27-02-2026, 07:14 PM
Ep1 स्लीपर का सफर माम और अजनबी-
बात आज से कुछ साल पहले की है जब मै 19 साल का था । मेरी मम्मी संगीता अग्रवाल जो एक हाउसवाइफ है। देखने मे भर पूरा शरीर, मोटे मोटे उरेज जिनको छुपाने मे साडी का पल्लू भी कभी कभी असमर्थ हो जाता है। मोटे, बाहर की तरफ उभरे हुए नितंब । एक अच्छा फीगर जिस पर कोई भी महिला घमंड कर सके। पिता राजेश अग्रवाल जो एक कारोबारी है। सबका ध्यान रखने वाले। पर कभी ये महसूस ही नही हुआ कि मा को पापा के सिवा किसी और ने छुआ भी होगा। और इतने संभाले हुए शरीर का अच्छे से रस भी किसी ने नही निचोडा होगा। तो कैसे एक अजनबी इस शरीर को निचोड ले जाता है जानते है।
मम्मी की उम्र 44 साल थी। मेरे मामा जी को डायबटीज है और मम्मी को उनकी बोहत फीक्र रहती है तो अगर कही से भी किसी दवाई का पता चलता है तो मम्मी मामा के लिए उसको लेने चल पडती है। मम्मी का ध्यान बडे अच्छे से रखा है पापा ने कभी उनको अकेले नही जाना पडा कही, उनकी सेफ्टी के लिए पापा हमेशा साथ गए। पर अब मै बडा हो गया हू तो अब ये मेरी जिम्मेवारी है। मम्मी को पता चला कि उदयपुर मे एक वैद्य जी है जो डायबटीज को जड से मिटाने की दवाई देते है तो मा ने पापा को कहा और पापा ने मेरी ड्यूटी लगा दी। लेकिन समस्या ये थी कि उदयपुर हमारे करनाल ( हरियाणा) से बोहत दूर था और दूर के सफर मे हम स्लीपर से जाना पसंद करते है। पापा ने स्लीपर बस ढूढनी शुरू की पर कोई बस सीधा उदयपुर नही जाती थी। एक बस जो चण्डीगढ से उदयपुर जा रही थी वो हमे मिल गई लेकिन उसमे एक सूलीपर और एक नोर्मल सीट ही मिल रही थी। मम्मी ने हा बोल दिया और कहा कि हम बारी बारी स्लीपर मे सो जाएगे। हम शुक्रवार शाम 6 बजे हम बस मे चढे। बस भरी हुई थी पर हमारी सीट बुक थी तो हमे एक सीट बैठने को मिल गई और कण्डक्टर ने मुझे स्लीपर वाला कैबिन भी दिखा दिया जहा हमारी दूसरी सीट थी। पर वो स्लीपर डबल वाला था मतलब उसमे कोई और भी था। मै खडा हो गया और मम्मी बैठ गई क्योकि मुझे अभी सोना नही था। मम्मी खिडकी के पास वाली सीट पर बैठ गई उनके पास एक आदमी बैठा हुआ था। सब ठीक लग रहा था पर थोडी देर मे बाहर से दूसरी गाडियो की रोशनी मे मम्मी के चेहरे पर नजर पडी तो वो मुझे अनकंफर्टेबल सी लगी। उन्होने काले रंग की उन की पजामी और काला ही टाप पहना था जिसमे उनके चुच्चे बोहत बडे लग रहे थे और चुतड भी अच्छे से दिखाई दे रहे थे। मम्मी बडे अजीब से तरीके से बैठी हुई थी वो उस आदमी की तरफ झुकी हुई थी। मैने देखा मम्मी की शाल के नीचे से वो मम्मी के चुच्चे मसल रहा था। मेरे तन बदन मे करंट सा दौड गया। समझ नही आया ये क्या हो रहा है। जिस मम्मी की तरफ किसी को आंख उठाते नही देखा उन्हे कोई ऐसे रगड रहा था। उसने शाल को अपने घुटनो तक सरका लिया और मम्मी की बेचैनी बढने लगी। शायद अब उसका हाथ औरत के उस नाजूक अंग पर था जिसको पाने के लिए इस धरती का हर मर्द पागल है। पर मेरे भाव भी बदल रहे थे और गुस्से के साथ मेरी पेंट मे भी हलचल हो रही थी। पर मैने खुद को संभालकर मम्मी को आवाज दी, मम्मी... मम्मी चलो आप स्लीपर मे लेट जाओ। मम्मी तो जैसे कुछ सुन ही न पा रही हो। काफी बुलाने पर उनका ध्यान टूटा और वो चौक कर उठी। उठते वक्त उनकी शाल हटी तो उनका एक चुच्चा पुरा उस आदमी के हाथ मे था। मम्मी ने थोडा जोर लगाके अलग होने की कोशिश की पर वो आदमी भी साथ ही खडा हो गया और सीट से बाहर निकलते वक्त उसने मम्मी के मोटे चुतडो पर अपना ल ण ड घुमाया। ये उसका आखिरी प्रयास था क्योखि उसी मेहनत पर मैने पानी फेर दिया था।उसने मम्मी के कान मे कुछ बोलने की कोशिश की पर मम्मी उसको हटाते हुए आगे बढ गई। मैने मम्मी को स्लीपर मे चढाया वहा पहले से कोई और भी था पर वो कंबल ओढके सोया हुआ था । मम्मी भी अपना कंबल लेके लेट गई। अब मुझे उस आदमी के साथ उस सीट पर बैठना था पर मुझे उससे घिन आ रही थी। मैने स्लीपर के नीचे 3 सीटर पर बैठे एक आदमी से रिक्वेसट की कि मेरी मम्मी बीमाय है तो मुझे उन्हे बार बार देखना पडेगा तो वो मेरे साथ सीट बदल ले। शायद वो विंडो सीट के लालच मे मान गया। पर उसकी सीट पर बैठते ही मेरा रोम रोम मचल गया क्योकि मेरे साथ एक आंटी बैठी थी सलवार सुट मे।मेरी कोहनी उनके चुचो से टच हुई और इतने नरम नरम चुच्चे थे कि जैसे मेरी कोहनी स्पंज मे धसी जा रही हो। अगले भाग मे पढेंखे कैसे उस आंटी ने मेरे कुवारेपन का रस पिया और कैसे किसी ने मेरी घरेलू मा के बदन को एसा रगडा कि उनका इतने सालो से संभाला हुआ जिस्म बिखर गया।
बात आज से कुछ साल पहले की है जब मै 19 साल का था । मेरी मम्मी संगीता अग्रवाल जो एक हाउसवाइफ है। देखने मे भर पूरा शरीर, मोटे मोटे उरेज जिनको छुपाने मे साडी का पल्लू भी कभी कभी असमर्थ हो जाता है। मोटे, बाहर की तरफ उभरे हुए नितंब । एक अच्छा फीगर जिस पर कोई भी महिला घमंड कर सके। पिता राजेश अग्रवाल जो एक कारोबारी है। सबका ध्यान रखने वाले। पर कभी ये महसूस ही नही हुआ कि मा को पापा के सिवा किसी और ने छुआ भी होगा। और इतने संभाले हुए शरीर का अच्छे से रस भी किसी ने नही निचोडा होगा। तो कैसे एक अजनबी इस शरीर को निचोड ले जाता है जानते है।
मम्मी की उम्र 44 साल थी। मेरे मामा जी को डायबटीज है और मम्मी को उनकी बोहत फीक्र रहती है तो अगर कही से भी किसी दवाई का पता चलता है तो मम्मी मामा के लिए उसको लेने चल पडती है। मम्मी का ध्यान बडे अच्छे से रखा है पापा ने कभी उनको अकेले नही जाना पडा कही, उनकी सेफ्टी के लिए पापा हमेशा साथ गए। पर अब मै बडा हो गया हू तो अब ये मेरी जिम्मेवारी है। मम्मी को पता चला कि उदयपुर मे एक वैद्य जी है जो डायबटीज को जड से मिटाने की दवाई देते है तो मा ने पापा को कहा और पापा ने मेरी ड्यूटी लगा दी। लेकिन समस्या ये थी कि उदयपुर हमारे करनाल ( हरियाणा) से बोहत दूर था और दूर के सफर मे हम स्लीपर से जाना पसंद करते है। पापा ने स्लीपर बस ढूढनी शुरू की पर कोई बस सीधा उदयपुर नही जाती थी। एक बस जो चण्डीगढ से उदयपुर जा रही थी वो हमे मिल गई लेकिन उसमे एक सूलीपर और एक नोर्मल सीट ही मिल रही थी। मम्मी ने हा बोल दिया और कहा कि हम बारी बारी स्लीपर मे सो जाएगे। हम शुक्रवार शाम 6 बजे हम बस मे चढे। बस भरी हुई थी पर हमारी सीट बुक थी तो हमे एक सीट बैठने को मिल गई और कण्डक्टर ने मुझे स्लीपर वाला कैबिन भी दिखा दिया जहा हमारी दूसरी सीट थी। पर वो स्लीपर डबल वाला था मतलब उसमे कोई और भी था। मै खडा हो गया और मम्मी बैठ गई क्योकि मुझे अभी सोना नही था। मम्मी खिडकी के पास वाली सीट पर बैठ गई उनके पास एक आदमी बैठा हुआ था। सब ठीक लग रहा था पर थोडी देर मे बाहर से दूसरी गाडियो की रोशनी मे मम्मी के चेहरे पर नजर पडी तो वो मुझे अनकंफर्टेबल सी लगी। उन्होने काले रंग की उन की पजामी और काला ही टाप पहना था जिसमे उनके चुच्चे बोहत बडे लग रहे थे और चुतड भी अच्छे से दिखाई दे रहे थे। मम्मी बडे अजीब से तरीके से बैठी हुई थी वो उस आदमी की तरफ झुकी हुई थी। मैने देखा मम्मी की शाल के नीचे से वो मम्मी के चुच्चे मसल रहा था। मेरे तन बदन मे करंट सा दौड गया। समझ नही आया ये क्या हो रहा है। जिस मम्मी की तरफ किसी को आंख उठाते नही देखा उन्हे कोई ऐसे रगड रहा था। उसने शाल को अपने घुटनो तक सरका लिया और मम्मी की बेचैनी बढने लगी। शायद अब उसका हाथ औरत के उस नाजूक अंग पर था जिसको पाने के लिए इस धरती का हर मर्द पागल है। पर मेरे भाव भी बदल रहे थे और गुस्से के साथ मेरी पेंट मे भी हलचल हो रही थी। पर मैने खुद को संभालकर मम्मी को आवाज दी, मम्मी... मम्मी चलो आप स्लीपर मे लेट जाओ। मम्मी तो जैसे कुछ सुन ही न पा रही हो। काफी बुलाने पर उनका ध्यान टूटा और वो चौक कर उठी। उठते वक्त उनकी शाल हटी तो उनका एक चुच्चा पुरा उस आदमी के हाथ मे था। मम्मी ने थोडा जोर लगाके अलग होने की कोशिश की पर वो आदमी भी साथ ही खडा हो गया और सीट से बाहर निकलते वक्त उसने मम्मी के मोटे चुतडो पर अपना ल ण ड घुमाया। ये उसका आखिरी प्रयास था क्योखि उसी मेहनत पर मैने पानी फेर दिया था।उसने मम्मी के कान मे कुछ बोलने की कोशिश की पर मम्मी उसको हटाते हुए आगे बढ गई। मैने मम्मी को स्लीपर मे चढाया वहा पहले से कोई और भी था पर वो कंबल ओढके सोया हुआ था । मम्मी भी अपना कंबल लेके लेट गई। अब मुझे उस आदमी के साथ उस सीट पर बैठना था पर मुझे उससे घिन आ रही थी। मैने स्लीपर के नीचे 3 सीटर पर बैठे एक आदमी से रिक्वेसट की कि मेरी मम्मी बीमाय है तो मुझे उन्हे बार बार देखना पडेगा तो वो मेरे साथ सीट बदल ले। शायद वो विंडो सीट के लालच मे मान गया। पर उसकी सीट पर बैठते ही मेरा रोम रोम मचल गया क्योकि मेरे साथ एक आंटी बैठी थी सलवार सुट मे।मेरी कोहनी उनके चुचो से टच हुई और इतने नरम नरम चुच्चे थे कि जैसे मेरी कोहनी स्पंज मे धसी जा रही हो। अगले भाग मे पढेंखे कैसे उस आंटी ने मेरे कुवारेपन का रस पिया और कैसे किसी ने मेरी घरेलू मा के बदन को एसा रगडा कि उनका इतने सालो से संभाला हुआ जिस्म बिखर गया।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)