14-02-2026, 09:10 PM
नीर को नाश्ता लगाकर आशा बेडरूम में निढाल-सी बिस्तर पर पीठ के बल लेट गई… बहुत थक गई थी वह. लेटे-लेटे ही पास रखे अपने हैंडबैग से एक छोटा-सा एन्वेलोप निकाली और उसमें से एक फ़ोटो निकाल कर देखने लगी. फ़ोटो में वह है, नीर है.... और हैं ‘अभय’… नीर के पापा.. उसके पति. कुछ देर तक एकटक देखती रही उस फोटो को और न जाने ऐसा क्या हुआ जो उसके आँखों के किनारों में आँसू आ गए. पर आंसूओं को अधिक देर तक टिकने नहीं दी --- तुरंत ही पल्लू के आखिरी हिस्से से उन्हें पोंछ ली. दरअसल बात क्या थी यह कोई नहीं जानता था. आशा के पति का आख़िर हुआ क्या है? जीवित है या वे दोनों अलग हो गए हैं? उसने इस बारे में कभी किसी से कोई बात नहीं की. कोई कितना भी पूछ ले, वह हमेशा बात को टाल जाती है. कुछ समय तक तो माता-पिता के साथ ही रही पर जब आस-पड़ोस में तरह-तरह की बातें होने लगीं और बेवजह कुछ बातें बनने भी लगीं, तब आशा ने शहर से दूर एक जगह पर इस घर को खरीदने का निर्णय लिया. पैसों की कमी न उसे है और न उसके माँ-बाप को. इसलिए घर लेने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई. दोनों घरों की बीच की दूरी कम से कम 5-6 घंटे की है. उसने अच्छे से सोच-विचार कर ही इतनी दूरी का चयन किया ताकि उसके किसी भी परिचित का उसके इस नए घर में जल्दी आना-जाना शुरू न हो जाए. साथ ही इससे वह वहाँ (माता-पिता के घर के) के पड़ोसियों से भी दूर रहेगी, फालतू के बात बनाने वाले और ऐसे लोगों के समुदाय से भी दूर और शांति से रहेगी.
जारी है….
लेटे-लेटे ही वह खिड़की से बाहर देखी... दूर पेड़ों की ऊपरी डालियाँ मंद-मंद हिल रही हैं. शीतल हवा के झोंके खुली खिड़की से अंदर घुस कर थकान से टूटते देह को कुछ यूँ आराम पहुँचा रहे हैं कि आँखों को खुला रखना मुश्किल हो रहा है.
खिड़की से नज़रें हटा कर सीलिंग को देखने लगी...
'बहुत शांति है यहाँ. शहर से इतनी दूर --- न प्रदूषण और न किसी तरह का कोई कोलाहल --- ऊपर से चारों तरफ हरियाली ही हरियाली.'
ये सब सोचते-सोचते आशा की आँखें बोझिल होने लगीं. पर अभी सोने का कोई इरादा नहीं है उसका. वैसे भी, ये कोई टाइम भी तो नहीं है सोने का. इसलिए उठ बैठी.
सोची,
'पहले नहा ले फ़िर कुछ खा लेने के बाद ही अच्छे से आराम करेगी.'
बिस्तर से उतर, कुछ कदम चलकर बगल में मौजूद ड्रेसिंग टेबल के आदमकद अंडाकार दर्पण के सामने जाकर खड़ी हो गई और खुद के ही अप्रतिम सौन्दर्य को निहारने लगी. शादी और बच्चे होने के बाद भी इतने सालों में कुछ बदलाव आने के बावजूद उसका रूप जैसे पहले और भी निखर गया है. जिस्म का हर उतार-चढ़ाव और हरेक कटाव उसकी जिस्मानी खूबसूरती में जैसे चार चाँद लगाते हैं. ऊपर से गदराया बदन.. 'उफ्फ्फ़…!' कभी-कभी तो उसे खुद से ही प्यार और खुद से ही रश्क होने लगता है.
खुद को मंत्रमुग्ध-सी देखती हुई उसने कंधे पर से साड़ी को ब्लाउज से पिन अप किए पिन को आहिस्ते से निकाली और पिन को एक ओर रखते हुए पल्लू गिरा दी. पल्लू के गिरते ही सामने दृश्यमान हुई उसकी भरी छाती से उभरा ब्लाउज ... 5 इंच लंबे क्लीवेज के साथ चूचियों के ऊपरी गोलाईयों को सख्ती से लिए उसके डीप कट ब्लाउज ने उन्हें बखूबी ऊपर उठा रखा है. ब्लाउज सिर्फ डीप कट ही नहीं बल्कि तंग और छोटा भी है.
आशा अपने गोल, बड़े-बड़े उभारों को देख, उसी मंत्रमुग्ध अवस्था में अपने दोनों हाथों से ब्लाउज के ऊपर से ही उभारों को दोनों साइड से हल्के से बीच की ओर ठेलने लगी और उसके ऐसा करते ही सीने की ऊपरी हिस्से पर चूचियों की गोलाईयाँ और भी अधिक उभर आईं और साथ ही एक गहरी घाटी बन आई दोनों चूचियों के मध्य.
अपने स्तनों की पुष्टता और क्लीवेज की लंबाई और गहराई को देख कर आशा के पूरे जिस्म में कामोत्त्जेना वाली एक गुदगुदी दौड़ गई और अपने शरीर के ऊपरी हिस्से के रूप व निखार को देख कर वह बुरी तरह शर्म से लाल होते हुए एक ‘आह’ भर उठी.
वह मादक यौवन से भरे अपने स्तनयुगल को किनारों से और ब्लाउज के ऊपर से सामने दिख रहे उनकी गोलाईयों को यूँ ही हौले से दबाने लगी. अपने ही नर्म, गदराए स्तनों का स्पर्श उसे एक अद्भुत रोमांच से भरने लगा. वह उस आदमकद दर्पण के सामने अपने ही हाथों का कोमल स्पर्श अपने गोल, सुडौल, पुष्टता से परिपूर्ण नर्म, गदराए चूचियों पर लेते हुए आँखें बंद कर ली और इस छुअन का सुखद अनुभव करने लगी. ऐसा करते हुए उसके मन में यह विचार आने लगा कि,
‘ईश्वर ने ऐसी गौरवमयी अमूल्य संपत्ति उसके अतिरिक्त शायद किसी और को नहीं दिया है.’
आँखें बंद किए आत्ममुग्धता में खोई आशा अपनी चूचियों को दबाते, सहलाते धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी और अपनी मखमली, नर्म पेट पर ठहर गई. इतनी नर्म चिकनी पेट पर उसे खुद विश्वास नहीं हुआ. शादी के कुछ साल, और फिर बच्चा होने के बाद, साथ ही एक कामकाजी महिला होने के बाद भी उसके जिस्म का रोम-रोम अब भी चिकनाहट से भरा हुआ और एक परफेक्ट फ़िगर लिए है. यथोचित चर्बीयुक्त पेट पर हाथ फेरते-फेरते एक ऊँगली नाभि में ले गई… गहरी गोल नाभि में ऊँगली का ऊपरी कुछ हिस्सा घुसा और फिर वैसे रखे ही ऊँगली को गोल-गोल घूमाने लगी.
अभी वह अपनी नाभि की सुंदर गोलाई और गहराई में डूब ही रही थी कि तभी खुली खिड़की से कमरे में हवा का झोंका थोड़ा तेज़ आया और इससे खिड़की पर ही पर्दों से लगा झालरनुमा पतले चेन से लगे धातु के छोटे-छोटे परिंदे आपस में टकरा कर एक तेज, पर मीठे ‘छन्नन्न’ से आवाज़ कर उठे और इससे आशा की यौन-तंद्रा भंग हुई.
एकदम से होश में लौटी!
अपनी स्थिति को देखकर बौखलाई भी और शरमाई भी — गाल सुर्ख लाल हो उठे.
जल्दी से दर्पण के सामने से हटी और पलंग पर रखे बैग से कपड़े, तौलिया वगैरह निकालने लगी. पल्लू अभी भी फ़र्श पर पड़ी है… पर आशा के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं. कभी-कभी बिना पल्लू के रहना उसे अच्छा लगता है. इससे वह खुद को बहुत उम्दा किस्म की फ़ील करती है. जैसे की, अभी बैग से कपड़े निकालते समय बिना पल्लू के तंग ब्लाउज में कैद उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ; गहरी क्लीवेज के साथ दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे हो कर नाच रही हैं. रह-रह कर आशा की नज़रें अपनी नाचती अर्धनग्न चूचियों और डीप क्लीवेज पे जाती... जहां उसकी सोने की पतली चेन क्लीवेज में कहीं खो कर रास्ता ढूँढ रही है... चर्बीयुक्त पेट और कमर की अलग ही थिरकन होती. ये सब देखकर उसे खुद के एक जबरदस्त कमसीन, सेक्सी औरत होने का अहसास होता और इस अहसास को वो खुल कर जीना चाहती... जी भर कर एंजॉय करती.
जीवन में जब भी पुरुष की कमी महसूस होती तो खुद को ही अपने स्पर्शों से जवां और हसीं - तरीन होने का सुख लेती. इसी से खुद को संपूर्ण समझती.
जारी है….


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