15-02-2026, 11:06 AM
Season I - Episode 3
शाम के करीब चार बजे का समय था, मोहल्ले में दिवाली की रौनक और सर्दी की चुभन -- दोनों अपनी पूरी शिद्दत पर थीं। हर घर में रंग-बिरंगी लाइटें लटक रही थीं, लेकिन कायला के आँगन का नज़ारा -- किसी भी रोशनी से ज़्यादा आँखें चुराने वाला था।
वो आँगन में झुकी हुई रंगोली बना रही थी, उसकी कमर की लचक ऐसी थी कि लोअर उसकी भारी गांड की दरार में बुरी तरह फँसा हुआ था। हर बार जब वो आगे झुककर रंग भरती, कपड़े में दबा बैंगनी चड्डी का पतला किनारा ऐसे उभर आता--जैसे किसी को सीधा उँगली रखकर खींच लेने का न्यौता दे रही हो... और नीचे से हल्की-सी गंध, गरम साँसों जैसी, हवा में तैरकर सीधा दिमाग पे चढ़ जाती। वो पतली-सी लकीर चड्डी और त्वचा के बीच की, बस इतनी कि सोचते ही उँगलियाँ खुद-ब-खुद कसने लगें।
उसका गोरा, भरा-पूरा बदन पसीने की हल्की नमी में चमक रहा था। ढीले लोअर और कसी हुई ब्लैक शॉर्ट टी-शर्ट के बीच से कभी-कभी बैंगनी ब्रा की स्ट्रैप बाहर फिसलकर दिख जाती। हवा का झोंका आया, टी-शर्ट उसके 36B के गोल-मटोल, लचकते दूधों पर चिपक गई--जैसे कपड़े हटाना अब बस औपचारिकता रह गया हो। निपल की हल्की-सी उभार ने कपड़े के नीचे अपनी मौजूदगी का ऐलान कर दिया, और वो गरमाहट से फड़फड़ाती सांसें... जैसे किसी को सीधे पकड़कर दबा लेने का इशारा कर रही हों।
उसके बालों से पसीने की बूंदें गर्दन और कॉलरबोन पर लुढ़क रही थीं। पसनीे की खुशबू में मिली उसकी देह की गरमी और हर हरकत में मांस का धीमा-धीमा खेल -- सब मिलकर ऐसा मंजर बना रहे थे कि कोई भी मर्द,चाहकर भी, अपनी नज़र और होश काबू में न रख पाए।
बाजू के घर से मोनू निकलता है -- कायला का पड़ोसी, मोहल्ले के कॉरपोरेटर का बेटा... और अब तो पुराना चोदन भी। आँखों में वही भूख थी -- जो एक बार चख चुका हो, उसकी प्यास और गहरी हो जाती है। साथ में आया था सनी -- सामने वाले घर का लड़का। बाहर रहता है, बस दिवाली पर ही यहाँ आता है अपने मम्मी-पापा के साथ त्योहार मनाने।
दोनों गले मिले और फिर नज़रें सीधी कायला के झुके हुए शरीर पर। लोअर की सिलवटें उसकी गांड के बीच ऐसे फँसी थीं जैसे वहीं अटककर कह रही हों -- "खींच ले मुझे"
मोनू (आँखें मिचमिचाकर, होंठ चाटते हुए): "देख बे सनी... सामने जो रंगोली बना रही है -- वही है कायला।"
सनी (हँसकर, नज़रें चिपकाकर): "भाई... लग रहा है जैसे चूत रंगों से नहीं, किसी और रस से भीगी हो। माल देखके ही लंड भारी हो गया।"
मोनू (धीमे, भारी साँस में): "साले, तू सोच रहा है... मैं तो इसे चख चुका हूँ। याद है पिछली बार जब इसके मम्मी-पापा बाहर गए थे...? यहीं आँगन में, नीम के पेड़ के तले पकड़ा था इसे। पूरी नंगी... पीठ पेड़ से चिपकाकर, गांड दोनों हाथों में भर के, चूत में लंड ऐसे ठोंका कि नीम के पत्ते भी हिल-हिल के गवाही दे रहे थे। पूरी रात इसकी सिसकारियाँ मोहल्ले में गूँज रही थीं।"
सनी (साँस खींचते हुए, आँखें लाल): "क्या बात कर रहा है बे... सुनते-सुनते ही खून दौड़ रहा है।"
मोनू (हल्की मुस्कान के साथ): "और आज मन कर रहा है फिर से वही दीवाली जलाऊँ... पर इस बार तू भी साथ होगा। आधा तू, आधा मैं... और बीच में इसकी कराहें।"
सनी (हँसकर, पर आवाज़ भारी): "भाई... अगर तूने दिला दिया न, तो लंड पे पटाखा बाँध के फोड़ दूँ।"
कायला अब भी झुकी हुई थी -- रंग उठाती, उँगलियाँ पोंछती, और कभी-कभी नीचे के होंठ को हल्के से दबा देती। उसके चेहरे पर शांति थी, मगर कपड़ों में सुलगता हुआ ताप... हर हरकत में एक लज्जा, लेकिन उस लज्जा के नीचे गहराई तक भीगी हुई चूत की धड़कन।
शाम के करीब चार बजे का समय था, मोहल्ले में दिवाली की रौनक और सर्दी की चुभन -- दोनों अपनी पूरी शिद्दत पर थीं। हर घर में रंग-बिरंगी लाइटें लटक रही थीं, लेकिन कायला के आँगन का नज़ारा -- किसी भी रोशनी से ज़्यादा आँखें चुराने वाला था।
वो आँगन में झुकी हुई रंगोली बना रही थी, उसकी कमर की लचक ऐसी थी कि लोअर उसकी भारी गांड की दरार में बुरी तरह फँसा हुआ था। हर बार जब वो आगे झुककर रंग भरती, कपड़े में दबा बैंगनी चड्डी का पतला किनारा ऐसे उभर आता--जैसे किसी को सीधा उँगली रखकर खींच लेने का न्यौता दे रही हो... और नीचे से हल्की-सी गंध, गरम साँसों जैसी, हवा में तैरकर सीधा दिमाग पे चढ़ जाती। वो पतली-सी लकीर चड्डी और त्वचा के बीच की, बस इतनी कि सोचते ही उँगलियाँ खुद-ब-खुद कसने लगें।
उसका गोरा, भरा-पूरा बदन पसीने की हल्की नमी में चमक रहा था। ढीले लोअर और कसी हुई ब्लैक शॉर्ट टी-शर्ट के बीच से कभी-कभी बैंगनी ब्रा की स्ट्रैप बाहर फिसलकर दिख जाती। हवा का झोंका आया, टी-शर्ट उसके 36B के गोल-मटोल, लचकते दूधों पर चिपक गई--जैसे कपड़े हटाना अब बस औपचारिकता रह गया हो। निपल की हल्की-सी उभार ने कपड़े के नीचे अपनी मौजूदगी का ऐलान कर दिया, और वो गरमाहट से फड़फड़ाती सांसें... जैसे किसी को सीधे पकड़कर दबा लेने का इशारा कर रही हों।
उसके बालों से पसीने की बूंदें गर्दन और कॉलरबोन पर लुढ़क रही थीं। पसनीे की खुशबू में मिली उसकी देह की गरमी और हर हरकत में मांस का धीमा-धीमा खेल -- सब मिलकर ऐसा मंजर बना रहे थे कि कोई भी मर्द,चाहकर भी, अपनी नज़र और होश काबू में न रख पाए।
बाजू के घर से मोनू निकलता है -- कायला का पड़ोसी, मोहल्ले के कॉरपोरेटर का बेटा... और अब तो पुराना चोदन भी। आँखों में वही भूख थी -- जो एक बार चख चुका हो, उसकी प्यास और गहरी हो जाती है। साथ में आया था सनी -- सामने वाले घर का लड़का। बाहर रहता है, बस दिवाली पर ही यहाँ आता है अपने मम्मी-पापा के साथ त्योहार मनाने।
दोनों गले मिले और फिर नज़रें सीधी कायला के झुके हुए शरीर पर। लोअर की सिलवटें उसकी गांड के बीच ऐसे फँसी थीं जैसे वहीं अटककर कह रही हों -- "खींच ले मुझे"
मोनू (आँखें मिचमिचाकर, होंठ चाटते हुए): "देख बे सनी... सामने जो रंगोली बना रही है -- वही है कायला।"
सनी (हँसकर, नज़रें चिपकाकर): "भाई... लग रहा है जैसे चूत रंगों से नहीं, किसी और रस से भीगी हो। माल देखके ही लंड भारी हो गया।"
मोनू (धीमे, भारी साँस में): "साले, तू सोच रहा है... मैं तो इसे चख चुका हूँ। याद है पिछली बार जब इसके मम्मी-पापा बाहर गए थे...? यहीं आँगन में, नीम के पेड़ के तले पकड़ा था इसे। पूरी नंगी... पीठ पेड़ से चिपकाकर, गांड दोनों हाथों में भर के, चूत में लंड ऐसे ठोंका कि नीम के पत्ते भी हिल-हिल के गवाही दे रहे थे। पूरी रात इसकी सिसकारियाँ मोहल्ले में गूँज रही थीं।"
सनी (साँस खींचते हुए, आँखें लाल): "क्या बात कर रहा है बे... सुनते-सुनते ही खून दौड़ रहा है।"
मोनू (हल्की मुस्कान के साथ): "और आज मन कर रहा है फिर से वही दीवाली जलाऊँ... पर इस बार तू भी साथ होगा। आधा तू, आधा मैं... और बीच में इसकी कराहें।"
सनी (हँसकर, पर आवाज़ भारी): "भाई... अगर तूने दिला दिया न, तो लंड पे पटाखा बाँध के फोड़ दूँ।"
कायला अब भी झुकी हुई थी -- रंग उठाती, उँगलियाँ पोंछती, और कभी-कभी नीचे के होंठ को हल्के से दबा देती। उसके चेहरे पर शांति थी, मगर कपड़ों में सुलगता हुआ ताप... हर हरकत में एक लज्जा, लेकिन उस लज्जा के नीचे गहराई तक भीगी हुई चूत की धड़कन।


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