16-02-2026, 03:57 PM
(This post was last modified: 16-02-2026, 03:57 PM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
शेर के लिए एक झटका
शाम ढल चुकी थी और कोठी के बाहर सरताज की सरकारी गाड़ी के रुकने की आवाज़ गूँजी। सीढ़ियों पर भारी जूतों की चाप और वर्दी की सरसराहट सुनते ही मीरा के बदन में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई।
पूरी दोपहर मीरा ने नीले रंग की उस झीनी साड़ी में अकेले बिताई थी, जहाँ बस यही सोच रही थी कि सरताज उसकी ज़िंदगी के लिए क्या मायने रखते हैं। कॉलेज के दिनों की खामोश मोहब्बत से लेकर रक्षक बनने तक की हर याद उसके दिल में इस कदर उमड़ी कि सरताज के लिए उसका प्यार आज एक सैलाब बन चुका था।
जैसे ही सरताज ने मुख्य दरवाज़ा खोला, मीरा बिजली की गति से उसकी ओर लपकी और उसे पागलों की तरह गले लगा लिया। सरताज ने भी पूरी शिद्दत से उसे अपनी बाहों के घेरे में भर लिया। सरताज के मज़बूत और बड़े हाथ मीरा की पतली कमर से फिसलते हुए उसकी साड़ी के नीचे, उसके नंगे और मखमली पेट पर जाकर कस गए। उसने मीरा को पूरी मजबूती से अपनी ओर खींचकर थाम लिया।
मीरा उस वक्त दुनिया जहान से बेखबर थी; उसने यह भी नहीं देखा कि आस-पास कोई देख रहा है या नहीं। वह बस सरताज के चेहरे को चूमने लगी—कभी उसके गालों को, कभी उसकी आँखों को। इस कशमकश में मीरा की नीली साड़ी के नीचे दबे उसके दोनों भारी और गर्म स्तन सरताज की कड़क वर्दी वाली चौड़ी छाती पर पूरी तरह मसल रहे थे।
तभी रसोई के दरवाज़े के पास खड़ा शेर यह सब देख रहा था। उसके हाथ में पानी का गिलास था, पर उसकी नज़रें मीरा के उस समर्पण और सरताज की उस मज़बूत पकड़ पर टिकी थीं। उसका चेहरा गुस्से और जलन से तमतमा उठा था, पर वह खामोश था।
उसकी नज़रें सरताज के उन मज़बूत हाथों पर जम गई थीं, जो मीरा के उस गोरे, चिकने और नंगे पेट को अपनी उंगलियों से भींच रहे थे।
शेर [आंतरिक विचार]: 'ओह तेरी... ये नज़ारा तो कलेजा चीर देगा। साब के वो हाथ उस मक्खन जैसी खाल को कैसे दबा रहे हैं… जैसे सारा रस निचोड़ लेंगे। काश... काश साब की जगह मेरे हाथ वहाँ होते, तो मैं अपनी उंगलियों को इस नाभि के गहरे भँवर में उतार देता और इस रेशमी बदन की गरमाहट को अपनी हथेलियों में सोख लेता। ये औरत नहीं, जलती हुई आग है।'
शेर [आंतरिक विचार]: 'हाय रे किस्मत... उस कड़क वर्दी की जगह अगर मेरा ये सांवला बदन होता, तो आज इन चूचियों की नरमी मैं महसूस करता। साला, ये हक मेरा होना चाहिए था।'
मीरा: (आँखों में आँसू और चेहरे पर एक अजीब सी बेताबी लिए, सरताज के सीने से लिपटते हुए) "सरताज!"
सरताज: (हैरानी और प्यार भरे स्वर में) "अरे... मीरा? क्या हुआ मेरी जान? इतनी घबराहट और इतना प्यार... सब खैरियत तो है न?"
मीरा: (उसकी खुशबू को अपनी साँसों में भरते हुए और उसे और कसकर पकड़ते हुए) "बस... बस आज मुझे अहसास हुआ कि मैं आपसे कितनी मोहब्बत करती हूँ। मुझे लगा जैसे मैं आपको बताना भूल गई हूँ कि आप मेरे लिए क्या हैं।"
सरताज: (धीमे से मुस्कुराते हुए, उसके बालों को सहलाते हुए) "तुम पागल हो। तुम्हें बताने की ज़रूरत नहीं है, मैं तुम्हारी हर धड़कन में खुद को महसूस करता हूँ। आज अचानक ऐसा क्या हो गया?"
मीरा: (अपना सिर उसके चौड़े सीने पर टिकाते हुए) "पता नहीं... शायद आज बीते कल की कुछ परतें खुलीं। मुझे याद आया कि कैसे आपने मुझे उस नरक से निकाला था। सरताज, उस वक्त अगर आप मेरा हाथ न थामते, तो आज मैं कहाँ होती?"
सरताज: (गंभीरता से, उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में देखते हुए) "मीरा, मैंने पहले भी कहा था और आज फिर कह रहा हूँ—वो मेरा फर्ज था। एक दोस्त के लिए, एक इंसान के लिए। और आज तुम मेरी पत्नी हो। उस अतीत को याद करके अपनी इन खूबसूरत आँखों में आँसू मत लाओ।"
मीरा: (सिसकते हुए) "नहीं सरताज, वो सिर्फ फर्ज नहीं था। वो आपकी वो खामोश मोहब्बत थी जिसे मैं सालों तक समझ नहीं पाई। मुझे माफ कर दीजिए कि मैंने आपको समझने में इतनी देर कर दी।"
सरताज: (उसे चूमते हुए, हल्के और कामुक स्वर में) "माफी की बात मत करो मीरा। तुमने मुझे जो घर, जो परिवार और जो प्यार दिया है, उसने मेरे हर ज़ख्म को भर दिया है। अब बस... इन आँसुओं को पोंछ लो।"
सरताज ने मीरा को अपनी बाहों से धीरे से अलग किया और उसके माथे को चूमते हुए अपनी भारी आवाज़ में कहा।
सरताज: "मीरा, आज का दिन बहुत भारी रहा, पर तुम्हारी ये बातें सुनकर सारी थकान मिट गई। चलो, आज बाहर डिनर पर चलते हैं। तुम ज्योति को तैयार करो, तब तक मैं ज़रा फ्रेश होकर आता हूँ।"
मीरा ने मुस्कुराकर सरताज का हाथ दबाया और ज्योति के कमरे की ओर बढ़ गई। सरताज गुनगुनाते हुए अपने बेडरूम से लगे बाथरूम की ओर चला गया। उसने अपनी वर्दी की बेल्ट खोली, कमीज उतारी और आईने के सामने खड़ा होकर अपना चेहरा देखने लगा।
बाथरूम में गर्म पानी का शावर चलाने के लिए जैसे ही वह मुड़ा, उसकी नज़री दीवार के उस कोने पर पड़ी जहाँ एक लकड़ी का कैबिनेट टिका हुआ था। उस कैबिनेट के ठीक बगल में, टाइल्स के बीच एक छोटा सा सुराख उसे कुछ अजीब लगा।
सरताज एक मँझा हुआ सिक्युरिटी अफ़सर था, जिसकी आँखें बारीक से बारीक सुराग ढूँढने की आदी थीं। वह पास गया और उस छेद को गौर से देखने लगा।
सरताज (मन ही मन): "ये क्या है? ये छेद यहाँ पहले तो नहीं था... या शायद था? क्या ये दीमक का काम है या किसी ने जानबूझकर यहाँ ड्रिल किया है?"
उसने अपना हाथ बढ़ाकर उस सुराख को छुआ। छेद बहुत करीने से बनाया गया था, बिल्कुल आँखों के लेवल पर। सरताज ने अपनी एक आँख उस छेद से सटाई और दूसरी तरफ देखने की कोशिश की। लेकिन उसे सिर्फ अंधेरा दिखाई दिया।
दरअसल, दीवार के दूसरी तरफ स्टोर रूम में, शेर ने उस सुराख के मुँह पर एक छोटा सा लकड़ी का गुटका लगा रखा था, ताकि कोई दूसरी तरफ से देख न सके।
सरताज ने अपनी उंगली से छेद की गहराई नापी। वह गहराई तक जा रहा था। उसके माथे पर हल्की सी शिकन उभर आई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह छेद हाल ही में बनाया गया है या यह पुराना है जो मरम्मत के दौरान छूट गया था। वह कुछ देर वहीं खड़ा सोचता रहा, उसके अफ़सर वाले दिमाग में शक की एक बारीक सी लकीर खिंच गई थी, लेकिन अभी उसके पास कोई ठोस सबूत नहीं था।
सरताज उस सुराख को घूरता रहा। एक अनुभवी सिक्युरिटी अफ़सर होने के नाते, वह जानता था कि अपराधी को पकड़ने के लिए अक्सर खुद को अनजान दिखाना पड़ता है। उसने अपनी आँखों को सिकोड़ा और एक गहरी सोच में डूब गया।
सरताज (मन ही मन): "अगर मैं अभी शोर मचाऊँगा, तो शिकारी भाग जाएगा। मुझे यह जानना होगा कि यह छेद किसी पुरानी मरम्मत का हिस्सा है या कोई अभी इसी वक्त हमारी निजता में सेंध लगा रहा है।"
तभी उसके दिमाग में एक शातिर चाल आई। उसने पास रखे टूथपेस्ट का ट्यूब उठाई। उसने थोड़ा सा पेस्ट अपनी उंगली पर लिया और बहुत ही सफाई से उस छेद को बाथरूम की तरफ से पूरी तरह बंद कर दिया। सफ़ेद पेस्ट टाइल्स के बीच ऐसे घुल-मिल गया कि पहली नज़र में पता भी नहीं चलता था कि वहाँ कोई सुराख था।
यह एक 'खामोश जाल' था।
सरताज ने एक ठंडी मुस्कान के साथ सोचा, "अब खेल शुरू होगा। अगर अगले कुछ दिनों में यह पेस्ट अपनी जगह से हटा या छेद फिर से साफ हुआ, तो इसका सीधा मतलब होगा कि कोई दूसरी तरफ से इसे हटाने की कोशिश कर रहा है। वह इंसान अभी इसी घर में मौजूद है और हमें देख रहा है। लेकिन अगर पेस्ट वैसा ही बना रहा, तो इसका मतलब यह कोई पुराना सुराख है।"
बाथरूम से बाहर आकर वह तैयार होने लगा। उसका चेहरा अब बिल्कुल शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
सरताज ने अपने शक का एक कतरा भी चेहरे पर नहीं आने दिया। वह जानता था कि अगर उसने मीरा को कुछ भी बताया, तो वह डर जाएगी और उसकी सुरक्षा का सुकून छीन जाएगा। एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह, उसने उस राज़ को अपने सीने में दफन कर लिया।
सरताज: (हंसते हुए) "चलो मीरा! ज्योति बेटा, तुम तो बिल्कुल गुड़िया लग रही हो। आज तो पापा की दोनों रानियाँ सबसे सुंदर लग रही हैं।"
मीरा सरताज की इस सहजता को देखकर निहाल हो गई। वह कहाँ जानती थी कि जिस पति के कंधे पर वह सिर टिका रही है, उसके दिमाग में एक शिकारी को दबोचने का जाल बुनना शुरू हो चुका है।
वे सब अपनी गाड़ी में बैठकर शहर के एक बेहद आलीशान और मशहूर रेस्टोरेंट पहुँचे। जैसे ही सरताज की काली SUV रेस्टोरेंट के पोर्टिको में रुकी, वहाँ की रौनक और बढ़ गई।
यह शहर का सबसे प्रीमियम रेस्टोरेंट था। जैसे ही वे अंदर दाखिल हुए, रेस्टोरेंट के मालिक, मिस्टर खन्ना, जो सरताज के पुराने परिचित और उनके काम के प्रशंसक थे, खुद भागते हुए स्वागत के लिए आगे आए।
मिस्टर खन्ना: (हाथ जोड़कर, बड़े सम्मान के साथ) "अरे! सरताज साहब, आज तो हमारा रेस्टोरेंट धन्य हो गया। स्वागत है, स्वागत है! मीरा जी, नमस्कार।"
खन्ना साहब ने खुद आगे बढ़कर उनके लिए सबसे बेहतरीन 'कॉर्नर टेबल' आरक्षित करवाई, जहाँ से शहर का खूबसूरत नज़ारा दिखता था।
मिस्टर खन्ना: (वेटर को इशारा करते हुए) "आज सरताज साहब और उनका परिवार हमारे मेहमान हैं। शेफ से कहो कि आज का सबसे बेहतरीन मेन्यू टेबल पर होना चाहिए।"
सरताज मुस्कुराते हुए बातें कर रहा था, ज्योति को खिला रहा था और मीरा के साथ हँसी-मजाक कर रहा था। बाहर से वह एक खुशहाल और तनावमुक्त पति लग रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर उसके दिमाग की एक खिड़की अभी भी उस बाथरूम की दीवार के सुराख पर खुली थी।
रेस्टोरेंट में जब सरताज, मीरा और ज्योति डिनर का लुत्फ उठा रहे थे, यहाँ कोठी में शेर के भीतर एक अलग ही शैतान जाग चुका था। उसे पता था कि उसके पास कम से कम एक-डेढ़ घंटे का वक्त है। उसके मन में एक सनक सवार हो गई थी—उसे मीरा की उन रेशमी पोशाकों को बतौर 'निशानी' चुराना था जिन्हें वह उनके बदन से उतरते देख चुका था।
वह दबे पाँव उनके बेडरूम में दाखिल हुआ। कमरे में मीरा के इत्र की हल्की-सी खुशबू अब भी मौजूद थी, जिसने शेर की हवस को और भड़का दिया। उसने मीरा की अलमारी के एक दराज को बड़ी बेताबी से खोला। वहाँ सलीके से रखे हुए कपड़ों के ढेर में से उसने दो जोड़ी रेशमी ब्रा और पैंटी उठाईं—एक काले रंग की और एक सुर्ख लाल। उसने उन्हें अपनी जेब में ठूंस लिया, पर उसका मन अभी भरा नहीं था।
उसके ज़हरीले दिमाग में एक ख्याल आया कि जो कपड़े मीरा ने आज शाम नहाने से पहले उतारे होंगे, उनमें उसके बदन की असली महक और गर्माहट होगी। इसी चाहत में वह बेडरूम से सटे बाथरूम की ओर बढ़ा।
बाथरूम के भीतर का माहौल अभी भी थोड़ा नम था। उसकी नज़र उस कोने में पड़ी जहाँ मीरा ने अपनी पहनी हुई गुलाबी ब्रा और पैंटी एक तरफ डाल रखी थी। शेर ने झपटकर उन्हें उठा लिया। उसकी आँखें चमक उठीं। उसने उन कपड़ों को अपने चेहरे के करीब लाया और आँखें बंद कर उन्हें गहराई से सूँघने लगा। मीरा के बदन की वो नशीली महक उसके दिमाग की नसों में बिजली की तरह दौड़ गई। वह मदहोशी में डूबने ही वाला था कि तभी...
उसकी नज़र दीवार के उस सुराख पर पड़ी जिसे उसने बड़ी मेहनत से बनाया था।
अचानक शेर के बदन का खून जैसे बर्फ बन गया। वह वहीं जम गया।
दीवार पर जहाँ वह बारीक सा छेद होना चाहिए था, वहाँ अब सफेद रंग का कोई पदार्थ लगा हुआ था। सुराख पूरी तरह से बंद था। शेर की साँसें हलक में अटक गईं और उसके हाथ कांपने लगे। उसका दिल हथौड़े की तरह सीने में बजने लगा।
शेर [आंतरिक खौफ]: 'ये... ये क्या है? ई छेद किसने बंद कर दिया? क्या मेमसाब ने देख लिया? या... या फिर दरोगा जी?'
उसके माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें उभर आईं। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह किसी ने अनजाने में किया है या उसे पकड़ने के लिए कोई जाल बिछाया गया है।
शेर के बदन में डर की एक लहर दौड़ गई। वह जानता था कि सरताज सिंह एक मंझा हुआ शिकारी है। उसने न तो किसी से उस छेद के बारे में पूछा, न ही कोई शोर मचाया—बस खामोशी से उसे बंद कर दिया। यह एक सिक्युरिटी अफ़सर का तरीका था अपराधी को जाल में फँसाने का।
शेर [आंतरिक खौफ]: 'दरोगा जी तो बड़े घाघ निकले! उन्होंने चुपचाप ई रास्ता बंद कर दिया और अब बस इंतज़ार कर रहे होंगे कि कौन सा चूहा इसे दोबारा खोलने आता है। अगर मैंने इसे छुआ, तो मेरी मौत पक्की है।'
कुछ पलों के लिए उसके मन में भारी गुस्सा उमड़ा। वह तड़प उठा यह सोचकर कि अब उसकी रोज़ाना की वो 'रंगीन फिल्म' बंद हो जाएगी। उस सुराख से मीरा को नंगा देखने का जो चस्का उसे लग चुका था, उसका छिन जाना उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। लेकिन तभी उसके ज़हरीले दिमाग ने एक नया मोड़ लिया। उसकी आँखों में एक वहशी चमक उभरी।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'ठीक है दरोगा जी... आपने सुराख बंद किया है, पर इस शेर की हवस का रास्ता बंद नहीं कर सकते। अब दूर से देखने का वक्त खत्म हुआ। अब वक्त आ गया है उस जड़ी-बूटी वाली दवा का इस्तेमाल करने का। अब पर्दा नहीं, सीधा दीदार होगा।'
बड़ी चालाकी और सफाई से, शेर ने मीरा की उन उतारकर रखी हुई पैंटी और ब्रा को वापस उन्हीं जगहों पर रख दिया जहाँ से उसने उन्हें उठाया था। उसने एक धागा भी इधर से उधर नहीं होने दिया, ताकि किसी को शक न हो कि कोई इस कमरे में आया था।
बाथरूम से बाहर निकलते वक्त उसने एक आखिरी बार उस बंद छेद की ओर देखा और मन ही मन एक खौफनाक शपथ ली।
शेर का संकल्प: "बहुत देख लिया दूर से... अब ये आँखें थक गई हैं। अब तो इन हाथों को उन भरी हुई चुचियों को भींचना है। इन होंठों को उस नंगे और मखमली पेट का स्वाद चखना है... और उन नीचे वाले गुलाबी होंठों की गर्माहट को अपनी रूह में उतारना है। सरताज सिंह, तुम छेद बंद करो या दरवाज़ा... ये शेर अब सीधा उस बिस्तर तक पहुँचेगा।"
अब उसका इरादा सिर्फ देखने का नहीं, बल्कि मीरा के उस रेशमी बदन को पूरी तरह से रौंदने का था।
घर पहुँचते ही सरताज के चेहरे पर वही बनावटी सुकून था। जैसे ही उसे मौका मिला, वह बाथरूम में दाखिल हुआ और सबसे पहले उसी सफेद धब्बे को देखा।
टूथपेस्ट का वह निशान अभी भी बिल्कुल वैसा ही था—सफेद, सूखा और बेजान। सरताज ने राहत की एक सांस ली, लेकिन उसका शक अभी पूरी तरह मिटा नहीं था। उसने सावधानी से कमरे और बाथरूम का मुआयना किया, मीरा की रखी हुई चीज़ों को देखा, पर सब कुछ अपनी जगह पर सही-सलामत था। शेर की चालाकी काम कर गई थी; उसने कपड़ों को इतनी सफाई से वापस रखा था कि एक अनुभवी अफ़सर भी यह नहीं भांप सका कि किसी ने उन्हें छुआ है।
सरताज (मन ही मन): "सब कुछ ठीक लग रहा है। शायद यह छेद वाकई पुराना हो और किसी ने अभी तक इसे छेड़ा न हो। पर सिक्युरिटी की वर्दी पहनकर मैंने एक ही सबक सीखा है—शिकारी को तब तक नहीं पकड़ना चाहिए जब तक वह खुद जाल के करीब न आ जाए।"
उसने फैसला किया कि वह अभी कोई जल्दबाजी नहीं करेगा। उसने मन ही मन तय किया कि वह अगले कुछ दिनों तक इस सुराख पर अपनी नज़र बनाए रखेगा। अगर यह कोई 'जिंदा' जाल है, तो चूहा एक न एक दिन उस पेस्ट को हटाने की कोशिश ज़रूर करेगा।
उधर, घर के दूसरे कोने में शेर अपनी उस काली दवा की शीशी को हथेली में दबाए अंधेरे में मुस्कुरा रहा था। उसे पता था कि दरोगा जी की नज़रें अब दीवार पर हैं, इसीलिए उसने अपना शिकार अब उस दीवार से हटाकर सीधे बिस्तर पर शिफ्ट कर दिया था।
रात गहरा रही थी। सरताज और मीरा बिस्तर पर एक-दूसरे के करीब थे। मीरा सरताज के सीने से लगकर सो रही थी।
Deepak Kapoor
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