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Adultery घर की बात... (short story)
#8
इसके बाद के कई दिन बिना किसी झंझट के बीते. 
 
कहते हैं कभी-कभी परेशानियाँ अपना समाधान करवाए बिना पीछा नहीं छोड़तीं.
 
ऐसा हमारे साथ भी हुआ.
 
एक दिन फिर उन्हीं लड़कों के साथ चाचा का सामना हो गयाउसी जगह पर... जहाँ पहली बार हुआ था. इस बार भी पार्किंग को ले कर हुआ. और इस बार मामला वाकई में पार्किंग को लेकर ही था. लड़कों की संख्या भी इस बार पहले के मुकाबले अधिक थी. कुल 6 जन थे. शुरूवात मामूली बकझक से हुई जोकि धीरे - धीरे बहुत सीरियस होती चली गई.
 
हाथ चलने में अब 2-3 मिनट की देरी थी...
 
और सबसे टेंशन वाली बात तो ये कि इस बार चाची भी साथ में थी. ऊपर से संयोगवश आज उनका ड्रेस (साड़ी) भी कुछ यूँ चटकदार है जिसे देख कर किसी का भी दिल बहक जाए. हुआ भी वही... उन लड़कों ने उनके साथ भी बहुत बदतमीज़ी की.
 
भीड़ इक्क्ठा हो गई...
 
कोई चाचा से सहमत,
 
तो कोई उन लड़कों को शांत करने में व्यस्त.
 
जो नहीं हो रहा था वो ये की उस भीड़ में से किसी के भी गाँड में इतना दम नहीं था की वो सीधे, एक बार के लिए ही सही, उन लड़कों को गलत कहता या उनके बर्ताव का विरोध करता... गलत का विरोध हमेशा होना चाहिए, जो कि यहाँ नहीं हुआ. वैसे भी आजकल लोग दूसरों के फटे में जल्दी टाँग नहीं अड़ाते. कम से कम यहाँ गिनती के कुछ लोग तो हैं जो बीच-बचाव के लिए आए हैं.
 
संयोग से मैं अपने दोस्तों के साथ पास ही के एक दुकान के पीछे सिगरेट पी रहा था. आजकल रोड रेज, पार्किंग इश्यू, ईगो क्लैश इत्यादि लगे ही रहते हैं इसलिए पहले ध्यान नहीं दिया, पर जब बहुत हो-हल्ला होने लगा तो अपनी जगह से उठ कर सड़क के पास आ कर देखा की अच्छी - खासी भीड़ हो रखी है और कुछ लोगों में बहुत बहस हो रही है. तुरंत ही चाचाजी का आवाज़ सुनाई दिया —- पास जाकर देखा तो उन लौंडे - लपाटों को देखते ही दिमाग भयानक गरम हो गया. पता नहीं एकदम से मुझे क्या हो गया जो मैं दौड़कर गया और बिना किसी को कोई मौका दिए उन लड़कों से अकेले भीड़ गया. अकेले ही सबको बहुत बुरी तरह से मारने-पीटने लगा. वे लड़के संख्या में अधिक थे और मुझे बड़े आराम से धो सकते थें लेकिन ऐसा कर न पाए क्योंकि तब तक मेरे ग्रुप से दो लड़के जो मेरी ही तरह हट्टे - कट्टे हैं, आ कर उन लड़कों से लड़ पड़े. थोड़ी देर तक अच्छी मारधाड़ चली. उस दिन वाले लड़के को जिसे मुक्के से बेहोश किया था, वह डायरेक्ट मुझसे लड़ने से बच रहा था लेकिन जल्द ही मेरे हाथ लग गया और फिर उसे तो सबसे ज़्यादा बहुत बुरी तरह मारा. हालाँकि थोड़ी मार मुझे भी लगी लेकिन उस समय गुस्सा इतना था दिमाग में की मार लगने के दर्द को बड़े आराम से सह गया.
 
इतनी देर में सिक्युरिटी आ गई.
 
किसी ने खबर कर दिया था...
 
हम सबको थाने ले गईं. ऐसे मामलों में जो भी संबंधित जाँच और फॉर्मलिटी होती है, वो सब की गई. पर सबको नहीं. जिन दो लड़कों ने विवाद खड़ा किया था उन्हें एक रात हवालात में बंद किया गया और बाकी को सख्त वॉर्निंग के साथ जाने दिया.
 
मैंने बाद में अपने सभी दोस्तों को धन्यवाद किया, खास कर उन दोनों को जिन्होंने लड़ाई में मेरा साथ दिया था.
 
उस दिन मेरी दिलेरी देख कर चाचा-चाची को बहुत गर्व हुआ था. ये बात उन दोनों के चेहरों से स्पष्ट पता चला था — और चाची तो मानो ख़ास इंप्रेस्ड हुई जान पड़ रही थी. उस दिन के बाद मेरे साथ बात करने का ढंग बहुत बदल गया उनका. अब जब भी बात करना होता, एक हल्की मुस्कुराहट के साथ करती. खास ध्यान रखती की मेरे पढ़ाई के समय बच्चे मेरे कमरे में न जाएँ. मोबाइल, टीवी की आवाज़ धीमी रखतीं. स्पेशल ध्यान दे कर खास मेरे लिए मेरी पसंद की डिश बनाती. पहले रात में जल्दी सोना पड़ता था; ज़्यादा देर तक लाइट ऑन रहना पसंद नहीं था. लेकिन अब चाचाजी ने फुल छूट दे दिया था. जितनी देर जागना चाहूँ, जब सोना चाहूँ --- मेरी मर्ज़ी.
 
एक साँझ 6:00 -- 6:15 बजे की बात है...
 
मैं बच्चों को उनके होमवर्क में हेल्प कर रहा थाऔर चाची बगल के सोफे पर बैठी मोबाइल में व्यस्त थी.
 
तभी चाचा जी एकदम से अंदर आएँ --- ऑफिस से तुरंत लौटे ही थें... बड़े खुश दिख रहे थे. चाची ने पूछा की आखिर बात क्या है? तब चाचा जी ने कहा,
 
"पता है आज क्या हुआ?"

"बताइयेगा नहीं तो कैसे पता होगा हमें?"     चाची भौंहें सिकोड़ते हुए बोली.

चाचा मुस्कुराकर बोले,

"आज वही लड़के मिले थे!"

"हे भगवान! फिर से..?"

"हम्म."

"कुछ कहा या किया क्या उन लड़कों ने?"

"नहीं...!"

"नहीं?!!"

"हम्म, न कुछ कहा और न कुछ किया."

"पक्का...??!"

"अरे हाँ भई, एकदम पक्का."

अब मैंने सवाल किया,

"कहाँ मिले?"

"जहाँ पहली बार तुम्हारे साथ पंगा हुआ था!"

"ओह! वही मिठाई दुकान पे."

"यस."

"उस दिन की तरह आज भी वो दो ही थे या ज़्यादा?"

"वही दोनों लड़के थे. दुकान के पास ही खड़े थे. जैसे ही मैं आया और बाइक साइड में लगाने लगा; वो दोनों धीरे - धीरे वहाँ से दूर हो गए."

"दूर हो गए मतलब? वहाँ से चले गए या…?"

"उस दुकान से अगले ३ दुकान छोड़कर खड़े हो गए थे."

"ये आपने कब देखा?"

"जब मिठाई लेकर निकल रहा था तब..."

"ओके."

चाची हैरत से हम दोनों चाचा-भतीजे के बीच की बातें सुन रही थीं. सुनते हुए कभी मुझे और कभी चाचाजी को देख रही थीं. जैसे ही हम दोनों के बीच एक पॉज आया, तुरंत बोल पड़ी,
 
"एक मिनट, एक मिनट, 'पहली बार से पंगा हुआ था' से क्या मतलब आपका?"
 
चाचाजी मुस्कराए,
 
एक बार मेरी तरफ और फिर चाची को देखा... और फिर बड़े शांत भाव से चाची को सब कुछ कह सुनाया. उस दिन की घटना बताते हुए इस बात का खास ज़िक्र किया कि कैसे मैंने एक लड़के को एक ही मुक्के से बेहोश कर दिया था. सब सुनते हुए चाची को बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा था पर चाचाजी ने अभी तक की मैरिड लाइफ में चाची से ना के बराबर झूठ बोला है और साथ ही ये सब कहते समय खुशी और गर्व से चमकती चाचाजी की आँखें खुद ही इस कहानी की गवाही दे रही थीं.
 
चाचाजी अपनी जगह से उठकर आए और मेरी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी और अचानक से ऐसी बात बोल दी जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी.
 
चाचाजी की खुशी को देखकर चाची भी काफी ख़ुश हो गई. उन्होंने भी मुझे मुस्कुरा कर देखा.
 
चाचाजी अपनी जगह से उठकर आए और मेरी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी और अचानक से ऐसी बात बोल दी जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी.
 
"ये मेरा सिर्फ भतीजा नहीं है, बल्कि उससे भी बढ़ कर है..."    
 
कह कर वो थोड़ा रूके, मैं उन्हें ही देख रहा...
 
चाची की नज़र हम दोनों पर थी.
 
चाचाजी ने सेकंड भर चाची को देखा, फिर मेरी आँखों में देखते हुए एक बड़ी -सी स्माइल लिए बोले,
 
"ही इज़ दी मैन ऑफ़ दिस हाउस…!!"
 
पहले तो मैं समझा नहीं, क्योंकि उन्होंने अचानक से अंग्रेज़ी में कहा था. पर जैसे ही समझा, मेरी तो घोर आश्चर्य से आँखें बड़ी-बड़ी हो गयीं. चाची की भी यही स्थिति थी.
 
'मुझे मैन ऑफ द हाउस का खिताब दे दिया!'
 
मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ
 
और चाची तो जैसे शॉक में बिल्कुल स्थिर हो चाचाजी को देखे जा रही थी.  
 
'भला खुद (चाचा जी) के रहते अपने ही मुँह से अपने भतीजे को मैन ऑफ द हाउस कैसे कह सकते हैं ये?!'
 
हम दोनों ने अति अविश्वास से पहले तो चाचा जी को देखा और फिर एक-दूसरे को. मुझे समझ में नहीं आया की क्या प्रतिक्रिया दूँ इसलिए थोड़ा नर्वसा करहे हेकर के हँस कर वहाँ से चला गया.
 
मुझे नर्वस देखकर चाची मुस्कुराए बिना नहीं रह पाई; पर वो तब भी हैरान थी.
 


जारी है....
My Current Story:
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Compromise  Running











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RE: घर की बात... (short story) - by The_Writer - 13-02-2026, 08:48 PM



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