16-02-2026, 06:59 PM
पर आज वो बहुत खुश थी। चुदाई मे इतना मज़ा मिलता है,उसने तो सपने मे भी नही सोचा था।जितनी बार वो आज झड़ी थी उतनी बार तो वो अपनी पूरी शादीशुदा ज़िंदगी मे भी नही झड़ी थी। विश्वा तो उसे बस मज़े के समुंदर के किनारे पे ला कर छोड़ देता था,पर आज पहली बार अपने ससुर के साथ इस समुंदर की गहराई मे कई बार डूब कर उसने पूरा लुफ्त उठाया था।
वो वैसे ही नंगी पड़ी इन ख़यालों मे खोई थी कि बाथरूम का दरवाज़ा खुला और राजासाहब बातरोब पहने बाहर आए। उसने मुस्कुरा कर उन्हे देखा पर वो उसे अनदेखा करते हुए लाउंज की ओर जाने लगे।
यहाँ तक आपने पढ़ा अब आगे.....................
"सुनिए",वो उठने लगी पर राजासाहब नही रुके। वो दौड़ती हुई उनके सामने जा कर खड़ी हो गयी। "क्या हुआ?कहाँ जा रहे हैं?"
"हमसे ग़लती हो गयी है। हमे जाने दीजिए।"
"कैसी ग़लती?क्या कह रहे हैं आप?अभी जो भी हुआ उसमे आपके साथ-साथ मेरी भी मर्ज़ी शामिल थी। फिर ग़लती कैसी?"
"समझने की कोशिश कीजिए!" मैत्री की पेशकश।
"क्या समझने की कोशिश करू? यही कि जितना मैं आपको प्यार करती हू उतना ही आप भी मुझ से करते हैं?"
"होश मे आइए। अभी जो हुआ वो नही होना चाहिए था।"
"मैं पूरे होश मे हू बल्कि अब ही तो मैं होश मे आई हू। अभी जो हुआ उसमे वासना से कही ज़्यादा प्यार था। मैने आपकी आँखों मे मेरे लिए चाहत साफ़ देखी है। क्या ये सच नही हैं या मैं ग़लत हू? आप को भी बस मेरे बदन की भूख थी।"
"आप जानती हैं कि हम आपको चाह-..."राजासाहब की अधूरी बात मे दर्द और गुस्सा था।
"तो फिर क्यू जा रहें है हमसे दूर?",मेनका ने उनके कंधों पे अपने हाथ दिए।
"आप...आप..हमारे बेटे की पत्नी हैं। समाज के भी कुछ नियम हैं। ये रिश्ता हम कैसे निभा सकते हैं?"
"समाज के नियम,पत्नी,हुन्ह! क्या है समाज के नियम! यही कि आग के चारो तरफ घूम के 7 फेरे ले,सिंदूर लगा कर किसी को भी अपनी पत्नी के शरीर को जब जी चाहे,जैसे चाहे रौंदने का मौका मिल जाता है! मैं नही मानती ऐसे नियम।"
"आप समझ नही रही है।" मैत्रिकी लेखनी।
"मैं सब समझ रही हू पर आप नही समझ रहे हैं। आपको समाज का डर है ना। मुझे भी राजकुल की मर्यादा का ख़याल है। आपको वचन देती हू कभी भी उस पर आँच नही आने दूँगी। कल को आपका बेटा ठीक होकर वापस आ जाएगा तो इस मर्यादा के लिए, समाज के लिए मैं उसकी ब्यहता बन जाऊंगी। पर राजासाहब,एक लड़की क्या चाहती है अपने पति से। बस प्यार,विश्वास और इज़्ज़त जोकि आपके बेटे ने मुझे कभी नही दिया। ये सब मुझे आपने दिया है और मैने तन और मन दोनो से आपको अपना पति मान लिया है। कल आपका बेटा वापस आएगा तो दुनिया के लिए मैं उसकी बीवी हूँगी पर मेरी आत्मा पर अगर किसी का अधिकार होगा तो वो बस आपका होगा। आज जो खुशी मैने पाई है वो पहले कभी किसी ने मुझे नही दी। प्लीज़...ये खुशी मुझ से मत छिनिये। चाहे थोड़े दीनो के लिए ही सही-ये...ये एक सपना ही सही। मुझे इस सपने मे अपने साथ जी लेने दीजिए, प्लीज़!",मेनका की आँखें छल्छला आई और गला भर गया।
"क्या ग़लत कह रही है? क्या हमे हक़ नही है खुश रहने का और इसने तो हमारे घर मे कदम रखने के बाद बस दुख ही झेले हैं, और उसके कुछ ज़िम्मेदार तो हम भी हैं। क्या हमारा फ़र्ज़ नही बनता इसकी इच्छाओं का मान रखने का।",राजासाहब के मन मे सवाल उठ रहे थे।
मेनका उनसे अलग हो उनकी तरफ पीठ कर सूबक रही थी। राजासाहब ने उसे अपनी तरफ घुमाया और ठुड्डी पकड़ कर उसके झुके चेहरे को उपर किया,"हम भी आपको वचन देते हैं जब तक इस शरीर मे जान है तब तक आपकी हर खुशी का ख़याल रखेंगे और इन आँखों मे आज के बाद हुमारी वजह से आँसू नही आएँगे।",राजासाहब ने उसके चेहरे पर बनी आँसू की लकीरों को अपने होठों से मिटा दिया और उसे अपनी बाहों मे भर लिया। मेनका उनके सीने मे मुँह छुपा फिर सुबकने लगी मगर इस बार आँसू खुशी के थे।
थोड़ी देर बाद जब वो चुप हो गयी तो उसने अपने ससुर की आँखों मे झाँका और अपने लिए सिर्फ़ प्यार पाया,"आइ लव यू।",कह कर उसने उनके होठ हल्के से चूम लिए। फिर उनका बातरोब साष खोल कर उतार दिया और उन्हे बेड पे ले गयी।
राजासाहब लेट गये तो वो भी उनकी बगल मे लेट गयी।
राजासाहब पीठ के बल लेट गये और मेनका उनकी बगल मे करवट ले कर लेट गयी। दोनो के होठ एक बार फिर जुड़ गये। राजासाहब की एक बाँह मेनका की कमर के गिर्द थी और उनका एक हाथ उसकी कमर और गांड को सहला रहा था और दूसरा उसकी छातियो को। मेनका की उंगलियाँ उसके ससुर के सीने के बालों से खेल रही थी। काफ़ी देर तक दोनो एक दूसरे को ऐसे ही चूमते रहे।
फिर मेनका ने उनके होठों को छोड़ उनके चेहरे को चूमना शुरू किया और चूमते हुए नीचे उनके सीने तक आ पहुँची। उसके होठ पहले तो हल्के से राजासाहब के काले निपल्स को छेड़ते रहे पर फिर अचानक उन्होने उन काले निपल्स को अपनी रेशमी गिरफ़्त मे भींच लिया। मेनका अपने ससुर के निपल्स चूसने लगी और वो अपने हाथ उसकी गांड और छाती से हटा उसके सर पर ले आए। उन्हे बहुत मज़ा आ रहा था। मैत्री की रचना।
मेनका उनके सीने को चूमते हुए उनके सीने के बालों का पीछा करते हुए नीचे जाने लगी और उनके लंड तक पहुँच गयी। लंड फिर से पूरा तना हुआ था। मेनका उसे एक तक निहारने लगी। कुछ देर पहले राजासाहब ने इसी लंड के सहारे उसे जन्नत की सैर कराई थी। उसने एक हाथ बढ़ा कर उसे अपनी गिरफ़्त मे ले लिया। राजासाहब उसे देख रहे थे। लंड इतना मोटा था कि उसका छ्होटा सा हाथ उसे पूरा नही घेर पा रहा था।
मेनका को अपने ससुर का लंड बहुत प्यारा लग रहा था। वो उसे अपने मुलायम हाथों से पकड़ धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसका चेहरा धीरे-2 करके लंड की ओर झुकता जा रहा था। उसने और झुक कर लंड के टोपे को बहुत हल्के से चूम लिया। उसे खुद पर बहुत हैरानी हुई। उसका पति यही चाहता था पर उसे इतनी घिन आती थी,सोचने भर से ही उसे उबकाई आती थी। वो अपने पति से उलझ भी पड़ी थी और साफ़ इनकार कर दिया था उसके लंड को अपने मुँह मे लेने से। (याद है ना!)
आज के लिए बस यही तक...............
मैत्री की ओर से जय भारत।।
वो वैसे ही नंगी पड़ी इन ख़यालों मे खोई थी कि बाथरूम का दरवाज़ा खुला और राजासाहब बातरोब पहने बाहर आए। उसने मुस्कुरा कर उन्हे देखा पर वो उसे अनदेखा करते हुए लाउंज की ओर जाने लगे।
यहाँ तक आपने पढ़ा अब आगे.....................
"सुनिए",वो उठने लगी पर राजासाहब नही रुके। वो दौड़ती हुई उनके सामने जा कर खड़ी हो गयी। "क्या हुआ?कहाँ जा रहे हैं?"
"हमसे ग़लती हो गयी है। हमे जाने दीजिए।"
"कैसी ग़लती?क्या कह रहे हैं आप?अभी जो भी हुआ उसमे आपके साथ-साथ मेरी भी मर्ज़ी शामिल थी। फिर ग़लती कैसी?"
"समझने की कोशिश कीजिए!" मैत्री की पेशकश।
"क्या समझने की कोशिश करू? यही कि जितना मैं आपको प्यार करती हू उतना ही आप भी मुझ से करते हैं?"
"होश मे आइए। अभी जो हुआ वो नही होना चाहिए था।"
"मैं पूरे होश मे हू बल्कि अब ही तो मैं होश मे आई हू। अभी जो हुआ उसमे वासना से कही ज़्यादा प्यार था। मैने आपकी आँखों मे मेरे लिए चाहत साफ़ देखी है। क्या ये सच नही हैं या मैं ग़लत हू? आप को भी बस मेरे बदन की भूख थी।"
"आप जानती हैं कि हम आपको चाह-..."राजासाहब की अधूरी बात मे दर्द और गुस्सा था।
"तो फिर क्यू जा रहें है हमसे दूर?",मेनका ने उनके कंधों पे अपने हाथ दिए।
"आप...आप..हमारे बेटे की पत्नी हैं। समाज के भी कुछ नियम हैं। ये रिश्ता हम कैसे निभा सकते हैं?"
"समाज के नियम,पत्नी,हुन्ह! क्या है समाज के नियम! यही कि आग के चारो तरफ घूम के 7 फेरे ले,सिंदूर लगा कर किसी को भी अपनी पत्नी के शरीर को जब जी चाहे,जैसे चाहे रौंदने का मौका मिल जाता है! मैं नही मानती ऐसे नियम।"
"आप समझ नही रही है।" मैत्रिकी लेखनी।
"मैं सब समझ रही हू पर आप नही समझ रहे हैं। आपको समाज का डर है ना। मुझे भी राजकुल की मर्यादा का ख़याल है। आपको वचन देती हू कभी भी उस पर आँच नही आने दूँगी। कल को आपका बेटा ठीक होकर वापस आ जाएगा तो इस मर्यादा के लिए, समाज के लिए मैं उसकी ब्यहता बन जाऊंगी। पर राजासाहब,एक लड़की क्या चाहती है अपने पति से। बस प्यार,विश्वास और इज़्ज़त जोकि आपके बेटे ने मुझे कभी नही दिया। ये सब मुझे आपने दिया है और मैने तन और मन दोनो से आपको अपना पति मान लिया है। कल आपका बेटा वापस आएगा तो दुनिया के लिए मैं उसकी बीवी हूँगी पर मेरी आत्मा पर अगर किसी का अधिकार होगा तो वो बस आपका होगा। आज जो खुशी मैने पाई है वो पहले कभी किसी ने मुझे नही दी। प्लीज़...ये खुशी मुझ से मत छिनिये। चाहे थोड़े दीनो के लिए ही सही-ये...ये एक सपना ही सही। मुझे इस सपने मे अपने साथ जी लेने दीजिए, प्लीज़!",मेनका की आँखें छल्छला आई और गला भर गया।
"क्या ग़लत कह रही है? क्या हमे हक़ नही है खुश रहने का और इसने तो हमारे घर मे कदम रखने के बाद बस दुख ही झेले हैं, और उसके कुछ ज़िम्मेदार तो हम भी हैं। क्या हमारा फ़र्ज़ नही बनता इसकी इच्छाओं का मान रखने का।",राजासाहब के मन मे सवाल उठ रहे थे।
मेनका उनसे अलग हो उनकी तरफ पीठ कर सूबक रही थी। राजासाहब ने उसे अपनी तरफ घुमाया और ठुड्डी पकड़ कर उसके झुके चेहरे को उपर किया,"हम भी आपको वचन देते हैं जब तक इस शरीर मे जान है तब तक आपकी हर खुशी का ख़याल रखेंगे और इन आँखों मे आज के बाद हुमारी वजह से आँसू नही आएँगे।",राजासाहब ने उसके चेहरे पर बनी आँसू की लकीरों को अपने होठों से मिटा दिया और उसे अपनी बाहों मे भर लिया। मेनका उनके सीने मे मुँह छुपा फिर सुबकने लगी मगर इस बार आँसू खुशी के थे।
थोड़ी देर बाद जब वो चुप हो गयी तो उसने अपने ससुर की आँखों मे झाँका और अपने लिए सिर्फ़ प्यार पाया,"आइ लव यू।",कह कर उसने उनके होठ हल्के से चूम लिए। फिर उनका बातरोब साष खोल कर उतार दिया और उन्हे बेड पे ले गयी।
राजासाहब लेट गये तो वो भी उनकी बगल मे लेट गयी।
राजासाहब पीठ के बल लेट गये और मेनका उनकी बगल मे करवट ले कर लेट गयी। दोनो के होठ एक बार फिर जुड़ गये। राजासाहब की एक बाँह मेनका की कमर के गिर्द थी और उनका एक हाथ उसकी कमर और गांड को सहला रहा था और दूसरा उसकी छातियो को। मेनका की उंगलियाँ उसके ससुर के सीने के बालों से खेल रही थी। काफ़ी देर तक दोनो एक दूसरे को ऐसे ही चूमते रहे।
फिर मेनका ने उनके होठों को छोड़ उनके चेहरे को चूमना शुरू किया और चूमते हुए नीचे उनके सीने तक आ पहुँची। उसके होठ पहले तो हल्के से राजासाहब के काले निपल्स को छेड़ते रहे पर फिर अचानक उन्होने उन काले निपल्स को अपनी रेशमी गिरफ़्त मे भींच लिया। मेनका अपने ससुर के निपल्स चूसने लगी और वो अपने हाथ उसकी गांड और छाती से हटा उसके सर पर ले आए। उन्हे बहुत मज़ा आ रहा था। मैत्री की रचना।
मेनका उनके सीने को चूमते हुए उनके सीने के बालों का पीछा करते हुए नीचे जाने लगी और उनके लंड तक पहुँच गयी। लंड फिर से पूरा तना हुआ था। मेनका उसे एक तक निहारने लगी। कुछ देर पहले राजासाहब ने इसी लंड के सहारे उसे जन्नत की सैर कराई थी। उसने एक हाथ बढ़ा कर उसे अपनी गिरफ़्त मे ले लिया। राजासाहब उसे देख रहे थे। लंड इतना मोटा था कि उसका छ्होटा सा हाथ उसे पूरा नही घेर पा रहा था।
मेनका को अपने ससुर का लंड बहुत प्यारा लग रहा था। वो उसे अपने मुलायम हाथों से पकड़ धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसका चेहरा धीरे-2 करके लंड की ओर झुकता जा रहा था। उसने और झुक कर लंड के टोपे को बहुत हल्के से चूम लिया। उसे खुद पर बहुत हैरानी हुई। उसका पति यही चाहता था पर उसे इतनी घिन आती थी,सोचने भर से ही उसे उबकाई आती थी। वो अपने पति से उलझ भी पड़ी थी और साफ़ इनकार कर दिया था उसके लंड को अपने मुँह मे लेने से। (याद है ना!)
आज के लिए बस यही तक...............
मैत्री की ओर से जय भारत।।


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