14-02-2026, 12:28 AM
१) आरंभ..
ताला एजेंट ने ही खोला था. सब कुछ पहले ही साफ-सुथरा करवा रखा था उसने. एक बार पूरा घर अच्छे से घूम-घूम कर दिखा देने और बाकी के ज़रूरी कागज़ी कामों को पूरा करने के पश्चात् वह चला गया. जाने से पहले उसने मेड के बारे में भी बता दिया जो कि एक घंटे बाद पहुँचने वाली थी. दरअसल आशा ने ही एजेंट से एक मेड दिलाने के बारे में बात की थी. चूँकि वह खुद एक प्राइवेट कॉलेज में टीचर है, इसलिए उसे करीब आठ से नौ घंटे तक कॉलेज में रहना पड़ता है. हालाँकि नीर भी उसी कॉलेज में पढ़ता है जिसमें आशा पढ़ाती है फिर भी कभी-कभी नीर जल्दी छुट्टी होने के बाद भी आशा के छुट्टी होने तक स्टाफ रूम में रहकर खेला करता है तो कभी जल्दी घर आ जाता है. उसके जल्दी आ जाने पर घर में उसका ध्यान रखने वाला कोई तो चाहिए… इसलिए आशा ने एक मेड रखवाई. बच्चे का ध्यान रखने के साथ-साथ वह घर के कामों में भी हाथ बँटा देगी.
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स्क्रीच्चचचssss….की आवाज़ के साथ टैक्सी एक घर के सामने आ कर रुकी. दो मंजिला घर. कुछ कमियों के कारण एक आलिशान बंगला बनते-बनते रह गया. आगे एक लॉन जिसके बीचोंबीच एक पतली-सी जगह है जो खूबसूरत मार्बल्स से पटी पड़ी है जिससे चल कर घर के मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा जा सकता है. ‘जस्ट पड़ोसी’ की बात की जाए तो जवाब हाँ में भी हो सकता है और ना में भी… क्योंकि आसपास के घर कम से 15 से 20 कदमों की दूरी पर हैं. यानी कि हर घर का शोर-शराबा दूसरे (पड़ोस के) घर के लोगों को डिस्टर्ब नहीं कर सकता. मतलब दूरी इतनी कि एक घर का शोर दूसरे घर तक पहुँचने से पहले ही हवा में घुल जाए. सिर्फ़ यही नहीं, हर दो घरों के बीच 3-4 पेड़ भी हैं जो हर एक घर को दूसरे से आंशिक रूप से छुपाते थे.
ये घर बहुत दिनों से खाली पड़ा था. पाँच दिन पहले ही डील पक्की हुई और तीन दिन पहले ही घर फाइनली बुक हो गया. टैक्सी के पीछे सामानों से लदी दो गाड़ियाँ आ कर खड़ी हो गईं. टैक्सी का पिछला गेट खुला और उससे बाहर निकली नीली साड़ी और मैचिंग शॉर्ट स्लीव ब्लाउज में... ‘आशा’ --- ‘आशा मुखर्जी’. गोरा रंग, कमर तक लंबे काले बाल, आँखों पर बड़े आकार के गोल फ्रेम वाला काला चश्मा, नाक पर फूल की आकार की छोटी-सी नोज़पिन, गले पर पतली सोने की चेन जिसका थोड़ा हिस्सा साड़ी के पल्ले के नीचे है, सिर के बीचोंबीच बालों को करीने से सेट कर लगाया हुआ काला हेयरबैंड, कंधे पर एक बड़ा -सा हैंडबैग, हाथों में चूड़ियाँ और सामान्य ऊँचाई की हील वाले सैंडेल्स. सब कुछ आपस में मिलकर उसे एक परफेक्ट 'औरत' बना रहे थे.
टैक्सी से उतर कर बाहर से ही कुछ देर तक घर को देखती रही आशा. फिर एक लंबा साँस छोड़ते हुए मुस्कुराई. फिर अपने ** साल के बेटे को लेकर, गाड़ी वालों को गाड़ी से सामान उतारने को कहकर घर की ओर बढ़ गई. साथ में उसे घर दिलाने वाला एजेंट भी था. एजेंट काफी देर तक घर की हर एक खासियत के बारे में अनर्गल बोलता रहा. आशा केवल उतनी ही बातों पर ध्यान दी जितना उसे ज़रूरी लगा. अपने बेटे नीरज, जिसे प्यार से नीर कहकर बुलाती है, नए घर में आने पर उसकी ख़ुशी को देख कर वह भी ख़ुश हो रही थी.
ताला एजेंट ने ही खोला था. सब कुछ पहले ही साफ-सुथरा करवा रखा था उसने. एक बार पूरा घर अच्छे से घूम-घूम कर दिखा देने और बाकी के ज़रूरी कागज़ी कामों को पूरा करने के पश्चात् वह चला गया. जाने से पहले उसने मेड के बारे में भी बता दिया जो कि एक घंटे बाद पहुँचने वाली थी. दरअसल आशा ने ही एजेंट से एक मेड दिलाने के बारे में बात की थी. चूँकि वह खुद एक प्राइवेट कॉलेज में टीचर है, इसलिए उसे करीब आठ से नौ घंटे तक कॉलेज में रहना पड़ता है. हालाँकि नीर भी उसी कॉलेज में पढ़ता है जिसमें आशा पढ़ाती है फिर भी कभी-कभी नीर जल्दी छुट्टी होने के बाद भी आशा के छुट्टी होने तक स्टाफ रूम में रहकर खेला करता है तो कभी जल्दी घर आ जाता है. उसके जल्दी आ जाने पर घर में उसका ध्यान रखने वाला कोई तो चाहिए… इसलिए आशा ने एक मेड रखवाई. बच्चे का ध्यान रखने के साथ-साथ वह घर के कामों में भी हाथ बँटा देगी.
सभी सामान अंदर सही जगह रखवाने में करीब पौने दो घंटे बीत गए. फ़िर सबका बिल चुका कर, सबको विदा करने के बाद, अच्छे से दरवाज़ा बंद कर के वह दूसरी मंजिल के एक बालकनी में जा कर खड़ी हो गई. उसे उस बालकनी से दूर-दूर तक अच्छा नज़ारा देखने को मिल रहा था. पेड़, पौधे, उनके बीच मौजूद कुछेक घर और उन घरों की खिड़कियों और छतों पर रखे छोटे-बड़े गमलों में लगे तरह-तरह के फूलों वाले नन्हें पौधे .... हर जगह हरियाली ही हरियाली... आशा को हमेशा से ऐसे वातावरण ने आकर्षित किया है. स्वच्छ हवा, आँखों को तृप्त करती हरियाली युक्त हरे-भरे पेड़-पौधे, सुबह और शाम मन को छू लेने वाली मंद-मंद चलने वाली हवा... आह:! आत्मा को तो जैसे शांति ही मिल जाती है. यह नज़ारा देखते-सोचते आशा की आँखें बंद हो गईं. वह वहीं आँखें बंद किए खड़ी रही… मानो अपने सामने की सम्पूर्ण प्रकृति, हरियाली और ताज़ा कर देने वाली हवा का सुखद अनुभूति लेते हुए ये सबकुछ अपने अंदर समा लेना चाहती है. कुछ पलों तक चुपचाप, आँखें बंद किए बिल्कुल स्थिर खड़ी रही. फिर एकदम से आँखें खुलीं.
'ओह नीर को खाना देना है!'
वह तुरंत मुड़कर जाने को हुई ही कि एकदम से ठहर गई. पलटकर देखी, दूर बगीचे में एक लड़का एक हाफ पैंट और सेंडो गंजी में खड़ा उसी की तरफ एकटक देख रहा है. उसके हाथों में मिट्टी जैसा कुछ है… और पैरों के आस-पास दो-चार पौधे रखे हुए हैं.
उस लड़के को अपनी तरफ उस निगाह से देखते देखकर आशा थोड़ी सकपका गई. स्त्री-सुलभ प्रवृत्ति के कारण जल्दी से उसने अपने शरीर पर एक हल्की नज़र दौड़ाई… और ऐसा करते ही वह भौंचक्क सी रह गई. दरअसल हुआ यह कि जब वह आँखें बंद कर हवा का आनंद ले रही थी तब हवा के ही झोंकों से उसकी साड़ी का एक पल्ला पूरी तरह से एक ओर को हट गया था... और इससे ब्लाउज में कैद दायाँ वक्ष सामने दृश्यमान हो गया था. ब्लाउज थोड़ा तंग होने के वजह से दोनों वक्षों के बीच बन रही करीब 5 इंच की घाटी सामने थी और स्तनों का आकार भी उस ब्लाउज में खुद को संभाल पाने में पूरी तरह से अक्षम था और इस कारण ऐसी स्थिति में उसके वक्ष किसी को भी दूर से अनावृत (नंगा) सा लग सकते हैं. गले में पड़ी सोने की चेन का काफी हिस्सा उस 5 इंच घाटी में समाया हुआ था जोकि आशा की सेक्सीनेस को कई गुना अधिक बढ़ाने का काम कर रहा था. बड़ी शर्म आई आशा को --- खुद को जल्दी से ठीक की, साड़ी के पल्ले को यथास्थान अच्छे से रख कर वो एक बार फ़िर सामने की ओर देखी... लड़का अब भी उसी की तरफ़ देख रहा है. उम्र कुछ ख़ास नहीं होगी उस लड़के की. शायद दसवीं में पढ़ने वाला होगा. सिर पर एक कपड़ा बंधा था, चेहरे पर भोलापन .. पर जैसे वो देख रहा था, आशा को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. वो ऐसी नज़रों को बहुत अच्छे से जानती है.
अंततः वह पलटी और अन्दर चली गई.
जारी है....
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