21-02-2026, 03:23 PM
भाग २)
रणधीर सिन्हा.. एंड फर्स्ट एनकाउंटर विद हिम
ज़ाहिर है कि बेशुमार दौलत जिसके पास हो और घर में बीवी ना हो तो ऐसे लोग खुले सांड की तरह हो जाते हैं.
कुछ ऐसा ही हाल था रणधीर बाबू का भी... पिछले कुछ महीनों से उनके घर में महिलाओं और लड़कियों का आना-जाना शुरू हो गया है. और सिर्फ़ शुरू ही नहीं हुआ; बल्कि बेतहाशा बढ़ भी गया है! ये औरतें और लड़कियाँ अधिकांश वो होती हैं जो रणधीर बाबू के किसी न किसी बिज़नेस या फर्म में काम करती हैं. रणधीर बाबू ने इतने फर्म्स खोल रखे हैं की शहर में किसी को भी अगर नौकरी की ज़रूरत होती तो वह सबसे पहले सीधे रणधीर बाबू के ही किसी एक ऑफिस में जा कर आवेदन करता. रणधीर बाबू अच्छी सैलरी देने के साथ ही अपने एम्प्लाइज को और ज़्यादा निखारने के लिए समय-समय पर उनकी ग्रूमिंग भी करते —- वो भी खुद अपने निरीक्षण में ! इससे उसके अंडर में काम करने वालों को डबल फ़ायदा होता…. एक तो अच्छी सैलरी मिलना और दूसरा, भविष्य के लिए खुद को और अधिक योग्य बनाना.
और इसलिए एम्प्लाइज भी हमेशा रणधीर बाबू के कुछ गलत आदतों-बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं. मसलन, रणधीर बाबू का अक्सर नशे में होना, शार्ट टेम्पर होना, हर लेडी स्टाफ को ग़लत नज़र से देखना और उनके साथ मनमाफिक छेड़खानी करना इत्यादि.. शराब और शबाब को लेकर उनके पूर्ण हृदय-समर्पण के बारे में तो हर कोई जानता है… विशेषतः खाती-पीती, अच्छी दिखने वाली महिलाओं के प्रति उनकी कमज़ोरी तो हर किसी के सामने जगजाहिर है.
रणधीर बाबू ऐसे व्यक्ति पहले नहीं थे.
पर समय से कहीं पहले धर्मपत्नी का वियोग, संतानों का विदेश में सेटल हो जाने के बाद वो काफी अकेले पड़ गए थे. सिर्फ घर में नहीं, अपितु वर्षों से अपने हाथों से सींच कर खड़ा किए अपने ही कार्यक्षेत्र में भी स्वयं को अत्यंत अकेला अनुभव करने लगे थे. इसका कोई ठोस कारण वो कभी समझ नहीं पाए. ऑफिस से घर आने पर तब तो अकेला फील होना समझ में आता है किंतु यदि ऑफिस वगैरह में भी 'एकांत' आपको काटने को दौड़े तो फिर जवाब सिर्फ दूसरों का संगति ही हो सकता है, अन्य कुछ नहीं.
कुछ समय तक तो दोस्तों-रिश्तेदारों के सोहबत ने उनके इस 'एकांत' को उनसे दूर रखा पर धीरे-धीरे ये तरीका फीका पड़ने लगा. आखिर सबके तो अपने पर्सनल लाइफ है, हर कोई हमेशा तो किसी एक को उसका 'अकेलापन' दूर करने की खातिर कंपनी तो नहीं दे सकता न.
ये बात रणधीर बाबू को जल्द ही समझ में आ गयी और इसलिए उन्होंने समय रहते स्वयं को दूसरों की संगति से अलग कर लिया था.
पर किसी का साथ तो चाहिए ही था…
शीघ्र ही उनकी भेंट हुई उन्हीं की एक नन - बैंकिंग कंपनी में काम करने वाली 'रूचि' से... पहले - पहल तो रूचि में कोई खास रूचि उनकी जागी नहीं लेकिन समय बीतने के साथ न जाने क्यों और कैसे दोनों पास आते गए और बात फॉर्मल बातों से जा कर खास मेल-मुलाकातों में बदल गई. रूचि की पर्सनैलिटी ने रणधीर बाबू को काफी मोहित किया था. उसका चलना, बोलना, हँसना, इत्यादि सब कुछ जैसे किसी खास साँचे में ढाला गया था…
रूचि को देखते ही रणधीर बाबू को ज़ी न्यूज़ की एंकर 'रूबिका' की याद जाती थी --- हाँ, एक समय वह बहुत बड़ी क्रश हुआ करती थी रणधीर बाबू की. स्क्रीन पे उसका कोई शो आते ही रणधीर बाबू सब काम एक ओर रखकर वो शो देखने लगते थे….
‘आह, क्या मस्त क्लीवेज-दर्शन करवाती थी!’
रूचि भी कुछ कम नहीं थी. कई मायनों में वह बिल्कुल 'रूबिका' ही लगती थी.
और दोनों के बीच सब कुछ बहुत बढ़िया चल भी रहा था…
पर बढ़ती उम्र में रणधीर बाबू के नए - नए शौक ने खिलते, फलते रिश्ते में दरार डाल दिया...
हद तो तब हो गई जब एक दिन एकाएक रणधीर बाबू को गाँड मारने का नायाब शौक चढ़ गया! रूचि के साथ हमबिस्तर होने के थोड़ी देर बाद ही रणधीर बाबू ने उसे डॉगी पोजीशन में ले आए और चुत में 8-10 बार अंदर-बाहर करने के बाद बिना किसी लुब्रीकेंट के, बिना किसी चेतावनी के, बिना कोई आभास दिए, लंड छेद पे टिकाया और फक्क से उसका टोपा अंदर कर दिया था!
बेचारी मारे दर्द के ऐसा चीखी, ऐसा चिल्लाई... माँ-बहन की ऐसी तगड़ी गालियाँ बकीं जिन्हें खुद कभी रणधीर बाबू ने भी नहीं सुना होगा.
पर कहते हैं न कि,
‘हवस में इंसान अगर एक बार हैवान बन जाए तो तब तक नहीं रुकता जब तक की या तो उसकी हवस न मिट जाए या फिर उसके पसंद की हैवानियत खत्म न हो जाए…’
रूचि के केस में भी यही हुआ...
रणधीर बाबू छेद बड़ा होने तक गाँड मारते रहे....
तब तक, जब तक कि उनका लंड बिना किसी ट्रैफिक के बड़ी सुगमता से अंदर-बाहर होने नहीं लगा था... छेद और रूचि की हालत की बात न ही की जाए तो बेहतर होगा.
और एक बार नहीं,... कुल चार बार उस छेद पर अपनी मुसल की कृपा-वर्षा की. मन तो फिर भी नहीं भरा उनका लेकिन रात के 2:30 बजे के बाद उनका शरीर भी जवाब देने लगा था. ये पहली बार था जब रणधीर बाबू रूचि पर जानवरों जैसा बरसे थे,. चूचियों, खास कर निप्पल और एरोला को, कमर, कंधे, पीठ में कई जगह इतना काटे थे; और कुछ बेरहमी के साथ काटे थे की कई जगह से खून की बूँदें छलक आईं थीं!उस एक रात के बाद अगले कुछ दिनों तक रूचि काम पे नहीं आई थी. फिर एक दिन अचानक फोन पे ही अपना इस्तीफा दे दी. इस बात को लेकर उसके ऑफिस में, यहाँ तक की धीरे-धीरे रणधीर बाबू के सभी बिज़नेस हाउस में कई तरह की अफवाहें उड़ने लगीं थीं. कई ने रूचि के मामले को महज अफवाह मान कर हवा में उड़ा दिया तो कुछ ने रणधीर के कारनामों के ताबूत पे अंतिम कील समझ कर बिज़नेस के बाहर के लोगों को भी ये अफवाह मसाला लगा कर सुनाया था. लेकिन जैसा की जगत का नियम है कि ‘ताकतवर को, सामर्थ्यवान को दोष नहीं लगता…’ ठीक यही नियम रणधीर बाबू के केस में भी चरितार्थ हुआ. यही नहीं, जिन लोगों ने अफवाहों को उड़ाने और उन्हें बल देने में स्पेशल इंटरेस्ट दिखाया था, उन सभी पर सख्त कार्यवाही की गई थी. धीरे-धीरे यह कांड समय के रेत में जल्दी दब गई... और रणधीर बाबू के कारनामे थोड़े समय के वनवास के बाद फिर से चालू हो गए थे…
आशा को अपनी ही एक सहेली से रणधीर बाबू के ऑफिस का नंबर मिला था… नौकरी के लिए आवेदन करने हेतु. वैकेंसी के बारे में जानकारी लेने के सिलसिले में ऑफिस में किसी लेडी स्टाफ़ से फ़ोन पर बात हुई थी आशा की. दो-तीन पोजीशन खाली होने के बारे में बताया गया था और इसी दरम्यान आशा से उसके बारे में भी जानकारी ली गई थी --- बाद में उसी दिन शाम को ऑफिस से फ़ोन आया था कि रणधीर बाबू ने ऑफिस से पहले एक बार उसे अपने घर बुलाया है बायोडाटा और दूसरे एकेडमिक सर्टिफिकेट्स के साथ; ऐसा इसलिए क्योंकि ऑफिस में मिलने से पहले रणधीर बाबू हर क्लाइंट से घर में मिलते हैं... कार्यक्षेत्र में ऑफिशियली मिलने से पहले घर में पर्सनली मिल कर जॉब के लिए अप्लाई करने वालों को एक व्यक्ति, एक इंसान के तौर पर टटोल लेने में विश्वासी रहे हैं रणधीर बाबू,. अब या तो ये सब उन्हीं का कोई बिज़नेस फंडा होगा या फिर शायद कोई अंधविश्वास होगा.
रणधीर बाबू के यहाँ बुलाए जाने की बात सुनते ही आशा ख़ुशी से नाच उठी थी. उसे पूरा भरोसा था कि रणधीर बाबू ने अगर बुलाया है तो फिर जॉब पक्की है. उसे अपनी क्वालिफिकेशन के साथ-साथ अपनी ख़ूबसूरती पर भी अडिग विश्वास रहा था हमेशा से… क्वालिफिकेशन देख कर 'ना' करना भी चाहे कोई अगर तो शायद आशा की सुंदरता के आगे अपने फैसले बदलने को मज़बूर हो जाए! आशा को एक औरत के दो कारगर हथियारों के बारे में बहुत अच्छे से पता रहा है हमेशा से और वो हैं;
१) औरत की ख़ूबसूरत देह और
२) औरत के आँसू
किसी भी औरत के ये दो ऐसे तेज़ हथियार हैं जो दिलों को ही क्या ---- बड़े-बड़े सत्ता तक को हिला और मिट्टी में मिला सकते हैं. दिग्गज ज्ञानी और विद्वान भी इन दो हथियारों के अचूक निशाने से खुद को बचा पाने में पूरी तरह से विफ़ल पाते हैं. फिर रणधीर बाबू जैसे लोगों की बिसात ही क्या है?
अगले ही दिन आशा बहुत अच्छे से तैयार हो कर रणधीर बाबू के यहाँ चली गई ---- गोल्डन बॉर्डर की बीटरेड साड़ी, साड़ी पर ही लाल और सुनहरे धागे से छोटे-छोटे फूल और कई सुंदर कलाकृतियाँ बनी हुई हैं---मैचिंग ब्लाउज --- शॉर्ट स्लीव--- ब्लाउज भी थोड़ा टाइट--- चूचियों को उनके पूरी गोलाईयों के साथ ऊपर की ओर स्थिर उठाए हुए --- सामने से डीप ‘वी’ कट और पीछे काफ़ी खुला हुआ--- डीप ‘यू’ कट--- ब्लाउज के निचले बॉर्डर और कमर पर बंधी साड़ी के बीच काफ़ी गैप है--- और चलने-फिरने से उस गैप से आशा का गोरा चिकना पेट साफ़ दिख रहा है. बाहर की ओर निकली हुई गोलाकार पिछवाड़ा टाइट बाँधी हुई साड़ी में एकदम स्पष्ट रूप से समझ में आ रही है और हर पड़ते कदम के साथ ऊपर-नीचे करती हुई नाच रही है.
नीर को अपने साथ लेकर आशा ऑटो से रणधीर बाबू के यहाँ पहुँची. इससे पहले रास्ते भर ऑटोवाला रियरव्यू मिरर से आशा की कसी बदन को ताड़ता रहा... ऑटो के तेज़ चलने से आने वाली हवा के झोंकों से कभी आशा के दाएँ तो कभी बाएँ तरफ़ का साड़ी का पल्ला उड़ जाता... अगर दायीं तरफ़ का उड़ता तो तंग ब्लाउज कप में कसी आशा की भरी गदराई चूची के ऊपरी गोलाई के दर्शन हो जाते और यदि बाएँ साइड से पल्ला उड़ता तो ब्लाउज कप में कैद आशा का बायाँ वक्ष अपनी पूरी गोलाई के आकार के साथ दिखता---और तो और ब्लाउज के निचले बॉर्डर से शुरू होकर कमर तक करीब 5-6 इंच के गैप में आँखों को बाँध देने वाली गोरी नर्म पेट का दर्शन हो रहा था.
जैसे - जैसे जगह मिलते ही ऑटो की स्पीड बढ़ती; वैसे - वैसे चलने वाली हवा भी तेज़ हो जाती---और इन्हीं तेज़ हवा के झोंकों से, रह-रह कर आशा का पल्लू उसके सीने पर से हट जाता और उस लाल तंग ब्लाउज के कप में कैद दायीं चूची पूरी और बायीं चूची का थोड़ा सा हिस्सा नज़र आ जाता... और इसके साथ ही एक लंबी-सी घाटी, अर्थात क्लीवेज भी दृष्टिगोचर हो जाती. एक तंग ब्लाउज में कैद पुष्टता से परिपूर्ण एक-दूसरे से सट कर लगे दो चूचियों के कारण बनने वाली एक क्लीवेज का आकार क्या और कैसा हो सकता है इसका तो हर कोई सहज ही अंदाज़ा लगा सकता है--- और जब बात बिल्कुल अपने सामने देखने की हो तो ऐसा अलौकिक दृश्य भला कौन मूर्ख छोड़ना चाहेगा?! बाएँ कंधे पर साड़ी को अगर सेफ्टी पिन से न लगाया होता, आशा ने तो शायद अब तक पूरा पल्लू ही हट गया होता! वो गोरी-गोरी चूचियाँ जो रोड के हरेक गड्ढे और उतार-चढ़ाव के आने पर ऐसे उछलती जैसे की कोई रबर बॉल या बैलून --- या – या फ़िर मानो पानी वाले गुब्बारे हों, जिन्हें भर कर ज़रा सा हिलाने पर जैसा हिलते हैं ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे हो कर हिल रही थीं. चूचियाँ तो कयामत ढा ही रही थीं पर आशा का दुधिया क्लीवेज भी --- जो पत्थर तक को पिघला कर पानी कर दे ---- ऑटोवाले को मदहोश किए जा रही थी.
ऐसा नहीं की आशा को पता नहीं चला था की ऑटोवाले का ध्यान कहाँ है... पर शायद कहीं न कहीं वो किसी भी मर्द को टीज़ करने में बड़ा सुख पाती है --- मर्दों का बेचैन हो जाना, थोड़ा और – थोड़ा और कर के लालायित रहना ---- यहाँ तक की ज़रा सा देह दर्शन करा देने से आजीवन चरणों का दास बने रहने की मर्दों की मौन सौगंध और स्वीकृति उसे अंदर तक गुदगुदा देती है. कॉलेज जीवन में फेरी वालों से 2-5 रुपये का कुछ बिल्कुल मुफ्त में लेना हो या फिर चाटवाले से कॉम्प्लीमेंट के तौर पर 2 एक्स्ट्रा बिना पानी वाला पानीपूरी खा लेना --- ये सब वह करती थी--- और ये सब वो करती थी अपनी ‘सिर्फ़ २ इंच का दूधिया क्लीवेज दिखा कर!’
बीते दिनों की यादों ने आशा के चेहरे पर एक कमीनी, कातिल मुस्कान ला दी; तिरछी आँखों से वह कुछेक बार ऑटोवाले लड़के की ओर देख चुकी है अब तक और हर बार ऑटोवाले लड़का एक हाथ से हैंडल पकड़े, दूसरे हाथ को सामने नीचे की ओर रखा हुआ मिला--- आँखों को सामने रोड पर टिकाए रखने की असफ़ल कोशिश करता हुआ.
‘फ़िक’ से धीमी आवाज़ में आशा की हँसी निकल गई… वह समझ गई की लड़का दूसरे हाथ से अपने हथियार को फड़क कर खड़ा होने से रोकना चाह रहा है पर नाकाम हो रहा है. बेचारे लड़के की ऐसी दुर्दशा का ज़िम्मेवार ख़ुद को मानते हुए आशा गर्व से ऐसी फूली समाई कि उसकी दोनों चूचियाँ और अधिक फूल कर सामने की ओर तनने लगीं...
खैर,
रणधीर बाबू के घर के सामने पहुँच कर ऑटो रुका...
घर तो नहीं एक बड़ा बंगला हो जैसे. आशा अपने बेटे को ले कर जल्दी से उतर कर बैग से पैसे निकालने लगी--- पल्लू अब भी यथास्थान न होने के कारण ऑटोवाला लड़का अभी भी बहुमूल्य संपत्तियों का नयनसुख ले रहा है. आशा बिना उसकी ओर देखे उसकी आँखों की दिशा को भाँपते हुए चोर नज़र से अपने शरीर को देखी और देखते ही एक झटका लगा उसे—पल्लू का स्थान गड़बड़ाने से उसकी दाईं चूची और क्लीवेज तो दिख ही रहा है पर साथ ही साथ, पल्लू बाएँ साइड से भी उठा हुआ होने के कारण बाईं चूची का गोल आकार और निप्पल का इम्प्रैशन साफ़ समझ में आ रहा है... वो भी ब्लाउज के ऊपर से ही!! इतना ही नहीं, आशा का दूधिया पेट और गोल गहरी नाभि भी सामने दृश्यमान हैं! वह लड़का कभी गहरी नाभि को देखता तो कभी रसीले दूधों को. आशा खुद को संभालते हुए जल्दी से पल्लू ठीक कर ऑटोवाले को पैनी नज़रों से देखी. लड़का डर कर तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा. पैसे देकर आशा पलट कर जाने ही वाली थी कि लड़का पूछ बैठा,
“मैडम..... मैं रहूँ या चलूँ?”
आशा ज़रा सा पीछे सर घूमा कर बोली,
“तुम जाओ.. मेरा काम हो गया.”
इतना कहकर नीर का हाथ पकड़ कर गेट की ओर बढ़ गई और इधर वह लड़का आशा के रूखे शब्द सुनकर और अपेक्षित उत्तर न पाकर थोड़ा निराश तो हुआ पर पीछे से आशा की गोल उभरी गाँड को देखकर उसकी वह निराशा पल भर में उत्तेजना में बदल गया और किसी मदमस्त गजगामिनी की भाँति आशा के चलने से गोल गाँड में होती थिरकन को देख, एक वासनायुक्त ‘आह’ कर के रह गया.
जारी है....


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