Yesterday, 07:23 AM
शिवानी का पेट अब काफी बड़ा हो चुका था। 7 महीने का हो गया था। वो लाल साड़ी में घर के काम करती, लेकिन हर बार आईने में खुद को देखकर रुक जाती। बच्चा अंदर हिलता, और वो पेट पर हाथ रखकर फुसफुसाती, “तू किसका है… लेकिन मैं तुझे प्यार करूँगी।” प्रिंस बाहर से सपोर्टिव था – डॉक्टर के चेकअप ले जाता, फल लाता, लेकिन रात को जब वो शिवानी को छूता, तो उसकी आँखों में वो पुराना जुनून नहीं रहता था। वो धीरे से किस करता, लेकिन सेक्स अब दूर की बात हो गई थी। प्रिंस कहता, “बच्चे को कुछ नहीं होना चाहिए,” लेकिन शिवानी जानती थी – वो बच्चे को देखकर अहमद याद आता है।
एक दोपहर शिवानी कॉफी शॉप के बाहर घूम रही थी – अब वो काम नहीं करती थी, बस घर पर रहती। अचानक वो ठिठक गई। सड़क के उस पार, ज्वेलरी शॉप के सामने अहमद खड़ा था। वही दाढ़ी, वही गहरी आँखें, लेकिन अब चेहरे पर थकान। वो पटना वापस आ गया था। शिवानी का दिल धड़क उठा। वो भागना चाहती थी, लेकिन पैर नहीं चले। अहमद ने उसे देख लिया। उनकी नजरें मिलीं – वो पुराना थ्रिल, वो दर्द, सब वापस आ गया।
अहमद धीरे से पास आया। “शिवानी…” उसकी आवाज काँप रही थी। शिवानी ने पेट पर हाथ रखा, जैसे बच्चे को छिपाना चाहती हो। “अहमद… तू… तू वापस क्यों?” वो फुसफुसाई। अहमद की आँखें शिवानी के पेट पर गईं। वो समझ गया। “ये… मेरा है ना?” उसने पूछा, आवाज में दर्द और खुशी दोनों। शिवानी रो पड़ी। “हाँ… लेकिन प्रिंस… वो मुझे माफ कर चुका है। वो बच्चे का बाप बनेगा। तू चला जा… प्लीज।”
अहमद ने हाथ बढ़ाया, लेकिन छुआ नहीं। “मैं गया था… सोचा भूल जाऊँगा। लेकिन नहीं भूल पाया। हर रात तेरी याद आती। मैं वापस आया… सिर्फ देखने के लिए। लेकिन अब… ये बच्चा…” वो घुटनों पर बैठ गया, सड़क पर। लोग देख रहे थे, लेकिन उसे फर्क नहीं पड़ा। “शिवानी… मुझे एक मौका दे। मैं तुम दोनों को ले जाऊँगा। मैं ,., हूँ… लेकिन मैं बच्चे को अपना मानूँगा।”
शिवानी का दिल टूट रहा था। वो रोते हुए बोली, “अहमद… मैं प्रिंस से वादा कर चुकी हूँ। वो टूट जाएगा। और समाज… पटना में सब जानेंगे।” लेकिन अहमद उठा, उसे एक सुनसान गली में ले गया। वहाँ कोई नहीं था। वो शिवानी को दीवार से सटाया – लेकिन जुनून से नहीं, दर्द से। “मैं तुझे जबरदस्ती नहीं लूँगा। लेकिन बच्चा मेरा है… मुझे उसका हक है।” शिवानी ने उसका चेहरा छुआ। “अहमद… मैं भी तुझे भूली नहीं। लेकिन अब… सब कुछ बदल गया।”
अहमद ने उसे गले लगाया। शिवानी का पेट उनके बीच था। वो बच्चे को महसूस कर रहा था। “मेरा बच्चा…” वो फुसफुसाया। शिवानी रो रही थी। “प्रिंस घर पर इंतजार कर रहा है। वो अच्छा आदमी है… उसने मुझे छोड़ा नहीं।” अहमद ने कहा, “मैं जानता हूँ। लेकिन क्या तू खुश है? सच में?” शिवानी चुप रही।
उस शाम शिवानी घर लौटी। प्रिंस ने देखा उसकी आँखें लाल। “क्या हुआ?” शिवानी ने झूठ बोला, “बस… थक गई।” लेकिन रात को वो नहीं सो पाई। प्रिंस सो रहा था, शिवानी उठी। फोन उठाया, अहमद को मैसेज किया: “कल मिल… गंगा घाट पर। शाम को।” वो जानती थी – ये फैसला लेना होगा।
अगली शाम गंगा घाट पर। सूर्यास्त। शिवानी लाल साड़ी में, पेट बड़ा। अहमद आया। वो दोनों बैठे। अहमद ने शिवानी का हाथ पकड़ा। “शिवानी… मैं तुझे और बच्चे को ले जाना चाहता हूँ। मैं दिल्ली में नई जिंदगी शुरू कर सकता हूँ।” शिवानी रो पड़ी। “अहमद… प्रिंस ने सब सह लिया। मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकती। लेकिन… बच्चा… वो तेरे जैसा दिखेगा।”
अहमद ने पेट पर हाथ रखा। बच्चा हिला। दोनों की आँखें नम। अहमद बोला, “तो क्या करूँ? मैं दूर से देखूँगा? या…” शिवानी ने कहा, “मैं प्रिंस से बात करूँगी। शायद… वो समझ जाए। लेकिन अगर नहीं… तो मैं अकेली रहूँगी बच्चे के साथ।”
उस पल में अहमद ने शिवानी को किस किया – धीमा, भावुक। शिवानी ने जवाब दिया। लेकिन जल्दी अलग हो गई। “नहीं… अभी नहीं।” वो उठी, चली गई। अहमद पीछे देखता रहा।
घर लौटकर शिवानी ने प्रिंस से कहा, “प्रिंस… अहमद वापस आ गया है।” प्रिंस का चेहरा सफेद पड़ गया। “क्या… वो जानता है?” शिवानी ने हाँ में सिर हिलाया। प्रिंस चुप रहा। फिर बोला, “शिवानी… तू फैसला ले। मैं… मैं तुझे खोना नहीं चाहता। लेकिन बच्चा… अगर वो उसका है… तो मैं कैसे?”
शिवानी रो पड़ी। “प्रिंस… मैं तुम दोनों को नहीं खोना चाहती।” लेकिन अब फैसला उसका था – प्रिंस के साथ रहना, या अहमद के साथ नई शुरुआत। पटना की गलियाँ अब और तंग लग रही थीं। बच्चा आने वाला था – और सच सामने आने वाला था।
एक दोपहर शिवानी कॉफी शॉप के बाहर घूम रही थी – अब वो काम नहीं करती थी, बस घर पर रहती। अचानक वो ठिठक गई। सड़क के उस पार, ज्वेलरी शॉप के सामने अहमद खड़ा था। वही दाढ़ी, वही गहरी आँखें, लेकिन अब चेहरे पर थकान। वो पटना वापस आ गया था। शिवानी का दिल धड़क उठा। वो भागना चाहती थी, लेकिन पैर नहीं चले। अहमद ने उसे देख लिया। उनकी नजरें मिलीं – वो पुराना थ्रिल, वो दर्द, सब वापस आ गया।
अहमद धीरे से पास आया। “शिवानी…” उसकी आवाज काँप रही थी। शिवानी ने पेट पर हाथ रखा, जैसे बच्चे को छिपाना चाहती हो। “अहमद… तू… तू वापस क्यों?” वो फुसफुसाई। अहमद की आँखें शिवानी के पेट पर गईं। वो समझ गया। “ये… मेरा है ना?” उसने पूछा, आवाज में दर्द और खुशी दोनों। शिवानी रो पड़ी। “हाँ… लेकिन प्रिंस… वो मुझे माफ कर चुका है। वो बच्चे का बाप बनेगा। तू चला जा… प्लीज।”
अहमद ने हाथ बढ़ाया, लेकिन छुआ नहीं। “मैं गया था… सोचा भूल जाऊँगा। लेकिन नहीं भूल पाया। हर रात तेरी याद आती। मैं वापस आया… सिर्फ देखने के लिए। लेकिन अब… ये बच्चा…” वो घुटनों पर बैठ गया, सड़क पर। लोग देख रहे थे, लेकिन उसे फर्क नहीं पड़ा। “शिवानी… मुझे एक मौका दे। मैं तुम दोनों को ले जाऊँगा। मैं ,., हूँ… लेकिन मैं बच्चे को अपना मानूँगा।”
शिवानी का दिल टूट रहा था। वो रोते हुए बोली, “अहमद… मैं प्रिंस से वादा कर चुकी हूँ। वो टूट जाएगा। और समाज… पटना में सब जानेंगे।” लेकिन अहमद उठा, उसे एक सुनसान गली में ले गया। वहाँ कोई नहीं था। वो शिवानी को दीवार से सटाया – लेकिन जुनून से नहीं, दर्द से। “मैं तुझे जबरदस्ती नहीं लूँगा। लेकिन बच्चा मेरा है… मुझे उसका हक है।” शिवानी ने उसका चेहरा छुआ। “अहमद… मैं भी तुझे भूली नहीं। लेकिन अब… सब कुछ बदल गया।”
अहमद ने उसे गले लगाया। शिवानी का पेट उनके बीच था। वो बच्चे को महसूस कर रहा था। “मेरा बच्चा…” वो फुसफुसाया। शिवानी रो रही थी। “प्रिंस घर पर इंतजार कर रहा है। वो अच्छा आदमी है… उसने मुझे छोड़ा नहीं।” अहमद ने कहा, “मैं जानता हूँ। लेकिन क्या तू खुश है? सच में?” शिवानी चुप रही।
उस शाम शिवानी घर लौटी। प्रिंस ने देखा उसकी आँखें लाल। “क्या हुआ?” शिवानी ने झूठ बोला, “बस… थक गई।” लेकिन रात को वो नहीं सो पाई। प्रिंस सो रहा था, शिवानी उठी। फोन उठाया, अहमद को मैसेज किया: “कल मिल… गंगा घाट पर। शाम को।” वो जानती थी – ये फैसला लेना होगा।
अगली शाम गंगा घाट पर। सूर्यास्त। शिवानी लाल साड़ी में, पेट बड़ा। अहमद आया। वो दोनों बैठे। अहमद ने शिवानी का हाथ पकड़ा। “शिवानी… मैं तुझे और बच्चे को ले जाना चाहता हूँ। मैं दिल्ली में नई जिंदगी शुरू कर सकता हूँ।” शिवानी रो पड़ी। “अहमद… प्रिंस ने सब सह लिया। मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकती। लेकिन… बच्चा… वो तेरे जैसा दिखेगा।”
अहमद ने पेट पर हाथ रखा। बच्चा हिला। दोनों की आँखें नम। अहमद बोला, “तो क्या करूँ? मैं दूर से देखूँगा? या…” शिवानी ने कहा, “मैं प्रिंस से बात करूँगी। शायद… वो समझ जाए। लेकिन अगर नहीं… तो मैं अकेली रहूँगी बच्चे के साथ।”
उस पल में अहमद ने शिवानी को किस किया – धीमा, भावुक। शिवानी ने जवाब दिया। लेकिन जल्दी अलग हो गई। “नहीं… अभी नहीं।” वो उठी, चली गई। अहमद पीछे देखता रहा।
घर लौटकर शिवानी ने प्रिंस से कहा, “प्रिंस… अहमद वापस आ गया है।” प्रिंस का चेहरा सफेद पड़ गया। “क्या… वो जानता है?” शिवानी ने हाँ में सिर हिलाया। प्रिंस चुप रहा। फिर बोला, “शिवानी… तू फैसला ले। मैं… मैं तुझे खोना नहीं चाहता। लेकिन बच्चा… अगर वो उसका है… तो मैं कैसे?”
शिवानी रो पड़ी। “प्रिंस… मैं तुम दोनों को नहीं खोना चाहती।” लेकिन अब फैसला उसका था – प्रिंस के साथ रहना, या अहमद के साथ नई शुरुआत। पटना की गलियाँ अब और तंग लग रही थीं। बच्चा आने वाला था – और सच सामने आने वाला था।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)