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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
आहिस्ता-आहिस्ता बहकाना
 
अगले दिन दोपहर को, अनीता ने फिर से अपनी पसंदीदा लाल रंग की साड़ी पहनी। उसने महसूस कर लिया था कि जींस पहनना या खुद को कपड़ों में कैद करना उसे करीम से नहीं बचा सकता; असली दीवार तो उसके अपने मन की थी। वह लाल साड़ी में बला की खूबसूरत लग रही थी, उसका गोरा बदन उस लाल रंग के साथ खिल उठा था।
 
वह रसोई में दोपहर का खाना तैयार कर रही थी, तभी करीम दबे पाँव अंदर आया। आज उसके चेहरे पर एक अजीब सी सौम्यता थी।
 
करीम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और धीमी आवाज़ में बोला:
 
करीम (अनीता की चूड़ियों की खनक सुनते हुए, धीमी आवाज़ में): "आज आप बहुत सुकून में लग रही हैं मालकिन। ऐसा लगता है जैसे मालिक ने कल रात आपकी सारी थकान और बेचैनी जड़ से मिटा दी है।"
 
अनीता (सब्जी चलाते हुए, एक हल्की मुस्कान के साथ): "हाँ करीम, आज मन थोड़ा शांत है। तुम भी बस अपने काम पर ध्यान दो, फालतू की बातें छोड़ो।"
 
करीम धीरे-धीरे चलकर सिंक के पास आया और बर्तन रखते-रखते रुक गया। उसने अपनी आवाज़ को धीमा कर लिया।

 
करीम (फुसफुसाते हुए): "मैं बस यही चाहता हूँ,हूँ मालकिन, कि आप मुझसे डरें नहीं। हमारे बीच जो कुछ भी होता है, वो इस बड़े बंगले की दीवारों के बीच दफन हमारी अपनी एक छोटी सी दुनिया है। आज मैं यहाँ अपना कोटा माँगने या आपके बदन से खेलने नहीं आया हूँ…"
 
अनीता के हाथ रुक गए। उसने करछुल को कड़ाही के किनारे टिका दिया और मुड़कर करीम को देखा। करीम ने आज अपनी आँखों में एक बनावटी ही सही, पर बहुत ही गहरी और कातर उदासी भर रखी थी। वह दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया।

करीम (बेबसी भरे लहज़े में): "मालकिन, मेरी एक बहुत छोटी सी गुज़ारिश है आपसे... क्या आज आप थोड़ी देर के लिए मेरे क्वार्टर में, मेरे उस मामूली से कमरे में चलेंगी?"

 
अनीता (हैरानी और झिझक के साथ): "तुम्हारे कमरे में? पर क्यों करीम? वहाँ जाने का क्या मतलब है?"
 
करीम (नज़रें झुकाकर, एक लंबी साँस लेते हुए): "बस कुछ देर के लिए मालकिन... बस थोड़ी देर के लिए मेरे उस गरीब खाने के बिस्तर पर मेरे साथ लेटिये। मैं खुदा की कसम खाकर वादा करता हूँ कि मैं अपनी जुबान नहीं तोड़ूँगा। मैं आपको हाथ तक नहीं लगाऊँगा अगर आप ना चाहें तो।"

 
करीम (अनीता की लाल साड़ी को हसरत भरी निगाहों से देखते हुए): "आप इस लाल साड़ी में इतनी सुंदर और सेक्सी लग रही हैं कि मेरी आँखें फटी की फटी रह गई हैं। मैं बस एक बार उस अहसास को महसूस करना चाहता हूँ जो राज साहब को हर रोज़ मिलता है—जब वो आपके जैसे मखमली बदन के बाजू में सोते हैं। मैं बस ये देखना चाहता हूँ कि जब आप मेरे उस फटे-पुराने बिस्तर पर लेटी होंगी, तो वो बिस्तर कैसा स्वर्ग जैसा लगने लगेगा।"

 
अनीता (असमंजस में डूबी हुई): "करीम, तुम जानते हो ना तुम क्या माँग रहे हो? अगर किसी ने देख लिया तो?"

 
करीम (आगे बढ़कर, मिन्नत भरी आवाज़ में): "कोई नहीं देखेगा मालकिन। मालिक दफ्तर में हैं, पूरा बंगला खाली है। बस 20 मिनट... अपनी ज़िंदगी के बस 20 मिनट इस गरीब नौकर को दे दीजिये। मैं बस आपकी खुशबू को अपने बिस्तर की चादरों में बसा लेना चाहता हूँ।"

 
अनीता कुछ बोलने ही वाली थी कि करीम ने अपना 'इमोशनल कार्ड' बहुत ही शातिर तरीके से खेल दिया। उसने अपनी आवाज़ को इतना दीन-हीन बना लिया कि कोई भी पत्थर दिल पिघल जाए।

 
करीम (बहुत ही बेबसी और उदासी के साथ): "मालकिन, मैं एक बहुत गरीब और काला आदमी हूँ। मुझ जैसे अदने से नौकर की तो औकात ही क्या है… मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि आप जैसी अप्सरा मेरे इस फटे-पुराने बिस्तर पर पैर भी रखेगी। मैं बस एक बार अपना वो सोया हुआ नसीब जागते देखना चाहता हूँ मालकिन।"

 
अनीता का दिल करीम की इस मासूमियत भरी दलील पर पसीज गया। उसे लगा कि एक गरीब इंसान की इतनी छोटी सी हसरत पूरी करने में क्या बुराई है, खासकर तब जब उसने वादा किया है कि वह कुछ गलत नहीं करेगा। उसे करीम पर तरस आने लगा और कहीं न कहीं उसके मन के एक कोने में उस अंधेरी कोठरी और करीम के उस खुरदरे बिस्तर पर लेटने की एक दबी हुई उत्तेजना भी जाग उठी थी।

 
उसने धीरे से अपनी गर्दन हिलाकर हामी भरी और दबे पाँव करीम के पीछे-पीछे घर के पिछले हिस्से में बनी उसकी छोटी सी कोठरी की ओर चल दी।

 
करीम की कोठरी बहुत छोटी और तंग थी। वहाँ सीलन की गंध और करीम के देसी इत्र की महक आपस में मिली हुई थी। उसका बिस्तर भी बस इतना ही बड़ा था कि एक इंसान मुश्किल से समा सके। करीम पहले उस चारपाई पर लेट गया और फिर उसने बड़े प्यार और एक अनकहे अधिकार से अनीता का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और सीधे अपने ऊपर लिटा लिया।

 
अनीता अब पूरी तरह करीम के ऊपर लेटी हुई थी। उस तंग जगह और छोटी चारपाई की वजह से अनीता के सुडौल और मखमली स्तन करीम के चौड़े और फौलादी सीने पर पूरी तरह पिचक गए थे। करीम की मज़बूत और काली बाहें अनीता के बैकलेस ब्लाउज वाली नंगी पीठ पर किसी शिकंजे की तरह कसी हुई थीं।
 
साड़ी और ब्लाउज की महीन परतों के पार अनीता को अपने पेट के निचले हिस्से पर करीम के उस १० इंच के सख्त लंड का मज़बूत उभार साफ़ महसूस हो रहा था, जो उसकी जांघों के बीच अपनी जगह बना रहा था।
 
करीम ने अपनी आँखें अनीता की आँखों में गड़ा दीं और अगले पाँच मिनट तक वह बस उससे बातें करता रहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव, नशा और रस्टिक जादू था।

 
करीम (अनीता की आँखों में डूबते हुए, फुसफुसाकर): "मालकिन, कसम खुदा की... यकीन नहीं होता कि आज मेरी ये फटी-पुरानी कोठरी किसी जन्नत से कम लग रही है। मुझ जैसे काले और गरीब नौकर के लिए तो ये किसी सपने जैसा है कि आप मेरे इस तपते हुए सीने से लगी लेटी हैं।"

 
अनीता उसकी उन काली और गहरी आँखों में पूरी तरह खोई हुई थी। करीम के हाथों की गरमाहट उसकी नंगी पीठ पर बिजली की तरह दौड़ रही थी।

 
करीम (अपनी एक उंगली से अनीता के गुलाबी गाल को सहलाते हुए): "राज साहब कितने खुशनसीब हैं मालकिन... उनके पास इतनी सुंदर बीवी है, अमीरी है, और इज़्ज़त है। और एक मैं अभागा हूँ, जिसके पास सिर्फ ये अंधेरी कोठरी और अकेलापन है।"

 
करीम (एक लंबी और ठंडी सांस लेते हुए): "पर आज, इन कुछ मिनटों के लिए, मैं खुद को दुनिया का सबसे अमीर आदमी मान रहा हूँ मालकिन... क्योंकि आज ये सारा हुस्न, ये सारी गोराई मेरी इन काली बाहों में कैद है। आज मैं राजा हूँ और आप मेरी रानी।"

 
अनीता का मन इस जज्बाती खेल में पूरी तरह उलझ गया था। उसे करीम पर तरस भी आ रहा था और उसके उस विशाल शरीर की निकटता उसे अंदर ही अंदर पिघला रही थी।

 
करीम (अनीता की आँखों में अपनी कातर निगाहें गड़ाते हुए): "बेटी, आपकी खूबसूरती की तारीफ़ तो इस दुनिया में हर कोई करता होगा, पर इस गरीब ने आज जो महसूस किया है, वो कोई रईस नहीं कर सकता। आपने मेरी मुराद पूरी कर दी मालकिन... आज इस बदनसीब की रूह को सुकून मिल गया।"

 
करीम ने अपनी काली और मज़बूत बाहों का घेरा अनीता की पीठ पर और भी तंग कर लिया। उसकी  उंगलियाँ अब बैकलेस ब्लाउज के किनारों पर धीरे-धीरे रेंगने लगी थीं, जहाँ रेशमी डोरी का एक नाजुक सा बंधन उस भारी खूबसूरती को थामे हुए था।

 
कोठरी के मद्धम उजाले में करीम की आँखें चमक रही थीं। उसने अपना मुँह अनीता के कान के बिल्कुल करीब लाया, उसकी गर्म और भारी साँसें अनीता की गर्दन की नसों को भिगो रही थीं।

 
करीम (बहुत ही मद्धम और कातर आवाज़ में): "बेटी... क्या आज मैं अपनी इस 'जन्नत' का दरवाज़ा खोल सकता हूँ?"

 
अनीता का पूरा शरीर एक अनजानी सिहरन से काँप उठा। उसने महसूस किया कि करीम का अंगूठा अब उस रेशमी डोरी के सिरे को सहला रहा है।

 
करीम (फुसफुसाते हुए, जैसे कोई भीख माँग रहा हो): "क्या मैं बस एक बार आपके ब्लाउज की डोरियाँ खोलकर इस खूबसूरती को अपनी आँखों से मुकम्मल देख सकता हूँ? क्या मुझ जैसे गरीब की आँखें इतनी खुशनसीब नहीं हो सकतीं कि वो देख सकें कि कुदरत ने आपको कितनी फुर्सत से बनाया है?"

 
अनीता (हल्की सी उलझन के साथ): "पर करीम... अभी कल ही तो कॉलेज ड्रेस वाले उस रोल-प्ले में तुमने उन्हें जी भर के देखा था। फिर आज फिर से वही ज़िद क्यों? क्या कल मन नहीं भरा था?"

 
करीम (गहरी आह भरते हुए और फुसफुसाते हुए): "अरे बेटी, उस वक्त की बात मत कीजिए। उस वक्त तो मैं उस रोल-प्ले के खेल में इतना खोया हुआ था कि आपकी इस रूहानी खूबसूरती को सही मायने में निहार ही नहीं पाया। और सच कहूँ तो, मुझे उस वाकये की याद मत दिलाइए… उस वक्त तो मैंने आपको अपनी 'गुलाम' बनने का पैगाम दिया था।"

 
करीम (अनीता की आँखों में डूबते हुए): "लेकिन अब नज़रिया बदल गया है। अब मैं आपको किसी गुलाम की तरह नहीं, बल्कि अपनी 'रानी' की तरह देखना चाहता हूँ।"

 
करीम (एक लंबी और भारी साँस भरते हुए): "बस एक बार देखने दीजिये मालकिन... कसम खुदा की, मैं बस अपनी आँखों की प्यास बुझाना चाहता हूँ। ई गोरा बदन जब मेरी इन काली आँखों के सामने नंगा होगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी गरीबी मिट गई।"

 
अनीता के पास अब विरोध करने की ताकत नहीं बची थी। करीम के शब्दों ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था और उसके बदन की गर्मी ने उसकी शर्म की दीवारें गिरा दी थीं। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और करीम के कंधे पर अपना सिर टिका दिया—यह उसकी तरफ से एक मूक सहमति थी।

 
करीम की उंगलियों ने निपुणता के साथ उस रेशमी डोरी को खींचा। एक हल्के से सरसराहट के साथ डोरी खुल गई। अनीता को अपनी नंगी पीठ पर ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ, और उसके ठीक बाद करीम के भारी और गर्म हाथों का स्पर्श। ब्लाउज अब सिर्फ उसके कंधों पर टिका था।

 
जैसे ही करीम के काँपते हाथों ने अनीता के ब्लाउज की अंतिम डोरी को आज़ाद किया, वह रेशमी लिबास सरककर उसके गोरे कंधों से नीचे गिर गया। उस मद्धम और घुटन भरी कोठरी के अंधेरे में अनीता का दूधिया बदन किसी चांदनी की तरह फूट पड़ा। करीम ने बड़ी कोमलता से अनीता को अपने ठीक सामने सीधा बिठा दिया। अब वे दोनों आमने-सामने थे, जहाँ करीम की नज़रों के ठीक सामने कुदरत का वह अनमोल खजाना था।

 
बिना किसी पर्दे के, अनीता के वे सुडौल और सुगठित वक्ष पूरी तरह से नग्न होकर करीम की आँखों के सामने उभर आए थे। वे इतने पुष्ट और उभारदार थे कि उनमें एक गजब की कशिश और कसावट थी।

 
उनकी गोलाई इतनी मुकम्मल थी जैसे किसी तराशे हुए संगमरमर के बुत में जान डाल दी गई हो। मद्धम उजाले में उनकी चमक और भी बढ़ गई थी, और उनकी गुलाबी रसीली चोटियां किसी कली की तरह खिली हुई थीं, जो करीम के भीतर की हवस और दीवानगी को चरम सीमा पर पहुँचा रही थीं।

 
करीम (गहरी और भारी आवाज़ में): "आज तो इस अंधेरी कोठरी में सचमुच चाँद उतर आया है मालकिन... कसम खुदा की! उफ़... इतनी नरमी? इतना निखार? बेटी, ई जो आपकी छाती की सुडौलता है न, ई तो कलेजे को चीर देने वाली है।"

 
करीम (हैरत और हवस की चरम सीमा पर पहुँचकर, हकलाते हुए): "हमने तो अपनी पूरी फटी-हाल ज़िंदगी में ई कभी ना सोचा था कि कोई हाड़-मांस की औरत इतनी मुकम्मल भी हो सकती है। देखो तो, कइसे कुदरत ने इन्हें तराशा है… एकदम बेदाग और सलीकेदार। ई गुलाबी रंग की कलियां तो जैसे जान ही निकाल ले रही हैं हमारी।"

 
करीम ने अपनी काली उंगलियों को अनीता के उन मखमली गोलों पर रख दिया। दूध जैसा सफेद बदन और उस पर करीम की स्याह उंगलियां—नज़ारा ऐसा था कि कोई भी अंधा हो जाए

 
जैसे ही उसके हाथों का वह खुरदरापन उन नरम और रेशमी उभारों से टकराया, अनीता के मुँह से एक दबी हुई आह निकल गई और उसने अपनी आँखें मूँद लीं।

 
अनीता (करीम की प्यासी नज़रों की तपिश महसूस करते हुए, धीमी आवाज़ में): "बस भी करो करीम... तुम्हारी नज़रों में इतनी आग है कि मुझे डर लग रहा है कि कहीं मैं जल न जाऊं। क्या सच में तुम्हें यह सब इतना पसंद आ रहा है?"

 
करीम (आगे बढ़कर एक हाथ अनीता की कमर पर रखते हुए): "पसंद? बेटी, ई तो वो नियामत है जिसके लिए इंसान अपनी रूह बेच दे। हमें तो लग रहा है कि ई सब देखकर हमारी आँखें ही ना पत्थर हो जाएं। ई सुडौल हुस्न, ई नंगा बदन... आज तो हमें अपने आप पर यकीन नहीं हो रहा कि हम किस जन्नत के मालिक बन बैठे हैं।"

 
करीम (भारी आवाज़ में): "हाय अल्लाह! बेटी... ई तो रुई से भी ज्यादा नरम और मजबूत कशाव है। कइसे ई गोलाई थमती है हमारे हाथों में? ई जो आपकी छाती की सुडौलता है, ई तो किसी अजूबे से कम नहीं। देखो तो... कइसे ई गुलाबी चोटियां इस चांदनी जैसे बदन पर उभर कर आ रही हैं, जैसे किसी बाग में दो अनछुए गुलाब खिले हों।"

 
उसकी एक उंगली ने बहुत संभलकर उन गुलाबी कलियों को बस हल्का सा छुआ। वह छुअन इतनी बिजली जैसी थी कि अनीता का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। वह करीम के कंधों पर अपने हाथ टिकाकर सहारा लेने लगी, जबकि करीम का मुँह अब उस उन्नत और नग्न हुस्न के बिल्कुल करीब पहुँच चुका था।

 
करीम (फुसफुसाते हुए, जैसे दीवानगी की हद पार कर रहा हो): "इन गुलाबी कलियों की रंगत देख के तो साला खून खौलने लगता है। कसम खुदा की बेटी, ई जो ई निखार है न... ई तो हमें पागल कर देगा। ई सुडौलपन... ई गोरापन... ई जो आपकी नंगी छाती की गर्मी हमारे हाथों को लग रही है, ई तो सीधे रूह में उतर रही है। आज तो हमें ई जन्नत मुकम्मल चाहिए… पूरी की पूरी।"
 
 
करीम (अनीता के निप्पलों को अपनी उंगलियों के बीच मरोड़ते हुए): "ये देखो... ई अंगूर जैसे दाने तो तपने लगे हैं। हमारी उंगलियों की गर्मी सह पा रही हो ना बेटी? आज तो हम इन पर अपने होने के ऐसे निशान छोड़ेंगे कि राज साहब भी देखकर हैरान रह जाएँ।"

 
अनीता (सिसकते हुए, बेहाल होकर): "आह्ह... करीम... बहुत... बहुत दर्द हो रहा है... प्लीज... धीरे..."

 
करीम (पूरी तरह से बेकाबू होकर): "हाय रे मेरी मालकिन... ई गुलाबी कलियां तो कसम खुदा की, एकदम अंगूर की तरह रसीली दिख रही हैं। जी चाहता है कि बस इन्हें अपनी ज़ुबान की नोक से चख लूँ, देखूँ तो सही कि खुदा ने इनमें कितना शहद भरा है।"

 
अनीता ने जैसे ही करीम के इरादे भांपे, उसकी रीढ़ की हड्डी में एक बिजली सी दौड़ गई। उसने करीम के कंधों को कसकर पकड़ लिया।

 
करीम ने अब और इंतज़ार नहीं किया। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और बहुत ही धीमे से अपनी गीली और खुरदरी ज़ुबान की नोक को अनीता की एक गुलाबी चोटी के बिल्कुल सिरे पर टिका दिया।

 
अनीता (सिसकते हुए): "उफ़्फ़... करीम... ई क्या... आhh..."

 
करीम ने उस सख्त और नुकीली चोटी के चारों ओर अपनी ज़ुबान को गोल-गोल घुमाना शुरू किया। वह उसे कभी अपनी ज़ुबान से सहलाता है, तो कभी उसे अपने होंठों के बीच हल्का सा दबाकर चूसने की कोशिश करता है। उस गोरे और सुडौल उभार पर करीम के काले और खुरदरे होंठों का वह संगम किसी गहरे नशे की तरह था।

 
करीम (चोटी को अपने मुँह में भरते हुए, दबी आवाज़ में): "ओह्ह... बेटी... ई तो मलाई से भी ज्यादा मुलायम है। ई जो कड़ापन है न आपकी इन कलियों में, ई तो सीधा हमारे कलेजे में आग लगा रहा है। कइसे ई सुडौल छाती हमारे मुँह में समाने को बेताब है... देखो तो सही।"

 
अब करीम की दीवानगी और बढ़ गई। उसने अपनी पकड़ और मज़बूत की और अब उस नग्न और सुडौल उभार को अपने पूरे मुँह के घेरे में ले लिया। वह उस गुलाबी चोटी के साथ-साथ उस पूरे सुडौल मांस को अपने होंठों से भिगोने लगा। अनीता का बदन पसीने से भीग चुका था और वह करीम के सिर को अपनी छाती पर और भी जोर से भींचने लगी।

 
करीम (थरथराती और भारी आवाज़ में): "आज यह गरीब सिर्फ देख कर सबर नहीं करेगा मालकिन... आज मैं इस गोरे कुएं का सारा दूध पियूँगा। आज अपनी बरसों की प्यास बुझाकर ही दम लूँगा। कसम खुदा की, ई जो सुडौल खजाना आपने खोल के रखा है न, ई हमें आज चैन से नहीं रहने देगा।"

 
इतना कहते ही करीम ने अपना मुँह अनीता के दूसरे पुष्ट और नग्न स्तन पर गड़ा दिया। वह किसी भूखे जानवर की तरह उस सुडौल उभार को अपने मुँह के घेरे में लेने लगा। उसकी साँसें इतनी गर्म थीं कि अनीता की त्वचा झुलसने लगी थी। वह उसे इतनी शिद्दत और गहराई से चूसने लगा जैसे वह कोई बरसों का प्यासा हो और उसे अमृत का कुआं मिल गया हो।

 
अनीता का पूरा शरीर एक अनजानी उत्तेजना में कमान की तरह तन गया। उसने अनचाहे ही करीम के सिर के बालों को अपनी मुट्ठियों में कस लिया और अपना सीना और आगे की ओर तान दिया। करीम की ज़ुबान का वह गीलापन और उसके होंठों का दबाव अनीता के पूरे बदन में लहरें पैदा कर रहे थे।

 
करीम (बीच-बीच में रुककर, लार टपकाते हुए): "कितना स्वाद है बेटी... लगता है कुदरत ने सारी मलाई यहीं भर दी है। ई मलाई तो हमारे जैसे मज़दूर की किस्मत में ही होनी चाहिए थी।"

 
वह कभी अपने दाँतों से कुतरता, तो कभी अपनी काली उंगलियों से उन्हें भींच देता है।

 
तभी करीम की हवस अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई। अपनी दीवानगी में उसने अनीता की उस रसीली गुलाबी चोटी को अपने दाँतों के बीच हल्का सा दबाकर एक ज़ोरदार काट  लिया।

 
"आह्ह्ह्ह्ह... करीम! उफ़..."

अनीता के मुँह से एक चीख निकल गई जो सिसकी और कराह का मिला-जुला रूप थी। वह दर्द और लज़्ज़त का ऐसा संगम था कि अनीता के शरीर में जैसे बिजली का कोई हाई-वोल्टेज करंट दौड़ गया हो। वह झटका इतना तेज़ था कि उसका सीधा असर अनीता की योनि पर हुआ, जहाँ एक तीखी झनझनाहट और गीलापन महसूस होने लगा। उसकी जांघें आपस में भिंच गईं और उसका पूरा वजूद कांप उठा।

 
अनीता (सिसकते हुए और हाँफते हुए): "आह... धीरे करीम... इतने ज़ोर से मत काटो। दाग पड़ जाएंगे... कल सबको क्या जवाब दूंगी? उफ़, मार ही डालोगे क्या आज?"

 
करीम (उस चोटी को धीरे से सहलाते हुए): "अरे मालकिन, ई तो प्यार की निशानी है। ई जो कसर रह गई थी न बरसों की, उ आज ई गुलाबी कलियां ही पूरी करेंगी। दाग पड़ेगा तो पड़ने दो, दुनिया को भी तो पता चले कि ई जन्नत पर आज करीम का कब्ज़ा है।"

 
करीम के होंठ अब भी उस सुडौल और नग्न हुस्न से चिपके हुए थे, और उसकी उंगलियां अब धीरे-धीरे अनीता के पेट से नीचे की ओर सरकने लगी थीं।

 
करीम ने अपनी पुरानी बनियान को एक झटके में उतारकर कोठरी के कोने में फेंक दिया। अब उसका चौड़ा, काला और पसीने से चमकता हुआ बालों वाला सीना पूरी तरह नंगा था। जैसे ही उसने अनीता को वापस अपनी बाहों में खींचकर अपने ऊपर लिटाया, अनीता के दूधिया, गोरे और नंगे स्तन करीम के उस खुरदरे और मर्दाना बालों वाले सीने से सीधे टकराए।

 
मुलायमियत और कठोरता का वह पहला स्पर्श इतना तीव्र था कि अनीता के गले से एक लंबी सिसकी निकल गई।

 
करीम (अनीता को अपनी फौलादी बाहों में जकड़ते हुए): "अनीता बेटी, इन गोरे नरम चूतड़ों... मेरा मतलब है इन चूचों को मेरे इस खुरदरे सीने पर रगड़ो... ज़ोर-ज़ोर से ऊपर और नीचे। महसूस करो इस मज़दूर के बदन की तपिश, जो आपके इस गोरे बदन की आग में जल रहा है!"

 
अनीता अब पूरी तरह करीम के वश में थी। उसने अपने हाथों को करीम के मजबूत कंधों पर टिकाया और अपने  सुडौल वक्षों को करीम के काले सीने पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने लगी। करीम के सीने के कड़े और घुंघराले बाल अनीता की उन संवेदनशील गुलाबी चोटियों को हर रगड़ के साथ सहला रहे थे, जिससे उसे मीठा दर्द और चरम उत्तेजना का अहसास हो रहा था।

 
करीम (अनीता की  गाँड पर अपने दोनों बड़े और खुरदरे हाथ जमाते हुए): "हाँ मालकिन... ऐसे ही! कसम खुदा की, ई जो आपकी छाती की नरमी हमारे सीने में धँस रही है, ई तो सीधे रूह को कपा दे रही है। अब ई जो नीचे की  गाँड है ना, इसे भी हमारे हाथों के इशारे पर नचाओ। आज इस लाल साड़ी के अंदर जो कुछ भी छुपा है, वो सिर्फ ई करीम का गुलाम है!"

 
करीम ने अपनी भारी हथेलियों से साड़ी के ऊपर से ही अनीता के मांसल और सुडौल गाँड  को पूरी ताकत से जकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ उन मांसल उभारों में धँस गई थीं। वह अनीता को ऊपर-नीचे की गति देने लगा, जिससे अनीता का पूरा निचला हिस्सा करीम की जांघों पर रगड़ खाने लगा।

 
हर धक्के और हर रगड़ के साथ अनीता को अपनी जांघों के बीच करीम के उस  10 इंच के लौड़ा  की भयंकर सख्ती महसूस हो रही थी। वह इतना सख्त और विशाल था कि साड़ी और पेटीकोट की परतों को चीरकर अनीता की योनि की गहराई तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।

 
अनीता (हाँफते हुए, मदहोश आवाज़ में): "उफ़ करीम... तुम्हारा बदन... कितना गर्म है। और ये... ये क्या चीज़ है जो मुझे इतना बेहाल कर रही है? तुम... तुम मुझे पागल कर दोगे।"

 
अनीता के पसीने से लथपथ जिस्म की सौंधी खुशबू और करीम के जिस्म की तीखी मर्दाना गंध ने उस कोठरी की हवा को कामुकता से भर दिया था। करीम ने एक हाथ से अनीता का सिर नीचे झुकाया और उसके होंठों को चूसते हुए उसकी सुडौल देह को अपने सीने पर और भी हिंसक तरीके से रगड़ना जारी रखा।

 
करीम (हवस भरी आवाज़ में): "हाँ बेटी... ऐसे ही। देखो कैसे तुम्हारा दूध जैसा बदन मेरे इस काले सीने पर फिसल रहा है। ई गोराई और ई कालापन... जैसे मलाई पर कोयला रगड़ रहा हो।"

 
अनीता (सिसकते और हाँफते हुए): "आह्ह्ह... उफ़्फ़... करीम... तुम... मेरा पूरा बदन जल रहा है... आह!"

 
करीम (उसके कान के पास फुसफुसाते हुए): "उफ़... कितनी गरम हो तुम बेटी। लगता है आज मालकिन पूरी तरह पिघल गई हैं।"

 
करीम ने फिर से उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और उसे पागलों की तरह चूमने लगा। घड़ी की सुइयां जैसे ही तीस मिनट के निशान पर पहुँचीं, करीम ने अपनी रफ्तार एकदम धीमी कर दी। पर उसने अनीता को अपने सीने से अलग नहीं किया। उसके नंगे स्तन करीम के बालों वाले सीने की रगड़ से लाल पड़ चुके थे।

 
करीम ने अचानक अपने हाथ अनीता की सुडौल गाँड से हटा लिए और उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों के शिकंजे में थाम लिया।

 
करीम (बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में): "अनीता बेटी... तीस मिनट पूरे हो गए। हमारे समझौते का वक़्त खत्म हुआ। हमने कहा था कि बस तीस मिनट..."

 
करीम (उसके गीले होंठों के बिल्कुल करीब रुक कर): "तो मालकिन... क्या मैं रुक जाऊं? क्या मैं पीछे हट जाऊं?"

 
अनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका जिस्म आग की तरह दहक रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। उसकी योनि से बहती चिपचिपी नमी उसकी बेबसी की गवाही दे रही थी। वह इस वक्त एक प्यासी नागिन की तरह थी जिसे करीम का ज़हर चाहिए था।

 
करीम (एक कुटिल मुस्कान के साथ): "बोलिए बेटी... चुप काहे हैं? अगर आप एक बार कहेंगी, तो ये गरीब नौकर अभी उठ जाएगा। बोलिए, रुक जाऊं?"

 
अनीता के भीतर की मालकिन मर चुकी थी। अब वहाँ सिर्फ एक भूखी औरत बची थी। उसने अपनी सारी इज़्ज़त और गुरूर को उस फटी-पुरानी चारपाई पर ढेर कर दिया और करीम के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया।

 
अनीता की सिसकियाँ उस तंग कोठरी की दीवारों से टकराकर दम तोड़ रही थीं। उसका वजूद अब किसी मोम की तरह पिघल चुका था, जो करीम की मर्दाना आग में फना होने को बेताब था।

 
अनीता (सिसकते और लगभग गिड़गिड़ाते हुए): "नहीं करीम... आह्ह... मत जाओ! मुझे इस हाल में बीच मझधार में मत छोड़ो... मेरा बुरा हाल हो रहा है। प्लीज करीम... आज मुझे पूरा कर दो... मुझे निचोड़ दो... प्लीज!"

 
करीम के चेहरे पर एक ऐसी काली मुस्कान आई, जैसे किसी शिकारी ने अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती शिकार को घुटनों पर ला दिया हो। उसकी आँखों में हवस की वह चमक थी जो अब सब कुछ तहस-नहस करने पर आमादा थी।

 
करीम (गरजते हुए और अपनी छाती ठोकते हुए): "तो अब आप खुद माँग रही हैं ना मालकिन? ठीक है... आज ई करीम आपको वो चीज़ दिखाएगा और वो सुख देगा जो राज साहब कभी नहीं दे पाए।"

 
करीम एक झटके से खड़ा हुआ और उसने अनीता को भी उस छोटे से बिस्तर से उठाकर अपने सामने खड़ा कर दिया। अनीता का ब्लाउज पहले ही उतर चुका था, और उसके सुडौल गोरे स्तन अब किसी लगाम के बिना, उसकी तेज साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।

 
करीम (साड़ी का पल्लू नीचे गिराते हुए): "आज मालकिन और नौकर के बीच ई जो रेशम की दीवार है, इसे हमेशा के लिए खत्म होना ही होगा बेटी। ई पर्दा अब ई करीम की आँखों को और नहीं खटकेगा।"

 
करीम ने अपनी उंगलियों को पेटीकोट की नाड़ी पर फँसाया और उसे एक झटके में खींच दिया। रेशमी कपड़ा सरसराते हुए अनीता के पैरों के पास ढेर हो गया। अब अनीता का पूरा निचला बदन करीम की भूखी नज़रों के सामने बेपर्दा था।
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना




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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - Yesterday, 04:43 PM



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