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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
शेर का अभियान-1
 
अगली दोपहर, घर में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। सरताज ऑफिस में व्यस्त था, जबकि ज्योति कॉलेज में अपनी क्लास अटेंड कर रही थी। मीरा लिविंग रूम के आरामदायक सोफे पर बैठी हुई थी, एक रोमांटिक उपन्यास में खोई हुई।
 
वह एक पीली साड़ी पहने हुई थी, जो उसके गोरे रंग पर खूब जंच रही थी। साड़ी का पल्लू हल्का सा लहरा रहा था, और उसकी कमर का कुछ हिस्सा झलक रहा था।
 
घर का नौकर शेर चुपचाप किचन से बाहर आया, उसके हाथ में एक गिलास ताजा अनार का जूस था। उसने बड़ी चालाकी से उसमें एक खास दवा मिला दी थी—एक ऐसी दवा जो शरीर में गर्मी की लहर दौड़ा देती है, नसों को उत्तेजित कर देती है, और दिमाग को एक गहरी, मदहोश करने वाली नींद में सुला देती है। दवा इतनी असरदार थी कि पीने वाला व्यक्ति सपनों की दुनिया में खो जाता, जहां हकीकत और कल्पना का फर्क मिट जाता।
 
शेर [आंतरिक विचार]: 'आज मेमसाब... आज तो ये शेर सीधे गुफा में घुसेगा। ई जूस की एक-एक बूंद आपकी रगों में वो आग लगाएगी कि आप खुद सरताज को भूलकर मुझे पुकारेंगी।'
 
शेर: (सम्मानजनक लहजे में, लेकिन आंखों में एक छिपी हुई चमक के साथ) "मेमसाब, साब ने मुझे सख्त हिदायत दी थी कि आप जूस समय पर नहीं पीतीं। ये लीजिए, मैंने अभी-अभी ताजा अनार से निकाला है। इसमें थोड़ी सी इलायची भी मिलाई है, ताकि स्वाद और बेहतर हो जाए।"
 
मीरा ने किताब से नज़रें उठाईं और मुस्कुराकर गिलास थाम लिया। वह  धीरे-धीरे जूस पीने लगी। हर घूंट के साथ उसका चेहरा तरोताजा लग रहा था।
 
मीरा ने मुस्कुराकर गिलास थाम लिया। "शुक्रिया शेर। तुम बहुत ख्याल रखते हो।"
 
 
करीब दस मिनट बाद, मीरा को अपनी आंखों पर एक अजीब सा भारीपन महसूस होने लगा। उसकी पलकें बोझिल हो रही थीं, और किताब उसके हाथ से फिसलकर सोफे पर गिर गई। वह सोफे पर ही लेट गई, सोचते हुए कि बस एक छोटी सी झपकी ले लेगी।
 
लेकिन दवा ने अपना जादू चला दिया था—वह गहरी बेहोशी में उतर गई, जहां उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी, और दिमाग में कामुक सपने घूमने लगे। उसके होंठ हल्के से खुले थे, और सांसें थोड़ी तेज हो गई थीं।
 
शेर दबे पाँव पास आया। उसने देखा कि मीरा का शरीर अब पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। उसका पल्लू सोफे के नीचे लटक रहा था और उसका नंगा पेट और गहरी नाभि खुली हवा में सांस ले रहे थे।
 
शेर धीरे से फर्श पर उसके पास बैठ गया। उसने पहले मीरा के चेहरे को निहारा। दवा ने अपना काम शुरू कर दिया था; मीरा के होंठ हल्के खुले थे और उसके चेहरे पर एक हल्की गुलाबी रंगत छा गई थी।
 
शेर ने कांपते हुए अपनी उंगलियाँ मीरा के पैरों के तलवों पर रखीं। वह मखमली त्वचा छूते ही शेर के बदन में आग लग गई। वह स्पर्श इतना नरम था कि मीरा को नींद में लगा जैसे कोई हल्की सी गुदगुदी हो रही है। शेर की सांसें तेज हो गईं; उसकी उंगलियां धीरे-धीरे पैर की उंगलियों पर फिसलने लगीं, उन्हें सहलाते हुए।
 
शेर: (अपने मन में फुसफुसाते हुए, इतनी धीमी आवाज में कि खुद को ही सुनाई दे) "ओह... कितने कोमल हैं ये... जैसे मखमल। मेमसाब, आप कितनी खूबसूरत हैं। मैं बस थोड़ा सा... थोड़ा सा छू लूंगा।"
 
वह बहुत धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा। उसकी उंगलियां अब मीरा की टांगों पर थीं—साड़ी के नीचे से छूते हुए, बिना कोई दबाव डाले। मीरा के शरीर में एक हल्की सी सिहरन दौड़ी, लेकिन वह नींद में ही रही।
 
शेर की हिम्मत बढ़ी। उसने अपनी हथेली मीरा के नंगे पेट पर रखी—वह हिस्सा दवा की गर्मी से तप रहा था, जैसे कोई आग सुलग रही हो। शेर ने बहुत धीरे से अपनी उंगलियां वहां घुमाईं, गोल-गोल चक्कर लगाते हुए। मीरा के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली—
 
मीरा के मुँह से एक धीमी सिसकी निकली—"हम्म..."—
 
शेर रुक गया, डरते हुए कि कहीं मीरा जाग न जाए। लेकिन जब उसने देखा कि मीरा की आंखें अभी भी बंद हैं और उसका चेहरा और गुलाबी हो गया है, तो उसने जारी रखा।
 
वह अपनी उंगलियां मीरा की नाभि के आसपास ले गया—गहरी, आकर्षक नाभि जो साड़ी के नीचे से झांक रही थी। शेर ने अपनी एक उंगली धीरे से नाभि में डाली, बिना दबाए, सिर्फ स्पर्श करते हुए। मीरा का पेट हल्का सा सिकुड़ा, और उसके मुंह से फिर एक सिसकी निकली—
 
शेर का बदन आग की तरह जल रहा था। उसकी नजरें अब मीरा की चुचियों पर टिकीं, जो साड़ी और ब्लाउज के नीचे से ऊपर-नीचे हो रहे थे। हर सांस के साथ वे लहरा रहे थे, जैसे कोई आमंत्रण दे रहे हों।
 
शेर ने बहुत धीरे से अपना हाथ ब्लाउज के ऊपर रखा, बिना दबाए। वह सिर्फ स्पर्श कर रहा था, हल्के से सहलाते हुए। मीरा के निप्पल्स दवा की गर्मी से सख्त हो चुके थे, और ब्लाउज के कपड़े से महसूस हो रहे थे। शेर ने अपनी उंगलियां उनके आसपास घुमाईं, गोल चक्कर लगाते हुए। मीरा की सांसें और तेज हो गईं—
 
मीरा: (नींद में कराहते हुए) "ओह... सरताज... आप... मेरे साथ... क्या कर रहे हैं?"
 
शेर अब और नहीं रुक सका। वह धीरे से मीरा के गले की तरफ झुका। उसकी गर्म सांसें मीरा की गर्दन पर पड़ रही थीं। वह बहुत धीरे से अपने होंठ मीरा के गले पर टिकाए—पहले सिर्फ स्पर्श, फिर हल्का सा चुम्बन। मीरा की गर्दन पर एक सिहरन दौड़ी, और उसने नींद में अपना सिर थोड़ा सा हिलाया।
 
मीरा: (नींद में फुसफुसाते हुए) "आह... सरताज... ? प्लीज... रुकिए न..."
 
शेर की हिम्मत और बढ़ गई। उसने मीरा के गले पर हल्का सा काट लिया—इतना धीमा कि दर्द न हो, सिर्फ उत्तेजना। मीरा की सिसकी और गहरी हो गई।
 
वह नींद में ही अपने हाथ उठाकर शेर के कंधों पर रख दिए, जैसे सरताज को गले लगाना चाह रही हो। शेर अब मीरा के चेहरे के करीब आ गया। उसने अपनी उंगलियां मीरा के बालों में फंसाईं, उन्हें सहलाते हुए। फिर, बहुत धीरे से, अपने होंठ मीरा के होंठों पर रख दिए। चुंबन शुरू में हल्का था—सिर्फ स्पर्श। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, शेर ने इसे गहरा किया। उसकी जीभ मीरा के होंठों को छूने लगी, धीरे से अंदर घुसने की कोशिश करते हुए।
 
मीरा के मुंह से एक मीठी सी कराह निकली—"आह... सरताज... "
 
शेर का 7 इंच का लंड उसकी पैंट में चट्टान की तरह सख्त हो चुका था, लेकिन वह जानता था कि सब कुछ धीरे-धीरे करना है। वह नहीं चाहता था कि मीरा जाग जाए।
 
शेर ने बहुत सावधानी से अपनी मजबूत बाहों में मीरा को उठाया। मीरा का शरीर किसी नरम लता की तरह उसके सीने पर ढह गया। उसका सिर शेर के कंधे पर टिक गया, और उसकी गर्म, गीली सांसें शेर की गर्दन को जला रही थीं। शेर का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था—डर और हवस दोनों एक साथ।
 
वह धीरे-धीरे बेडरूम की ओर बढ़ा। दरवाजा बंद करते ही कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की आवाज गूंजने लगी। शेर ने मीरा को उस विशाल, मुलायम बिस्तर पर लिटा दिया। मीरा का शरीर बिस्तर पर फैल गया, पीली साड़ी थोड़ी सी सिलवटों में उलझी हुई।
 
 
सरताज की बेचैनी
उधर, शहर की भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर सिक्युरिटी की सरकारी गाड़ी में बैठे सरताज का दिल अचानक ज़ोर से धड़का। वह अपनी टीम के साथ टूर पर जा रहा था, लेकिन पिछले कुछ मिनटों से उसे एक अजीब सी बेचैनी  महसूस हो रही थी। उसका हाथ अनजाने में ही अपनी छाती पर चला गया।
उसने अपनी जेब से बटुआ निकाला और उसे खोला। बटुए के एक कोने में मीरा की एक मुस्कुराती हुई छोटी सी तस्वीर लगी थी। सरताज उस तस्वीर को एकटक निहारने लगा।
 
सरताज [मन ही मन]: 'पता नहीं क्यों, पर जी बहुत घबरा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मीरा किसी बहुत बड़ी मुसीबत में है। ... क्या मैं कुछ देख नहीं पा रहा हूँ?'
 
 
शेर (मन ही मन, फुसफुसाते हुए): "यही वो बिस्तर है... जहाँ हर रात वो सरदार तुझे रौंदता है। आज इस बिस्तर का गवाह मैं बनूंगा। तुझे क्या पता मीरा मैडम... तेरा ये वफादार कुत्ता आज तेरा मालिक बनने जा रहा है।"
 
शेर को साड़ी बांधने का तरीका नहीं आता था, इसलिए उसने जोखिम नहीं लिया। उसने सबसे पहले साड़ी का वो रेशमी, गुलाबी पल्लू बहुत धीरे से कंधे से सरकाया। पल्लू हटते ही मीरा का ऊपरी बदन सिर्फ उस तंग, पीले ब्लाउज में रह गया। ब्लाउज इतना टाइट था कि उसके सुडौल, रसीले स्तन बाहर छलकने को तैयार थे।
 
शेर की उंगलियां कांप रही थीं। उसने बहुत धीरे-धीरे, एक-एक करके ब्लाउज के बटन खोले। हर बटन खुलने के साथ उसकी सांसें और तेज हो रही थीं। जैसे ही ब्लाउज के दोनों हिस्से अलग हुए, सामने आई मीरा की पीली ब्रा—जो उसके गोरे, सुडौल चुचियों को ऊपर की ओर उभार रही थी। शेर ने एक पल रुककर उस नजारे को निहारा।
 
शेर (मन ही मन, कांपती आवाज में): "उफ्फ... ये तो किसी मलाई के गोले हैं... इतने सफेद, इतने नरम... सरताज के हाथों ने ही इन पर राज किया है आज तक... लेकिन आज... मेरी ये काली उंगलियां इन पर अपनी छाप छोड़ेंगी।"
 
उसने ब्रा के हुक को बहुत धीरे से, बिना किसी झटका दिए, खोला। ब्रा ढीली हुई और मीरा के दोनों विशाल, गोल, रसीले स्तन आजाद होकर बाहर छलक पड़े। वे इतने कोमल और भरे हुए थे कि शेर को लगा जैसे कोई सपना सच हो रहा है। निप्पल्स दवा की गर्मी से सख्त और गुलाबी हो चुके थे।
 
वह उन गोरे पहाड़ों की चमक और उन पर तनी हुई गुलाबी कलियों को देख कर सुध-बुध खो बैठा। वह बस उन दोनों गोलाइयों को निहार रहा था, जैसे किसी मंदिर की मूर्ति की महिमा देख रहा हो।
 
तभी सन्नाटे को चीरते हुए मीरा के मोबाइल की स्क्रीन जल उठी। मेज पर रखा फोन थरथराने लगा—'सरताज कॉलिंग'
 
शेर का दिल धक से रह गया। वह पल भर के लिए सिहर उठा, पर अगले ही पल उसने झपटकर फोन उठाया और उसे साइलेंट कर दिया। उसने जलती हुई आँखों से स्क्रीन पर चमकते सरताज के नाम को देखा और दांत पीसते हुए फुसफुसाकर एक गंदी गाली दी।
 
शेर : "कबाब में हड्डी! अपनी बीवी को फोन कर रहा है हरामजादा? साले की माँ की चोद... तू वहां ड्यूटी कर, यहाँ तेरी अमानत का रस ये शेर पिएगा।"
 
उसने फोन को रख दिया, पर उसकी नज़रें अभी भी उस साइलेंट होती स्क्रीन पर थीं। सरताज का फोन अभी भी आ रहा था, और इधर शेर ने अपना चेहरा मीरा के उन नंगे और भारी स्तनों की ओर झुका दिया।
 
बड़ी बेशर्मी और वहशीपन के साथ, उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और मीरा की उन गुलाबी कलियों को चाटना और चूसना शुरू कर दिया। वह फोन को देख रहा था जो अब भी वाइब्रेट कर रहा था, और दूसरे हाथ से मीरा के उस गोरे मांस धीरे-धीरे,  बिना दबाव डाले, उसे सहलाना शुरू किया। हथेली से मसलते हुए, अंगूठे से निप्पल को हल्का-हल्का रगड़ते हुए।
 
मीरा ने नींद में ही एक लंबी और मदहोश कराह भरी, उसने शेर के सिर को अपनी छाती से और कसकर चिपका लिया, यह सोचकर कि यह उसका पति है जो उसे प्यार कर रहा है।
 
मीरा (मदहोश, फुसफुसाती आवाज में): "...आह... सरताज... ?"
 
शेर को एक अजीब सा क्रूर आनंद मिल रहा था। वह मन ही मन सोच रहा था, 'देख दरोगा जी... तू फोन करता रह, और मैं तेरी बीवी के इन दूधिया कलशों का स्वाद ले रहा हूँ। तू वर्दी की अकड़ में रह, और मैं तेरी रूह को तड़पा रहा हूँ।'
 
फोन की स्क्रीन की रोशनी एक बार फिर बुझी। कुछ ही मिनटों का सन्नाटा रहा होगा कि अंधेरे कमरे में मीरा का मोबाइल फिर से थरथराने लगा। स्क्रीन पर फिर से वही नाम चमक उठा—''सरताज कॉलिंग''
 
शेर ने मीरा के एक स्तन को अपने मुँह से बाहर निकाला, जो अब उसकी लार से पूरी तरह भीग कर चमक रहा था। उसने मुड़कर फोन की जलती हुई स्क्रीन को देखा, उसके चेहरे पर एक कुटिल और ज़हरीली मुस्कान आ गई। उसने एक बार फिर दांत पीसते हुए सरताज को एक गंदी गाली दी।
 
शेर [वहशी अंदाज़ में]: "साले कुत्ते की औलाद... हार नहीं मानेगा तू? साला रंडी का बच्चा, बार-बार फोन करके अपनी बीवी को याद कर रहा है? कर ले बेटा... तू जितना फोन करेगा, मैं उतना ही तेरी इस अमानत को रौंदूँगा।"
 
उसने फोन को फिर से नज़रअंदाज़ किया और मीरा की दूसरी भारी और छलकती हुई चुची की ओर मुड़ा। उसने बड़े अधिकार के साथ उस गोरी गोलाई को अपनी हथेली में भींचा और उसे अपने मुँह के करीब लाया।
 
शेर [बुदबुदाते हुए]: "साला जब तक तू फोन करेगा, तब तक मैं तेरी बीवी का ये अमृत जैसा दूध पीता रहूँगा। तू वहां ड्यूटी की अकड़ दिखा, यहाँ मैं इस रेशमी बदन का मालिक बना बैठा हूँ।"
 
उसने अपनी जीभ मीरा की उस दूसरी गुलाबी कली पर फेरी, जो पहले से ही ठंड और दवा की गर्मी से पत्थर की तरह सख्त थी। शेर ने उसे अपने दांतों के बीच हल्का सा दबाया, जिससे मीरा के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। गहरी नींद और दवा के नशे में डूबी मीरा ने एक लंबी और मदहोश कराह भरी। उसने अपना शरीर शेर की ओर और उचका दिया, उसके अचेतन मन को अभी भी यही लग रहा था कि सरताज ही उसके पास है।
 
शेर अब पूरी तरह बेकाबू हो चुका था। वह एक नज़र उस थरथराते हुए फोन पर डालता, जो सरताज की बेताबी का सबूत था, और फिर दुगनी ताकत से मीरा के उन नंगे और भारी स्तनों पर टूट पड़ता। वह उस गोरे मांस को ऐसे चूस रहा था जैसे कोई भूखा बच्चा अपनी माँ का दूध पीता है।
 
उसकी ज़बान मीरा के स्तनों के चारों ओर घूम रही थी, उनकी मखमली त्वचा का स्वाद चख रही थी। फोन की वह नीली रोशनी शेर के चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें किसी भेड़िये की तरह चमक रही थीं।
 
उधर शहर के दूसरे कोने में, सरताज का दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठा जा रहा था। वह अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा बार-बार मीरा का नंबर मिला रहा था। उसकी घड़ियाँ जैसे ठहर गई थीं।
 
सरताज (मन ही मन): "मीरा फोन क्यों नहीं उठा रही? दोपहर  होने को है और उसका फोन बजता जा रहा है... उसे तो हल्की सी आहट पर भी जागने की आदत है। कहीं... कहीं वो सुराख और मीरा की ये खामोशी किसी बड़े खतरे का संकेत तो नहीं?"
 
उसने एक के बाद एक पाँच से छह बार फोन लगाया। हर बार घंटी पूरी जाती और फिर कट जाती। सरताज की बेचैनी अब गुस्से और खौफ में बदल रही थी।
 
लेकिन यहाँ, बेडरूम के उस घुप्प अंधेरे में, सरताज की वही बेताबी शेर के लिए एक वहशी जश्न बन चुकी थी। हर बार जब मेज पर रखे फोन की स्क्रीन जलती और वह कमरा नीली रोशनी से भर जाता, शेर की हवस एक नए उफान पर पहुँच जाती।
 
जैसे ही फोन थरथराता, शेर अपनी पकड़ मीरा के दूधिया स्तनों पर और मज़बूत कर लेता। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह सरताज की मर्दानगी को चुनौती दे रहा हो।
 
शेर [हर घंटी के साथ और वहशी होते हुए]: "बजा ले साले... जितनी बार घंटी बजेगी, उतनी बार मैं इस गोरे मांस का रस निचोड़ूँगा। तू उसे पुकार रहा है, और मैं यहाँ उसे अपनी ज़बान से चख रहा हूँ।"
 
जैसे-जैसे सरताज के फोन कॉल्स की गिनती बढ़ती गई, शेर का तरीका और भी हिंसक होता गया। वह मीरा की एक चुची को अपने मुँह में पूरी तरह भर लेता और उसे इतनी ज़ोर से चूसता कि मीरा की नींद में भी सिसकियाँ निकल जातीं। फिर जैसे ही वह कॉल कटती और सरताज दोबारा मिलाता, शेर अपनी जीभ दूसरी गुलाबी कली पर फिराने लगता।
 
मीरा उस मदहोशी में बस अपनी कमर ऊपर की ओर उचका रही थी। उसे लग रहा था कि सरताज आज कुछ ज़्यादा ही बेताब है, और इसी भ्रम में उसने अपनी टांगें थोड़ी और फैला दीं।
 
सरताज का छठा फोन अभी भी बज रहा था, और इधर शेर मीरा के बदन को अपनी लार से पूरी तरह भिगो चुका था।
 
सरताज का छठा फोन भी जब बिना जवाब के कट गया, तो कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। मेज पर रखी स्क्रीन की नीली रोशनी अब बुझ चुकी थी।
 
उसने सरताज की उस खामोश हार पर एक वहशी मुस्कान बिखेरी और अपना चेहरा मीरा के भीगे हुए स्तनों से हटाकर नीचे की ओर सरकाना शुरू किया।
 
दवा का नशा अब मीरा के जिस्म के रोम-रोम में समा चुका था। वह एक ऐसे स्वप्नलोक में थी जहाँ उसे बस एक मज़बूत साया महसूस हो रहा था। उसे लगा कि सरताज आज उसे अपनी मोहब्बत की गहराइयों में उतार रहा है, और इसी मदहोशी में उसने एक लंबी और गहरी आह भरी।
 
शेर रेंगता हुआ मीरा के उस नंगे और मखमली पेट पर पहुँचा। पसीने और पानी की नम बूंदों ने उस गोरी त्वचा को और भी ज़्यादा फिसलन भरा और मादक बना दिया था। शेर ने अपनी खुरदरी हथेलियों को मीरा की कमर के दोनों ओर जमाया और अपनी जीभ मीरा की गहरी नाभि के इर्द-गिर्द घुमाना शुरू किया।
 
शेर [हवस भरी फुसफुसाहट]: "दरोगा जी का फोन बंद हुआ... अब इस शेर का असली खेल शुरू होगा। ई नाभि है कि कोई जादुई कुआं... आज तो इसमें डूब के ही दम लूँगा।"
 
उसने अपनी ज़बान नाभि के उस गहरे भँवर में उतार दी। मीरा का पूरा बदन बिजली की तरह तड़प उठा और उसने अपने दोनों पैर बिस्तर पर पटक दिए।
 
अब शेर का हाथ साड़ी के निचले हिस्से की ओर बढ़ा। उसने साड़ी और पेटीकोट को एक साथ पकड़ा और बहुत धीरे-धीरे ऊपर की ओर खींचना शुरू किया। कपड़े सरकते गए, और मीरा की गोरी, सुडौल टांगें उजागर होती गईं। जब साड़ी मीरा के कूल्हों तक पहुंची, तो शेर की नजर पीली पैंटी पर पड़ी। पैंटी के बीच में गहरा गीला धब्बा था—उत्तेजना की वजह से पूरी तरह भीगी हुई। और वहां साफ-साफ कैमल टो बन रहा था। शेर का दिल धड़ककर मुँह में आ गया।
 
शेर (मन ही मन, कांपते हुए): "उफ्फ... ये देखो... कितनी गीली हो चुकी है... सरताज का लट्ठा तो अभी तक नहीं आया... फिर भी ये चूत मेरे लिए तरस रही है।"
 
उसने बहुत धीरे से पैंटी को थोड़ा नीचे सरका दिया। मीरा के पैरों के बीच का वो गुप्त खजाना—चिकनी, गुलाबी, पूरी तरह शेव्ड चूत—शेर की आंखों के ठीक सामने थी। पसीने और रस की वजह से वह चमक रही थी। शेर का गला सूख गया।
 
मीरा के पैरों के बीच का वह मासूम और गीला गुलाबी खज़ाना अब पूरी तरह से नग्न और शेर के सामने था। वह हिस्सा इतना साफ़, कोमल और मदहोश कर देने वाला था कि शेर की आँखों में वहशीपन की सुर्खी उतर आई।
 
शेर [दांत पीसते हुए]: "ओह रब्बा... ई क्या चीज़ है! एकदम मक्खन जैसी दरार... आज तो सरताज के इस किले को मैं तहस-नहस कर दूँगा।"
 
उसने अपनी उंगली बहुत हल्के से उस मखमली द्वार पर रखी। सिर्फ स्पर्श किया, बिना अंदर डाले।
 
शेर (मन ही मन): "यही वो जगह है... जहाँ वो 10 इंच का लट्ठा हर रात जाता है... आज मेरी उंगलियां यहां राज करेंगी... देख मीरा मैडम... तेरा नौकर आज तुझे जन्नत दिखाएगा।"
 
उसने अपनी उंगली को धीरे-धीरे उस गीली दरार पर फिराना शुरू किया। बाहर से ही क्लिटोरिस को हल्का-हल्का रगड़ते हुए। मीरा ने सिसकते हुए अपनी दोनों टांगें और चौड़ी कर दीं। उसकी कमर बिस्तर से ऊपर उठ गई।
 
मीरा (नींद में, कराहते हुए): "आह... सरताज... हां... वहीं... उफ्फ... आप आज बहुत... अलग लग रहे हैं... मुझे और... और प्यार कीजिए... धीरे से... प्लीज..."
 
शेर अभी मीरा की उन गीली और रेशमी जांघों के बीच अपना मुँह टिकाकर उस गुलाबी दरार का रस पीने ही वाला था कि अचानक उसके खुद के मोबाइल का वाइब्रेशन उसकी पैंट की जेब में होने लगा। सन्नाटे में वह आवाज़ किसी धमाके की तरह गूँजी।
 
शेर का बदन डर और गुस्से से काँप उठा। उसने कांपते हाथों से फोन बाहर निकाला—स्क्रीन पर 'सरताज साब ' चमक रहा था।
 
शेर की साँसें हलक में अटक गईं। उसने एक नज़र मीरा के उस बेपर्दा और मदहोश गुलाबी खजाने पर डाली और फिर फोन उठाकर कान से लगाया।
 
सरताज: (फोन पर, आवाज़ में भारी चिंता और कड़कपन) "शेर! कहाँ हो तुम? मैं आधे घंटे से मीरा को फोन कर रहा हूँ, वो उठा नहीं रही। क्या सब ठीक है? तुम क्या कर रहे हो?"
 
शेर की आँखों के ठीक सामने मीरा के वे कोमल गुलाबी होंठ फैले हुए थे, जो किसी भी पल उसके स्पर्श के लिए तड़प रहे थे। उसने अपनी हवस भरी नज़रों को वहीं जमाए रखा और अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना सीधा और विनम्र बनाने की कोशिश की।
 
शेर: "जी... जी साब। मैं तो अपने कमरे में लेटा था। सब ठीक है साब... मेमसाब शायद गहरी नींद में सो गई होंगी, इसीलिए फोन नहीं सुना होगा। आप फिकर ना करें, मैं हूँ न यहाँ।"
 
लेकिन शेर के दिमाग के भीतर ज़हर उबल रहा था। वह मन ही मन सरताज को गंदी-गंदी गालियाँ दे रहा था।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'साले रंडी के बच्चे! हरामजादे... तू अपनी ड्यूटी कर ना! यहाँ तेरी बीवी अपनी टांगें फैलाए मेरे मुँह के सामने लेटी है और तू साला बीच में टाँग अड़ा रहा है। तू उधर अपनी वर्दी की अकड़ दिखा, यहाँ मैं तेरी इस अमानत के गुलाबी होंठों को चखने की तैयारी में हूँ। साला कबाब में हड्डी...!'
 
सरताज की आवाज़ फोन पर किसी ठंडे कोड़े की तरह गूँजी, "शेर! मैं बस पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ। बाहर आकर मेन गेट खोलो।"
 
शेर का कलेजा धक से रह गया। उसके पास अब समय नहीं, बस चंद लम्हे बचे थे। उसने दाँत पीसते हुए फोन काटा और मन ही मन सरताज की सात पीढ़ियों को गंदी गालियाँ दीं।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'साले कुत्ते की औलाद! हरामजादे... बस दो मिनट और रुक जाता तो मैं इस गुलाबी कुएँ की गहराई नाप लेता। साला रंडी का बच्चा, एकदम सही टाइम पर गला दबाने आ गया। तू बाहर आ, ... पर अभी इस माल को चखने दे!'
 
खतरा सिर पर मँडरा रहा था, पर शेर की हवस इतनी बेलगाम हो चुकी थी कि उसने उन दो मिनटों की भी परवाह नहीं की। उसने झपटकर अपना मुँह मीरा की टाँगों के बीच उस गीले और मासूम गुलाबी खजाने पर दे मारा। उसने पूरी वहशीयत के साथ उन कोमल होंठों को अपनी ज़बान से चाटा और चूसना शुरू किया। मीरा ने उस गहरी मदहोशी में अपनी कमर को ऊपर उचकाया और एक ऐसी लंबी सिसकी भरी जो शायद घर के बाहर तक सुनाई दे जाती।
 
मीरा (मदहोश स्वर में): "ओह... सरताज... आह... और... और नीचे... प्लीज... "
 
शेर अपनी जीभ की रगड़ से उस गुलाबी दरार का सारा रस निचोड़ लेना चाहता था। उसका मुँह मीरा के उस सबसे निजी हिस्से की महक से भर गया था।
 
मीरा (कराहते हुए): "हां... सरताज... ऐसे ही... मुझे... जन्नत दिखा रहे हो... आह... और तेज... नहीं... धीरे... धीरे... बस ऐसे ही... उफ्फ..."
 
शेर का सिर हवस के भूत से भरा हुआ था, लेकिन उसका शातिर दिमाग अब भी पूरी तरह सतर्क था। वह जानता था—एक छोटी सी गलती, एक गलत निशान, या मीरा की आंखों में एक झलक भी भर जाए, तो सरताज की रिवॉल्वर की गोली उसे सीधे काल कोठरी पहुंचा देगी।
 
उसने मीरा की चूत को अपनी जीभ से चाटना बंद कर दिया। उसकी कमर बिस्तर से ऊपर उठी हुई थी, टांगें कांप रही थीं, सांसें रुक-रुक कर आ रही थीं।
 
उसके दोनों हाथ अभी भी मीरा के नंगे, रसीले चुचियों पर थे। वह उन्हें धीरे-धीरे मसल रहा था, निप्पल्स को अंगूठे से हल्का-हल्का रगड़ रहा था। मीरा नींद में कराह रही थी—
 
शेर ने धीरे से अपने हाथ हटाए। मीरा का शरीर बिस्तर पर थोड़ा सा सिकुड़ गया, जैसे कोई अधूरा सपना टूट गया हो। उसकी सांसें अभी भी तेज थीं, चेहरा लाल, होंठ कांप रहे थे। शेर ने अपनी घड़ी पर नजर डाली—2 मिनट पूरे हो चुके थे।
 
शेर ने भारी मन से खुद को पीछे खींचा। उसने बहुत सावधानी से ब्रा के हुक वापस लगाए। उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे। फिर ब्लाउज के बटन एक-एक करके बंद किए—हर बटन बंद करते वक्त वह मीरा के चेहरे को देखता रहा, कहीं आंखें न खुल जाएं। ब्लाउज पूरी तरह व्यवस्थित हो गया।
 
अब उसने मीरा के कूल्हों तक चढ़ी हुई साड़ी और पेटीकोट को पकड़ा। बहुत धीरे-धीरे, बिना कोई झटका दिए, उन्हें नीचे सरकाया। साड़ी का हर फेंट सही जगह पर लाया, पेटीकोट को कमर पर ठीक किया।
 
उसने पल्लू उठाकर मीरा के सीने पर इस तरह लपेटा कि उसकी सुडौल देह फिर से पूरी तरह शालीन लगे। बिस्तर की सिलवटों को हाथों से साफ किया, तकिए पर मीरा के बिखरे बालों को सलीके से फैलाया। मीरा अब भी गहरी नींद में थी—उसके चेहरे पर एक हल्की, संतुष्ट मुस्कान थी। होंठ हल्के खुले, गालों पर गुलाबी रंगत, जैसे अभी-अभी किसी प्रेमी के साथ बिताए पलों की खुमारी में डूबी हो। उसे अंदाजा भी नहीं था कि पिछले बीस मिनटों में उसके शरीर के साथ क्या-क्या हुआ था।
 
Deepak Kapoor
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