20-02-2026, 06:57 PM
थोड़ी देर दोनो वैसे ही एक-दूसरे से लिपटे,एक दूसरे को चूमते सहलाते रहे। फिर राजासाहब ने उसकी चूत से अपना लंड खींचना शुरू किया तो मेनका ने सवालिया नज़रो से उन्हे देखा,"डील साइन करने भी तो जाना है",उन्होने अपना लंड बाहर निकाल लिया,"जल्दी तैयार हो जाइए",उसके होठों को चूमा और बाथरूम से बाहर चले गये।
मेनका थोड़ी देर तक वैसे ही बैठी रही,वो इस एहसास से बाहर ही नही आना चाहती थी। पर डील के लिए भी तो जाना था। वो उठी और नहाने की तैयारी करने लगी।
यहाँ से आगे...................
पार्ट 5
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।
थोड़ी देर बाद राजासाहब और मेनका नाश्ते के लिए, होटेल के रेस्टोरेंट की तरफ जा रहे थे। होटेल के शॉपिंग एरिया से गुज़रते हुए मेनका को एक ख़याल आया,
"आप चलिए, हम अभी आते हैं।"
"अरे,क्या बात हो गयी? पहले नाश्ता तो कर लें, फिर शॉपिंग कर लेना।"
"प्लीज़! आप चलिए ना। हम बस यूँ गये और यू आए।"
"ओके,जैसी आपकी मर्ज़ी।" राजासाहब रेस्टोरेंट मे एक टेबल पर बैठ गये और नाश्ते का ऑर्डर कर दिया। वो थोड़ी देर पहले होटेल स्यूट के कंप्यूटर पे पढ़े डॉक्टर.पुरन्दारे के ई-मैल के बारे मे सोचने लगे। उन्हे इस बात की तसल्ली थी कि विश्वा भी ठीक होना चाहता है पर शादी मे उसका विश्वास ना होने वाली बात से वो थोड़े चिंतित थे। वो मेनका को प्यार नही करता था, ये जान कर उनके मन के किसी कोने मे बहुत खुशी पैदा हुई थी पर वो जानते थे कि मेनका और उनका रिश्ता विश्वा के लौटने तक ही रह सकता है। "खैर, जब विश्वा आएगा तो देखेंगे।" उन्होने एक ठंडी आह भरी। अभी तक दुष्यंत ने भी कोई खबर नही दी है। वो सोच रहे थे। मैत्री की रचना[b]।[/b]
अब आप सोचेंगे कि ये दुष्यंत कौन है? दुष्यंत वर्मा उन गिने-चुने लोगों मे से है जो राजासाहब को उनके नाम से पुकार सकते हैं। दोनो बोर्डिंग कॉलेज और कॉलेज मे साथ पढ़े थे और पक्के दोस्त थे। दुष्यंत वेर्मा एक सेक्यूरिटी और डीटेक्टिव एजेन्सी चलाते थे, जिसके क्लाइंट्स हिन्दुस्तान की जानी-मानी हस्तियाँ थी। राजासाहब ने उनसे उस इंसान का पता लगाने को कहा था, जो उनके बेटे को ड्रग्स सप्लाइ करता था। उनकी सख़्त हिदायत थी कि इस पूरी जाँच को सीक्रेट रखा जाए और दुष्यंत, उनके इस काम पे लगे स्टाफ और राजासाहब के अलावा किसी को भी इस बात की भनक ना लगने पाए। ऐसा वो, इसलिए चाहते थे क्यूकी उन्हे पूरा यकीन था कि इसके पीछे जब्बार का हाथ है और इस बार वो उसे आखरी सबक सिखाना चाहते थे।
"अरे, क्या सोच रहें है? खाते क्यू नही?" मेनका उनके सामने बैठी उनकी आँखों के आगे हाथ फिरा रही थी। वो अपने ख़यालों मे इतना खोए थे कि वो कब आई और वेटर कब खाना सर्व कर गया, उन्हे पता ही ना चला।
"कुछ खास नही, बस ऐसे ही। चलिए शुरू कीजिए।" दोनो नाश्ता करने लगे।
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जहा राजासाहब अपने दुश्मन को सबक सिखाने के ख़यालों मे डूबे थे वही उनका दुश्मन भी उनकी बर्बादी के इरादे से शहर आ पहुँचा था। आइए चल कर देखते हैं कि वो क्या कर रहा है।
शहर के बाहरी हिस्से मे जहा रोज़ नये फ्लॅट्स बन रहे हैं, वही एक अपार्टमेंट कॉंप्लेक्स है जो कि अभी तक पूरी तरह से बसा नही है, उस कॉंप्लेक्स का एक फ्लॅट जब्बार का शहर का अड्डा है। उसका फ्लॅट ग्राउंड फ्लोर पर है और उस बिल्डिंग के बाकी फ्लोर्स अभी खाली पड़े हैं। अभी दोपहर के वक़्त भी यहा वीरानी छाई है। बस एक लंबा-चौड़ा शख्स चलता हुआ उस फ्लॅट की ओर आ रहा है। मैत्री की पेशकश[b]।[/b]
आप उस इंसान के बगल से भी गुज़र जाएँ तो आप कुछ खास बात नही नोटीस कर पाएँगे पर जब मैं आपसे पूछूंगी कि उसकी शक्ल कैसी थी तब आपका ध्यान जाएगा कि आप पास से गुज़रते हुए भी उसका चेहरा साफ़-साफ़ नही देख पाए थे। जी, हाँ ये कल्लन है। सर पर कॅप, आँखों पे काला चश्मा, बदन पे जॅकेट जिसका कॉलर उठा हुआ है ताकि कोई भी उसका हुलिया ना जान पाए।
देखिए वो कॉल बेल बजा रहा है। चलिए देखते हैं क्या होता है।
बेल सुन मलिका ने दरवाज़ा खोला, "ओह, तुम हो", एक कातिल मुस्कान उसने कल्लन की तरफ फेंकी।
"जब्बार तो बाहर गया है।"
"मैं वेट करूँगा।" कल्लन ने अंदर आकर जॅकेट, चश्मा और कॅप उतार दिया । उसके बाल फिर से बढ़ गये थे और चेहरे पर दाढ़ी भी वापस आ गयी थी।
"ड्रिंक लोगे?" मलिका अपनी गांड मटकाते हुए, बार की तरफ बढ़ी, कल्लन की तरफ उसकी पीठ थी और वो जान बुझ कर अपनी गांड थोड़ी ज़्यादा लचका रही थी। उसने एक टॉप पहना था जो कि उसकी छातियो के बड़े साइज़ के कारण बहुत कसा हुआ था और उसके निपल्स का आकर साफ़ दिख रहा था, नीचे एक मिनी स्कर्ट थी और जब वो चल रही थी तो, तो उसमे से उसकी नंगी गांड का थोड़ा सा हिस्सा झलक रहा था।
।। जय भारत ।।
मेनका थोड़ी देर तक वैसे ही बैठी रही,वो इस एहसास से बाहर ही नही आना चाहती थी। पर डील के लिए भी तो जाना था। वो उठी और नहाने की तैयारी करने लगी।
यहाँ से आगे...................
पार्ट 5
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।
थोड़ी देर बाद राजासाहब और मेनका नाश्ते के लिए, होटेल के रेस्टोरेंट की तरफ जा रहे थे। होटेल के शॉपिंग एरिया से गुज़रते हुए मेनका को एक ख़याल आया,
"आप चलिए, हम अभी आते हैं।"
"अरे,क्या बात हो गयी? पहले नाश्ता तो कर लें, फिर शॉपिंग कर लेना।"
"प्लीज़! आप चलिए ना। हम बस यूँ गये और यू आए।"
"ओके,जैसी आपकी मर्ज़ी।" राजासाहब रेस्टोरेंट मे एक टेबल पर बैठ गये और नाश्ते का ऑर्डर कर दिया। वो थोड़ी देर पहले होटेल स्यूट के कंप्यूटर पे पढ़े डॉक्टर.पुरन्दारे के ई-मैल के बारे मे सोचने लगे। उन्हे इस बात की तसल्ली थी कि विश्वा भी ठीक होना चाहता है पर शादी मे उसका विश्वास ना होने वाली बात से वो थोड़े चिंतित थे। वो मेनका को प्यार नही करता था, ये जान कर उनके मन के किसी कोने मे बहुत खुशी पैदा हुई थी पर वो जानते थे कि मेनका और उनका रिश्ता विश्वा के लौटने तक ही रह सकता है। "खैर, जब विश्वा आएगा तो देखेंगे।" उन्होने एक ठंडी आह भरी। अभी तक दुष्यंत ने भी कोई खबर नही दी है। वो सोच रहे थे। मैत्री की रचना[b]।[/b]
अब आप सोचेंगे कि ये दुष्यंत कौन है? दुष्यंत वर्मा उन गिने-चुने लोगों मे से है जो राजासाहब को उनके नाम से पुकार सकते हैं। दोनो बोर्डिंग कॉलेज और कॉलेज मे साथ पढ़े थे और पक्के दोस्त थे। दुष्यंत वेर्मा एक सेक्यूरिटी और डीटेक्टिव एजेन्सी चलाते थे, जिसके क्लाइंट्स हिन्दुस्तान की जानी-मानी हस्तियाँ थी। राजासाहब ने उनसे उस इंसान का पता लगाने को कहा था, जो उनके बेटे को ड्रग्स सप्लाइ करता था। उनकी सख़्त हिदायत थी कि इस पूरी जाँच को सीक्रेट रखा जाए और दुष्यंत, उनके इस काम पे लगे स्टाफ और राजासाहब के अलावा किसी को भी इस बात की भनक ना लगने पाए। ऐसा वो, इसलिए चाहते थे क्यूकी उन्हे पूरा यकीन था कि इसके पीछे जब्बार का हाथ है और इस बार वो उसे आखरी सबक सिखाना चाहते थे।
"अरे, क्या सोच रहें है? खाते क्यू नही?" मेनका उनके सामने बैठी उनकी आँखों के आगे हाथ फिरा रही थी। वो अपने ख़यालों मे इतना खोए थे कि वो कब आई और वेटर कब खाना सर्व कर गया, उन्हे पता ही ना चला।
"कुछ खास नही, बस ऐसे ही। चलिए शुरू कीजिए।" दोनो नाश्ता करने लगे।
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जहा राजासाहब अपने दुश्मन को सबक सिखाने के ख़यालों मे डूबे थे वही उनका दुश्मन भी उनकी बर्बादी के इरादे से शहर आ पहुँचा था। आइए चल कर देखते हैं कि वो क्या कर रहा है।
शहर के बाहरी हिस्से मे जहा रोज़ नये फ्लॅट्स बन रहे हैं, वही एक अपार्टमेंट कॉंप्लेक्स है जो कि अभी तक पूरी तरह से बसा नही है, उस कॉंप्लेक्स का एक फ्लॅट जब्बार का शहर का अड्डा है। उसका फ्लॅट ग्राउंड फ्लोर पर है और उस बिल्डिंग के बाकी फ्लोर्स अभी खाली पड़े हैं। अभी दोपहर के वक़्त भी यहा वीरानी छाई है। बस एक लंबा-चौड़ा शख्स चलता हुआ उस फ्लॅट की ओर आ रहा है। मैत्री की पेशकश[b]।[/b]
आप उस इंसान के बगल से भी गुज़र जाएँ तो आप कुछ खास बात नही नोटीस कर पाएँगे पर जब मैं आपसे पूछूंगी कि उसकी शक्ल कैसी थी तब आपका ध्यान जाएगा कि आप पास से गुज़रते हुए भी उसका चेहरा साफ़-साफ़ नही देख पाए थे। जी, हाँ ये कल्लन है। सर पर कॅप, आँखों पे काला चश्मा, बदन पे जॅकेट जिसका कॉलर उठा हुआ है ताकि कोई भी उसका हुलिया ना जान पाए।
देखिए वो कॉल बेल बजा रहा है। चलिए देखते हैं क्या होता है।
बेल सुन मलिका ने दरवाज़ा खोला, "ओह, तुम हो", एक कातिल मुस्कान उसने कल्लन की तरफ फेंकी।
"जब्बार तो बाहर गया है।"
"मैं वेट करूँगा।" कल्लन ने अंदर आकर जॅकेट, चश्मा और कॅप उतार दिया । उसके बाल फिर से बढ़ गये थे और चेहरे पर दाढ़ी भी वापस आ गयी थी।
"ड्रिंक लोगे?" मलिका अपनी गांड मटकाते हुए, बार की तरफ बढ़ी, कल्लन की तरफ उसकी पीठ थी और वो जान बुझ कर अपनी गांड थोड़ी ज़्यादा लचका रही थी। उसने एक टॉप पहना था जो कि उसकी छातियो के बड़े साइज़ के कारण बहुत कसा हुआ था और उसके निपल्स का आकर साफ़ दिख रहा था, नीचे एक मिनी स्कर्ट थी और जब वो चल रही थी तो, तो उसमे से उसकी नंगी गांड का थोड़ा सा हिस्सा झलक रहा था।
।। जय भारत ।।


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