18-02-2026, 02:36 AM
अनीता कॉलेज ड्रेस
अगली दोपहर का सन्नाटा कमरे की दीवारों पर भारी पड़ रहा था। राज के ऑफिस जाते ही घर एक अजीब सी खामोशी में डूब गया था। अनीता अपने कमरे में आइने के सामने खड़ी थी। करीम की लाई हुई वह कॉलेज ड्रेस उसके शरीर पर कसी हुई थी।
करीम का चुनाव वाकई बहुत शातिर था। सफ़ेद शर्ट इतनी तंग थी कि अनीता के सुडौल स्तनों के उभार बटनों के बीच की खाली जगह से साफ झलक रहे थे। शर्ट का कपड़ा इतना महीन था कि बिना ब्रा के उसके निप्पलों की सख्ती उभरी हुई थी।
नीली स्कर्ट इतनी छोटी थी कि जांघों का आधा हिस्सा नंगा था और कूल्हों की गोलाई हर हरकत पर बाहर छलकने को बेताब थी। अनीता ने अपनी जुल्फों को दो चोटियों में बांध लिया था, जिससे उसका चेहरा तो मासूम लग रहा था, पर उसका बदन किसी ज्वालामुखी की तरह धधक रहा था।
उसकी लंबी, गोरी और चिकनी टांगें पूरी तरह नंगी और कामुक लग रही थीं।
तभी रसोई से करीम की भारी और गूँजती आवाज़ आई।
करीम: "बेटी… कॉलेज की घंटी बज गई है। जल्दी आइए, आज की पढ़ाई बहुत ज़रूरी है।"
अनीता का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह कांपते पैरों से रसोई की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने रसोई में कदम रखा, उसने देखा कि करीम आज अपनी मूँछों पर ताव देते हुए उसी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था। वह सिर्फ अपनी तंग जाँघिया में था, और उसके भारी लंड जाँघिया के भीतर किसी फन उठाए नाग की तरह फड़क रहा था। वह चाहता था कि अनीता उसके नंगे जिस्म की गंध और रगड़ को महसूस करे।
करीम की नज़रें जब अनीता के इस 'कॉलेज गर्ल' अवतार पर पड़ीं, तो उसकी आँखों में एक चमक आ गई।
करीम (नशीली और भारी आवाज़ में): "वाह! ई तो बिल्कुल जन्नत की परी लग रही है। ई तंग कमीज़ और छोटी फ्रॉक... आज तो ई वर्दी आपकी जवानी को छुपाने के बजाय उसे और भी उभार रही है। आइये बिटिया... अपनी क्लास में बैठिये।"
अनीता बिना कुछ बोले, गर्दन झुकाए करीम के पास पहुँची। करीम ने झटके से उसका हाथ पकड़ा और उसे अपनी नंगी जाँघों पर बिठा लिया।
अनीता (सिसकते हुए): "आह्ह... करीम! ई... ई बहुत छोटी है... सब दिख रहा है... उह्ह!"
करीम ने अपनी मज़बूत काली बाँहें अनीता की कमर के चारों ओर कस लीं। शर्ट का पतला कपड़ा करीम के पसीने से भीगे सीने से सट गया। करीम ने अपना चेहरा अनीता के कंधे पर रखा और उसकी गर्दन के पास सूंघने लगा।
करीम: "ई शर्ट तो इतनी झीनी है कि हम आपकी धड़कनें अपनी आँखों से देख पा रहे हैं। देखिये तो सही, आपकी ई 'चूचियाँ' कैसे आज़ाद होने के लिए तड़प रही हैं। क्या आज कॉलेज में मास्टर जी से इनाम नहीं चाहिए?"
करीम: "चुप काहे हो बेटी? आज मास्टर जी की गोद में बैठ के डर लग रहा है? देखिये तो सही, आपकी ई शर्ट कितनी बेबस है... ई बटन तो खुद-ब-खुद कह रहे हैं कि मालकिन को इस कैद से आज़ाद कर दो।"
करीम ने अपनी उंगलियों के पोरों से शर्ट के उन खिंचे हुए बटनों के बीच की खाली जगह को टटोलना शुरू किया। जहाँ से अनीता का गोरा मांस साफ़ दिख रहा था, करीम ने वहाँ अपनी उंगली का सिरा धीरे से अंदर धकेला और उसे अनीता की त्वचा पर गोल-गोल घुमाने लगा।
अनीता (सिसकते हुए): "आह्ह... करीम! उह्ह... मत करो... सिसss... बहुत अजीब लग रहा है। उह्ह!"
करीम: "अजीब नहीं मालकिन, ई तो असली पढ़ाई है। देखिये तो, ई सफ़ेद कपड़ा आपकी धड़कनों के साथ कैसे ऊपर-नीचे हो रहा है।"
करीम ने अपने दोनों हाथों से शर्ट के ऊपर से ही अनीता के चूचियाँ को अपनी विशाल हथेलियों के बीच दबा लिया। उसने उन्हें इतनी कोमलता और फिर अचानक इतनी सख्ती से भींचा कि अनीता के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। ब्रा न होने की वजह से करीम की हथेलियाँ सीधे अनीता के निप्पलों को कपड़े के पार से ही महसूस कर रही थीं।
करीम ने अपना मुँह आगे बढ़ाया और शर्ट के कपड़े के ऊपर से ही एक उभरे हुए निप्पल को अपने होंठों के बीच भर लिया। वह उसे अपनी ज़ुबान से कपड़े के पार ही गीला करने लगा। अनीता का पूरा शरीर करीम की गोद में झटके लेने लगा। उसे महसूस हो रहा था कि करीम का वह 10 इंच का पत्थर जैसा लंड उसकी छोटी स्कर्ट के नीचे उसके कूल्हों की दरार में कितनी गहराई से धंस रहा है।
करीम (मुँह हटाकर, हाँफते हुए): "बिटिया... ई जो आपकी नीली स्कर्ट है ना... ई तो सिर्फ आपके आधे गोरेपन को ढंक पा रही है। ई जो आपकी नंगी जांघें हमरी गोद में रगड़ खा रही हैं, ई हमरा ईमान डोल रही हैं।"
करीम ने अपना हाथ नीचे सरकाया और उस छोटी स्कर्ट के किनारे से अंदर अपनी उंगलियाँ धकेल दीं। उसने जांघों के ऊपरी हिस्से की कोमल त्वचा को सहलाते हुए अपना हाथ उस रेशमी पैंटी के पास ले गया जो अनीता ने इस ड्रेस के नीचे पहनी थी। करीम ने पैंटी के ऊपर से ही उस संवेदनशील हिस्से पर दबाव बनाना शुरू किया।
अनीता (बेकाबू होकर, करीम के कंधे को पकड़ते हुए): "ओह्ह गॉड... करीम! आह्ह... वहाँ नहीं... उह्ह! तुम... तुम वादा तोड़ रहे हो... सिसss... मत करो!"
करीम: "वादा कहाँ टूटा मालकिन? हाथ तो अभी भी कपड़े के ऊपर ही है। ई पैंटी भी तो कपड़ा ही है ना? बस मैं देख रहा हूँ कि हमारी बिटिया अपनी क्लास में कितना ध्यान लगा रही है। देखिये तो... यहाँ तो सावन की झड़ी लगी है।"
करीम ने अपनी उंगलियों की रफ्तार बढ़ा दी। वह उस महीन कपड़े के ऊपर से ही अनीता की गहराइयों को अपनी मर्दानगी का अहसास दिला रहा था।
करीम ने उसे अपनी गोद में थोड़ा और ऊपर उठाया और उसे अपने सख्त अंग पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ना शुरू किया। शर्ट के बटन और भी ज़्यादा खिंचने लगे और रसोई में सिर्फ उन दोनों की तेज़ साँसों और अनीता की बेतहाशा सिसकारियों की आवाज़ रह गई।
अनीता: "उह्ह... करीम! यह... यह क्या कर रहे हो?" (उसकी सिसकारी निकली जब वह लंड उसके नाजुक हिस्से पर दबाव बनाने लगा)।
अनीता की मखमली और कोमल टांगें करीम की काली और बालों वाली टांगों पर फैली हुई थीं। करीम ने अपनी मज़बूत बाहें उसकी पतली कमर के चारों ओर लपेटीं और अपना चेहरा उसकी गर्दन में गड़ा दिया।
अनीता: "आह्ह... उम्मम... धीरे करीम..."
करीम ने उसे अपने घुटनों पर थोड़ा और नीचे की ओर सरकाया ताकि वह उसके लंड की हर हरकत को अपनी योनि के द्वार पर महसूस कर सके।
अनीता: (आँखें मूंदते हुए) "ओह्ह... गॉड... आह्ह-आह्ह..."
दस मिनट की उस भयंकर रगड़ के बाद करीम का जंगलीपन बाहर आ गया।
करीम: "बेटी, जब बच्ची कॉलेज जाने में आनाकानी करे, तो उसे मास्टर जी से मार खानी ही पड़ती है!"
करीम: "अब मैं तुम्हें अनुशासन सिखाऊंगा, बेटी…"
करीम ने अचानक एक झटके के साथ अनीता को अपनी गोद में इस तरह घुमा दिया कि अब उसकी गाँड करीम की आँखों के ठीक सामने थी। स्कर्ट पहले ही बहुत छोटी थी, और इस तरह झुकने की वजह से वह पूरी तरह ऊपर चढ़ गई थी, जिससे अनीता के सुडौल कूल्हों का विशाल हिस्सा करीम की भूखी नज़रों के सामने बिल्कुल नंगा और बेबस था।
करीम (हवस भरी आवाज़ में): "या अल्लाह! ई का देख रहे हैं हम... ई तो पूरा पहाड़ है मलाई का। आज मास्टर जी अपनी बिटिया को कायदे से सबक सिखाएंगे।"
करीम ने अपना बड़ा हाथ हवा में उठाया और 'चटाक' की आवाज़ के साथ अनीता की नंगी गाँड पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।
अनीता (चीखते हुए): "आह्ह्ह! करीम... उह्ह... माँ! बहुत तेज़ लग रहा है... सिसss!"
हर थप्पड़ के साथ अनीता का पूरा शरीर झटके ले रहा था। उस झटके और दबाव की वजह से उसकी छाती करीम की नंगी जांघों पर बुरी तरह रगड़ खा रही थी। वह तंग सफेद शर्ट अब अपनी सहनशक्ति खो चुकी थी। जैसे ही करीम ने दूसरा और भी ज़ोरदार तमाचा अनीता के दूसरे कूल्हे पर मारा, शर्ट का तनाव बर्दाश्त से बाहर हो गया।
'तड़क-तड़क' की आवाज़ के साथ शर्ट के ऊपरी दो बटन टूटकर रसोई के फर्श पर जा गिरे।
बटन टूटते ही तंग शर्ट के दोनों पल्ले झटके से अलग हो गए और अनीता के दोनों स्तन पूरी तरह से आज़ाद होकर बाहर निकल आए। ब्रा न होने की वजह से वे किसी पके हुए रसीले फल की तरह करीम की जांघों के साइड में लटक रहे थे। सुबह की रोशनी में उनकी सफेदी और उनके सुर्ख लाल निप्पल किसी कयामत से कम नहीं लग रहे थे।
करीम की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह एक पल के लिए पूरी तरह सुन्न हो गया। उसके सामने एक ऐसा मंज़र था जहाँ उसकी मति मारी गई—वह तय नहीं कर पा रहा था कि वह कहाँ देखे?
अनीता की वह विशाल और थप्पड़ों से लाल होती हुई गाँड थी, जो हर हरकत पर फड़क रही थी, या वे आज़ाद हुए स्तन जो करीम की जांघों को छू रहे थे और अपनी कोमलता से उसे पागल कर रहे थे।
करीम (हाँफते हुए, लड़खड़ाती आवाज़ में): "हाय दैया... ई तो लूट लिया मास्टर जी को। मालकिन, आपने तो पूरा खजाना खोल दिया। समझ नहीं आ रहा कि पहले इस मलाई को चखूँ या उस पहाड़ को मसलूँ। ई जो आपके 'दूध के घड़े' आजाद हुए हैं ना, खुदा कसम, आज करीम की रूह कांप गई है।"
उसने अनीता को उठाकर अपनी तरफ घुमाकर गोद में बिठा लिया। अनीता की टांगें उसकी कमर के दोनों तरफ फैली थीं और उसके नंगे स्तन सीधे करीम से सट रहे थे।
अनीता अब पूरी तरह अर्धनग्न अवस्था में करीम की गोद में ढह चुकी थी। उसका चेहरा शर्म से लाल था, उसकी साँसें बेकाबू थीं, और उसकी आज़ाद हो चुकी छातियाँ करीम की नंगी त्वचा पर अपनी गर्मी छोड़ रही थीं।
करीम ने अपनी पकड़ और भी मज़बूत कर ली। उसके दोनों विशाल हाथ अनीता की उस नंगी, थप्पड़ों से लाल हुई गाँड को पूरी ताक़त से जकड़े हुए थे। अनीता का पूरा निचला हिस्सा अब करीम के वश में था। करीम ने अनीता की आँखों में अपनी दहकती हुई नज़रें गड़ाईं और अपनी आवाज़ को और भी गहरा और हुक्म भरा बना लिया।
करीम (हवस में हाँफते हुए): "बिटिया, मास्टर जी आज बहुत खुश हैं। पर अभी एक काम बाकी है। ई जो तुम्हारे 'दूध के घड़े' आज़ाद हुए हैं ना, इन्हें खाली मत छोड़ो। अब तुम खुद अपने इन चूचों को मेरे सीने पर रगड़ो मैं देखना चाहता हूँ कि ई मलाई मेरे इस काले और सख्त सीने पर कैसे फिसलती है।"
अनीता का गला सूख गया था, पर उसके बदन में लगी आग अब उसे करीम के हुक्म को मानने पर मजबूर कर रही थी। उसने अपनी हथेलियाँ करीम के चौड़े कंधों पर टिकाईं और धीरे-धीरे अपने बदन को ऊपर-नीचे हिलाना शुरू किया।
शर्ट के बटन टूटे होने की वजह से उसके नंगे स्तन करीम के पसीने से तर-बतर और बालों वाले सीने पर पूरी तरह सट गए थे। जैसे ही उसके कोमल अंगों का स्पर्श करीम की सख्त त्वचा से हुआ, रसोई के सन्नाटे में अनीता की एक लंबी सिसकारी गूँज उठी।
अनीता: (बेबसी और उत्तेजना में सिसकते हुए) "आह्ह... उह्ह... उम्मम..."
वह धीरे-धीरे अपने सीने को करीम के सीने पर रगड़ रही थी, जिससे उसके निप्पल करीम के पसीने में भीगकर और भी संवेदनशील हो रहे थे।
करीम (आँखें मूँदकर लुत्फ़ लेते हुए): "उफ़्फ़... हाँ मालकिन, बिल्कुल ऐसे ही। रगड़ो इन्हें... अपनी पूरी जवानी का अहसास दिलाओ इस बूढ़े नौकर को। देखिये तो सही, आपकी ई सफेदी मेरे काले सीने पर कितनी चमक रही है।"
करीम के हाथ नीचे उसकी गाँड को बुरी तरह मसल रहे थे, और साथ ही उसका 10 इंच का विशाल लंड, जो जाँघिया के भीतर लोहे की तरह अकड़ा हुआ था, अब अनीता की उस नीली पैंटी पर सीधे अपनी धमक दे रहा था।
करीम ने अपनी कमर को धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया। वह अपना अंग अनीता की पैंटी के उस रेशमी कपड़े पर बहुत धीरे-धीरे और गहराई से फिसल रहा था। पैंटी की बारीक परत के पार से अनीता को करीम की मर्दानगी की पूरी लंबाई और उसकी भयंकर गर्मी महसूस हो रही थी। वह रगड़ इतनी धीमी और लंबी थी कि अनीता के पैरों के बीच से कामुक रस की धारा बहने लगी थी, जिससे वह नीली पैंटी अब बीच से पूरी तरह भीग चुकी थी।
अनीता (सिसकते हुए, पूरी तरह टूटकर): "आह्ह्ह... करीम! उह्ह... माँ... ई... ई रगड़... सिसss... तुम... तुम तो जान निकाल दोगे! आह! और... और ज़ोर से... उह्ह!"
करीम (दांत पीसते हुए): "मज़ा आ रहा है ना मालकिन? ई नीली पैंटी तो बस नाम की है... ई तो खुद कह रही है कि अब पर्दा हटा दो। देखिये... कैसे मेरा अंग आपकी इस रेशमी दीवार को चीरना चाहता है।"
करीम ने अपने दोनों हाथों से अनीता की लाल हो चुकी गाँड को नीचे से मजबूती से थाम रखा था, जैसे वह उसे अपनी मर्दानगी के और भी करीब खींचना चाहता हो।
करीम (आँखें बंद करके एक गहरी साँस लेते हुए): "हाँ बिटिया... बिल्कुल ऐसे ही। धीरे-धीरे... महसूस कीजिये ई गर्मी को। मास्टर जी आज आपको सिखाएंगे कि ई गोरा बदन और ई काला पसीना जब मिलते हैं, तो कैसी आग लगती है। रगड़िये... और ज़ोर से।"
अनीता: "आह्ह... करीम... आह्ह-आह्ह... उम्मम... मैं... मैं मर जाऊँगी..."
करीम: "उह्ह... बेटी तुम्हारा बदन तो मक्खन है। रगड़ो इसे... पूरा।"
बाईस मिनट बीत चुके थे। अनीता उत्तेजना के उस चरम पर थी जहाँ शरीर जवाब देने लगता है। वह पसीने से तरबतर थी। लेकिन तभी, करीम ने अचानक अपने हाथ खींच लिए और उसे अधूरा छोड़ दिया।
अनीता: (पागलों की तरह हाँफते हुए) "करीम... प्लीज... आह्ह... इसे खत्म करो। मैं... मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। प्लीज... मुझे चाहिए... आह्ह!"
करीम: "इतनी जल्दी नहीं बेटी... अगर आप चाहती हैं कि मैं इस आग को ठंडा करूँ, तो आपको पूरी तरह मेरी गुलाम बनना होगा। मेरे हर हुक्म को, चाहे वो कितना भी गंदा क्यों न हो, आपको सर झुका कर मानना होगा। बोलिए, मंजूर है?"
'गुलाम' शब्द सुनते ही अनीता के कानों में जैसे गरम शीशा पिघल कर गिर गया हो। वह शब्द उसकी रूह को चीरता हुआ पार निकल गया। एक पल के लिए उसकी 'मालकिन' वाली गरिमा, उसका खानदानी गुरूर और उसकी मर्यादा झटके के साथ वापस लौटी।
उसने फटी-फटी आँखों से करीम के उस काले और पसीने से लथपथ चेहरे को देखा, जो हवस की आग में तप रहा था। उसे अहसास हुआ कि जिसे वह महज एक 'खेल' समझ रही थी, वह उसे एक ऐसे दलदल में खींच ले गया है जहाँ उसकी हैसियत एक बेबस कठपुतली से ज़्यादा कुछ नहीं बची थी।
उसने अपने काँपते हाथों से अपनी उस फटी हुई पारदर्शी शर्ट के पल्लों को समेटा, जिससे उसके स्तन अब भी झाँक रहे थे। बिना एक शब्द बोले, वह बिजली की तेज़ी से उसकी गोद से उतरी और बदहवासी की हालत में रसोई से बाहर भागी।
अनीता भागती हुई बाथरूम में घुसी और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया। उसका पूरा शरीर किसी ठंडे बुखार की तरह थरथरा रहा था। उसने फौरन शावर चालू किया। ठंडा पानी जब उसके तपते हुए बदन और उन थप्पड़ों से लाल पड़े गाँड पर गिरा, तो उसे एक भयंकर टीस और जलन महसूस हुई। पानी की बूंदें उसकी त्वचा पर पड़ते ही उसे उस खुरदरे अहसास की याद दिला रही थीं जो अभी कुछ पल पहले करीम की उंगलियों और उसकी ज़ुबान से मिल रहा था।
लेकिन करीम ने जो आग उसके अंदर सुलगाई थी, वह ठंडे पानी से बुझने वाली नहीं थी। वह बाथरूम की दीवार के सहारे टिक गई और अपनी ही उंगलियों का सहारा लेने लगी। वह करीम की उंगलियों और उसके सख्त 'डंडे' की कल्पना करते हुए खुद को शांत करने की कोशिश करने लगी।
अनीता: "ओह्ह... करीम... उम्मम... और तेज़... आह्ह!"
जब वह चरम पर पहुँची, तो उसके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली और उसका बदन ढीला पड़ गया। जैसे ही शारीरिक उत्तेजना शांत हुई, उसे अपनी असलियत का अहसास हुआ। वह फर्श पर ही बैठ गई और अपने घुटनों में सिर छुपाकर फूट-फूटकर रोने लगी।
अनीता (अपनी बिखरी हुई हालत देखकर सिसकते हुए): "आह्ह… सिस… यह क्या हो रहा है मुझे? मैं… मैं अनीता हूँ, इस घर की मालकिन! फिर क्यों मैं उस अनपढ़ और जंगली जानवर के सामने इतनी बेबस हो गई? क्यों मेरे शरीर ने उसके उन गंदे थप्पड़ों और उसकी उस शर्मनाक मांग के आगे घुटने टेक दिए?"
उसने अपनी उन दो चोटियों को झटके से खोल दिया जिन्हें करीम ने 'बेटी' कहकर सहलाया था। उसे खुद से घृणा होने लगी जब उसने देखा कि शावर के नीचे खड़ा उसका बदन अब भी करीम के स्पर्श की गर्मी से सुलग रहा
उसे खुद से नफरत हो रही थी कि वह एक नौकर के सामने इतनी गिर गई थी कि उसने उसे 'गुलाम' बनने का प्रस्ताव दे दिया।
जैसे ही अनीता रसोई से भागकर बाथरूम की ओर गई, करीम वहीं अपनी लकड़ी की कुर्सी पर पत्थर सा बुत बना बैठा रह गया।
जैसे-जैसे उसके शरीर की उत्तेजना ठंडी होने लगी, करीम की आँखों के सामने अनीता का वो चेहरा घूमने लगा—वो फटी हुई आँखें, वो काँपते हाथ जिनसे वो अपनी फटी शर्ट समेट रही थी, और सबसे बढ़कर, वो 'गुलाम' शब्द का प्रहार।
करीम (मन ही मन बुदबुदाते हुए): "अरे... ई का कर दिए हम? हवस में अंधे होकर हम ई भी भूल गए कि वो मालकिन हैं हमारी। 'गुलाम' बोल के हमने उनके कलेजे पर घाव कर दिया है।"
उसने फर्श पर बिखरे हुए शर्ट के उन दो बटनों को देखा जो अभी कुछ देर पहले उसकी दरिंदगी की वजह से टूटे थे। करीम को अपनी गलती का अहसास होने लगा कि उसने बहुत जल्दबाज़ी कर दी थी। जो अनीता धीरे-धीरे उसके जाल में आ रही थी, आज की इस भयंकर 'क्लास' और उन तल्ख शब्दों ने उसे डरा दिया था।
करीम: "हम बहुत तेज़ भागने लगे... बहुत ज़्यादा माँग लिए उनसे। ई कॉलेज ड्रेस, वो थप्पड़... और फिर वो ज़ुबान का ज़हर। कहीं ऐसा न हो कि डर के मारे मालकिन सब राज साहब को बता दें। अगर आज उन्होंने हिम्मत कर ली, तो करीम का ठिकाना जेल की सलाखों के पीछे होगा।"
उसके माथे पर पसीना चमकने लगा, पर इस बार ये पसीना हवस का नहीं, बल्कि आने वाले अंजाम के खौफ का था। वह समझ गया था कि उसने अनीता के शरीर को तो जीत लिया था, पर उसके सम्मान को इतनी बुरी तरह कुचला है कि अब उसे दोबारा अपनी गोद तक लाना नामुमकिन हो सकता है।
शाम ढलते-ढलते घर का माहौल भारी हो गया था। करीम अपनी कोठरी में बैठा वही सब सोच रहा था जो दोपहर में हुआ था। उसे डर था कि कहीं उसने बाज़ी हाथ से न गँवा दी हो।
जब राज दफ्तर से लौटकर अपने कमरे में फ्रेश होने गया, तब करीम ने रसोई में काम कर रही अनीता को अकेला पाकर दबे पाँव अंदर कदम रखा।
अनीता बदन अब भी शावर के ठंडे पानी के बावजूद उस 'पढ़ाई' की गर्मी से सुलग रहा था। तभी उसे पीछे किसी की आहट महसूस हुई।
करीम वहाँ खड़ा था। उसकी आँखों में वह जंगली चमक नहीं थी, बल्कि उसकी जगह एक बनावटी ग्लानि और पश्चाताप ने ले ली थी। उसने हाथ जोड़ लिए और अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना लाचार और भारी बना लिया।
करीम: "मालकिन... अगर सज़ा देनी है तो अभी दे दीजिये, पर हमरी ओर एक बार देख तो लीजिये। दोपहर में जो हुआ... वो हम नहीं थे। वो तो ई कम्बख्त 'रोल-प्ले' का भूत था जो हम पर सवार हो गया था।"
अनीता ने बिना मुड़े, कठोर आवाज़ में कहा, "चले जाओ यहाँ से करीम। तुमने आज दिखा दिया कि तुम्हारी असलियत क्या है। तुमने मुझे 'गुलाम' कहा... मेरी गरिमा को पैरों तले कुचल दिया।"
करीम ने एक कदम और आगे बढ़ाया और लगभग फुसफुसाते हुए गिड़गिड़ाने लगा:
करीम: "अरे नहीं मालकिन! मुँह से गलती से निकल गया। आप क्यों गुलाम बनेंगी? आप तो हमारी मल्लिका हैं, इस घर की असली मालकिन। हम तो बस उस मास्टर वाले नाटक में इतना खो गए थे कि अपनी हदें भूल गए। यकीन मानिए, हमें अपनी गलती का अहसास हो गया है।"
अनीता की आँखों में अभी भी गुस्सा था, पर करीम के नम लहजे ने उसे थोड़ा ढीला कर दिया। करीम ने मौका ताड़ते हुए अपनी 'माफी' का आखिरी पत्ता फेंका।
करीम: "मालकिन, हम पुराने ३० मिनट वाले समझौते पर ही टिके रहेंगे। न कोई कॉलेज ड्रेस, न कोई गंदा शब्द। हम मर्यादा नहीं लांघेंगे। बस हमें माफ़ कर दीजिये... हम बस जवानी के जोश में बह गए थे। कल से सब वैसे ही होगा जैसा पहले दिन तय हुआ था—मर्यादा के भीतर।"
अनीता ने लंबी साँस ली। उसे लगा कि शायद करीम वाकई शर्मिंदा है और अब वह सुरक्षित है। उसे क्या पता था कि करीम का यह 'गिड़गिड़ाना' तो बस उसे दोबारा सहज करने की एक सोची-समझी चाल थी ताकि वह अगली बार और भी गहराई से वार कर सके।
अनीता (धीमी आवाज़ में): "ठीक है करीम। कल से अगर तुमने अपनी हद पार की, तो मैं अंजाम की परवाह किए बिना राज को सब बता दूँगी। अब जाओ यहाँ से।"
करीम ने सर झुकाकर सलाम किया और मुड़ते वक्त उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसे देख कर अनीता की रूह कांप जाती—वह समझ गया था कि 'मालकिन' ने चारा निगल लिया है।
उस रात, राज ने भी अनीता को बिस्तर पर बहुत प्यार किया।
राज: "अनीता… तुम आज बहुत अलग लग रही हो। इतनी… उत्तेजित और सुंदर।"
अनीता: "उम्मम... राज... बस मुझे आज कसकर पकड़ लो।"
राज के प्यार और करीम की दी हुई उस भयंकर उत्तेजना के बीच फंसी अनीता को उस रात एक अजीब सा सुकून मिला। उसे लगा कि शायद अब सब कुछ 'नॉर्मल' हो रहा है। करीम के माफ़ी मांगने और अपनी हद में रहने के वादे ने उसके मन से वह भारी बोझ हटा दिया था।
Deepak Kapoor
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