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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
शेर का अभियान-2
 
 
तभी बाहर गाड़ी के टायर रगड़ने की आवाज़ आई। शेर झटके से पीछे हटा। उसका दिल किसी जंगली जानवर की तरह धड़क रहा था।

 
जैसे ही वह मेन गेट पर पहुँचा, उसने अपने चेहरे पर वही पुराना 'वफादार नौकर' वाला मुखौटा लगा लिया। उसने हाथ जोड़कर दरवाज़ा खोला, जहाँ सरताज अपनी वर्दी में कड़क अंदाज़ में खड़ा था।

 
शेर: (साँस फूलते हुए, पर विनम्रता का नाटक करते हुए) "जी साब... आइए। मैंने चेक किया था, मेमसाब गहरी नींद में हैं, शायद थकान की वजह से फोन नहीं सुना होगा।"

 
सरताज को शेर के व्यवहार में कुछ भी अजीब नहीं लगा। शेर ने इतनी सफाई से अपनी हवस और घबराहट को वफादारी के मुखौटे के पीछे छिपा लिया था कि एक मंझा हुआ सिक्युरिटी अफ़सर भी उसे भांप नहीं पाया। शेर ने बड़ी शालीनता से सरताज का सामान पकड़ा और अपने कमरे की तरफ चला गया।

 
सरताज दबे पाँव बेडरूम में दाखिल हुआ। सरताज ने देखा कि मीरा  बेहद शांति से सो रही है। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और हल्की सी सुर्खी थी।

 
सरताज का मन हुआ कि उसे जगाए और पूछे कि वह फोन क्यों नहीं उठा रही थी, लेकिन उसे इतनी गहरी और मासूम नींद में देखकर सरताज की हिम्मत नहीं हुई कि उसे जगाए। उसे लगा कि शायद दिन भर की थकान और गर्भावस्था की वजह से वह बेसुध होकर सो गई है।

 
वह बिस्तर के किनारे बैठ गया और बस टकटकी लगाकर मीरा के चेहरे को निहारता रहा। उसने बड़ी कोमलता से अपना हाथ मीरा के माथे पर रखा और उसके बिखरे हुए बालों को सहलाने लगा। स्पर्श मिलते ही, मदहोशी की नींद में डूबी मीरा के होंठों पर एक कोमल मुस्कान तैर गई और उसने नींद में ही धीरे से फुसफुसाया:
 

मीरा: (नींद में बुदबुदाते हुए) "...सरताज... आप... आ गए..."

 
सरताज के दिल में प्यार की एक लहर दौड़ गई। उसने अपनी आँखों में नमी महसूस की और मन ही मन मुस्कुराया।

 
सरताज (सोचते हुए): "पगली... सो रही है, फिर भी मेरा ही नाम ले रही है। कितनी मोहब्बत करती है मुझसे।"

 
वह यह कभी नहीं जान पाया कि जिस नाम को वह अपनी जीत समझ रहा था, वह दरअसल मीरा के उस भ्रम का हिस्सा था जहाँ वह शेर के अपवित्र स्पर्श को सरताज का प्यार समझ बैठी थी। सरताज को अंदाज़ा भी नहीं था कि वह शेर की उस दरिंदगी के कितने करीब पहुँच चुका था।

 
दीवार के उस पार, अपने क्वार्टर में लेटा शेर अंधेरे में छत को घूर रहा था। उसके होंठों पर अभी भी मीरा के उस गुलाबी खजाने का स्वाद था और उसके दिमाग में मीरा की वह आखिरी सिसकी गूँज रही थी। वह अपनी जीत पर मुशकुरा रहा था।

 
सरताज धीरे से मीरा के बगल में लेट गया और उसे अपनी बाहों के घेरे में भर लिया। मीरा ने नींद में ही सरताज के सीने से अपना सिर सटा दिया। सरताज को लगा कि उसकी दुनिया उसकी बाहों में है, और इसी सुकून के साथ वह गहरी नींद में सो गया।

 
दोपहर के करीब तीन बजे मीरा की आंखें धीरे-धीरे खुलीं। उसका शरीर अभी भी एक अजीब सी गर्मी से तप रहा था—एक सुलगती हुई, अधूरी उत्तेजना जो उसके नसों में दौड़ रही थी। उसके स्तन सुडौल लग रहे थे, निप्पल्स अभी भी सख्त और संवेदनशील, और नीचे... नीचे तो एक गीली, गर्माहट थी जो उसे बेचैन कर रही थी। सब कुछ अधूरा, सुलगता हुआ सा था।

 
उसके बगल में सरताज अभी भी गहरी नींद में सोया हुआ था।

 
जैसे ही मीरा पूरी तरह होश में आई, उसे वह 'ख्वाब' याद आने लगा। उसे याद आया कि कैसे सरताज (जो असल में शेर था) ने उसके सुडौल और दूधिया स्तनों पर अपनी मुहर लगाई थी। उसे साफ़-साफ़ महसूस हो रहा था कि कैसे सरताज ने एक-एक करके उसकी उन गुलाबी कलियों को अपने मुँह में भरा था और उन्हें इतनी शिद्दत से चूसा था कि उसकी रूह कांप गई थी।

 
उसके स्तन इतने सजीव और फड़कते हुए महसूस हो रहे थे, जैसे वे अभी भी किसी के स्पर्श के लिए तड़प रहे हों। उसे अपनी उन कोमल गोलाइयों पर एक अजीब सी झनझनाहट महसूस हो रही थी। उसे लगा कि सरताज ने प्यार के साथ रौंदा है।

 
मीरा [मन ही मन]: 'हे भगवान... क्या सच में सरताज ने ये सब किया था? या ये सिर्फ एक सपना था? पर अगर सपना था, तो मेरा बदन इतना टूटा हुआ और इतना प्यासा क्यों महसूस हो रहा है? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अभी भी कोई हाथ मेरे पेट और जांघों को सहला रहे हैं?'

 
दरअसल, यह उस दवा का असर था। उस जड़ी-बूटी ने न केवल मीरा की यादों को धुंधला कर दिया था, बल्कि उसकी कामुक इच्छाओं को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया था। उसका शरीर अब और भी ज़्यादा उत्तेजित था। उसे अपने ही बदन की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी।

 
उसकी नज़र सोते हुए सरताज पर पड़ी। उसे लगा कि उसे सरताज को जगा देना चाहिए और उसे फिर से अपनी बाहों में भरने के लिए कहना चाहिए। उसके भीतर की आग अब बेकाबू थी।

 
दवा के उस जादुई और ज़हरीले असर ने उसे एक ऐसी प्यास दी थी, जिसे सिर्फ सरताज का मज़बूत जिस्म ही शांत कर सकता था। उसे याद आ रहा था कि कैसे उसके 'सरताज' ने उसके सुडौल स्तनों को अपने मुँह से सहलाया था, और वही अधूरा अहसास अब उसे पागल कर रहा था।

 
उसने करवट बदली और सरताज के करीब खिसक गई। सरताज अभी भी गहरी नींद में था, उसका चौड़ा सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था। मीरा ने अपनी कांपती हुई उंगलियाँ सरताज की वर्दी से आज़ाद हो चुकी छाती पर रखीं। उसकी त्वचा की गर्माहट छूते ही मीरा के बदन में बिजली सी दौड़ गई।

 
मीरा: (भारी और कामुक आवाज़ में फुसफुसाते हुए) "सरताज... उठिए ना... देखिए आपकी मीरा को क्या हो रहा है..."

 
सरताज ने नींद में ही अपनी आँखें मूँदी रखीं और मुस्कुराते हुए मीरा को अपनी बाहों में और कस लिया।

 
सरताज: (नींद भरी आवाज़ में) "सोने दो मीरा... । क्या हुआ, आज इतनी बेताबी?"

 
मीरा ने अपना चेहरा सरताज की गर्दन में छुपा लिया और उसकी मखमली खाल पर अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए कहने लगी।

 
मीरा: "दोपहर आपने जो शुरू किया था... उसे अधूरा क्यों छोड़ दिया? मुझे अभी भी वो अहसास महसूस हो रहा है... आपके वो हाथ, आपके वो होंठ..."

 
सरताज थोड़ा चौंककर जागा और उसने अधखुली आँखों से मीरा की ओर देखा। मीरा की आँखें नशीली हो रही थीं और उसका चेहरा उत्तेजना से लाल था। सरताज को याद भी नहीं था कि उसने दोपहर को ऐसा कुछ किया था, पर मीरा की ये हालत देखकर उसके भीतर का मर्द भी जाग उठा।

 
मीरा ने सरताज का हाथ पकड़ा और उसे धीरे से अपने  फड़कते हुए स्तन पर रख दिया।

 
मीरा: "देखिए ना... ये आपके इंतज़ार में कैसे पत्थर हो रहे हैं। आज रुकिए मत सरताज... आज मुझे पूरी तरह अपना बना लीजिए।"

 
सरताज ने जैसे ही उस रेशमी गोलाई की नरमी और गर्मी को महसूस किया, उसकी नींद उड़ गई। उसने मीरा को अपने नीचे दबा लिया और उसके गुलाबी होंठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

 
बाहर गलियारे में, शेर दरवाज़े की दूसरी तरफ खड़ा था। लकड़ी के उस भारी दरवाज़े के पार से आती मद्धम आवाज़ें उसके कानों में उतर रही थीं।

 
उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उसे पता था कि भले ही सरताज आज मीरा के जिस्म के साथ खेल रहा है, पर मीरा के ज़हन में जो 'नशा' और जो 'आग' है, वो शेर की दवा की देन है।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'खेलो दरोगा जी, खेलो... आज तुम उसे जो सुख दोगे, उसका रास्ता मैंने बनाया है। तुम्हारी बीवी की ये तड़प मेरी दी हुई दवा का कमाल है। तुम शरीर के मालिक हो, पर उसकी हवस का लगाम तो इस शेर के हाथ में है!'

 
मीरा के भीतर की आग अब किसी ज्वालामुखी की तरह फूटने को बेताब थी। दवा के असर ने उसकी शर्म और हया को पूरी तरह से सोख लिया था। सरताज अभी पूरी तरह होश में भी नहीं आया था कि मीरा ने बिस्तर पर घुटनों के बल खड़े होकर अपनी साड़ी की तहें खोलनी शुरू कर दीं।

 
उसका हर कदम बहुत ही धीमा और मदहोश कर देने वाला था। उसने साड़ी का पल्लू अपने कंधे से सरकाया, जिससे उसका वह गोरा और मखमली कंधा चाँदनी जैसी सुबह की रोशनी में चमक उठा। साड़ी धीरे-धीरे सरकते हुए उसके पैरों के पास ढेर हो गई।

 
अब उसके बदन पर केवल ब्लाउज़ और पेटीकोट ही शेष थे। मीरा ने अपने कांपते हाथों से ब्लाउज़ की डोरियों को ढीला किया और फिर धीरे से उसे अपनी बाहों से उतार दिया। पेटीकोट की गिरह भी खुल चुकी थी और वह सरसराते हुए फर्श पर साड़ी के ढेर में समा गया।

 
अब वह केवल अपनी सुनहरी  अंतर्वस्त्रों में खड़ी थी। उसकी पीली ब्रा के भीतर उसके वक्ष स्थल की गोलाई किसी उफनते दरिया की तरह मचल रही थी। उसकी पैंटी उसकी उभरी हुई जंघाओं पर कसी हुई थी, जहाँ उसकी उत्तेजना के कारण गीलापन साफ़ उभर आया था। वह कैमल टो उस तंग कपड़े के आर-पार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था, जो कामुकता की चरम सीमा को दर्शा रहा था।

 
मीरा का चेहरा शर्म और वासना की लज्जा से सिंदूरी लाल हो चुका था। उसकी साँसें तेज़ और उखड़ी हुई थीं। उसने एक गहरी और थरथराती हुई आह भरी और अपनी ब्रा के हुक को एक झटके में खोल दिया। वह सुनहरी पैंटी भी अब और टिक न सकी; मीरा ने उसे धीरे से नीचे की ओर धकेल दिया, और अब वह पूर्णतः नग्न अवस्था में सरताज की भूखी नज़रों के सामने अपनी पूरी मादकता के साथ खड़ी थी।

सरताज अपनी पत्नी के इस रूप को देखकर हक्का-बक्का रह गया। उसने कभी मीरा को इतना बेबाक और इतना प्यासा नहीं देखा था। मीरा ने झुककर सरताज की बनियान और कपड़े उतारे, उसका हाथ सरताज के चौड़े सीने पर रेंग रहा था।

 
जैसे ही सरताज पूरी तरह निर्वस्त्र हुआ, मीरा की नज़रें उसके उस 10-इंच के मज़बूत और फड़कते हुए अंग पर टिक गईं, जो किसी लोहे की छड़ की तरह सख्त होकर उसे चुनौती दे रहा था।

 
मीरा ने एक गहरी और लंबी आह भरी। उसने अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए स्तनों को भींचा और सरताज की आँखों में देखते हुए धीरे से उसकी जाँघों पर सवार हो गई।

 
मीरा: (कामुक लहजे में फुसफुसाते हुए) "आज... आज मुझे बस आप चाहिए... पूरी तरह से।"

 
उसने अपनी जाँघें फैलाईं और सरताज के उस विशाल अंग की नोक को अपनी गीली और गुलाबी दरार के मुहाने पर टिकाया। जैसे ही वह धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी, उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई तपती हुई छलाँग उसके भीतर उतर रही हो। उसका बदन कांपने लगा, पर प्यास इतनी थी कि उसने रुकने के बजाय एक गहरा धक्का दिया।

 
मीरा: "आह... सरताज!"

 
मीरा अब सरताज के ऊपर किसी रानी की तरह सवार थी। वह बहुत ही धीमी और लयबद्ध गति से ऊपर-नीचे होने लगी। हर बार जब वह नीचे बैठती, सरताज का वह कठोर अंग उसकी गहराई को छूता, जिससे मीरा के मुँह से सिसकियाँ निकल जातीं। उसके  स्तन उसकी इस हरकत के साथ हवा में लहरों की तरह उछल रहे थे। सरताज ने अपने दोनों मज़बूत हाथों से मीरा की कमर को थाम लिया और उसे नीचे की ओर दबाया, जिससे गहराई और बढ़ गई।

 
कमरे में सिर्फ मीरा की चूड़ियों की खनक और उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी। मीरा की रफ्तार अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था और उसकी आँखें बंद थीं। वह उस काल्पनिक 'ख्वाब' और इस हकीकत के बीच के अंतर को भूल चुकी थी। दवा का असर उसे चरम सीमा की ओर धकेल रहा था।

 
अंत में, एक ज़ोरदार धक्के के साथ मीरा ने सरताज के सीने पर अपने हाथ टिका दिए और उसका पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। एक लंबी और तीखी कराह के साथ उसने अपना चरम सुख  प्राप्त किया। उसका शरीर ढीला पड़ गया और वह सरताज के चौड़े सीने पर ढह गई, उसकी तेज़ साँसें सरताज की गर्दन पर टकरा रही थीं।

 
मीरा के चरम सुख पर पहुँचते ही सरताज के सब्र का बाँध भी पूरी तरह टूट गया। मीरा की वह मदहोश सिसकारी और उसके बदन की थरथराहट ने सरताज के भीतर के सोए हुए तूफान को जगा दिया था। मीरा अभी भी उसकी जांघों पर सवार थी, उसका पसीने से भीगा गोरा बदन सरताज से चिपका हुआ था।

 
सरताज ने अपनी मज़बूत हथेलियों से मीरा के उफनते हुए नितम्बों को कसकर जकड़ लिया। उसने नीचे से एक के बाद एक कई ज़ोरदार धक्के दिए, जिससे उसका वह 10-इंच का फड़कता हुआ अंग मीरा की गहराई के आखिरी छोर को छूने लगा। मीरा की आँखें मुँद गईं और उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका दिया।

 
सरताज: (अपनी भारी और मर्दाना आवाज़ में कराहते हुए) "ओह… मीरा… आज तुम क्या कर रही हो…"

 
सरताज के शरीर की हर नस तन गई थी। अगले ही पल, एक गहरी और ज़ोरदार कराह के साथ सरताज का पूरा शरीर अकड़ गया और उसने अपना सारा गर्म लावा मीरा की कोख की गहराइयों में उड़ेल दिया। दोनों के जिस्म पसीने से सराबोर थे और कमरे की हवा उनकी भारी पड़ती साँसों से बोझिल हो गई थी। मीरा निढाल होकर सरताज के चौड़े सीने पर ढह गई।

 
बाहर गलियारे में, शेर दरवाज़े की दूसरी तरफ खड़ा था। कमरा अंदर से बंद था, इसलिए वह कुछ देख तो नहीं पा रहा था, लेकिन लकड़ी के उस भारी दरवाज़े के पार से आती मद्धम और दबी हुई आवाज़ें उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रही थीं।

 
उसने सुना कि कैसे मीरा की सिसकियाँ एक तीखी चीख में बदलीं और फिर सरताज की वह गहरी, मर्दाना कराह... शेर का कलेजा जलकर राख हो रहा था। उसे पता था कि अंदर क्या हो रहा है। वह अपनी बंद मुट्ठियों को दीवार पर पटकने ही वाला था कि रुक गया।

 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'साला... दरोगा जी तो आज जन्नत की सैर कर रहे हैं। ये आवाज़ें... ये मीरा मेमसाब की मदहोश कराहें... ये सब मेरी दवा का कमाल है। तुम शरीर का भोग कर लो साब, पर याद रखना, ये आग मैंने लगाई है। आज तुम शांत हुए हो, पर कल जब मैं इस कमरे की कुंडी खोलूँगा, तब ये आवाज़ें इस शेर के नाम की होंगी।'

 
उसने गहरी साँस ली और अपने होंठों पर लगी उस मिठास को याद किया जो उसने मीरा के गुलाबी होंठों से चुराई थी। भले ही वह देख नहीं पा रहा था, पर उसकी कल्पना में मीरा का वह नंगा और थरथराता हुआ बदन साफ दिख रहा था। वह दबे पाँव वहाँ से हट गया, पर उसके दिमाग में अब एक ही बात घूम रही थी कि अगली बार वह इस दरवाज़े के बाहर नहीं, बल्कि उस बिस्तर के भीतर होगा।

 
दोपहर की उस आग उगलती उमस और बंद कमरे की मदहोश कर देने वाली खुशबू के बीच, करीब एक घंटे की गहरी नींद के बाद मीरा की आँखें खुलीं। वह अभी भी सरताज की बाहों में लिपटी हुई थी। उसका शरीर अब भी उस चरम सुख की थकावट और दवा के खुमार से भारी था।

 
मीरा ने अपनी पलकें झपकाईं और सामने सो रहे सरताज के चेहरे को देखा। धीरे-धीरे होश आने पर उसे याद आया कि अभी कुछ ही देर पहले क्या हुआ था। उसने कमरे की खिड़की से छनकर आती तेज़ धूप को देखा और फिर दीवार घड़ी की ओर नज़र दौड़ाई। दोपहर के 4.30 बज रहे थे।

 
उसने अचरज से सरताज को हिलाया।

 
मीरा: (उनींदी और सुरीली आवाज़ में) "सरताज... ओ सरताज, उठिए ना।"

 
सरताज ने अपनी आँखें खोलीं और मुस्कुराते हुए मीरा को और करीब खींच लिया।

 
सरताज: "उठ गया बाबा, उठ गया। आज तो तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा..."

 
मीरा ने मुस्कुराकर अपना सिर उसके सीने पर टिकाया, पर फिर उसके दिमाग में एक सवाल कौंधा।

 
मीरा: "लेकिन सरताज... एक बात बताइए, आप दोपहर में कब आए? और अचानक इस वक्त घर कैसे? आमतौर पर तो आप इस वक्त ऑफिस में फाइलों के बीच दबे होते हैं।"

 
सरताज ने मीरा की ओर देखा और फिर उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया।

 
सरताज: " दरअसल मैं ऑफिस में था और तुम्हें बार-बार फोन कर रहा था, पर तुमने एक बार भी फोन नहीं उठाया। मैं इतना फिक्रमंद हो गया कि सब काम छोड़कर दोपहर में ही घर भागा आया। मुझे लगा कहीं तुम्हारी तबीयत तो खराब नहीं हो गई।"

 
मीरा खामोश होकर उसे सुनने लगी, उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

 
सरताज: (हल्की मुस्कान के साथ) "जब मैं कमरे में आया, तो देखा कि तुम घोड़े बेचकर सो रही थी। तुम्हारी नींद खराब करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, इसलिए मैं भी बस तुम्हारे बगल में ही लेट गया। अभी मुश्किल से एक घंटा ही हुआ होगा कि तुमने अचानक मुझे नींद से जगाया और..."

 
सरताज ने शरारत भरी नज़रों से मीरा को देखा और उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया।

 
सरताज: "और फिर तुमने जिस तरह से मुझ पर सवार होकर अपना हक जताया है... सच कहूँ तो मैंने अपनी मीरा को इतना बेबाक पहले कभी नहीं देखा। तुमने जिस तरह से मुझे राइड किया ... मैं तो दंग रह गया। आखिर क्या हुआ है तुम्हें आज? इतनी आग कहाँ से आई?"

 
सरताज की ये बातें सुनते ही मीरा का चेहरा शर्म से बिल्कुल लाल हो गया। उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने खुद पहल की थी, कैसे उसने सरताज के कपड़े उतारे थे और कैसे वह उसके ऊपर सवार होकर उस पागलपन की हद तक गई थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस 'ख्वाब' में वह डूबी थी, वह असल में अभी दोपहर की हकीकत थी या कुछ और।

 
सरताज ने मीरा की आँखों में देखते हुए अपनी बात जारी रखी, उसकी आवाज़ में अभी भी थोड़ी चिंता और हैरानी घुली हुई थी।

 
सरताज: "वो सब तो ठीक है मीरा, पर तुमने मेरा फोन क्यों नहीं उठाया? मैंने एक-दो बार नहीं, कम से कम छह-सात बार कॉल किया था। मैं बुरी तरह डर गया था कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई।"

 
मीरा ने हैरान होकर सरताज की ओर देखा। उसे सच में किसी भी घंटी या कंपन का कोई अहसास नहीं हुआ था।

 
मीरा: "फोन? पर सरताज, मुझे तो कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी। मैं तो बस सो रही थी और मुझे लगा कि कमरा बिल्कुल शांत है।"

 
मीरा ने बिस्तर के बगल वाली मेज़ की ओर हाथ बढ़ाया और अपना मोबाइल उठाया। जैसे ही उसने स्क्रीन को अनलॉक किया, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ सरताज की मिस कॉल्स की एक लंबी कतार थी। उसने ऊपर की ओर देखा और दंग रह गई।

 
मीरा: (अचरज भरे स्वर में) "अरे... ये तो म्यूट  पर है! मेरा फोन तो हमेशा रिंगर पर रहता है, ये अपने आप साइलेंट कैसे हो गया?"

 
सरताज: (हल्के शक के साथ) "म्यूट पर? तुमने खुद ही किया होगा, शायद सोते वक्त गलती से हाथ लग गया हो।"

 
मीरा: (माथे पर बल डालते हुए और फोन को उलट-पलट कर देखते हुए) "शायद... शायद मुझसे ही गलती से दब गया होगा। पर मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने इसे छुआ भी था। अजीब बात है..."

 
मीरा को याद आ रहा था कि वह तो बस साड़ी पहनकर दोपहर में लेटी थी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी उस गहरी नींद और दवा के खुमार के बीच शेर की गंदी उंगलियों ने न केवल उसके फोन को म्यूट किया था, बल्कि उसकी पूरी दुनिया को म्यूट करने की साज़िश रची थी।

 
सरताज ने एक गहरी साँस ली और मीरा को दोबारा चूमते हुए कहा, "चलो छोड़ो, जो भी हुआ... कम से कम इस बहाने मुझे तुम्हारी इस बेबाक मोहब्बत का दीदार तो हुआ।"

 
सरताज बिस्तर से उठा और बाथरूम की ओर बढ़ गया। उसके दिमाग में अभी भी वह सुराख वाली बात घूम रही थी। जैसे ही उसने बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया, उसकी नज़र सबसे पहले उसी दीवार के कोने पर गई।

 
उसने गौर से देखा—सफेद टूथपेस्ट का वह निशान बिल्कुल वैसा ही था जैसा उसने लगाया था। वह सूखा हुआ था। शेर इतना शातिर था कि उसने उस छेद को दोबारा छूने की हिम्मत नहीं की थी, क्योंकि वह जानता था कि सरताज ने जाल बिछाया है।

 
सरताज ने एक ठंडी सांस ली और आईने में अपना चेहरा देखने लगा।

 
सरताज (मन ही मन): "शायद मैं कुछ ज़्यादा ही शक कर रहा हूँ... मीरा को लेकर मैं ज़रूरत से ज़्यादा 'पैरानॉइड' होता जा रहा हूँ। छेद अभी भी बंद है, घर की चीज़ें वैसी ही हैं।"

 
उसने शावर चालू किया और गिरते हुए पानी के नीचे खड़ा हो गया। उसे अपनी उस घबराहट पर अब थोड़ी हँसी आ रही थी जिसके कारण वह ऑफिस छोड़कर भागा आया था। उसे लग रहा था कि फोन म्यूट होना और उसका डरना बस एक इत्तेफाक था।

 
पर सरताज को इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी उसी 'पैरानॉइड' वाली सोच और सिक्युरिटीिया सहज ज्ञान  ने आज मीरा की इज़्ज़त को तार-तार होने से बचा लिया था।

 
अगर वह पाँच मिनट और देरी से आता, तो शेर अपना वहशी खेल पूरा कर चुका होता। सरताज का वह डर, जिसे वह अपनी कमजोरी समझ रहा था, दरअसल वह कुदरत का इशारा था जिसने उसे सही वक्त पर घर पहुँचा दिया।

 
वह मुस्कुरा रहा था कि आज दोपहर उसने मीरा के साथ इतना यादगार वक्त बिताया, बेखबर कि उसकी गैर-मौजूदगी में कोई और उसी बिस्तर पर उसकी पत्नी की रूह को ज़ख्मी करने के बेहद करीब था।

 
मीरा(मन ही मन, थोड़ा हैरान):  "ये क्या था... इतना जीवंत सपना... सरताज इतने प्यार से... इतने गहरे... छू रहे थे। लेकिन... ये सब सपना ही था न? डॉक्टर ने तो कहा था कि हार्मोनल दवाइयों से बॉडी में बदलाव आएंगे... लेकिन इतना... इतना रियल क्यों लग रहा है?"

 
वह बिस्तर से उतरी, आईने के सामने खड़ी हुई। चेहरा थोड़ा लाल था, होंठ सूजे हुए लग रहे थे। उसने साड़ी ठीक की, बाल संवारे, और फिर अचानक ख्याल आया—वह तो लिविंग रूम के सोफे पर सोई थी… किताब पढ़ते-पढ़ते। यहां बेडरूम में कैसे पहुंच गई?

 
मीरा (मन ही मन, घबराकर):  "ये कैसे हो सकता है? मैं सोफे पर लेटी थी... जूस पीया था... और फिर... नींद आ गई। लेकिन बिस्तर पर... कौन लाया मुझे?"

 
उसके मन में एक हल्का सा शक जागा, लेकिन तुरंत दबा दिया। "नहीं-नहीं… खुद ही चलकर आई होगी… नींद में ही।"

 
वह बाहर निकली, हॉल में आई। शेर किचन से निकलकर आ रहा था, हाथ में चाय का ट्रे लिए। मीरा ने उसे देखा और आवाज दी।

 
मीरा (नरम लेकिन थोड़े संकोच के साथ):  "शेर..."

 
शेर रुक गया। उसका दिल एक पल के लिए धड़क गया। लेकिन चेहरा बिल्कुल शांत, वही वफादार नौकर वाला भाव।

 
शेर (सिर झुकाकर, सम्मान से): "जी मेमसाब... बोलिए।"

 
मीरा (थोड़ा हिचकिचाते हुए): "वो... मैं... मैं लिविंग रूम में सोफे पर सोई थी न? किताब पढ़ते-पढ़ते... तुमने मुझे जूस दिया था... फिर... मुझे याद नहीं... मैं बेडरूम के बिस्तर पर कैसे पहुंच गई? क्या तुमने... मुझे उठाकर वहां ले गए?"

 
शेर के चेहरे पर एक पल के लिए हल्की सी घबराहट आई—उसकी आंखें एक सेकंड के लिए नीचे झुक गईं। लेकिन वह फौरन संभल गया। उसने ट्रे टेबल पर रखी और बहुत सहजता से जवाब दिया।

 
शेर (बड़ी मासूमियत से, आंखें मीरा की आंखों में डालकर): "नहीं मेमसाब... मैंने आपको जूस दिया था, आपने पीया और सोफे पर ही लेट गईं। फिर मैं किचन में चला गया... बर्तन धोने। जब वापस आया, तो आप लिविंग रूम में नहीं थीं। मैंने सोचा, शायद आप कमरे में आराम करने चली गई होंगी। मैंने कोई आवाज नहीं की, सोचा आप सो रही होंगी।"

 
वह रुक गया, फिर थोड़ा मुस्कुराकर बोला—

 
शेर:  "क्यों, मेमसाब… कोई बात तो नहीं? आप ठीक तो हैं न? चेहरा थोड़ा… लाल लग रहा है।"

 
मीरा ने अपना हाथ अपने गरम गालों पर रखा। शेर की नज़रों में आज एक ऐसी बेबाकी थी जो मीरा के बदन के आर-पार देख रही थी। पहली बार, उस ज़हरीली दवा के नशे में, मीरा ने शेर को एक 'नौकर' की तरह नहीं बल्कि एक मज़बूत, सांवले और जवान मर्द की तरह देखा।

 
उसे शेर के उस खुरदरेपन में एक अजीब सी उत्तेजना महसूस हुई। उसके मन में ख्याल आया कि क्या इस सांवले जिस्म में भी उतनी ही आग होगी जितनी उसने अपने 'सपने' में महसूस की थी?

 
पर अगले ही पल वह कांप उठी।

 
मीरा (मन ही मन): "छि:! मैं ये क्या सोच रही हूँ? वो मेरा नौकर है। ये दवाइयां सच में मेरा दिमाग खराब कर रही हैं।"

 
शेर (मन ही मन, शैतानी मुस्कान के साथ, लेकिन बाहर से शांत):  "जी मेमसाब... आप आराम कर लीजिए। मैं चाय बना देता हूं।"

 
मीरा(हल्के से मुस्कुराकर): "हां... ठीक है। चाय बना दो।"

 
मीरा कमरे की तरफ चली गई। उसके कदमों में अभी भी वो सुलगती हुई गर्मी थी। वह बिस्तर पर बैठी, हाथ अपनी जांघों पर फेरने लगी। मन में वही अधूरा सपना बार-बार घूम रहा था।
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
  2. सम्मान और बदला ( 5th-Book in hindi)
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना




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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 27-02-2026, 05:05 AM



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