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Adultery लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल...
#68
अब आगे:

सरिता जब राजू के कमरे से बाहर आई तो वहां रिशा को बैठा देख चौंक गई।


अंजान बनते हुए वो रिशा से पूछने लगी.. "अरे बहू तू कब आई"

रिशा. “तभी जब आप राजू से अपना बुर चटवा के उसको काड़ा पिला रही थी"


सरिता एक दम से भोचक्की रह गई और इसके मुंह से कुछ बोलते नहीं बना। फिर थोड़ी हिम्मत कर वो बोली.."क्या करु बहू. जवान खून है. मुझे अपने कमरे में अकेली देख खुद को रोक नहीं पाया और पटक दिया अपने बिस्तर पर"



रिशा.."आप भी तो पूरा साथ दे रही थी"

सरिता.."तो क्या करती। उसकी जवानी और जोश देख मैं भी खुद को रोक नहीं पाई और चुदवा बैठी"



इतना बोल सरिता अपने कमरे की और चलने लगी लेकिन गांड चुदाई और अधिक दर्द के कारण उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। रिशा ने झट से सरिता को कमर से पकड़ा और उसको कमरे की तरफ ले जाने लगी।


रिशा.."लगता है राजू ने बुरी तरह चोदा है आज"

सरिता..” हां कमीने ने आज मेरी कुंवारी गांड मार ली. असहनिय पीड़ा हो रही है.

रिशा..चलिए मैं आपको आपके कमरे तक छोड़ दूं और थोड़े गरम पानी से सिकाई कर दूं

सरिता.."हां बहू ये ठीक रहेगा। कुत्ते ने बहुत बुरी तरह से चोद कर गांड फाड़ दी है मेरी

रिशा ने सरिता को उसके जमरे में ले जा बिस्तर पर लिटाया और गरम पानी की बोतल लेने किचन में चली गई. रिशा जब वापस आई तो देखा सरिता साड़ी उतार कर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में बिस्तर पर लेटी हुई थी.
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RE: लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल... - by nitya.bansal3 - 13-02-2026, 06:42 PM



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