03-03-2026, 12:24 PM
नेहा अभी भी खिड़की की तरफ मुड़ी हुई थी—उसकी आँखें बालकनी पर जमी हुईं, लेकिन अब उसकी साँसें मेरे हर स्पर्श के साथ और तेज़ हो रही थीं।
मैं घुटनों पर था—उसकी चूत मेरे मुँह के सामने, जीभ क्लिट पर गोल-गोल, दो उँगलियाँ अंदर-बाहर।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर दब रही थीं—काँपती हुई, गर्म।
उसका रस मेरी जीभ पर बह रहा था—मीठा, गाढ़ा।
तभी... मेरे दिमाग में वो शब्द गूंजे।
सूट 502।
अलोक ने जाते-जाते कहा था—"सूट नंबर 502"।
और अब... विशाल और डेविड की बातें सुनकर... सब साफ़ हो गया।
वो लोग... सैंडी को तैयार कर रहे थे... अलोक के लिए।
और अलोक... सूट 502 में... इंतज़ार कर रहा था।
मेरा लुंड फड़क उठा।
मैंने नेहा की चूत पर जीभ और तेज़ की—क्लिट को चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।
नेहा की आह निकली—"आह्ह... सैम..."
बालकनी से बातें अभी भी आ रही थीं।
विशाल ने हँसते हुए कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।
"यार... वो रिसेप्शन वाली भी मस्त थी।"
डेविड ने पीले दाँत चमकाते हुए हँसा।
"हाँ यार... देखते ही खड़ा हो गया था... लेकिन नखरे करती थी वो... सैंडी की तरह नहीं।
नखरे वाली को तो पालतू कुत्ती बनाने का अलग ही मज़ा है... पता है ना... जो नखरे करती है... उसे कैसे लाइन पर लाते हैं अलोक भाई।"
नेहाहा की साँसें अब और तेज़ हो गईं।
उसका हाथ मेरे बालों में और कस गया—वो मुझे और नीचे खींच रही थी।
उसकी आह ऊँची हो गई—"आह्ह... सैम... हाँ..."
उसकी चूत अब पूरी तरह भिगो चुकी थी—रस मेरी जीभ पर बह रहा था।
वो सुन रही थी—हर शब्द।
"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."
"अलोक भाई का तरीका..."
मैंने जीभ को और तेज़ किया—क्लिट पर चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।
उसकी आह अब और ऊँची—"सैम... हाँ... मैं... मैं आने वाली हूँ..."
उसका रस मेरी उँगलियों और जीभ पर बहा—गर्म, चिपचिपा।
विशाल ने रेलिंग पर हाथ मारकर हँसा—उसकी हँसी अभी भी गूंज रही थी।
"मादरचोद... तब तक अलोक भाई सैंडी को कुत्ती बना रहे होंगे... चल... बिस्तर बदलते हैं।"
डेविड ने भी हँसा
"हाँ... हमारी आदत हो गई है... ऐसे गंदे जगह में रहने की... लेकिन सैंडी... वो मुँह बनाती है... जैसे उसे गंदगी से परेशानी हो।"
विशाल ने फिर जोर से हँसा—उसकी आवाज़ कमरे तक गूंज गई।
"भेनचोद... वो अमीर लोगों से महंगे होटल और कारों में चुदवाती है... और तू उसे गंदे गद्दे पर सिर दबाकर चोदता है।
उसकी वो शक्ल... जब गंदगी महसूस करती है... कमाल की लगती है।"
डेविड ने सिर हिलाया—उसकी मुस्कान अब और गंदी हो गई।
"मुझे यही मज़ा आता है यार... जब मैं ऐसे खेलता हूँ।
गंदा गद्दा... पसीना... कम... पेशाब... सब मिलाकर... और वो रंडी... मुँह बनाती है... लेकिन चुदवाती है।
मज़ा दोगुना हो जाता है।"
नेहा अब पूरी तरह थक चुकी थी।
उसकी चूत मेरी जीभ और उँगलियों पर बार-बार सिकुड़ रही थी—एक के बाद एक ऑर्गेज़्म, गहरा, लंबा, लगातार।
उसका रस मेरे मुँह में बह रहा था—इतना ज़्यादा कि मेरी जीभ और गले तक पहुँच रहा था।
पहली बार... मेरे मुँह में इतना रस आया कि मैं सब नहीं संभाल पाया।
कुछ मेरे होंठों से बहकर मेरी ठोड़ी पर गिर गया—गर्म, चिपचिपा, उसकी खुशबू से भरा।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर ढीली पड़ गईं—वो अब मेरे ऊपर पूरी तरह झुक चुकी थी।
उसकी साँसें धीमी, काँपती हुईं।
बालकनी अब खाली थी।
डेविड और विशाल अंदर चले गए थे—उनकी हँसी, उनकी गंदी बातें अब बंद हो चुकी थीं।
सैंडी भी अलोक के साथ अंदर थी—शायद सूट 502 में।
नेहा का बदन अब ढीला पड़ चुका था।
वो खड़ी नहीं रह पा रही थी।
उसकी टाँगें काँप रही थीं—जैसे इतनी देर खड़े रहने से, और उन सारे ऑर्गेज़्म से कमज़ोर हो गई हों।
मैंने उसे उठाया—कमर से पकड़कर, धीरे से बिस्तर पर ले जाया।
उसे लिटाया।
उसकी आँखें आधी बंद थीं—थकान से, लेकिन अभी भी वो चमक थी।
वो चुप थी।
एक शब्द नहीं बोला।
बस... साँस ले रही थी—धीमी, गहरी।
उसका चेहरा लाल था, होंठ सूजे हुए, बाल मेरे हाथों से बिखरे हुए।
मैं उसके ऊपर था—मेरा लुंड अभी भी हार्ड, फड़कता हुआ, उसके पेट से छू रहा था।
मैं उसे चोदना चाहता था—तेज़, गहरा, अभी।
लेकिन... मेरे दिमाग में वो बातें गूंज रही थीं।
"रिसेप्शन वाली भी मस्त थी..."
"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."
"अलोक भाई जानता है कैसे लाइन पर लाते हैं..."
नेहा ने सुना था।
सब सुना था।
और वो "रिसेप्शन वाली" का मतलब... वो समझ गई होगी।
वो जानती होगी कि वो बातें... उसके लिए भी हो सकती थीं।
अगर अलोक जी चाहें।
अगर वो नखरे करे।
मेरा लुंड हार्ड था—बहुत हार्ड।
लेकिन अब... अब मेरा दिमाग साफ़ नहीं था।
खून नीचे जा रहा था—दिमाग में नहीं।
मुझे लगा... मुझे यहाँ से निकलना चाहिए।
कुछ देर के लिए।
कुछ सोचने के लिए।
कोई बहाना।
कोई झूठ।
मैंने उसके माथे पर किस किया।
फिर धीरे से बोला—आवाज़ में थोड़ी सी हिचकिचाहट।
"बेबी... मैं... थोड़ी देर में आता हूँ।
नीचे... रिसेप्शन पर... चेकआउट का कुछ काम है।
बिल... और कुछ।
तुम... आराम कर लो।
मैं जल्दी आता हूँ।"
नेहा ने मेरी तरफ देखा—आँखें आधी बंद, थकी हुई, लेकिन प्यार भरी।
उसने हल्के से सिर हिलाया।
मैं बाथरूम में गया।
दरवाज़ा बंद किया।
शीशे के सामने खड़ा हुआ।
मेरा चेहरा... पूरी तरह चमक रहा था।
नेहा का रस—गाढ़ा, गर्म, चिपचिपा—मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, होंठों पर फैला हुआ।
मेरी नाक पर भी—उसकी खुशबू अभी भी मेरे नाक में थी।
मैंने पानी खोला—ठंडा, तेज़।
चेहरा धोया—जोर-जोर से, जैसे सब कुछ धुल जाए।
लेकिन वो खुशबू... वो गर्माहट... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।
मैंने शीशे में खुद को देखा।
आँखें लाल, चेहरा गीला, लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दबाव।
मैंने चेहरा पोंछा।
पैंट ठीक की।
दरवाज़ा खोला।
नेहा बिस्तर पर लेटी थी—पूरी तरह नंगी।
उसकी जांघें हल्की सी खुली हुईं, चूत अभी भी गीली
मैं कमरे से निकला।
दरवाज़ा बंद किया।
कॉरिडोर में खड़ा हुआ।
मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि कान में गूंज रहा था।
मेरा लुंड अभी भी हार्ड था—पैंट में दबाव।
मैं चौथी मंज़िल पर था।
सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।
पैर तेज़-तेज़ उठ रहे थे—लगभग भाग रहा था।
पाँचवीं मंज़िल पर पहुँचा।
साँसें फूल रही थीं।
कॉरिडोर में नंबर देखने लगा—501... 502...
मैं 501 के दरवाज़े के सामने पहुँच गया—पैनिक में।
हाथ बेल की तरफ बढ़ा—लेकिन रुक गया।
साँस ली।
खुद को शांत किया।
एक कदम पीछे।
फिर 502 के सामने खड़ा हुआ।
दरवाज़ा—सादा, ब्राउन, नंबर 502 चमकता हुआ।
मैंने बेल दबाई।
रिंग... रिंग...
15 सेकंड।
20 सेकंड।
हर सेकंड इतना लंबा लग रहा था जैसे घंटा बीत रहा हो।
मेरा दिल कान में गूंज रहा था।
मेरा लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दर्द।
मैंने फिर बेल दबाई—जोर से।
रिंग... रिंग...
मैंने दरवाज़ा धीरे से धकेला।
क्लिक की आवाज़ के साथ वो खुल गया—हल्का सा, लेकिन मेरे कानों में गूंज गया।
मेरा हाथ काँप रहा था—दरवाज़े का हैंडल पकड़े हुए।
अंदर एक लंबा गलियारा था—सूट का, लग्ज़री
हवा में खुशबू— सैंडी की।
दूर से आवाज़ें आ रही थीं—एक औरत की आहें, दर्द भरी लेकिन मज़े वाली।
"आआह्ह... आह्ह..."
सैंडी।
और साथ में... एक आदमी की गुर्राहट—जानवर जैसी, गहरी, भारी।
अलोक।
मैं आगे बढ़ा—पैर काँप रहे थे, लेकिन रुक नहीं पा रहा था।
गलियारे के आखिर में बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था।
सैंडी बिस्तर पर पीठ के बल लेटी हुई थी—पूरी तरह नंगी, सिर्फ़ शर्ट कंधों पर लटकी हुई, बटन फटे हुए, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में खींचकर तोड़ दिए हों।
उसके हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे—दोनों कलाइयाँ अलोक ने पकड़ रखी थीं, ऊपर की तरफ दबाकर बिस्तर पर दबा रखी थीं।
उसका चेहरा लाल था—गालों पर प्रीकम की पुरानी बूँदें अब सूखकर चमक रही थीं, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं थी।
भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।
पहले वाली वो शरारती, हँसती हुई सैंडी अब नहीं थी।
अब सिर्फ़ दर्द और एक गहरी, बेबस आहें।
उसकी जांघें बिस्तर के किनारे पर लटक रही थीं—पूरी तरह खुली हुईं, चूत पूरी बाहर, गीली, लाल, सूजी हुई।
अलोक उसके ऊपर था—एक जानवर की तरह।
उसकी शर्ट उतरी हुई, पैंट घुटनों तक नीचे, लुंड—मोटा, काला, पूरी तरह अंदर—हर धक्के पर बाहर तक निकल रहा था, फिर जोर से अंदर धकेल रहा था।
हर धक्का इतना जोरदार कि बिस्तर हिल रहा था, चादर गीली, बिखरी हुई।
अलोक की साँसें गुर्राहट जैसी—कोई मज़ाक नहीं, कोई खेल नहीं।
बस... क्रूर, बेरहम, लगातार।
"ले... ले रंडी... पूरी तरह ले..."
उसकी आवाज़ गहरी, जानवर जैसी।
सैंडी की आहें अब दर्द भरी थीं—"आह्ह... अलोक जी... धीरे... आह्ह..."
लेकिन अलोक रुका नहीं।
उसने उसकी कलाइयाँ और जोर से दबाईं—उसके हाथ बिस्तर में धँस गए।
हर धक्के पर सैंडी का शरीर हिलता—स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, निप्पल्स सख्त, लाल।
उसकी चूत से रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था, गीला पैच और फैल रहा था।
अलोक और सैंडी ने मुझे देखा।
कोई "हैलो" नहीं।
कोई मुस्कान नहीं।
बस... एक ठंडी, लंबी नज़र।
अलोक की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल के लिए।
फिर वापस सैंडी पर।
उसने धक्का नहीं रोका।
उसका लुंड अभी भी अंदर-बाहर हो रहा था—जोरदार, बेरहम, जैसे कल रात का सारा गुस्सा, सारा टेंशन, सारी भूख एक साथ निकाल रहा हो।
हर धक्के पर बिस्तर हिल रहा था।
चादर गीली, बिखरी हुई, पसीने और रस से सनी हुई।
सैंडी की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल।
पहली बार... उसके चेहरे पर वो शरारती, हँसती हुई मुस्कान नहीं थी।
कोई गुदगुदी, कोई खेल नहीं।
उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।
भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।
उसकी आँखों में... एक छोटा सा पछतावा।
जैसे वो सोच रही हो—ये डील... शायद गलती थी।
लेकिन वो रुकी नहीं।
उसकी जांघें अभी भी खुली थीं—अलोक के धक्कों के साथ हिल रही थीं।
उसकी चूत लाल, सूजी हुई, रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था।
वो ले रही थी—बेरहमी से, लेकिन चुपचाप।
मैं साइड में खड़ा था—दरवाज़े के पास, दीवार से सटा हुआ।
मेरा लुंड पैंट में फड़क रहा था—दर्द करने लगा।
मैंने सोचा—अगर मैं आगे बढ़ूँ... अलोक को धक्का देकर हटा दूँ... उसकी जगह ले लूँ...
उसकी चूत की गर्मी... उसकी आहें... सब मेरा हो जाए।
लेकिन मैं रुका।
मैं जानता था—ये उसका "माल" है।
अलोक का।
वो इसे यूज़ कर रहा था—जैसे चाहे।
जितना चाहे।
जितने जोर से चाहे।
और मैं... मैं डेविड और विशाल की तरह हूँ।
बस... बचा हुआ।
लेफ्टओवर।
जब अलोक भाई खत्म कर लेंगे... तब हमारी बारी।
मैं इंतज़ार करता रहा।
मैंने सोचा—शायद अलोक जी मुझे देखकर पुरानी तरह से इशारा करेंगे।
जैसे कल रात... वो मुस्कुराए थे।
"ले लो... मैंने उसे पूरे दिन के लिए रखा है... तुम उसकी चूत ले लो।"
शायद वो मुझे जगह दें।
शायद वो मुझे भी हिस्सा दें।
लेकिन नहीं।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल के लिए।
फिर वापस सैंडी पर।
उसने धक्का नहीं रोका।
वो अपनी जगह दिखा रहा था—कुत्ती को।
कुत्ती को।
मेरा समय कम था।
चेकआउट का टाइम नज़दीक था।
नेहा बिस्तर पर लेटी थी—नंगी, जांघें खुली, चूत गीली, इंतज़ार में।
मैंने उसे जल्दबाज़ी में छोड़ा था।
लेकिन अब... अब मुझे लगा—अगर अलोक जी जगह नहीं दे रहे... तो मुझे कुछ तो लेना चाहिए।
आखिरी मौका था।
सैंडी को छूने का।
उसके बदन को महसूस करने का।
मैं बिस्तर पर चढ़ गया।
सैंडी की आँखें खुलीं—एक पल के लिए।
उसने मुझे देखा।
कोई मुस्कान नहीं।
बस... एक थकी हुई नज़र।
मैंने उसके स्तनों की तरफ हाथ बढ़ाया।
उन्हें छुआ—गोल, भारी, गर्म।
मसलने लगा—धीमे, लेकिन जल्दबाज़ी में।
निप्पल्स सख्त थे—मैंने उन्हें पिंच किया, खींचा।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
दर्द भरी।
मैंने उसके स्तनों को चूमा—एक को मुँह में लिया, चूसा, जीभ घुमाई।
दूसरे को हाथ से मसलता रहा।
फिर नीचे—उसकी गहरी नाभि पर जीभ रखी।
उसकी पेट की मांसपेशियाँ सिकुड़ गईं।
मैंने उँगली उसकी नाभि में डाली—हल्के से खेला।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल।
उसने धक्का नहीं रोका।
बस... जारी रखा।
उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."
सैंडी की आँखें बंद हो गईं।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस... ले रही थी।
मैं जल्दबाज़ी में था।
हर हिस्से पर समय कम था।
मैंने उसके स्तनों पर फिर से चूसा—जोर से।
मैंने सैंडी के बदन के साथ खेलना जारी रखा—जैसे वो कोई गुड़िया हो।
उसके स्तनों को मसलता रहा—नरम, भारी, गर्म।
निप्पल्स को पिंच किया, खींचा, चूसा।
उसकी नाभि में जीभ डाली, गहरी नाभि को चाटा।
उसकी चूत पर उँगली रखी—अलोक के लुंड के साथ, बाहर से रगड़ते हुए।
उसकी क्लिट पर हल्का दबाव।
लेकिन... सैंडी ने कोई जवाब नहीं दिया।
कोई आह नहीं।
कोई हल्की सी सिसकारी नहीं।
कोई मुस्कान नहीं।
उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।
उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए।
उसके बदन में कोई हरकत नहीं—बस... ले रही थी।
जैसे कोई गुड़िया।
जैसे कोई चीज़।
अलोक अभी भी धक्के दे रहा था—जोरदार, बेरहम।
उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."
मैं बिस्तर पर घुटनों पर था।
मैंने अपना पजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया।
मेरा लुंड बाहर आया—हार्ड, फड़कता हुआ।
मैंने सैंडी का सिर पकड़ा—उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए।
उसे अपनी तरफ खींचा—मेरे लुंड की तरफ।
"सैंडी... ले... मुँह में ले..."
लेकिन वो मुड़ी नहीं।
उसने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
उसकी आँखें बंद रहीं।
उसके होंठ बंद।
कोई जवाब नहीं।
मैंने जोर लगाया—उसके सिर को अपनी तरफ खींचा।
उसके होंठ मेरे लुंड से छू गए।
लेकिन वो रुकी नहीं।
उसने चेहरा और दूर किया।
उसकी आँखें खुलीं—एक पल के लिए।
उसकी नज़र में... अब कोई शरारत नहीं थी।
कोई खेल नहीं।
और एक छोटा सा... इनकार।
मैंने समझ लिया।
ये सैंडी... कल रात वाली सैंडी नहीं थी।
कल रात वो हँस रही थी।
खेल रही थी।
मज़े ले रही थी।
आज... वो बदल गई थी।
शायद अलोक जी ने उसे कुछ कहा था।
शायद उसे ब्रिफ किया था।
शायद उसे साफ़ कर दिया था—कौन मालिक है।
कौन फैसला करता है।
कौन कब... और कैसे।
मैंने उसका सिर फिर खींचने की कोशिश की।
लेकिन वो नहीं मानी।
उसने चेहरा और दूर किया।
उसकी आँखें बंद हो गईं।
मैंने हार मान ली।
मैं उसके चेहरे के पास झुका।
उसके होंठों के पास।
मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रखने की कोशिश की।
किस करना चाहता था।
एक छोटा सा... स्पर्श।
मेरे होंठ उसके होंठों से छू गए।
लेकिन वो... स्थिर थी।
कोई जवाब नहीं।
उसके होंठ बंद।
उसकी साँसें तेज़, लेकिन कोई हरकत नहीं।
वो बस... ले रही थी।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल।
उसने मुस्कुराया—वो पुरानी वाली मुस्कान।
फिर धक्का दिया—और गहरा।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
अलोक का बदन पसीने से तर था—उसकी शर्ट पूरी तरह भीगी हुई, चिपकी हुई, सीने पर लगी हुई।
उसकी साँसें तेज़ थीं—जोर-जोर से, जानवर जैसी।
वो रुका—अचानक।
लेकिन अभी भी अंदर था।
उसका लुंड सैंडी की चूत में पूरी तरह दबा हुआ—नहीं हिल रहा था, बस... मौजूद था।
उसकी कलाइयाँ अब छोड़ दी थीं—सैंडी के हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे, काँपते हुए, बेजान।
सैंडी का पूरा बदन थरथरा रहा था।
उसकी जांघें काँप रही थीं—एक हल्का सा, लगातार झटका।
उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म अभी-अभी आया था।
उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, चेहरा लाल, पसीने से तर।
उसकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं—जैसे वो अभी भी उस धक्के के असर में हो।
पहली बार... उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी।
कोई शरारत नहीं।
बस... थकान।
और एक गहरी, बेबस संतुष्टि।
अलोक ने धीरे से खड़े होने की कोशिश की।
वो ऊपर उठा, लेकिन अभी भी अंदर था।
फिर... एक जोरदार थप्पड़।
उसने सैंडी के स्तन पर—बाएँ वाले पर—जोर से थप्पड़ मारा।
एक तेज़, गूंजता हुआ आवाज़।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
उसका स्तन लाल हो गया—हाथ का निशान साफ़।
ये थप्पड़... कोई प्यार नहीं था।
ये... एक रफ़, क्रूर तारीफ थी।
"अच्छा लिया... रंडी... इतना मोटा लुंड... पूरी तरह अंदर लिया।"
अलोक ने धीरे से बाहर निकाला।
उसका लुंड बाहर आया—चमकता हुआ, सैंडी के रस से भीगा हुआ, अभी भी हार्ड।
वो बिस्तर के किनारे पर खड़ा हो गया—साँसें तेज़, बदन पसीने से तर।
मैं उठा—जल्दबाज़ी में।
बिस्तर पर चढ़ गया।
अलोक की जगह ले ली—जैसे कोई जानवर मरे हुए शिकार पर झपटता है, जब शेर खा चुका हो।
मेरा लुंड बाहर
मैंने सैंडी की जांघें थोड़ी और चौड़ी कीं।
उसकी चूत अभी भी खुली थी—अलोक के बड़े, मोटे लुंड से फैली हुई, गर्म, गीली।
मैंने अपना लुंड उसके छेद पर रखा।
एक धक्का—सीधा, गहरा।
मेरा लुंड अंदर चला गया—जैसे चाकू मक्खन में।
उसकी चूत अभी भी कंपकंपा रही थी—अलोक के ऑर्गेज़्म का असर।
छेद अभी भी फैला हुआ था—सिकुड़ नहीं पाया था।
लेकिन... गर्मी।
एक गहरी, गर्म, नरम गर्मी।
मैंने धक्का नहीं दिया।
बस... अंदर रह गया।
महसूस करने लगा—उसकी चूत की गर्मी, उसकी नमी, उसकी सिकुड़न।
सैंडी ने आँखें खोलीं।
उसकी नज़र मेरी तरफ उठी।
उसके चेहरे पर... कोई मुस्कान नहीं थी।
लेकिन... एक छोटी, थकी हुई हँसी।
जैसे वो हँसना चाह रही हो, लेकिन हँस नहीं पा रही हो।
फिर... उसने एक जांघ ऊपर उठाई।
उसका पैर मेरी छाती पर रखा।
उसके पैर की उँगलियाँ—नाजुक, लेकिन मजबूत—मेरी छाती पर दब गईं।
उसने अंगूठे और तर्जनी से मेरी छाती की चमड़ी पकड़ी—जोर से पिंच किया।
"आआह्ह..."
मैंने आह भरी—दर्द से।
सैंडी ने जोर से धक्का दिया।
उसके पैर ने मुझे पीछे धकेला—जोर से, लगभग एक थप्पड़ जैसा।
मेरा लुंड बाहर निकल गया।
मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर।
मेरा लुंड हार्ड, फड़कता हुआ, बाहर लटका हुआ।
मैं घुटनों पर था—उसकी चूत मेरे मुँह के सामने, जीभ क्लिट पर गोल-गोल, दो उँगलियाँ अंदर-बाहर।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर दब रही थीं—काँपती हुई, गर्म।
उसका रस मेरी जीभ पर बह रहा था—मीठा, गाढ़ा।
तभी... मेरे दिमाग में वो शब्द गूंजे।
सूट 502।
अलोक ने जाते-जाते कहा था—"सूट नंबर 502"।
और अब... विशाल और डेविड की बातें सुनकर... सब साफ़ हो गया।
वो लोग... सैंडी को तैयार कर रहे थे... अलोक के लिए।
और अलोक... सूट 502 में... इंतज़ार कर रहा था।
मेरा लुंड फड़क उठा।
मैंने नेहा की चूत पर जीभ और तेज़ की—क्लिट को चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।
नेहा की आह निकली—"आह्ह... सैम..."
बालकनी से बातें अभी भी आ रही थीं।
विशाल ने हँसते हुए कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।
"यार... वो रिसेप्शन वाली भी मस्त थी।"
डेविड ने पीले दाँत चमकाते हुए हँसा।
"हाँ यार... देखते ही खड़ा हो गया था... लेकिन नखरे करती थी वो... सैंडी की तरह नहीं।
नखरे वाली को तो पालतू कुत्ती बनाने का अलग ही मज़ा है... पता है ना... जो नखरे करती है... उसे कैसे लाइन पर लाते हैं अलोक भाई।"
नेहाहा की साँसें अब और तेज़ हो गईं।
उसका हाथ मेरे बालों में और कस गया—वो मुझे और नीचे खींच रही थी।
उसकी आह ऊँची हो गई—"आह्ह... सैम... हाँ..."
उसकी चूत अब पूरी तरह भिगो चुकी थी—रस मेरी जीभ पर बह रहा था।
वो सुन रही थी—हर शब्द।
"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."
"अलोक भाई का तरीका..."
मैंने जीभ को और तेज़ किया—क्लिट पर चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।
उसकी आह अब और ऊँची—"सैम... हाँ... मैं... मैं आने वाली हूँ..."
उसका रस मेरी उँगलियों और जीभ पर बहा—गर्म, चिपचिपा।
विशाल ने रेलिंग पर हाथ मारकर हँसा—उसकी हँसी अभी भी गूंज रही थी।
"मादरचोद... तब तक अलोक भाई सैंडी को कुत्ती बना रहे होंगे... चल... बिस्तर बदलते हैं।"
डेविड ने भी हँसा
"हाँ... हमारी आदत हो गई है... ऐसे गंदे जगह में रहने की... लेकिन सैंडी... वो मुँह बनाती है... जैसे उसे गंदगी से परेशानी हो।"
विशाल ने फिर जोर से हँसा—उसकी आवाज़ कमरे तक गूंज गई।
"भेनचोद... वो अमीर लोगों से महंगे होटल और कारों में चुदवाती है... और तू उसे गंदे गद्दे पर सिर दबाकर चोदता है।
उसकी वो शक्ल... जब गंदगी महसूस करती है... कमाल की लगती है।"
डेविड ने सिर हिलाया—उसकी मुस्कान अब और गंदी हो गई।
"मुझे यही मज़ा आता है यार... जब मैं ऐसे खेलता हूँ।
गंदा गद्दा... पसीना... कम... पेशाब... सब मिलाकर... और वो रंडी... मुँह बनाती है... लेकिन चुदवाती है।
मज़ा दोगुना हो जाता है।"
नेहा अब पूरी तरह थक चुकी थी।
उसकी चूत मेरी जीभ और उँगलियों पर बार-बार सिकुड़ रही थी—एक के बाद एक ऑर्गेज़्म, गहरा, लंबा, लगातार।
उसका रस मेरे मुँह में बह रहा था—इतना ज़्यादा कि मेरी जीभ और गले तक पहुँच रहा था।
पहली बार... मेरे मुँह में इतना रस आया कि मैं सब नहीं संभाल पाया।
कुछ मेरे होंठों से बहकर मेरी ठोड़ी पर गिर गया—गर्म, चिपचिपा, उसकी खुशबू से भरा।
उसकी जांघें मेरे कंधों पर ढीली पड़ गईं—वो अब मेरे ऊपर पूरी तरह झुक चुकी थी।
उसकी साँसें धीमी, काँपती हुईं।
बालकनी अब खाली थी।
डेविड और विशाल अंदर चले गए थे—उनकी हँसी, उनकी गंदी बातें अब बंद हो चुकी थीं।
सैंडी भी अलोक के साथ अंदर थी—शायद सूट 502 में।
नेहा का बदन अब ढीला पड़ चुका था।
वो खड़ी नहीं रह पा रही थी।
उसकी टाँगें काँप रही थीं—जैसे इतनी देर खड़े रहने से, और उन सारे ऑर्गेज़्म से कमज़ोर हो गई हों।
मैंने उसे उठाया—कमर से पकड़कर, धीरे से बिस्तर पर ले जाया।
उसे लिटाया।
उसकी आँखें आधी बंद थीं—थकान से, लेकिन अभी भी वो चमक थी।
वो चुप थी।
एक शब्द नहीं बोला।
बस... साँस ले रही थी—धीमी, गहरी।
उसका चेहरा लाल था, होंठ सूजे हुए, बाल मेरे हाथों से बिखरे हुए।
मैं उसके ऊपर था—मेरा लुंड अभी भी हार्ड, फड़कता हुआ, उसके पेट से छू रहा था।
मैं उसे चोदना चाहता था—तेज़, गहरा, अभी।
लेकिन... मेरे दिमाग में वो बातें गूंज रही थीं।
"रिसेप्शन वाली भी मस्त थी..."
"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."
"अलोक भाई जानता है कैसे लाइन पर लाते हैं..."
नेहा ने सुना था।
सब सुना था।
और वो "रिसेप्शन वाली" का मतलब... वो समझ गई होगी।
वो जानती होगी कि वो बातें... उसके लिए भी हो सकती थीं।
अगर अलोक जी चाहें।
अगर वो नखरे करे।
मेरा लुंड हार्ड था—बहुत हार्ड।
लेकिन अब... अब मेरा दिमाग साफ़ नहीं था।
खून नीचे जा रहा था—दिमाग में नहीं।
मुझे लगा... मुझे यहाँ से निकलना चाहिए।
कुछ देर के लिए।
कुछ सोचने के लिए।
कोई बहाना।
कोई झूठ।
मैंने उसके माथे पर किस किया।
फिर धीरे से बोला—आवाज़ में थोड़ी सी हिचकिचाहट।
"बेबी... मैं... थोड़ी देर में आता हूँ।
नीचे... रिसेप्शन पर... चेकआउट का कुछ काम है।
बिल... और कुछ।
तुम... आराम कर लो।
मैं जल्दी आता हूँ।"
नेहा ने मेरी तरफ देखा—आँखें आधी बंद, थकी हुई, लेकिन प्यार भरी।
उसने हल्के से सिर हिलाया।
मैं बाथरूम में गया।
दरवाज़ा बंद किया।
शीशे के सामने खड़ा हुआ।
मेरा चेहरा... पूरी तरह चमक रहा था।
नेहा का रस—गाढ़ा, गर्म, चिपचिपा—मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, होंठों पर फैला हुआ।
मेरी नाक पर भी—उसकी खुशबू अभी भी मेरे नाक में थी।
मैंने पानी खोला—ठंडा, तेज़।
चेहरा धोया—जोर-जोर से, जैसे सब कुछ धुल जाए।
लेकिन वो खुशबू... वो गर्माहट... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।
मैंने शीशे में खुद को देखा।
आँखें लाल, चेहरा गीला, लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दबाव।
मैंने चेहरा पोंछा।
पैंट ठीक की।
दरवाज़ा खोला।
नेहा बिस्तर पर लेटी थी—पूरी तरह नंगी।
उसकी जांघें हल्की सी खुली हुईं, चूत अभी भी गीली
मैं कमरे से निकला।
दरवाज़ा बंद किया।
कॉरिडोर में खड़ा हुआ।
मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि कान में गूंज रहा था।
मेरा लुंड अभी भी हार्ड था—पैंट में दबाव।
मैं चौथी मंज़िल पर था।
सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।
पैर तेज़-तेज़ उठ रहे थे—लगभग भाग रहा था।
पाँचवीं मंज़िल पर पहुँचा।
साँसें फूल रही थीं।
कॉरिडोर में नंबर देखने लगा—501... 502...
मैं 501 के दरवाज़े के सामने पहुँच गया—पैनिक में।
हाथ बेल की तरफ बढ़ा—लेकिन रुक गया।
साँस ली।
खुद को शांत किया।
एक कदम पीछे।
फिर 502 के सामने खड़ा हुआ।
दरवाज़ा—सादा, ब्राउन, नंबर 502 चमकता हुआ।
मैंने बेल दबाई।
रिंग... रिंग...
15 सेकंड।
20 सेकंड।
हर सेकंड इतना लंबा लग रहा था जैसे घंटा बीत रहा हो।
मेरा दिल कान में गूंज रहा था।
मेरा लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दर्द।
मैंने फिर बेल दबाई—जोर से।
रिंग... रिंग...
मैंने दरवाज़ा धीरे से धकेला।
क्लिक की आवाज़ के साथ वो खुल गया—हल्का सा, लेकिन मेरे कानों में गूंज गया।
मेरा हाथ काँप रहा था—दरवाज़े का हैंडल पकड़े हुए।
अंदर एक लंबा गलियारा था—सूट का, लग्ज़री
हवा में खुशबू— सैंडी की।
दूर से आवाज़ें आ रही थीं—एक औरत की आहें, दर्द भरी लेकिन मज़े वाली।
"आआह्ह... आह्ह..."
सैंडी।
और साथ में... एक आदमी की गुर्राहट—जानवर जैसी, गहरी, भारी।
अलोक।
मैं आगे बढ़ा—पैर काँप रहे थे, लेकिन रुक नहीं पा रहा था।
गलियारे के आखिर में बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था।
सैंडी बिस्तर पर पीठ के बल लेटी हुई थी—पूरी तरह नंगी, सिर्फ़ शर्ट कंधों पर लटकी हुई, बटन फटे हुए, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में खींचकर तोड़ दिए हों।
उसके हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे—दोनों कलाइयाँ अलोक ने पकड़ रखी थीं, ऊपर की तरफ दबाकर बिस्तर पर दबा रखी थीं।
उसका चेहरा लाल था—गालों पर प्रीकम की पुरानी बूँदें अब सूखकर चमक रही थीं, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं थी।
भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।
पहले वाली वो शरारती, हँसती हुई सैंडी अब नहीं थी।
अब सिर्फ़ दर्द और एक गहरी, बेबस आहें।
उसकी जांघें बिस्तर के किनारे पर लटक रही थीं—पूरी तरह खुली हुईं, चूत पूरी बाहर, गीली, लाल, सूजी हुई।
अलोक उसके ऊपर था—एक जानवर की तरह।
उसकी शर्ट उतरी हुई, पैंट घुटनों तक नीचे, लुंड—मोटा, काला, पूरी तरह अंदर—हर धक्के पर बाहर तक निकल रहा था, फिर जोर से अंदर धकेल रहा था।
हर धक्का इतना जोरदार कि बिस्तर हिल रहा था, चादर गीली, बिखरी हुई।
अलोक की साँसें गुर्राहट जैसी—कोई मज़ाक नहीं, कोई खेल नहीं।
बस... क्रूर, बेरहम, लगातार।
"ले... ले रंडी... पूरी तरह ले..."
उसकी आवाज़ गहरी, जानवर जैसी।
सैंडी की आहें अब दर्द भरी थीं—"आह्ह... अलोक जी... धीरे... आह्ह..."
लेकिन अलोक रुका नहीं।
उसने उसकी कलाइयाँ और जोर से दबाईं—उसके हाथ बिस्तर में धँस गए।
हर धक्के पर सैंडी का शरीर हिलता—स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, निप्पल्स सख्त, लाल।
उसकी चूत से रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था, गीला पैच और फैल रहा था।
अलोक और सैंडी ने मुझे देखा।
कोई "हैलो" नहीं।
कोई मुस्कान नहीं।
बस... एक ठंडी, लंबी नज़र।
अलोक की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल के लिए।
फिर वापस सैंडी पर।
उसने धक्का नहीं रोका।
उसका लुंड अभी भी अंदर-बाहर हो रहा था—जोरदार, बेरहम, जैसे कल रात का सारा गुस्सा, सारा टेंशन, सारी भूख एक साथ निकाल रहा हो।
हर धक्के पर बिस्तर हिल रहा था।
चादर गीली, बिखरी हुई, पसीने और रस से सनी हुई।
सैंडी की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल।
पहली बार... उसके चेहरे पर वो शरारती, हँसती हुई मुस्कान नहीं थी।
कोई गुदगुदी, कोई खेल नहीं।
उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।
भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।
उसकी आँखों में... एक छोटा सा पछतावा।
जैसे वो सोच रही हो—ये डील... शायद गलती थी।
लेकिन वो रुकी नहीं।
उसकी जांघें अभी भी खुली थीं—अलोक के धक्कों के साथ हिल रही थीं।
उसकी चूत लाल, सूजी हुई, रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था।
वो ले रही थी—बेरहमी से, लेकिन चुपचाप।
मैं साइड में खड़ा था—दरवाज़े के पास, दीवार से सटा हुआ।
मेरा लुंड पैंट में फड़क रहा था—दर्द करने लगा।
मैंने सोचा—अगर मैं आगे बढ़ूँ... अलोक को धक्का देकर हटा दूँ... उसकी जगह ले लूँ...
उसकी चूत की गर्मी... उसकी आहें... सब मेरा हो जाए।
लेकिन मैं रुका।
मैं जानता था—ये उसका "माल" है।
अलोक का।
वो इसे यूज़ कर रहा था—जैसे चाहे।
जितना चाहे।
जितने जोर से चाहे।
और मैं... मैं डेविड और विशाल की तरह हूँ।
बस... बचा हुआ।
लेफ्टओवर।
जब अलोक भाई खत्म कर लेंगे... तब हमारी बारी।
मैं इंतज़ार करता रहा।
मैंने सोचा—शायद अलोक जी मुझे देखकर पुरानी तरह से इशारा करेंगे।
जैसे कल रात... वो मुस्कुराए थे।
"ले लो... मैंने उसे पूरे दिन के लिए रखा है... तुम उसकी चूत ले लो।"
शायद वो मुझे जगह दें।
शायद वो मुझे भी हिस्सा दें।
लेकिन नहीं।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल के लिए।
फिर वापस सैंडी पर।
उसने धक्का नहीं रोका।
वो अपनी जगह दिखा रहा था—कुत्ती को।
कुत्ती को।
मेरा समय कम था।
चेकआउट का टाइम नज़दीक था।
नेहा बिस्तर पर लेटी थी—नंगी, जांघें खुली, चूत गीली, इंतज़ार में।
मैंने उसे जल्दबाज़ी में छोड़ा था।
लेकिन अब... अब मुझे लगा—अगर अलोक जी जगह नहीं दे रहे... तो मुझे कुछ तो लेना चाहिए।
आखिरी मौका था।
सैंडी को छूने का।
उसके बदन को महसूस करने का।
मैं बिस्तर पर चढ़ गया।
सैंडी की आँखें खुलीं—एक पल के लिए।
उसने मुझे देखा।
कोई मुस्कान नहीं।
बस... एक थकी हुई नज़र।
मैंने उसके स्तनों की तरफ हाथ बढ़ाया।
उन्हें छुआ—गोल, भारी, गर्म।
मसलने लगा—धीमे, लेकिन जल्दबाज़ी में।
निप्पल्स सख्त थे—मैंने उन्हें पिंच किया, खींचा।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
दर्द भरी।
मैंने उसके स्तनों को चूमा—एक को मुँह में लिया, चूसा, जीभ घुमाई।
दूसरे को हाथ से मसलता रहा।
फिर नीचे—उसकी गहरी नाभि पर जीभ रखी।
उसकी पेट की मांसपेशियाँ सिकुड़ गईं।
मैंने उँगली उसकी नाभि में डाली—हल्के से खेला।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल।
उसने धक्का नहीं रोका।
बस... जारी रखा।
उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."
सैंडी की आँखें बंद हो गईं।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस... ले रही थी।
मैं जल्दबाज़ी में था।
हर हिस्से पर समय कम था।
मैंने उसके स्तनों पर फिर से चूसा—जोर से।
मैंने सैंडी के बदन के साथ खेलना जारी रखा—जैसे वो कोई गुड़िया हो।
उसके स्तनों को मसलता रहा—नरम, भारी, गर्म।
निप्पल्स को पिंच किया, खींचा, चूसा।
उसकी नाभि में जीभ डाली, गहरी नाभि को चाटा।
उसकी चूत पर उँगली रखी—अलोक के लुंड के साथ, बाहर से रगड़ते हुए।
उसकी क्लिट पर हल्का दबाव।
लेकिन... सैंडी ने कोई जवाब नहीं दिया।
कोई आह नहीं।
कोई हल्की सी सिसकारी नहीं।
कोई मुस्कान नहीं।
उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।
उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए।
उसके बदन में कोई हरकत नहीं—बस... ले रही थी।
जैसे कोई गुड़िया।
जैसे कोई चीज़।
अलोक अभी भी धक्के दे रहा था—जोरदार, बेरहम।
उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."
मैं बिस्तर पर घुटनों पर था।
मैंने अपना पजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया।
मेरा लुंड बाहर आया—हार्ड, फड़कता हुआ।
मैंने सैंडी का सिर पकड़ा—उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए।
उसे अपनी तरफ खींचा—मेरे लुंड की तरफ।
"सैंडी... ले... मुँह में ले..."
लेकिन वो मुड़ी नहीं।
उसने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
उसकी आँखें बंद रहीं।
उसके होंठ बंद।
कोई जवाब नहीं।
मैंने जोर लगाया—उसके सिर को अपनी तरफ खींचा।
उसके होंठ मेरे लुंड से छू गए।
लेकिन वो रुकी नहीं।
उसने चेहरा और दूर किया।
उसकी आँखें खुलीं—एक पल के लिए।
उसकी नज़र में... अब कोई शरारत नहीं थी।
कोई खेल नहीं।
और एक छोटा सा... इनकार।
मैंने समझ लिया।
ये सैंडी... कल रात वाली सैंडी नहीं थी।
कल रात वो हँस रही थी।
खेल रही थी।
मज़े ले रही थी।
आज... वो बदल गई थी।
शायद अलोक जी ने उसे कुछ कहा था।
शायद उसे ब्रिफ किया था।
शायद उसे साफ़ कर दिया था—कौन मालिक है।
कौन फैसला करता है।
कौन कब... और कैसे।
मैंने उसका सिर फिर खींचने की कोशिश की।
लेकिन वो नहीं मानी।
उसने चेहरा और दूर किया।
उसकी आँखें बंद हो गईं।
मैंने हार मान ली।
मैं उसके चेहरे के पास झुका।
उसके होंठों के पास।
मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रखने की कोशिश की।
किस करना चाहता था।
एक छोटा सा... स्पर्श।
मेरे होंठ उसके होंठों से छू गए।
लेकिन वो... स्थिर थी।
कोई जवाब नहीं।
उसके होंठ बंद।
उसकी साँसें तेज़, लेकिन कोई हरकत नहीं।
वो बस... ले रही थी।
अलोक ने मुझे देखा—एक पल।
उसने मुस्कुराया—वो पुरानी वाली मुस्कान।
फिर धक्का दिया—और गहरा।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
अलोक का बदन पसीने से तर था—उसकी शर्ट पूरी तरह भीगी हुई, चिपकी हुई, सीने पर लगी हुई।
उसकी साँसें तेज़ थीं—जोर-जोर से, जानवर जैसी।
वो रुका—अचानक।
लेकिन अभी भी अंदर था।
उसका लुंड सैंडी की चूत में पूरी तरह दबा हुआ—नहीं हिल रहा था, बस... मौजूद था।
उसकी कलाइयाँ अब छोड़ दी थीं—सैंडी के हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे, काँपते हुए, बेजान।
सैंडी का पूरा बदन थरथरा रहा था।
उसकी जांघें काँप रही थीं—एक हल्का सा, लगातार झटका।
उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म अभी-अभी आया था।
उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, चेहरा लाल, पसीने से तर।
उसकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं—जैसे वो अभी भी उस धक्के के असर में हो।
पहली बार... उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी।
कोई शरारत नहीं।
बस... थकान।
और एक गहरी, बेबस संतुष्टि।
अलोक ने धीरे से खड़े होने की कोशिश की।
वो ऊपर उठा, लेकिन अभी भी अंदर था।
फिर... एक जोरदार थप्पड़।
उसने सैंडी के स्तन पर—बाएँ वाले पर—जोर से थप्पड़ मारा।
एक तेज़, गूंजता हुआ आवाज़।
सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."
उसका स्तन लाल हो गया—हाथ का निशान साफ़।
ये थप्पड़... कोई प्यार नहीं था।
ये... एक रफ़, क्रूर तारीफ थी।
"अच्छा लिया... रंडी... इतना मोटा लुंड... पूरी तरह अंदर लिया।"
अलोक ने धीरे से बाहर निकाला।
उसका लुंड बाहर आया—चमकता हुआ, सैंडी के रस से भीगा हुआ, अभी भी हार्ड।
वो बिस्तर के किनारे पर खड़ा हो गया—साँसें तेज़, बदन पसीने से तर।
मैं उठा—जल्दबाज़ी में।
बिस्तर पर चढ़ गया।
अलोक की जगह ले ली—जैसे कोई जानवर मरे हुए शिकार पर झपटता है, जब शेर खा चुका हो।
मेरा लुंड बाहर
मैंने सैंडी की जांघें थोड़ी और चौड़ी कीं।
उसकी चूत अभी भी खुली थी—अलोक के बड़े, मोटे लुंड से फैली हुई, गर्म, गीली।
मैंने अपना लुंड उसके छेद पर रखा।
एक धक्का—सीधा, गहरा।
मेरा लुंड अंदर चला गया—जैसे चाकू मक्खन में।
उसकी चूत अभी भी कंपकंपा रही थी—अलोक के ऑर्गेज़्म का असर।
छेद अभी भी फैला हुआ था—सिकुड़ नहीं पाया था।
लेकिन... गर्मी।
एक गहरी, गर्म, नरम गर्मी।
मैंने धक्का नहीं दिया।
बस... अंदर रह गया।
महसूस करने लगा—उसकी चूत की गर्मी, उसकी नमी, उसकी सिकुड़न।
सैंडी ने आँखें खोलीं।
उसकी नज़र मेरी तरफ उठी।
उसके चेहरे पर... कोई मुस्कान नहीं थी।
लेकिन... एक छोटी, थकी हुई हँसी।
जैसे वो हँसना चाह रही हो, लेकिन हँस नहीं पा रही हो।
फिर... उसने एक जांघ ऊपर उठाई।
उसका पैर मेरी छाती पर रखा।
उसके पैर की उँगलियाँ—नाजुक, लेकिन मजबूत—मेरी छाती पर दब गईं।
उसने अंगूठे और तर्जनी से मेरी छाती की चमड़ी पकड़ी—जोर से पिंच किया।
"आआह्ह..."
मैंने आह भरी—दर्द से।
सैंडी ने जोर से धक्का दिया।
उसके पैर ने मुझे पीछे धकेला—जोर से, लगभग एक थप्पड़ जैसा।
मेरा लुंड बाहर निकल गया।
मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर।
मेरा लुंड हार्ड, फड़कता हुआ, बाहर लटका हुआ।


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