Yesterday, 01:10 PM
मेनका ने लाल रंग की स्लीव्लेस नाइटी पहनी थी जिसमे स्ट्रॅप्स की जगह कंधों पे 2 पतले स्ट्रिंग्स थे। नाइटी का गला भी गहरा था जिसमे उसका क्लीवेज इस मध्यम रोशनी मे भी चमक रहा था, बाई टाँग पर एक स्लिट था जो की उसके घुटने के उपर जाँघ तक चला गया था और जब वो सीढ़ियाँ उतर रही थी तो उसमे से उसकी गोरी टाँग और जाँघ का हिस्सा झलक रहा था। उसके लंबे बाल खुले थे और कमर पर लहरा रहा थे।
राजासाहब की नज़रों की गर्मी ने मेनका के दिल मे हलचल मचा दी और उसके चेहरे पर हया की लाली च्छा गयी पर उसे ये भी अच्छा लग रहा था कि उसके प्रेमी को उसका ये रूप बहुत भा रहा था। राजासाहब आगे बढ़े और मेनका को अपनी बाहों मे भर लिया और अपने तपते होठों से उसे चूमने लगे, मेनका ने भी अपनी बाहें उनके गले मे दल दी और किस का जवाब देने लगी। दोनो थोड़ी देर तक ऐसे ही एक दूसरे से चिपके अपने होठों और जीभ से खेलते रहे। मैत्री की पेशकश
फिर राजासाहब ने चूमना छोड़ उसे अपनी गोद मे उठा लिया, मेनका ने अपनी बाहें उनके गले मे डाल दी और फिर से उन्हे चूमने लगी। राजासाहब वैसे ही चूमते हुए उसे उठा कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। उपर पहुँच कर वो अपने कमरे की तरफ मुड़े तो मेनका ने चूमना छोड़ शरमाते हुए कहा,
"मेरे कमरे मे चलिए ना।"
"अरे,कमरा क्या पूरा का पूरा महल आपका है। फिर क्या आपका क्या मेरा। आज अपने इस कमरे, जिसे नाचीज़ अपना कहता है, चल कर इसे भी स्वर्ग बना दीजिए।" और दोनो हंस पड़े।
राजासाहब उसे अपने कमरे मे ले आए और अपने बिस्तर पर लिटा दिया और उसके उपर झुक कर उसे चूमने लगे। मेनका के हाथ उनके सर के बालों से खेलने लगे। राजासाहब ने उसके होठों को छोड़ एक बार पूरे चेहरे को चूमा और फिर नीचे उसकी गर्दन पर पहुँच गये। मेनका ने अपने हाथ उनके कुर्ते के अंदर घुसा दिए और उनकी पीठ सहलाने लगी।
राजासाहब थोड़ा उपर हुए और अपना कुर्ता उतार फेंका और फिर से अपनी बहू की गर्दन पर झुक गये। अपने हाथों से उन्होने उसके कंधों से दोनो स्ट्रिंग्स नीचे सरका दी और उसके नंगे कंधों को चूमने लगे, मेनका की चूत गीली होने लगी थी और उसने अपनी जांघे बेचैनी से रगड़ना शुरू कर दिया। उसके नाख़ून अभी भी अपने ससुर की पीठ पर फिर रहे थे। राजासाहब मेनका के क्लीवेज पर आ गये और दीवानो की तरह चूमने लगे। उनसे बर्दाश्त करने मुश्किल हो रहा था, वो जल्द से जल्द अपनी बहू के नंगे जिस्म का दीदार करना चाहते थे।
अपने हाथ पीछे ले जाकर उन्होने उसकी नाइटी का ज़िप खोल दिया, फिर उठे और एक झटके मे उसे उसके शरीर से अलग कर दिया। नीचे मेनका ने कुछ नही पहना था। राजासाहब उसके उपर झुक गये तो मेनका ने शर्म से आँखें बंद कर ली और सर एक तरफ घुमा लिया।
"मेनका।" राजासाहब ने अपने हाथ से उसकी ठुड्डी पकड़ चेहरे को सीधा किया। मेनका ने अधखुली आँखों से उन्हे देखा।
"अपने होठों से हमारा नाम लो ना।" सुनकर मेनका और शर्मा गयी और फिर से मुस्कुराते हुए अपने चेहरे को अपने हाथों से छुपा लिया।
"प्लीज़,मेनका। बस एक बार। हमारा नाम लो। प्लीज़।" मैत्री लिखित
राजासाहब की नज़रों की गर्मी ने मेनका के दिल मे हलचल मचा दी और उसके चेहरे पर हया की लाली च्छा गयी पर उसे ये भी अच्छा लग रहा था कि उसके प्रेमी को उसका ये रूप बहुत भा रहा था। राजासाहब आगे बढ़े और मेनका को अपनी बाहों मे भर लिया और अपने तपते होठों से उसे चूमने लगे, मेनका ने भी अपनी बाहें उनके गले मे दल दी और किस का जवाब देने लगी। दोनो थोड़ी देर तक ऐसे ही एक दूसरे से चिपके अपने होठों और जीभ से खेलते रहे। मैत्री की पेशकश
फिर राजासाहब ने चूमना छोड़ उसे अपनी गोद मे उठा लिया, मेनका ने अपनी बाहें उनके गले मे डाल दी और फिर से उन्हे चूमने लगी। राजासाहब वैसे ही चूमते हुए उसे उठा कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। उपर पहुँच कर वो अपने कमरे की तरफ मुड़े तो मेनका ने चूमना छोड़ शरमाते हुए कहा,
"मेरे कमरे मे चलिए ना।"
"अरे,कमरा क्या पूरा का पूरा महल आपका है। फिर क्या आपका क्या मेरा। आज अपने इस कमरे, जिसे नाचीज़ अपना कहता है, चल कर इसे भी स्वर्ग बना दीजिए।" और दोनो हंस पड़े।
राजासाहब उसे अपने कमरे मे ले आए और अपने बिस्तर पर लिटा दिया और उसके उपर झुक कर उसे चूमने लगे। मेनका के हाथ उनके सर के बालों से खेलने लगे। राजासाहब ने उसके होठों को छोड़ एक बार पूरे चेहरे को चूमा और फिर नीचे उसकी गर्दन पर पहुँच गये। मेनका ने अपने हाथ उनके कुर्ते के अंदर घुसा दिए और उनकी पीठ सहलाने लगी।
राजासाहब थोड़ा उपर हुए और अपना कुर्ता उतार फेंका और फिर से अपनी बहू की गर्दन पर झुक गये। अपने हाथों से उन्होने उसके कंधों से दोनो स्ट्रिंग्स नीचे सरका दी और उसके नंगे कंधों को चूमने लगे, मेनका की चूत गीली होने लगी थी और उसने अपनी जांघे बेचैनी से रगड़ना शुरू कर दिया। उसके नाख़ून अभी भी अपने ससुर की पीठ पर फिर रहे थे। राजासाहब मेनका के क्लीवेज पर आ गये और दीवानो की तरह चूमने लगे। उनसे बर्दाश्त करने मुश्किल हो रहा था, वो जल्द से जल्द अपनी बहू के नंगे जिस्म का दीदार करना चाहते थे।
अपने हाथ पीछे ले जाकर उन्होने उसकी नाइटी का ज़िप खोल दिया, फिर उठे और एक झटके मे उसे उसके शरीर से अलग कर दिया। नीचे मेनका ने कुछ नही पहना था। राजासाहब उसके उपर झुक गये तो मेनका ने शर्म से आँखें बंद कर ली और सर एक तरफ घुमा लिया।
"मेनका।" राजासाहब ने अपने हाथ से उसकी ठुड्डी पकड़ चेहरे को सीधा किया। मेनका ने अधखुली आँखों से उन्हे देखा।
"अपने होठों से हमारा नाम लो ना।" सुनकर मेनका और शर्मा गयी और फिर से मुस्कुराते हुए अपने चेहरे को अपने हाथों से छुपा लिया।
"प्लीज़,मेनका। बस एक बार। हमारा नाम लो। प्लीज़।" मैत्री लिखित


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