोली।

 
जैसे ही कपड़ा नीचे गिरा, करीम का वह 10 इंच का फौलादी और काला लंड एक झटके के साथ आजाद हुआ। वह किसी अजगर की तरह गुस्से में तना हुआ था और उसकी रगों में खून का बहाव इतना तेज था कि वह धक-धक कर रहा था।

 
अनीता ने जब पहली बार करीम के उस काले और लंबे लंड को अपनी नज़रों के सामने देखा, तो उसके मुँह से एक दबी हुई आह निकली।

 
जब अनीता की नज़र करीम के उस विशाल और काले लंड  पर पड़ी, तो उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। वह लगभग 10 इंच लंबा था और उसकी मोटाई राज के लंड से दोगुनी थी। अनीता ने आज तक ऐसा मंज़र सिर्फ नीली फिल्मों  में ही देखा था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक इंसान का लंड इतना बड़ा हो सकता है।

 
उसे देखकर ही अनीता की योनि में एक थरथराहट दौड़ गई—डर और चरम उत्तेजना का एक ऐसा मिश्रण जिसे वह लफ्जों में बयान नहीं कर सकती थी। 
 
 
करीम: "अब तैयार हो जाइए रानी साहिबा... क्योंकि ई लंड अब आपकी उस गुलाबी कली की गहराई नापने के लिए बेताब है।"

 
करीम फिर से अपनी उस छोटी सी चारपाई पर चित लेट गया। उसका वह विशाल और काला लंड अब किसी खंभे की तरह सीधा खड़ा होकर छत की ओर इशारा कर रहा था, जिस पर खून की नसें उभरी हुई थीं और वह उत्तेजना से धक-धक कर रहा था। उसने अपने दोनों हाथ फैलाए और अपनी काली, प्यासी नज़रों से अनीता के गोरे, नंगे बदन को निहारा।

 
करीम (हुक्म भरे लहजे में): "अनीता बेटी, अब टुकुर-टुकुर देख क्या रही हो? ई वही चीज़ है जिसके लिए तुम्हारा ई गोरा बदन तड़प रहा था। ई मजूर का लोहा है, जो आग में तपकर तैयार हुआ है।"

 
करीम ने अपनी जांघों पर जोर से हाथ थपथपाया और अनीता की ओर इशारा किया।

 
करीम: "चलो, अब देर मत करो... चढ़ जाओ हमारे ऊपर। आज हमें भी तो पता चले कि एक रईस मालकिन अपने काले नौकर को कैसे खुश करती है। आज रईसी और गरीबी का सारा फर्क इस बिस्तर पर मिट जाएगा।"

 
अनीता का शरीर उस विशाल काले अंग को देखकर बुरी तरह कांप उठा। उसकी जांघें थरथरा रही थीं और आँखों में लज़्ज़त के साथ-साथ एक अनजाना डर भी था।

 
अनीता (सिसकते हुए): "नहीं करीम... मैं ये नहीं ले पाऊँगी। यह बहुत ज़्यादा चौड़ा है… ये बहुत मोटा है करीम! इसकी विड्थ  इतनी ज़्यादा है कि ये मुझे अंदर से फाड़ देगा। प्लीज करीम, इसे मेरे पास मत लाओ... मैं सच में नहीं सह पाऊँगी!"

 
अनीता की आँखों में खौफ और उसकी ज़ुबान से अपने 'मोटे लोहे' की ऐसी तारीफ सुनकर करीम का सीना फख्र से चौड़ा हो गया। उसे अपनी इस मर्दानगी पर बहुत गुरूर महसूस हो रहा था।

 
करीम (ऊपर से बहुत ही शांत और मद्धम आवाज़ में): "अरे बेटी, आप तो डर गईं। घबराइए मत, हम बहुत धीरे-धीरे  करेंगे। ई मजूर का प्यार है, हम ज़ुल्म नहीं करेंगे।"

 
लेकिन करीम के दिमाग में तो कुछ और ही शैतानियत पल रही थी। वह उस दिन को नहीं भूला था जब अनीता ने उसे थप्पड़ मारा था। उसके दिमाग में एक ही बात गूँज रही थी: 'उस दिन तो तुमने हमें चांटा मारा था मालकिन... आज ई करीम तुम्हारे इस गोरे बदन को तहस-नहस कर देगा। आज तो तुम्हारी फाड़ के रख दूंगा... और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि कब ई प्यार दरिंदगी में बदल गया।'

 
करीम (अनीता को अपने ऊपर खींचते हुए): "अरे बेटी, ई फौलाद है, ई मुड़ेगा नहीं। और रहा सवाल इसके मोटापे का, तो ई जन्नत का दरवाज़ा बड़ा छोटा है, पर ई उसे अपने रास्ते खुद बना लेगा।"

 
अनीता ने कांपते हुए अपने गोरे घुटने करीम की जांघों के दोनों तरफ टिकाए और उस काले लंड  के ठीक ऊपर सवार हो गई। जैसे ही उसकी गीली और गुलाबी योनि ने उस दहकते हुए अंग के सिरे को छुआ, अनीता के मुँह से एक चीख निकल गई।

 
करीम (अनीता की आँखों में झाँकते हुए): "राज साहब को तो बस ई गोरा बदन मिला है, पर आज इस काले नौकर को इसकी रूह और हवस दोनों मिल गई हैं। अब धीरे-धीरे नीचे आओ बेटी... और ई मोटे लोहे को अपनी गहराई नापने दो।"

 
करीम ने अपनी दोनों खुरदरी हथेलियों से अनीता के उन भारी और सुडौल कूल्हों को इतनी बेदर्दी से भींचा कि उसकी उंगलियां उस गोरे मांस में गहरी धँस गईं। वह अनीता की उस मखमली त्वचा और अपनी मर्दाना कठोरता के मिलन का पूरा लुत्फ उठा रहा था।

 
करीम (आँखों में हवस का सैलाब भरकर): "अब धीरे-धीरे नीचे आओ बेटी... इसे पूरा अपने अंदर उतार लो। याद रखना, ई राज साहब वाला नाहीं है... ई तुम्हें पूरा चीर कर रख देगा। आज तुम्हारी हर नली को ई करीम का काला लंड ही खोलेगा और ई पसीने की खुशबू को रग-रग में भर देगा।"

 
अनीता का शरीर थर-थर कांप रहा था। उसने कांपते हुए अपने हाथों को करीम के काले, बालों वाले सीने पर टिकाया और बहुत धीरे से अपने शरीर का भार नीचे की ओर डाला।

 
जैसे ही उस विशाल काले लंड का गर्म और सख्त सिरा अनीता की गीली और गुलाबी योनि के मुहाने को फाड़कर अंदर दाखिल हुआ, अनीता के मुँह से एक आह निकली। उसे महसूस हुआ कि कोई दहकती हुई लोहे की छड़ उसके रेशमी बदन के दो टुकड़े कर रही है।

 
अभी केवल 6 इंच ही अंदर गया था कि अनीता की साँसें उखड़ने लगीं। उस मोटे और कठोर अंग ने अनीता की योनि की दीवारों को इतनी बुरी तरह खींच दिया था कि वह दर्द और लज़्ज़त के बीच कहीं खो गई।

 
अनीता (चीखते हुए, आँखों में आंसू और माथे पर पसीना): "आह्ह्ह्ह्ह... उफ़्फ़... करीम... नहीं! ई... ई बहुत मोटा है... मैं फट जाऊंगी... रुको... मेरी जान निकल जाएगी! ई अंदर समा ही नहीं रहा... आह!"

 
उसका वह गोरा और सुकुमार बदन इतने हिंसक प्रहार के लिए तैयार नहीं था। वह पीछे हटने की कोशिश करने लगी, लेकिन करीम के हाथ उसकी पतली कमर पर और भी कस गए।

 
करीम (हंसी हंसते हुए): "आह्ह... बेटी, इतनी जल्दी घबरा गयी? अभी तो सिर्फ आधा रास्ता खुला है... असली मज़ा तो अब शुरू होगा। ई जो तुम्हारी योनि का कसाव है ना, ई इस काले लोहे को और भी गर्म कर रहा है।"

 
करीम ने अपनी आँखें मूँद लीं, उसके चेहरे पर एक वहशीपन था। उसने अनीता की कमर को मजबूती से नीचे की ओर दबाया और साथ ही अपनी कमर को नीचे से एक  ज़ोरदार और ऊपर की तरफ का झटका  दिया।

 
एक भयानक 'सपाक' की आवाज़ हुई। अनीता का पूरा शरीर हवा में उछला और उसका वह 10 इंच का काला फौलाद उसकी गहराई के आखिरी छोर तक धँस गया। अनीता की चीख कोठरी के सन्नाटे को चीर गई, लेकिन करीम ने उसे मौका ही नहीं दिया। उस झटके के साथ अनीता के नंगे और सुडौल स्तन करीम के पसीने से तरबतर सीने पर धप से गिरे और वे दोनों एक-दूसरे में पूरी तरह समा गए।

 
अनीता (सिसकते और तड़पते हुए): "नहीं करीम... आह्ह... रुको... मर जाऊंगी मैं... प्लीज... इसे निकाल लो... आह्ह!"

 
करीम : "चुप रहो बेटी! आज तुम मरोगी नहीं, आज तो तुम पहली बार ज़िंदा होगी। देखो कैसे ई काला लुंड तुम्हारी गहराई नाप रहा है!"

 
करीम (अनीता के कान में फुसफुसाते हुए): "अब देखो... अब ई पूरा अंदर है।"

 
अनीता अब पूरी तरह से उस मोटे काले लंड पर फिट हो चुकी थी, उसका शरीर पसीने और कामुक रस से पूरी तरह भीग चुका था।

 
करीम पर अब पूरी तरह से दरिंदगी सवार थी। उसने अनीता की कमर को पकड़कर उसे किसी गुड़िया की तरह हवा में उछालना शुरू कर दिया। हर बार जब अनीता का वजन नीचे आता, करीम का वह १० इंच का विशाल लंड उसकी गहराई के आखिरी कोने को बेरहमी से कुचल देता। अनीता के मुँह से अब सिर्फ 'आह... उफ़... करीम...' की बेकाबू सिसकारियाँ निकल रही थीं।

 
"आराम से लो बेटी... आराम से लेत अपने करीम बाबा का लुंड। यह रज-बाबूजी वाला खिलौना नहीं है, यह मर्द का लंड है।" करीम ने हाँफते हुए उसके कानों में फुसफुसाया। "सह लो इसे... जब यह पूरा 10 इंच अंदर जायेगा, तभी तुम्हारी आत्मा को ठंडक मिलेगी।"

 
अनीता के नंगे और सुडौल स्तन करीम की आँखों के सामने बेतहाशा उछल रहे थे। वह दर्द से कराह रही थी, लेकिन उस दर्द के साथ एक ऐसा करंट उसके शरीर में दौड़ रहा था जिसे उसने आज तक महसूस नहीं किया था।

 
अनीता (सिसकते और हाँफते हुए): "आह्ह्ह... उफ़्फ़... करीम... बस... अब और नहीं... मैं... मैं मर जाऊंगी... आह!"

 
करीम (हवस भरी आँखों से उछलते स्तनों को देखते हुए): "अरे बेटी, अभी तो शुरुआत हुई है... इतनी जल्दी थक गयी? मालकिन की जवानी का ज़ोर बस इतना ही है का?"

 
करीम (उसके निप्पलों को भींचते हुए): "चलो, इन चूचों को खुद पकड़ो और ऊपर-नीचे हो। दिखाओ मुझे कि राज साहब की मेमसाहब में कितनी जान है। आज इस काले नौकर को भी तो पता चले कि बड़े घरों की औरतें बिस्तर पर कैसी आग उगलती हैं!"

 
अनीता की हालत पस्त थी, लेकिन करीम के हाथों का दबाव और उसके १० इंच के लंड की कठोरता उसे रुकने नहीं दे रही थी। उसने करीम के मज़बूत हाथों के ऊपर अपने हाथ रखे और खुद को ऊपर उठाना और फिर से उस भारी लंड पर गिराना शुरू किया। हर बार जब वह नीचे बैठती, करीम का लंड उसकी कोख की दीवारों को बुरी तरह झकझोर देता।

 
करीम (नीचे से एक ज़ोरदार और मोटा झटका मारते हुए): "राज साहब का छोटा सा खिलौना तो बस किनारे सहलाता होगा ना बेटी? पर ई देखो... ई करीम का लंड तुम्हारी जड़ें हिला रहा है। बताओ मालकिन... कौन दमदार है? वो गोरा रईस मालिक या ई काला फटे-हाल नौकर?"

 
अनीता अब पूरी तरह बेसुध हो चुकी थी। दर्द और लज़्ज़त की उस आंधी ने उसे बोलने लायक भी नहीं छोड़ा था, फिर भी राज का नाम सुनकर उसके भीतर एक अजीब सी कसमसाहट हुई।

 
अनीता (सिसकते और हाँफते हुए): "आह्ह... करीम... प्लीज... राज के बारे में... आह! उनके बारे में बात मत करो... उफ़्फ़! मुझे इस हाल में... उनका नाम मत लो... करीम!"

 
करीम ने एक खूँखार और शैतानी हंसी। उसने अनीता की कमर पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर दी और जानबूझकर एक ऐसा मोटा और गहरा झटका मारा कि अनीता की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

करीम (अनीता की बेबसी का लुत्फ उठाते हुए): "क्यों बेटी? काहे राज साहब का नाम सुन के कलेजा मुँह को आ रहा है? क्या हुआ... ई सच्चाई अब चुभ रही है का?"

 
करीम ने अनीता की बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया और अपनी रफ़्तार को और भी जंगली बना दिया।

 
करीम (दाँत पीसते हुए): "चुप रहने से सच नहीं बदलेगा मालकिन! आज तो ई काला लंड ही आपकी जान निकालेगा। राज कभी... उफ़्फ़... ऐसा नहीं कर पाए होंगे। आज तो ई मजूर ही आपकी रूह तक पहुँचेगा... आह्ह्ह!"

 
करीम ने नीचे से एक ऐसा भीषण और गहरा झटका  मारा कि अनीता की रीढ़ की हड्डी में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह मोटा फौलाद उसकी योनि के अंतिम छोर को छू गया था। अनीता की आँखें मदहोशी और लज़्ज़त के मारे ऊपर की ओर खिंच गईं।

 
करीम (हौले से): "हाँ मालकिन... अब कहाँ भागोगी? देखो तो, कइसे आपकी ई चूत हमारे इस लोहे को जकड़ रही है! अब ई जान निकलने वाली है आपकी..."

 
अनीता को महसूस हुआ कि उसके पेट के निचले हिस्से में एक असहनीय और मीठा तनाव पैदा हो रहा है। उसकी योनि की दीवारें करीम के उस मोटे और गर्म अंग को पागलों की तरह भींचने लगीं। वह अब दर्द और शर्म सब भूल चुकी थी।

 
अनीता (बेकाबू होकर चीखते हुए): "आह्ह्ह्ह... करीम! उफ़्फ़... मत रुको... और तेज़! मुझे... मुझे कुछ हो रहा है... आह! करीम... मैं... मैं मर जाऊँगी... आhh!"

 
अनीता का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। उसके पैरों की उंगलियां मुड़ गईं और उसकी योनि से कामुक रस का एक गर्म फव्वारा फूट पड़ा। वह झटके पर झटके खा रही थी, उसका पूरा वजूद उस १० इंच के काले फौलाद के इर्द-गिर्द सिमट गया था। वह बेसुध होकर करीम के कंधे पर गिर पड़ी, उसकी सिसकियाँ अब एक लंबी और थकी हुई कराह में बदल गई थीं।

करीम अभी भी शांत था, उसने अपना रस अंदर नहीं छोड़ा था। उसने बस उस मदहोश और टूटी हुई मालकिन को निहारा, जिसके चेहरे पर उस 'काले नौकर' की दी हुई लज़्ज़त और थकावट साफ झलक रही थी।

 
अनीता अब पूरी तरह पसीने में नहाई हुई, करीम के सीने पर बेजान पड़ी थी।उसके सुडौल स्तन करीम के पसीने से लथपथ बालों वाले सीने पर बुरी तरह दब गए।
 
 
करीम (एक गंदी हंसी हँसते हुए): "बेटी, थक गयी हो? मालकिन की जवानी तो बहुत नाज़ुक निकली। अभी तो ई करीम का आधा कोटा भी पूरा नाहीं हुआ। पर फिकर मत करो... अब तुम आराम करो, अब नौकर अपनी मालकिन की 'सेवा' करेगा।"
 
 
करीम ने बड़े प्यार से अनीता को अपने ऊपर से हटाया और उसे उस तंग चारपाई पर चित्त लिटा दिया। उसने अनीता की दोनों गोरी और लंबी जांघों को पकड़ा और उन्हें मोड़कर अपने मज़बूत कंधों पर रख लिया। इस मुद्रा में अनीता की योनि पूरी तरह करीम के सामने नंगा और लाचार थी।
 
 
करीम (अपने १० इंच के काले लंड को हाथ में लेकर): "मालकिन, अब देखो असली तमाशा। राज साहब तो बस प्यार जताना जानते होंगे, पर ई करीम आज तुम्हारी गहराई में अपना नाम लिख देगा।"
 
 
करीम (लंड के गीले सिरे को द्वार पर टिकाते हुए): "तैयार हो जाओ बेटी... अब ई काला लंड तुम्हारे अंदर पूरा समाने जा रहा है। एक-एक इंच का मज़ा लेना... आह!"
 
 
करीम ने अपनी कमर को एक सधे हुए शिकारी की तरह धीरे-धीरे आगे धकेला। जैसे ही वह मोटा, काला और नसदार हिस्सा अनीता की तंग गहराइयों को चीरता हुआ अंदर सरकने लगा, अनीता का सिर पीछे की ओर लटक गया। कोठरी की दीवारों ने उसकी एक लंबी और थरथराती हुई सिसकी सुनी।

 
अनीता (कांपती आवाज़ में): "आह्ह... करीम... उफ़्फ़... रुको... ई बहुत बड़ा है... आह्ह! मेरा बदन फट जाएगा... करीमम्म!"
 
अनीता की उंगलियां उस खुरदरी चादर को ऐसे भींचने लगीं जैसे वह अपनी जान बचा रही हो। करीम ने रफ़्तार नहीं बढ़ाई; वह चाहता था कि मेमसाहब उसके लंड के हर एक इंच और उसकी हर फौलादी नस को अपनी कोमल दीवारों पर महसूस करें। वह धीरे-धीरे अंदर जाता और फिर लगभग पूरा बाहर निकल आता। हर बार जब वह अंदर धंसता है, अनीता की गोरी जांघें करीम के काले कंधों पर और भी कस जाती हैं।

 
करीम (हाँफते हुए, एक गंदी मुस्कान के साथ): "उफ़... बेटी, इतनी तंग हो तुम... बिल्कुल कांच की गुड़िया जैसी। देखो कैसे मेरा ये काला लंड तुम्हारे इस मखमली बदन को फाड़ रहा है। मालिक ने कभी इतनी गहराई नापी है तुम्हारी? क्या कभी राज साहब वहाँ तक पहुँचे हैं जहाँ आज ई नौकर खड़ा है?"
 
 
अनीता (बेसुध होकर): "न-नहीं... आह्ह... करीम... उफ़्फ़... तुम... तुम बहुत... ओह्ह! राज... राज तो बस... आह्ह!"

 
अनीता की आवाज़ अब सिर्फ सिसकियों और कराहों का एक अंतहीन सिलसिला बन चुकी थी। कोठरी में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की चप-चप और अनीता की बेतहाशा आहें गूँज रही थीं। करीम ने अब अपनी असली 'मज़दूर वाली ताकत' बढ़ा दी। वह अपनी लंबाई के साथ अनीता के अंदर प्रहार करने लगा। अनीता का पूरा शरीर झटके खा रहा था, उसके नंगे स्तन हवा में पागलों की तरह नाच रहे थे।
 
 
करीम (जंगली गर्जना के साथ): "अब आ रहा है बेटी... अब मैं तुम्हें अपने गरम रस से पूरा भर दूंगा! लो... पूरा पी जाओ अपने इस काले नौकर का ये तोहफा!"

 
करीम ने अनीता की कमर को हवा में थोड़ा और ऊपर उठाया और एक आखिरी, सबसे गहरा और जानलेवा झटका दिया। उसका १० इंच का लंड अनीता की कोख की आखिरी दीवार से जा टकराया। करीम का पूरा बदन पत्थर की तरह अकड़ गया और अगले ही पल, अनीता को अपने अंदर एक गरम लावा फूटता हुआ महसूस हुआ। करीम का वीर्य किसी फव्वारे की तरह उसके अंदर भरता चला गया।
 
 
करीम पूरी तरह अनीता के ऊपर ढेर हो गया। करीब एक घंटे बाद, जब शाम की धुंधली रोशनी अंदर आई, तो अनीता की आँखें खुलीं।

 
उसने अपने चारों ओर देखा। वह एक नौकर की कोठरी में, उसके गंदे बिस्तर पर पूरी तरह नंगी लेटी थी। उसके मन में ग्लानि  का एक पहाड़ टूट पड़ा।
 
 
'मैंने यह क्या कर दिया?' उसने सोचा। 'एक नौकर के साथ... मर्यादा की सारी दीवारें गिर गईं। राज को
पता चला तो क्या होगा?'

 
परंतु उसी ग्लानि के नीचे एक अजीब सी संतुष्टि भी छिपी थी। जो प्यास राज कभी नहीं बुझा पाए थे, उसे करीम ने आज अपनी दरिंदगी से शांत कर दिया था। 
 
 
अनीता ने बिस्तर से उठने की कोशिश की, पर जैसे ही उसने पैर फर्श पर रखे, उसकी योनि और जांघों के बीच एक असहनीय और तीखा दर्द उठा। उसे लगा जैसे उसका शरीर अंदर से सूज गया हो।
 
 
अनीता (दर्द से कराहते हुए): "आह्ह... उफ़्फ़... ई क्या हो गया मुझे..."

 
तभी करीम की मज़बूत बाहों ने उसे पीछे से थाम लिया। उसकी आँखों में वही पुरानी कुटिल मुस्कान थी।

 
करीम (खुरदरी आवाज़ में): "बेटी, इतनी जल्दी मत कीजिये। अभी थोड़ा दर्द तो होगा ही। आखिर पहली बार किसी मर्द ने आपकी ज़मीन जोती है। इतने बड़े डंडे की आदत पड़ने में थोड़ा समय लगता है।"
 
 
अनीता ने शर्म के मारे आँखें झुका लीं। वह दर्द से लंगड़ाते हुए, अपनी साड़ी और ब्लाउज समेटकर धीरे-धीरे कोठरी से बाहर निकली। उसे पता था कि आज जो सीमा उसने लांघी है, वहाँ से वापस लौटने का अब कोई रास्ता नहीं है।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 03-03-2026, 12:59 PM



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