24-02-2026, 09:53 PM
गेट से लेकर मेन डोर तक सब कुछ साफ-सुथरा और चमक रहा था. डोरबेल बजने पर एक आदमी आ कर दरवाज़ा खोल गया --- नौकर ही होगा शायद— रणधीर बाबू के बारे में पूछने पर बताया कि,
कुछ मिनटों के बाद अंदर के कमरे से रणधीर बाबू आए. कुरता-पजामा में वो काफ़ी जंच रहे थें — आशा की ओर देखते हुए एक स्वागत वाली मुस्कान दे कर ठीक सामने वाली सोफ़ा चेयर पर बैठ गए. रणधीर बाबू को नमस्ते करके आशा भी बैठ गई. बैठते समय आशा को आगे की ओर थोड़ा झुकना पड़ा था --- और यही झुकना ही शायद उसकी बहुत बड़ी गलती हो गई थी उस दिन. आशा के मुखरे की खूबसूरती देख प्रभावित हुआ रणधीर बाबू अब भी उसी की ओर ही देख रहा था कि तभी वो भी नमस्ते करके बैठते हुए तनिक झुक गई --- और इससे उसका दायाँ स्तन टाइट ब्लाउज-ब्रा कप के कारण ऊपर की ओर ज़्यादा निकल आया! यूँ समझिए की लगभग पूरा ही निकल आया था!! सुनहरी गोल फ्रेम के चश्मे से आशा की ओर देख रहे रणधीर बाबू वो नज़ारा देखते ही क्षण भर में बदहवास सा हो गए... मुँह से पान की पीक निकलते-निकलते रह गई… यहाँ तक की वह निगलना तक भूल गए और इसलिए होंठों के एक किनारे से थोड़ी पीक निकल भी आई. आँख गोल बड़े-बड़े हो गए. हद तो तब हो गई जब 2 सेकंड बाद ही आशा नीर के द्वारा एक बिस्कुट गिरा दिए जाने पर झुक कर कारपेट पर से बिस्कुट उठाने लगी और उसके ऐसा करने से रणधीर बाबू ने शायद अपने जीवन में अब तक का चिर-परिचित किन्तु सबसे सुन्दर नज़ारा देखा होगा... चूची के वजन से दाएँ साइड से साड़ी का पल्ला हट गया थे और तंग ब्लाउज में से उतनी बड़ी चूची एक तो वैसे ही नहीं समा रही थी, और तो और, पूरा ही बाहर निकल आने को बस रत्ती भर की देर थी ---- सिर्फ यही नहीं, करीब-करीब सात इंच का एक लंबा गहरा दूधिया क्लीवेज भी सामने प्रकट हो गया था!
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“साहब अभी नाश्ता कर रहे हैं—आप बैठिए.”
सामने सोफ़े की ओर इंगित कर के वह चला गया. आशा उसी सोफे पर बैठ गई… नीर बीच-बीच में जल्दी घर जाने की ज़िद कर रहा था. इसी बीच वही नौकर दो गिलास में पानी दे गया. आशा को प्यास लगी थी, इसलिए पानी गटकने में देर नहीं की. एक प्लेट में कुछ बिस्किट्स भी ले आया था वो आदमी. आशा के कुछ समझने से पहले ही नीर झट से दो बिस्कुट उठाकर अपने मुँह में रख लिया. आशा उसे घूर कर देखी. नीर सहम कर दूसरी तरफ देखने लगा... लेकिन बिस्कुट फिर भी नहीं निकाला मुँह से और जल्दी-जल्दी खा गया.
जहां तक हो सके... जितना हो सके... आशा नज़रें घूमा-घूमा कर उस आलिशान रूम को देखने लगी ---- टाइल्स, मार्बल्स, दीवार घड़ी, टेबल, चेयर्स,सोफ़ा सेट... सब कुछ शायद इम्पोर्टेड ही रखा हुआ है वहाँ! क्या फर्नीचर और क्या खिड़की के पलड़े --- यहाँ तक की खिड़कियों पर लगे पर्दे भी अपनी ख़ूबसूरती से खुद के बेशकीमती होने के सबूत देना चाह रहे थें.
कुछ मिनटों के बाद अंदर के कमरे से रणधीर बाबू आए. कुरता-पजामा में वो काफ़ी जंच रहे थें — आशा की ओर देखते हुए एक स्वागत वाली मुस्कान दे कर ठीक सामने वाली सोफ़ा चेयर पर बैठ गए. रणधीर बाबू को नमस्ते करके आशा भी बैठ गई. बैठते समय आशा को आगे की ओर थोड़ा झुकना पड़ा था --- और यही झुकना ही शायद उसकी बहुत बड़ी गलती हो गई थी उस दिन. आशा के मुखरे की खूबसूरती देख प्रभावित हुआ रणधीर बाबू अब भी उसी की ओर ही देख रहा था कि तभी वो भी नमस्ते करके बैठते हुए तनिक झुक गई --- और इससे उसका दायाँ स्तन टाइट ब्लाउज-ब्रा कप के कारण ऊपर की ओर ज़्यादा निकल आया! यूँ समझिए की लगभग पूरा ही निकल आया था!! सुनहरी गोल फ्रेम के चश्मे से आशा की ओर देख रहे रणधीर बाबू वो नज़ारा देखते ही क्षण भर में बदहवास सा हो गए... मुँह से पान की पीक निकलते-निकलते रह गई… यहाँ तक की वह निगलना तक भूल गए और इसलिए होंठों के एक किनारे से थोड़ी पीक निकल भी आई. आँख गोल बड़े-बड़े हो गए. हद तो तब हो गई जब 2 सेकंड बाद ही आशा नीर के द्वारा एक बिस्कुट गिरा दिए जाने पर झुक कर कारपेट पर से बिस्कुट उठाने लगी और उसके ऐसा करने से रणधीर बाबू ने शायद अपने जीवन में अब तक का चिर-परिचित किन्तु सबसे सुन्दर नज़ारा देखा होगा... चूची के वजन से दाएँ साइड से साड़ी का पल्ला हट गया थे और तंग ब्लाउज में से उतनी बड़ी चूची एक तो वैसे ही नहीं समा रही थी, और तो और, पूरा ही बाहर निकल आने को बस रत्ती भर की देर थी ---- सिर्फ यही नहीं, करीब-करीब सात इंच का एक लंबा गहरा दूधिया क्लीवेज भी सामने प्रकट हो गया था!
चाहे कितना भी नंगा देख लो, पर अधनंगी चूचियों को देखने में एक अलग ही मज़ा आता है ---- खास कर यदि चूचियों में पुष्टता हो और क्लीवेज की भी एक अच्छी लंबाई व गहराई हो --- ऊपर से रणधीर बाबू तो इन्ही दो चीज़ों पर जान छिड़कते थे.
आशा सीधी होकर बैठ गई — पर पल्लू को ठीक नहीं की. शायद उसका ध्यान नहीं गया होगा. इससे दायीं ब्लाउज कप में कैद दायीं चूची ऊपर को निकली हुई अपनी गोलाई के साथ पल्लू से बाहर झाँकती रही और रणधीर बाबू को एक अनुपम नयनसुख का एहसास कराती रही.
रणधीर बाबू तो जैसे अंदर ही अंदर स्वर्गलाभ करने लगे थे... साथ ही यह दृढ़ निश्चय भी करने लगे कि अगर इसी तरह प्रत्येक दिन दूध वाले सौन्दर्य दर्शन करना है तो उन्हें न सिर्फ़ अभी के अभी इस नायाब माल को नौकरी के लिए हाँ करना है बल्कि बिल्कुल भी इंकार न कर सके ऐसा कोई ज़बरदस्त ऑफर भी करना होगा.
गला खँखारते हुए उन्होंने पूछा,
“यहाँ आते हुए कोई दिक्कत तो नहीं हुई न, आशा जी?”
“नहीं सर, कोई प्रोब्लम नहीं हुई... पर सर, आप प्लीज़ मुझे ‘जी’ कह कर संबोधित मत कीजिए. मैं बहुत छोटी हूँ आपसे—तकरीबन आपकी बेटी की उम्र की हूँ.”
आशा के ऐसा कहते ही एक उत्तेजना वाली लहर दौड़ गई रणधीर बाबू के पूरे शरीर में. अब ध्यान दिया --- आशा की उम्र लगभग उनकी अपनी बेटी की उम्र के आसपास ही होगी. अपने से इतनी कम उम्र की किसी लड़की के साथ सम्बन्ध बनाने की कल्पना मात्र से ही रणधीर बाबू का रोम-रोम एक अद्भुत रोमाँच से भर गया.
पहले तो नहीं, पर अब आशा को अच्छे से देखने से वाकई लग रहा है कि कम से कम 20-22 साल का अंतर तो होगा ही दोनों में --- रणधीर बाबू ने खुद अनुमान लगाया की जब वह खुद 65 के हैं तो आशा तो कम से कम 35-40 की होगी ही... उम्र का ये अंतर भी काफ़ी था उनके पजामे में हरकत करवाने में.
थोड़ी देर तक इधर-उधर की फॉर्मेलिटी पूछ्ताछ के बाद,
“अच्छा आशा, तुम्हारे जवाबों से मुझे संतुष्टि तो हुई है... मम्ममम..... (अब नज़र आशा के बेटे पर गई…) प्यारा बच्चा है, क्या नाम है इसका…?”
आशा ने खुद जवाब न देकर नीर से कहा,
“बाबू... अंकल के निजेर नाम बौलो.” (“बाबू... अंकल को अपना नाम बताओ.”)
तनिक तोतलाते हुए नीर ने जवाब दिया,
“न..नीर.. नीरज... नीरज मुखर्जी…”
रणधीर बाबू उसका जवाब सुनकर हँसते हुए पूछे,
“एंड व्हाट्स योर फादर्स नेम?”
जारी है....
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