13-02-2026, 12:07 AM
Season I
शाम का वक्त था... ऑफिस का शोर थम चुका था। कायला अपनी टाइट कसी हुई ब्लैक लेगिंग्स में फाइलें समेट रही थी। ऊपर की ओर लाल, सफेद और काले रंग का चटक कुर्ता,
जो उसकी मांसल छातियों को हल्के से उभार देता था। अंदर से स्लेटी रंग की ब्रा उसके उभरे (36B) के दूधुओं को जकड़ रही थी,और नीचे नीली चड्डी उसकी चूत की गर्मी को भींचे बैठी थी।
उसकी लेगिंग्स इतनी टाइट थी कि हर कदम पर मोटी जांघें कस रही थीं,और हर झुकाव में गांड के गोल उभार उभर आते थे।
तभी उसकी जूनियर ममता पास आती है -- "मैडम, मिश्राजी के डॉगी का कुछ छूट गया है... घर जाते वक्त दे देना।"
कायला ने चुपचाप सिर हिलाया, "ठीक है।"
पैकेट लिया और निकल पड़ी -- बिना कुछ कहे, जैसे किसी हुक्म को मान रही हो।
पंद्रह मिनट में उसकी गाड़ी दीपक मिश्राजी के गेट पर रुकती है।
गली में सिर्फ पत्तों की सरसराहट थी... और उस बीच कायला की चड्डी के नीचे चुपचाप पसीजती चूत।
डोर बेल बजती है -- गेट खुलता है।
सामने से निकलते हैं मिश्राजी -- ढीला सा पायजामा पहने,ऊपर से सफेद बनियान, जो पसीने से चिपक कर उनके बालों भरे सीने को उघाड़े हुए थी।
आँखों में एक अलग ही चमक... उनकी नज़रें टिकी थीं कायला की छातियों पर -- कुछ देर वैसे ही, जैसे किसी भूखे को गरम रोटी दिखाई दे।
लंड में हरकत तो साफ़ दिखती थी, लेकिन उनकी जुबान शालीन बनी रही। उनकी नजरें सीधे कायला की जांघों से लेकर छातियों तक घूमती हैं।
"अरे... कायला तू?"
उसने बस सिर झुका के पैकेट आगे कर दिया।
"अंदर आ जा..."
मिश्राजी का गला सूखा हुआ था -- मन तो उसी पल उसका कुर्ता फाड़ने का कर रहा था, पर खुद को रोके हुए थे।
वो पहली बार उनके घर आई थी, पर जैसे उसके पैर खुद-ब-खुद अंदर बढ़ गए -- जैसे किसी हुक्म की तामीर हो।
अंदर जाते ही कायला ने पैकेट थमाया -- "ये लीजिए"
मिश्राजी ने पैकेट हाथ में लिया, और दरवाज़ा बंद करते हुए बोले--"तू जानती है ना, मेरे पास पचास कुत्ते-कुत्तियाँ हैं... ध्यान ही नहीं रहता कब क्या छूट गया।"
उन्होंने आवाज़ दी -- "गोल्डी!"
एक भारी जर्मन शेफर्ड लपक कर आया -- मिश्राजी के पास से होता हुआ सीधा कायला के पैरों पर सूँघने लगा।
फिर अचानक ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा -- जैसे किसी अजनबी की चूत से उठती गंध पर भूख चढ़ गई हो। कायला की जांघें सिकुड़ गईं।
मिश्राजी बोले, "गोल्डी, No!"
लेकिन कुत्ता रुका नहीं।
"कायला, इसे सेहला... नया चेहरा है, इसलिए शोर कर रहा है।" कायला कुछ नहीं बोलती, धीरे-धीरे झुकती है -- और तभी उसकी मोटी, मांसल गांड लेगिंग्स के अंदर से पूरी तरह फट कर उभर आती है।
उसकी लेगिंग्स इतनी चिपकी हुई थी कि हर बार जब वो झुकती, गांड की लकीरें ऐसे उभरतीं जैसे किसी गीली मिट्टी में लंड दबाया गया हो।
गोल्डी उसकी टांगों के पास चक्कर काटता है, सूँघता है और और ज़ोर से भौंकता है।
कायला हाथ बढ़ाती है -- सहलाना शुरू करती है, लेकिन घबराई हुई सी...
मिश्राजी पास आते हैं -- दोनों झुके हुए, दोनों नीचे... लेकिन एक बूढ़ा लंड खड़ा हो चुका था।
"अरे कायला... अच्छे से सेहला।"
वो पीछे से उसके और पास आए -- और एक हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।
"ऐसे नहीं... ऐसे सेहला... जैसे मैं तुझे सेहलाता हूँ... तभी मानेगा ये।"
उनका हाथ उसकी पीठ से नीचे फिसलता है... कमर पार करता हुआ सीधा उसकी गांड पर।
बड़ी, भरी हुई, मोटी गांड... एकदम मांसल।
मिश्राजी ने जैसे ही हाथ रखा, कायला की सांस एकदम भारी हुई।
उनका हाथ लेगिंग्स के ऊपर से ही उसकी गांड की गोलाई पर गोल-गोल घुम रहा था -- जैसे वो रोटी नहीं, कोई गरम चूत की ढक्कन छू रहे हों।
"ये गांड... क्या चीज बनाई है ऊपर वाले ने..." वो खुद बुदबुदाए।
अब हाथ ने सेहलाना नहीं, दबाना शुरू कर दिया -- मोटी गद्दी को अंदर तक दबा रहे थे...
हर दबाव में कायला की सांस रुक रही थी, लेकिन वो रुकी नहीं -- अब भी गोल्डी को सेहला रही थी।
"तू उसे सेहला रही है... और मैं तुझे।"
मिश्राजी अब गांड की लकीर पर अपनी उंगलियाँ फेरा रहे थे -- जहाँ लेगिंग्स में चूत और गांड की सीमाएँ मिलती हैं। कायला की साँस रुक गई।
मोटी, गरम, और पूरी तरह आज्ञाकारी गांड... जो बस रगड़ और लंड के इंतज़ार में थी।
मिश्राजी अब और पास आ चुके थे। कायला झुकी हुई थी, गोल्डी को सेहला रही थी, पर उसकी गांड अब पूरी तरह मिश्राजी की पकड़ में थी।
उन्होंने धीरे-धीरे हाथ पीछे सरकाया -- और उसकी कुर्ती को पीछे से पकड़कर ऊपर खींचना शुरू किया।
धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना पर्दा हटा रहा हो किसी बंद मंदिर से।कुर्ती ऊपर सरकती गई -- कमर से पीठ, और फिर ब्रा की पट्टी तक।
अब उसकी पूरी गांड लेगिंग्स के अंदर से बाहर झाँक रही थी -- फटी हुई नहीं, पर टाइट में फंसी हुई, जैसे चड्डी-लेगिंग्स की सलाखों में कैद कोई चूत की कैदी।
पीठ -- गोरी, नंगी, और झुकी हुई -- अब धीरे-धीरे सामने आ रही थी।
मिश्राजी थोड़ी देर वहीं खड़े रहे -- आंखें भर-भर देखी उन्होंने उसकी गांड और झुकी पीठ।
जैसे मांस की कोई पूजा हो, और वो खुद को पुजारी मान बैठे हों।फिर आराम से सोफे पर बैठ गए -- जैसे किसी मूर्ख लड़की की गांड की नुमाइश देख रहे हों।
दोनों हाथ उठाए -- और दोनों गांड के उभारों पर एक-एक थप्पड़ मारा।
"ठप्प!"
एक बूँद भी हवा न बची अंदर -- कायला की गांड थप्पड़ से हिल कर थरथराई, मगर वो कुछ नहीं बोली।
थप्पड़ के झटके से उसकी दोनों चूचियाँ नीचे झूल गईं -- मगर आवाज़ एक भी नहीं, सिर्फ़ साँस की गर्म भाप उसकी पीठ से उठ रही थी।
मिश्राजी मुस्कराए -- जैसे किसी बंद पेटी की पहली चाबी मिली हो।अगले ही सेकंड उन्होंने उसकी टाइट लेगिंग्स और नीली चड्डी को एक ही झटके में घुटनों तक खींच दिया --
जब मिश्राजी ने उसकी लेगिंग्स और चड्डी खींची -- तो चूत से चिपकी चड्डी एक झटके में चपचप की आवाज़ के साथ उतरी... जैसे रस में डूबी कोई परत हटाई गई हो।
अब चूत और गांड दोनों नंगी, खुली हवा में हिल रही थीं।
गांड अब पूरी तरह उभर चुकी थी -- मोटी, चौड़ी, भरी हुई।
बीच की लकीर से झाँघों के बाल झाँक रहे थे, और गंध गरम होकर हवा में तैर रही थी।
मिश्राजी ने आँखें बंद कर लीं --
"यही तो गांड है जो लायक मर्द को चूत तक ले जाती है..." वो धीरे से बुदबुदाए।
मिश्राजी अब पूरे हक से खेल को आगे बढ़ाते हैं।उन्होंने झुकी हुई कायला को अपने पास खींचा--सीधा घुटनों पर लिटा दिया।
अब कायला उनकी गोदी में एकदम वैसे पड़ी थी जैसे कोई कुतिया जिसे मालिक ने सज़ा के लिए बुलाया हो--मुँह नीचा, गांड ऊपर।
उसकी चौड़ी, गरम, उजली गांड, जो अब पूरी तरह लेगिंग और चड्डी से आज़ाद थी,ठीक मिश्राजी की नज़रों के सामने थी--मुलायम मांस की दो मोटी लपटें,
जो एकदम निवेदन कर रही थीं,"ले लीजिए, मरोड़ दीजिए, दबा दीजिए।"
मिश्राजी ने अब दोनों हाथों से उसकी गांड की दरार को धीरे-धीरे फैलाया।मांस की गोल परतें उनके अंगूठों के बीच से अलग होती गईं,
उनके अंगूठों के नीचे से दरार की गर्मी जैसे साँस बनकर बाहर फूट रही थी--चूत और गुदा के बीच की वह गीली राह, अब आँखों से नहीं, इरादों से खुल रही थी।
और अब उनकी आँखों के सामने दो छेद--एक चूत का, जो भीगा हुआ, चमकता हुआ उनकी जीभ की मांग कर रहा था...
और एक गुदा का, जो सूखा था, लेकिन उसी रस का इंतज़ार कर रहा था।
मिश्राजी ने अपना चेहरा झुकाया--उनकी गर्म साँसें पहले गांड की दरार में घुसीं, फिर जीभ।
जीभ जैसे दीवार पर रेंग रही हो--एक किनारे से दूसरे छेद तक--हर बाल, हर सिलवट को अपने थूक से सींचती हुई,
चूत से गीली मिठास खींचकर गुदा की प्यास तक पहुँचा रही थी।
जैसे कोई तजुर्बेकार मर्द अपने थूक से चेदों की तासीर बराबर कर रहा हो।"अब दोनों रास्ते मेरे बनें..." मिश्राजी मन ही मन बोले।
फिर उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--जीभ से हल्का दबाव, ऊपर से थूक...और नीचे से चूत और गांड की हर नस थरथराने लगी।
कायला की जाँघें हिलने लगी थीं, चूत हल्की भींच में आ गई थी, और बदन से गंध अब लज्जा नहीं, भूख की तरह उठ रही थी।
उसकी साँसें टूटी-फूटी होने लगीं, बदन कांपने लगा, मगर आवाज़ एक भी नहीं--उसकी चुप्पी अब इजाज़त बन चुकी थी।
एक 60 साल का बूढ़ा मर्द, और उसके नीचे झुकी हुई 30 की मांसल औरत--जिसकी गांड और चूत अब सिर्फ़ उस एक ज़ुबान की गवाही पर नम हो रही थी।
थूक अब दोनों चेदों पर बह रहा था--मिश्राजी उन्हें आने वाले खेल के लिए तैयार कर रहे थे।
सिर्फ जीभ से नहीं... इरादों से।
मिश्राजी ने कायला को हल्के से खींचा, और सीधा अपने घुटनों पर लिटा दिया--अब वो एकदम कुतिया की तरह मिश्राजी के सामने झुकी हुई थी।
कायला की जाँघें अब काँप रही थीं -- चूत से रस बहता जा रहा था और गुदा की झुर्रियाँ मिश्राजी की जीभ के स्पर्श से भीग चुकी थीं।
उसके पेट की हर नस अब उस आखिरी धक्के की मिन्नत कर रही थी।
उसने खुद को थोड़ा और झुका दिया -- जैसे कहना चाह रही हो, 'अब ले ही लो मुझे...'
मिश्रा जी ने उसकी कमर पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर उठाया, और खुद सोफे से उठ खड़े हुए।
उनकी आँखों में अब सिर्फ भूख नहीं थी -- अब वहाँ अधिकार था।
उसकी कुर्ती ऊपर खिंची हुई थी, गोरी, नरम पीठ खुली थी, और नीचे से लेगिंग व चड्डी एक ही झटके में घुटनों तक उतार दी गई थी।
अब उसकी बड़ी, भरी हुई, उजली गांड -- मिश्राजी के सामने ऐसे फैली थी जैसे पूजा की थाली में रखा गया गरम, मुलायम प्रसाद --
जिसे उठाने से पहले ही मुँह में पानी भर जाए।
मांसल, फूली हुई, और नरम... दो गोल हिस्से ऐसे काँप रहे थे जैसे कोई गर्म रोटी तवे पर रखी हो।
मिश्राजी एक पल को वहीं रुक गए--आँखों से पी रहे थे वो दृश्य।फिर दोनों हाथों से गांड की दरार को अलग किया।
जैसे ही दो अंगूठों के बीच वो मांस फैला, अंदर से दोनों चेद खुल गए--एक चूत का, जो पूरी तरह गीली, थरथराती हुई...
और दूसरा गुदा का, जो सूखा, पर कस के बंद, जैसे कह रही हो 'मुझे भी ले।'
मिश्राजी ने बिना देर किए अपना चेहरा उन दोनों दरवाज़ों के बीच उतारा...
पहले उनकी जीभ चूत की भीगी दीवार पर नीचे से ऊपर ऐसे चली जैसे नम नमक पर जीभ घिसती हो -- हर रगड़ पर कायला की जाँघें सिहरती थीं।
फिर वहीं से गीलापन उठाकर गुदा के रुखे मुँह तक ले गए--थूक के साथ।
गुदा की झुर्रियों में जब पहली बार थूक सरका,तो कायला की पूरी रीढ़ जैसे हरकत में आई--जैसे वहाँ भी कोई भूख धीरे-धीरे जाग रही हो।
'तेरा हर रस्ता अब मेरा होगा...'मन ही मन बुदबुदाते हुए, उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--
हर चाट में थूक, हर फूँक में हुकूमत।
कायला झुकी रही--गुलाम, गीली, और अंदर से कांपती हुई।उसकी आँखें बंद थीं, होंठों पर हल्का कंपन था, पर मुँह से कुछ नहीं--अब उसकी इजाज़त शब्दों से नहीं, उसके फैलाव से झलक रही थी।
उसके चेहरे पर सुकून नहीं, सिर्फ समर्पण था।मिश्राजी अब रुकने वाले नहीं थे--ये चेद अब सजे हैं... अगले तूफ़ान के लिए।
मिश्राजी ने न शादी की थी, न बच्चे हुए -- और औरत की चूत का सुख कितना लिया है, ये तो शायद कोई नहीं जानता।
पर आज जो उनके सामने खड़ी है, वो कोई आम औरत नहीं -- ये तो तीस साल की गरम, मदहोश चूत वाली मादा है, जो खुद चलकर उनकी ज़िंदगी में घुस आई है।
और अब, जब वो उसकी गांड चाटकर उठे, तो आँखों में भूख नहीं थी... अब वहाँ फैसला था।
अब उनकी आँखों में वही ठहराव था जो एक शिकारी की आँखों में आता है जब शिकार खुद सामने आकर गर्दन झुका दे।
अब खेल आगे जाना था, पूरे हक से।
मिश्रा जी अब भी झुकी कायला की गांड को घूर रहे थे -- थूक से भीगी दरार और काँपती जाँघें जैसे उन्हें और रोक रही थीं।
उन्होंने धीरे से उसकी कमर पर हाथ रखा -- दबाव नहीं, बस एक संकेत...
कायला ने खुद ही अपने हाथों को मोड़ा, और धीरे-धीरे उठकर सीधी हो गई -- जैसे हर हरकत अब उसकी मर्जी नहीं, उसी मर्द की इजाज़त से चल रही हो।
जैसे अब वो देखेगा, सीखेगा -- और समझेगा कि असली मर्द और मादा के बीच क्या होता है।
अब मिश्राजी ने हाथ बढ़ाकर कायला की कुर्ती पकड़ी।
बिना कुछ बोले, कायला ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर दिए -- जैसे खुद को पूरी तरह पेश कर रही हो,
'ले लीजिए... अब ये जिस्म भी आपका।'कुर्ती ऊपर गई... और नीचे ज़मीन पर फेंकी गई -- जैसे कोई परत हटाई गई हो उस भरे हुए जिस्म पर से।
अब कायला ग्रे ब्रा में खड़ी थी, और नीचे की ओर उसकी चड्डी अब भी घुटनों तक झुकी हुई थी --बीच में चूत का हिस्सा खुला, गीला, और ललचाता हुआ।
ब्रा के अंदर से उसके दूधू ऐसे हिल रहे थे जैसे हर साँस पे अपनी जगह से बाहर आना चाहते हों -- और नीचे की चूत की सिलवटों से अब रस बहकर जाँघ तक सरकने लगा था...
मिश्राजी अब अपनी बनियान उतारते हैं --उनके पसीने और उम्र की गंध अब कमरे में ऐसी फैली थी जैसे किसी पुराने मर्द की चूसी हुई मादा फिर से हाजिर हो।
अंदर से बालों से भरी छाती निकलती है, और साथ में बूढ़े बदन से उठती एक अलग ही मर्दानी महक।
फिर उन्होंने कायला को धीरे से पीछे घुमा दिया -- अब वो सामने नहीं, पीठ करके खड़ी थी।
ब्रा की स्ट्रैप उसकी गोरी पीठ पर खिंच रही थी, और नीचे से गांड अब भी खुली थी -- मोटी, भारी, और नरम।
मिश्राजी की साँसें भारी हो चुकी थीं -- और कायला अब भी चुप,
बस एक जवान, मदहोश मादा की तरह मर्द के स्पर्श में पिघलती हुई।
मिश्राजी अब पूरी तरह काबू में आ चुके थे।
उम्र साठ की, मगर आँखों में लंड जैसी सख़्ती और नीयत में बूढ़े मर्द की भूख।
उन्होंने पीछे से झुकी हुई कायला की ब्रा का हुक खोल दिया।
क्लिक की हल्की सी आवाज़ के साथ वो कसाव ढीला पड़ा, और उसकी भारी 36B की छातियाँ थोड़ी हिलकर सांस लेने लगीं।
दोनों ब्रा स्ट्रैप्स को उन्होंने धीरे-धीरे नीचे सरकाया --
जैसे कोई मर्द अपने हक से किसी औरत के पर्दे हटा रहा हो।
ब्रा हटाकर उन्होंने उसे बगल में सोफे की ओर फेंक दिया।
अब मिश्राजी ने अपने पैरों से कायला की चड्डी और लेगिंग्स पकड़ी -- और धीरे-धीरे घुटनों से नीचे सरका दी।
कायला ने ख़ुद आगे एक-एक पैर उठाकर कपड़े उतारे -- जैसे अपनी नर्मी को खुद हवाले कर रही हो।
मिश्राजी ने भी अब अपना लोअर नीचे सरकाया --अब वो सिर्फ चड्डी में खड़े थे, और उसमें से लंड का उभार साफ़ दिख रहा था --
चड्डी में बंद मगर चिल्लाता हुआ।
कायला अब पूरी तरह नंगी थी -- सामने से भी, पीछे से भी।वो अब एक खुली किताब थी -- सामने से चूत की गीली लकीरें और पीछे से गांड की झुर्रियाँ ऐसे दिख रहीं थीं जैसे कोई पुरानी मगर भूखी कहानी अब फिर से पढ़ी जा रही हो।
छातियाँ खुली, चूत जाँघों के बीच से हल्की सी चमकती हुई, और गांड अब भी नरम और भारी।
मिश्राजी ने एक हाथ से उसकी छातियों में से एक को पकड़ा -- पूरी हथेली में समा रही थी, मगर उभार अब भी बाहर था।
दूसरा हाथ पीठ पर गया -- जहाँ ब्रा का निशान अब भी धँसा हुआ था, उस निशान को उँगलियाँ सहलाती हुई नीचे उतरीं...
कमर, फिर पेट, और सीधा वहाँ...
जहाँ उसकी चूत की झाड़ गीली सांसों से हिल रही थी।
मिश्राजी ने उँगली बीच में घुसाई -- और उसकी गीली पंखुड़ियाँ अब खुलने लगीं।
नरम, गरम, और बेकाबू...
कायला की देह अब काँप रही थी -- सांस तेज़, होंठ सूखे, मगर आवाज़ अब भी नहीं।
वो अब भी एकदम चुप -- एक ऐसी गुलाम मादा, जिसे बस महसूस करना आता है, विरोध नहीं।
मिश्राजी अब अपने भारी होंठों से उसकी पीठ चूम रहे थे --
हर चुम्बन में थूक और मर्दानगी का रंग था।
फिर अचानक... उन्होंने कायला को पकड़ा और मोड़कर सोफे पर बैठा दिया --
कायला अब पूरी तरह नंगी बैठी थी -- और सामने खड़े मिश्राजी, बस चड्डी पहने,जिसके ऊपर से उनका लंड फड़फड़ा रहा था -- जैसे कह रहा हो, अब इंतज़ार नहीं होगा..."
मिश्रा जी ने अपनी आखिरी परत भी उतार दी -- चड्डी धीरे से सरकाई, और उनका लंड अब सीधा तना हुआ जवान मिसाइल जैसा था, जैसे कोई शिकारी जो मादा को चीरने के लिए पैदा हुआ हो।
उनकी उम्र साठ थी, पर उनमें अभी भी उस लंड की ताकत थी जो किसी भी कुतिया को रात भर बाँध कर रख दे।
कायला सामने खड़ी थी, झुकी हुई, पूरी तरह नग्न--जैसे वफ़ादार देह का एक टुकड़ा, जो आज सिर्फ लंड की जागीर थी।
उसकी टाँगें हल्की खुली थीं, चूत की झाँटें रस-भरी चमक के साथ थीं--जैसे हर कोशिका पूछ रही हो, "अब..."
मिश्रा जी ने लंड थामा, हल्के से थूक करते हुए चमड़ी को ऊपर-नीचे किया, फिर उसे चूत के दरवाजे पर ठहराया--जैसे खुद कह रहे हों, "अब तेरा असली रास्ता खुलने वाला है।"
एक धीमा धक्का, फिर एक तेज़ झटका -- चूत ने पूर्ण रूप से मिश्रा जी का स्वागत किया। चूत की दीवारों ने जैसे पहला फूल खिला दिया -- एक धक्के की रस की बारिश।
"आह..." कायला की आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ समर्पण की पुकार--एक मादा की सबसे सच्ची तैयारियाँ।
मिश्रा जी ने पेट के बल उसे झुका दिया, खुद ऊपर चढ़े और उसके कूल्हों को कसकर पकड़ लिया--हर एक धक्का अंदर तक गूंज रहा था।
नीचे की चूत गर्म थी, रस से लथपथ, और पूरी तरह मिश्रा जी के लंड के इंतज़ार में थी।
हर धक्का एक गीत था, चूत और लंड की टूटी रागिनी--जिसमें रस और हवा मिलकर गाती थी।
कुछ देर बाद मिश्रा जी ने कायला को पलटा दिया--पीठ के बल, दोनों पैर हवा में थे, और फिर उन्होंने उसके ऊपर भारी लंड को ताना।
उनकी साँसें तेज़ थीं; चुदाई अब गहराई पकड़ चुकी थी--हर धक्का गांड पर थप्पड़ की तरह जोरदार था।
मिश्रा जी ने कायला को सोफे के किनारे बिठाया। उसकी पीठ सोफे से टिकी, टाँगें खोल दीं, और चूत खुली थी--रस की धारियाँ उसे चमक रही थीं।
फिर मिश्रा जी ने एक नज़र उस पर डाली और हँसते हुए बोले-- "ये चूत अब बस मेरी नहीं रही... "
दो हाथों से गांड फैलाकर मिश्रा जी ने लंड को दरार पर टिकाया, फिर एक तेज़ धक्का -- फिर एक और।
"धप-धप" की आंधी चल रही थी कमरे में।
कायला को फिर से पेट के बल झुकाया गया, मिश्रा जी उसके पीछे चढ़े हुए, दोनों टाँगों के बीच में बैठे -- फिर से सीधी चूत।
हर हिलावट पसीने से भीगी थी, हवा गरम होती जा रही थी--किसी थकान की कोई उम्मीद न थी।
उनका लंड पूर्ण रूप से अपनी भूमिका में था--हर खिंचाव, हर धक्का चूत के रस को समेटकर बाहर आ रहा था।
फिर क्लाइमेक्स आया। कायला को चार हाथ-पाँव पर झुका दिया गया। गांड उठा हुआ, चूत खुल चुकी थी, और मिश्रा जी पीछे से तैयार थे।
उन्होंने गांड फैलाई, लंड रगड़ा, फिर एक जोरदार धक्का--चूत अब रस से टपक रही थी।
और फिर अचानक आखिरी धक्का -- लंड बाहर निकला, और गरम-गाढ़ा वीर्य सीधे कायला की गांड पर उँडेल दिया गया।
वीर्य की गरमी उसकी गांड से होते हुए जांघों पर बह रही थी -- कुछ बूँदें फर्श पर टपकीं।कायला अब भी उसी पोज़ में जमी हुई थी -- जैसे पूरे बदन का कंट्रोल निकल गया हो।
उसकी साँसें टूट-टूट कर बाहर आ रही थीं, और छातियाँ हर धड़कन पर हिल रही थीं।
मिश्रा जी ने धीमे से उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरा -- एक मर्द का मालिकाना स्पर्श।
'देख... ये अब सिर्फ मेरी नहीं रही,' उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, 'ये अब वो मादा है जिस पर मोहर लग चुकी है...'कायला ने कुछ नहीं कहा -- बस आँखें बंद कर लीं, जैसे उसने खुद को पूरी तरह सौंप दिया हो।
फिर थोड़ी देर बाद, उसने थरथराते हाथों से कपड़े उठाए -- और उठते वक्त उसकी जांघों के बीच से वीर्य की एक बूँद नीचे सरकती चली गई..."
कायला धीरे-धीरे उठी, कोई शब्द नहीं बोली। कपड़े पहनने लगी, बाल ठीक किए, बैग उठाया, और दरवाज़े की ओर बढ़ी।
कायला ने दरवाज़ा खोला, लेकिन उससे पहले एक बार पलटकर मिश्रा जी की ओर देखा -- उनकी नज़रें अब भी उसकी खुली जाँघों की तरफ थीं।
उसने कुछ नहीं कहा, बस आँखें झुका लीं।
फर्श पर गिरा वीर्य अब भी लिपका हुआ था -- और उसके अंदर की गरमी अब भी थमी नहीं थी।
मिश्रा जी चड्डी पहनकर सोफे पर बैठे रहे आँखें बंद कीं... और थकी सी आवाज़ में बस इतना कहा -- "ऐसे ही आती-जाती रहना..."
दरवाज़ा बंद हुआ, लेकिन उस कमरे की हवा अब भी उसी गंध से भारी थी...
एक और मादा की सब्मिशन की खुशबू।
शाम का वक्त था... ऑफिस का शोर थम चुका था। कायला अपनी टाइट कसी हुई ब्लैक लेगिंग्स में फाइलें समेट रही थी। ऊपर की ओर लाल, सफेद और काले रंग का चटक कुर्ता,
जो उसकी मांसल छातियों को हल्के से उभार देता था। अंदर से स्लेटी रंग की ब्रा उसके उभरे (36B) के दूधुओं को जकड़ रही थी,और नीचे नीली चड्डी उसकी चूत की गर्मी को भींचे बैठी थी।
उसकी लेगिंग्स इतनी टाइट थी कि हर कदम पर मोटी जांघें कस रही थीं,और हर झुकाव में गांड के गोल उभार उभर आते थे।
तभी उसकी जूनियर ममता पास आती है -- "मैडम, मिश्राजी के डॉगी का कुछ छूट गया है... घर जाते वक्त दे देना।"
कायला ने चुपचाप सिर हिलाया, "ठीक है।"
पैकेट लिया और निकल पड़ी -- बिना कुछ कहे, जैसे किसी हुक्म को मान रही हो।
पंद्रह मिनट में उसकी गाड़ी दीपक मिश्राजी के गेट पर रुकती है।
गली में सिर्फ पत्तों की सरसराहट थी... और उस बीच कायला की चड्डी के नीचे चुपचाप पसीजती चूत।
डोर बेल बजती है -- गेट खुलता है।
सामने से निकलते हैं मिश्राजी -- ढीला सा पायजामा पहने,ऊपर से सफेद बनियान, जो पसीने से चिपक कर उनके बालों भरे सीने को उघाड़े हुए थी।
आँखों में एक अलग ही चमक... उनकी नज़रें टिकी थीं कायला की छातियों पर -- कुछ देर वैसे ही, जैसे किसी भूखे को गरम रोटी दिखाई दे।
लंड में हरकत तो साफ़ दिखती थी, लेकिन उनकी जुबान शालीन बनी रही। उनकी नजरें सीधे कायला की जांघों से लेकर छातियों तक घूमती हैं।
"अरे... कायला तू?"
उसने बस सिर झुका के पैकेट आगे कर दिया।
"अंदर आ जा..."
मिश्राजी का गला सूखा हुआ था -- मन तो उसी पल उसका कुर्ता फाड़ने का कर रहा था, पर खुद को रोके हुए थे।
वो पहली बार उनके घर आई थी, पर जैसे उसके पैर खुद-ब-खुद अंदर बढ़ गए -- जैसे किसी हुक्म की तामीर हो।
अंदर जाते ही कायला ने पैकेट थमाया -- "ये लीजिए"
मिश्राजी ने पैकेट हाथ में लिया, और दरवाज़ा बंद करते हुए बोले--"तू जानती है ना, मेरे पास पचास कुत्ते-कुत्तियाँ हैं... ध्यान ही नहीं रहता कब क्या छूट गया।"
उन्होंने आवाज़ दी -- "गोल्डी!"
एक भारी जर्मन शेफर्ड लपक कर आया -- मिश्राजी के पास से होता हुआ सीधा कायला के पैरों पर सूँघने लगा।
फिर अचानक ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा -- जैसे किसी अजनबी की चूत से उठती गंध पर भूख चढ़ गई हो। कायला की जांघें सिकुड़ गईं।
मिश्राजी बोले, "गोल्डी, No!"
लेकिन कुत्ता रुका नहीं।
"कायला, इसे सेहला... नया चेहरा है, इसलिए शोर कर रहा है।" कायला कुछ नहीं बोलती, धीरे-धीरे झुकती है -- और तभी उसकी मोटी, मांसल गांड लेगिंग्स के अंदर से पूरी तरह फट कर उभर आती है।
उसकी लेगिंग्स इतनी चिपकी हुई थी कि हर बार जब वो झुकती, गांड की लकीरें ऐसे उभरतीं जैसे किसी गीली मिट्टी में लंड दबाया गया हो।
गोल्डी उसकी टांगों के पास चक्कर काटता है, सूँघता है और और ज़ोर से भौंकता है।
कायला हाथ बढ़ाती है -- सहलाना शुरू करती है, लेकिन घबराई हुई सी...
मिश्राजी पास आते हैं -- दोनों झुके हुए, दोनों नीचे... लेकिन एक बूढ़ा लंड खड़ा हो चुका था।
"अरे कायला... अच्छे से सेहला।"
वो पीछे से उसके और पास आए -- और एक हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।
"ऐसे नहीं... ऐसे सेहला... जैसे मैं तुझे सेहलाता हूँ... तभी मानेगा ये।"
उनका हाथ उसकी पीठ से नीचे फिसलता है... कमर पार करता हुआ सीधा उसकी गांड पर।
बड़ी, भरी हुई, मोटी गांड... एकदम मांसल।
मिश्राजी ने जैसे ही हाथ रखा, कायला की सांस एकदम भारी हुई।
उनका हाथ लेगिंग्स के ऊपर से ही उसकी गांड की गोलाई पर गोल-गोल घुम रहा था -- जैसे वो रोटी नहीं, कोई गरम चूत की ढक्कन छू रहे हों।
"ये गांड... क्या चीज बनाई है ऊपर वाले ने..." वो खुद बुदबुदाए।
अब हाथ ने सेहलाना नहीं, दबाना शुरू कर दिया -- मोटी गद्दी को अंदर तक दबा रहे थे...
हर दबाव में कायला की सांस रुक रही थी, लेकिन वो रुकी नहीं -- अब भी गोल्डी को सेहला रही थी।
"तू उसे सेहला रही है... और मैं तुझे।"
मिश्राजी अब गांड की लकीर पर अपनी उंगलियाँ फेरा रहे थे -- जहाँ लेगिंग्स में चूत और गांड की सीमाएँ मिलती हैं। कायला की साँस रुक गई।
मोटी, गरम, और पूरी तरह आज्ञाकारी गांड... जो बस रगड़ और लंड के इंतज़ार में थी।
मिश्राजी अब और पास आ चुके थे। कायला झुकी हुई थी, गोल्डी को सेहला रही थी, पर उसकी गांड अब पूरी तरह मिश्राजी की पकड़ में थी।
उन्होंने धीरे-धीरे हाथ पीछे सरकाया -- और उसकी कुर्ती को पीछे से पकड़कर ऊपर खींचना शुरू किया।
धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना पर्दा हटा रहा हो किसी बंद मंदिर से।कुर्ती ऊपर सरकती गई -- कमर से पीठ, और फिर ब्रा की पट्टी तक।
अब उसकी पूरी गांड लेगिंग्स के अंदर से बाहर झाँक रही थी -- फटी हुई नहीं, पर टाइट में फंसी हुई, जैसे चड्डी-लेगिंग्स की सलाखों में कैद कोई चूत की कैदी।
पीठ -- गोरी, नंगी, और झुकी हुई -- अब धीरे-धीरे सामने आ रही थी।
मिश्राजी थोड़ी देर वहीं खड़े रहे -- आंखें भर-भर देखी उन्होंने उसकी गांड और झुकी पीठ।
जैसे मांस की कोई पूजा हो, और वो खुद को पुजारी मान बैठे हों।फिर आराम से सोफे पर बैठ गए -- जैसे किसी मूर्ख लड़की की गांड की नुमाइश देख रहे हों।
दोनों हाथ उठाए -- और दोनों गांड के उभारों पर एक-एक थप्पड़ मारा।
"ठप्प!"
एक बूँद भी हवा न बची अंदर -- कायला की गांड थप्पड़ से हिल कर थरथराई, मगर वो कुछ नहीं बोली।
थप्पड़ के झटके से उसकी दोनों चूचियाँ नीचे झूल गईं -- मगर आवाज़ एक भी नहीं, सिर्फ़ साँस की गर्म भाप उसकी पीठ से उठ रही थी।
मिश्राजी मुस्कराए -- जैसे किसी बंद पेटी की पहली चाबी मिली हो।अगले ही सेकंड उन्होंने उसकी टाइट लेगिंग्स और नीली चड्डी को एक ही झटके में घुटनों तक खींच दिया --
जब मिश्राजी ने उसकी लेगिंग्स और चड्डी खींची -- तो चूत से चिपकी चड्डी एक झटके में चपचप की आवाज़ के साथ उतरी... जैसे रस में डूबी कोई परत हटाई गई हो।
अब चूत और गांड दोनों नंगी, खुली हवा में हिल रही थीं।
गांड अब पूरी तरह उभर चुकी थी -- मोटी, चौड़ी, भरी हुई।
बीच की लकीर से झाँघों के बाल झाँक रहे थे, और गंध गरम होकर हवा में तैर रही थी।
मिश्राजी ने आँखें बंद कर लीं --
"यही तो गांड है जो लायक मर्द को चूत तक ले जाती है..." वो धीरे से बुदबुदाए।
मिश्राजी अब पूरे हक से खेल को आगे बढ़ाते हैं।उन्होंने झुकी हुई कायला को अपने पास खींचा--सीधा घुटनों पर लिटा दिया।
अब कायला उनकी गोदी में एकदम वैसे पड़ी थी जैसे कोई कुतिया जिसे मालिक ने सज़ा के लिए बुलाया हो--मुँह नीचा, गांड ऊपर।
उसकी चौड़ी, गरम, उजली गांड, जो अब पूरी तरह लेगिंग और चड्डी से आज़ाद थी,ठीक मिश्राजी की नज़रों के सामने थी--मुलायम मांस की दो मोटी लपटें,
जो एकदम निवेदन कर रही थीं,"ले लीजिए, मरोड़ दीजिए, दबा दीजिए।"
मिश्राजी ने अब दोनों हाथों से उसकी गांड की दरार को धीरे-धीरे फैलाया।मांस की गोल परतें उनके अंगूठों के बीच से अलग होती गईं,
उनके अंगूठों के नीचे से दरार की गर्मी जैसे साँस बनकर बाहर फूट रही थी--चूत और गुदा के बीच की वह गीली राह, अब आँखों से नहीं, इरादों से खुल रही थी।
और अब उनकी आँखों के सामने दो छेद--एक चूत का, जो भीगा हुआ, चमकता हुआ उनकी जीभ की मांग कर रहा था...
और एक गुदा का, जो सूखा था, लेकिन उसी रस का इंतज़ार कर रहा था।
मिश्राजी ने अपना चेहरा झुकाया--उनकी गर्म साँसें पहले गांड की दरार में घुसीं, फिर जीभ।
जीभ जैसे दीवार पर रेंग रही हो--एक किनारे से दूसरे छेद तक--हर बाल, हर सिलवट को अपने थूक से सींचती हुई,
चूत से गीली मिठास खींचकर गुदा की प्यास तक पहुँचा रही थी।
जैसे कोई तजुर्बेकार मर्द अपने थूक से चेदों की तासीर बराबर कर रहा हो।"अब दोनों रास्ते मेरे बनें..." मिश्राजी मन ही मन बोले।
फिर उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--जीभ से हल्का दबाव, ऊपर से थूक...और नीचे से चूत और गांड की हर नस थरथराने लगी।
कायला की जाँघें हिलने लगी थीं, चूत हल्की भींच में आ गई थी, और बदन से गंध अब लज्जा नहीं, भूख की तरह उठ रही थी।
उसकी साँसें टूटी-फूटी होने लगीं, बदन कांपने लगा, मगर आवाज़ एक भी नहीं--उसकी चुप्पी अब इजाज़त बन चुकी थी।
एक 60 साल का बूढ़ा मर्द, और उसके नीचे झुकी हुई 30 की मांसल औरत--जिसकी गांड और चूत अब सिर्फ़ उस एक ज़ुबान की गवाही पर नम हो रही थी।
थूक अब दोनों चेदों पर बह रहा था--मिश्राजी उन्हें आने वाले खेल के लिए तैयार कर रहे थे।
सिर्फ जीभ से नहीं... इरादों से।
मिश्राजी ने कायला को हल्के से खींचा, और सीधा अपने घुटनों पर लिटा दिया--अब वो एकदम कुतिया की तरह मिश्राजी के सामने झुकी हुई थी।
कायला की जाँघें अब काँप रही थीं -- चूत से रस बहता जा रहा था और गुदा की झुर्रियाँ मिश्राजी की जीभ के स्पर्श से भीग चुकी थीं।
उसके पेट की हर नस अब उस आखिरी धक्के की मिन्नत कर रही थी।
उसने खुद को थोड़ा और झुका दिया -- जैसे कहना चाह रही हो, 'अब ले ही लो मुझे...'
मिश्रा जी ने उसकी कमर पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर उठाया, और खुद सोफे से उठ खड़े हुए।
उनकी आँखों में अब सिर्फ भूख नहीं थी -- अब वहाँ अधिकार था।
उसकी कुर्ती ऊपर खिंची हुई थी, गोरी, नरम पीठ खुली थी, और नीचे से लेगिंग व चड्डी एक ही झटके में घुटनों तक उतार दी गई थी।
अब उसकी बड़ी, भरी हुई, उजली गांड -- मिश्राजी के सामने ऐसे फैली थी जैसे पूजा की थाली में रखा गया गरम, मुलायम प्रसाद --
जिसे उठाने से पहले ही मुँह में पानी भर जाए।
मांसल, फूली हुई, और नरम... दो गोल हिस्से ऐसे काँप रहे थे जैसे कोई गर्म रोटी तवे पर रखी हो।
मिश्राजी एक पल को वहीं रुक गए--आँखों से पी रहे थे वो दृश्य।फिर दोनों हाथों से गांड की दरार को अलग किया।
जैसे ही दो अंगूठों के बीच वो मांस फैला, अंदर से दोनों चेद खुल गए--एक चूत का, जो पूरी तरह गीली, थरथराती हुई...
और दूसरा गुदा का, जो सूखा, पर कस के बंद, जैसे कह रही हो 'मुझे भी ले।'
मिश्राजी ने बिना देर किए अपना चेहरा उन दोनों दरवाज़ों के बीच उतारा...
पहले उनकी जीभ चूत की भीगी दीवार पर नीचे से ऊपर ऐसे चली जैसे नम नमक पर जीभ घिसती हो -- हर रगड़ पर कायला की जाँघें सिहरती थीं।
फिर वहीं से गीलापन उठाकर गुदा के रुखे मुँह तक ले गए--थूक के साथ।
गुदा की झुर्रियों में जब पहली बार थूक सरका,तो कायला की पूरी रीढ़ जैसे हरकत में आई--जैसे वहाँ भी कोई भूख धीरे-धीरे जाग रही हो।
'तेरा हर रस्ता अब मेरा होगा...'मन ही मन बुदबुदाते हुए, उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--
हर चाट में थूक, हर फूँक में हुकूमत।
कायला झुकी रही--गुलाम, गीली, और अंदर से कांपती हुई।उसकी आँखें बंद थीं, होंठों पर हल्का कंपन था, पर मुँह से कुछ नहीं--अब उसकी इजाज़त शब्दों से नहीं, उसके फैलाव से झलक रही थी।
उसके चेहरे पर सुकून नहीं, सिर्फ समर्पण था।मिश्राजी अब रुकने वाले नहीं थे--ये चेद अब सजे हैं... अगले तूफ़ान के लिए।
मिश्राजी ने न शादी की थी, न बच्चे हुए -- और औरत की चूत का सुख कितना लिया है, ये तो शायद कोई नहीं जानता।
पर आज जो उनके सामने खड़ी है, वो कोई आम औरत नहीं -- ये तो तीस साल की गरम, मदहोश चूत वाली मादा है, जो खुद चलकर उनकी ज़िंदगी में घुस आई है।
और अब, जब वो उसकी गांड चाटकर उठे, तो आँखों में भूख नहीं थी... अब वहाँ फैसला था।
अब उनकी आँखों में वही ठहराव था जो एक शिकारी की आँखों में आता है जब शिकार खुद सामने आकर गर्दन झुका दे।
अब खेल आगे जाना था, पूरे हक से।
मिश्रा जी अब भी झुकी कायला की गांड को घूर रहे थे -- थूक से भीगी दरार और काँपती जाँघें जैसे उन्हें और रोक रही थीं।
उन्होंने धीरे से उसकी कमर पर हाथ रखा -- दबाव नहीं, बस एक संकेत...
कायला ने खुद ही अपने हाथों को मोड़ा, और धीरे-धीरे उठकर सीधी हो गई -- जैसे हर हरकत अब उसकी मर्जी नहीं, उसी मर्द की इजाज़त से चल रही हो।
जैसे अब वो देखेगा, सीखेगा -- और समझेगा कि असली मर्द और मादा के बीच क्या होता है।
अब मिश्राजी ने हाथ बढ़ाकर कायला की कुर्ती पकड़ी।
बिना कुछ बोले, कायला ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर दिए -- जैसे खुद को पूरी तरह पेश कर रही हो,
'ले लीजिए... अब ये जिस्म भी आपका।'कुर्ती ऊपर गई... और नीचे ज़मीन पर फेंकी गई -- जैसे कोई परत हटाई गई हो उस भरे हुए जिस्म पर से।
अब कायला ग्रे ब्रा में खड़ी थी, और नीचे की ओर उसकी चड्डी अब भी घुटनों तक झुकी हुई थी --बीच में चूत का हिस्सा खुला, गीला, और ललचाता हुआ।
ब्रा के अंदर से उसके दूधू ऐसे हिल रहे थे जैसे हर साँस पे अपनी जगह से बाहर आना चाहते हों -- और नीचे की चूत की सिलवटों से अब रस बहकर जाँघ तक सरकने लगा था...
मिश्राजी अब अपनी बनियान उतारते हैं --उनके पसीने और उम्र की गंध अब कमरे में ऐसी फैली थी जैसे किसी पुराने मर्द की चूसी हुई मादा फिर से हाजिर हो।
अंदर से बालों से भरी छाती निकलती है, और साथ में बूढ़े बदन से उठती एक अलग ही मर्दानी महक।
फिर उन्होंने कायला को धीरे से पीछे घुमा दिया -- अब वो सामने नहीं, पीठ करके खड़ी थी।
ब्रा की स्ट्रैप उसकी गोरी पीठ पर खिंच रही थी, और नीचे से गांड अब भी खुली थी -- मोटी, भारी, और नरम।
मिश्राजी की साँसें भारी हो चुकी थीं -- और कायला अब भी चुप,
बस एक जवान, मदहोश मादा की तरह मर्द के स्पर्श में पिघलती हुई।
मिश्राजी अब पूरी तरह काबू में आ चुके थे।
उम्र साठ की, मगर आँखों में लंड जैसी सख़्ती और नीयत में बूढ़े मर्द की भूख।
उन्होंने पीछे से झुकी हुई कायला की ब्रा का हुक खोल दिया।
क्लिक की हल्की सी आवाज़ के साथ वो कसाव ढीला पड़ा, और उसकी भारी 36B की छातियाँ थोड़ी हिलकर सांस लेने लगीं।
दोनों ब्रा स्ट्रैप्स को उन्होंने धीरे-धीरे नीचे सरकाया --
जैसे कोई मर्द अपने हक से किसी औरत के पर्दे हटा रहा हो।
ब्रा हटाकर उन्होंने उसे बगल में सोफे की ओर फेंक दिया।
अब मिश्राजी ने अपने पैरों से कायला की चड्डी और लेगिंग्स पकड़ी -- और धीरे-धीरे घुटनों से नीचे सरका दी।
कायला ने ख़ुद आगे एक-एक पैर उठाकर कपड़े उतारे -- जैसे अपनी नर्मी को खुद हवाले कर रही हो।
मिश्राजी ने भी अब अपना लोअर नीचे सरकाया --अब वो सिर्फ चड्डी में खड़े थे, और उसमें से लंड का उभार साफ़ दिख रहा था --
चड्डी में बंद मगर चिल्लाता हुआ।
कायला अब पूरी तरह नंगी थी -- सामने से भी, पीछे से भी।वो अब एक खुली किताब थी -- सामने से चूत की गीली लकीरें और पीछे से गांड की झुर्रियाँ ऐसे दिख रहीं थीं जैसे कोई पुरानी मगर भूखी कहानी अब फिर से पढ़ी जा रही हो।
छातियाँ खुली, चूत जाँघों के बीच से हल्की सी चमकती हुई, और गांड अब भी नरम और भारी।
मिश्राजी ने एक हाथ से उसकी छातियों में से एक को पकड़ा -- पूरी हथेली में समा रही थी, मगर उभार अब भी बाहर था।
दूसरा हाथ पीठ पर गया -- जहाँ ब्रा का निशान अब भी धँसा हुआ था, उस निशान को उँगलियाँ सहलाती हुई नीचे उतरीं...
कमर, फिर पेट, और सीधा वहाँ...
जहाँ उसकी चूत की झाड़ गीली सांसों से हिल रही थी।
मिश्राजी ने उँगली बीच में घुसाई -- और उसकी गीली पंखुड़ियाँ अब खुलने लगीं।
नरम, गरम, और बेकाबू...
कायला की देह अब काँप रही थी -- सांस तेज़, होंठ सूखे, मगर आवाज़ अब भी नहीं।
वो अब भी एकदम चुप -- एक ऐसी गुलाम मादा, जिसे बस महसूस करना आता है, विरोध नहीं।
मिश्राजी अब अपने भारी होंठों से उसकी पीठ चूम रहे थे --
हर चुम्बन में थूक और मर्दानगी का रंग था।
फिर अचानक... उन्होंने कायला को पकड़ा और मोड़कर सोफे पर बैठा दिया --
कायला अब पूरी तरह नंगी बैठी थी -- और सामने खड़े मिश्राजी, बस चड्डी पहने,जिसके ऊपर से उनका लंड फड़फड़ा रहा था -- जैसे कह रहा हो, अब इंतज़ार नहीं होगा..."
मिश्रा जी ने अपनी आखिरी परत भी उतार दी -- चड्डी धीरे से सरकाई, और उनका लंड अब सीधा तना हुआ जवान मिसाइल जैसा था, जैसे कोई शिकारी जो मादा को चीरने के लिए पैदा हुआ हो।
उनकी उम्र साठ थी, पर उनमें अभी भी उस लंड की ताकत थी जो किसी भी कुतिया को रात भर बाँध कर रख दे।
कायला सामने खड़ी थी, झुकी हुई, पूरी तरह नग्न--जैसे वफ़ादार देह का एक टुकड़ा, जो आज सिर्फ लंड की जागीर थी।
उसकी टाँगें हल्की खुली थीं, चूत की झाँटें रस-भरी चमक के साथ थीं--जैसे हर कोशिका पूछ रही हो, "अब..."
मिश्रा जी ने लंड थामा, हल्के से थूक करते हुए चमड़ी को ऊपर-नीचे किया, फिर उसे चूत के दरवाजे पर ठहराया--जैसे खुद कह रहे हों, "अब तेरा असली रास्ता खुलने वाला है।"
एक धीमा धक्का, फिर एक तेज़ झटका -- चूत ने पूर्ण रूप से मिश्रा जी का स्वागत किया। चूत की दीवारों ने जैसे पहला फूल खिला दिया -- एक धक्के की रस की बारिश।
"आह..." कायला की आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ समर्पण की पुकार--एक मादा की सबसे सच्ची तैयारियाँ।
मिश्रा जी ने पेट के बल उसे झुका दिया, खुद ऊपर चढ़े और उसके कूल्हों को कसकर पकड़ लिया--हर एक धक्का अंदर तक गूंज रहा था।
नीचे की चूत गर्म थी, रस से लथपथ, और पूरी तरह मिश्रा जी के लंड के इंतज़ार में थी।
हर धक्का एक गीत था, चूत और लंड की टूटी रागिनी--जिसमें रस और हवा मिलकर गाती थी।
कुछ देर बाद मिश्रा जी ने कायला को पलटा दिया--पीठ के बल, दोनों पैर हवा में थे, और फिर उन्होंने उसके ऊपर भारी लंड को ताना।
उनकी साँसें तेज़ थीं; चुदाई अब गहराई पकड़ चुकी थी--हर धक्का गांड पर थप्पड़ की तरह जोरदार था।
मिश्रा जी ने कायला को सोफे के किनारे बिठाया। उसकी पीठ सोफे से टिकी, टाँगें खोल दीं, और चूत खुली थी--रस की धारियाँ उसे चमक रही थीं।
फिर मिश्रा जी ने एक नज़र उस पर डाली और हँसते हुए बोले-- "ये चूत अब बस मेरी नहीं रही... "
दो हाथों से गांड फैलाकर मिश्रा जी ने लंड को दरार पर टिकाया, फिर एक तेज़ धक्का -- फिर एक और।
"धप-धप" की आंधी चल रही थी कमरे में।
कायला को फिर से पेट के बल झुकाया गया, मिश्रा जी उसके पीछे चढ़े हुए, दोनों टाँगों के बीच में बैठे -- फिर से सीधी चूत।
हर हिलावट पसीने से भीगी थी, हवा गरम होती जा रही थी--किसी थकान की कोई उम्मीद न थी।
उनका लंड पूर्ण रूप से अपनी भूमिका में था--हर खिंचाव, हर धक्का चूत के रस को समेटकर बाहर आ रहा था।
फिर क्लाइमेक्स आया। कायला को चार हाथ-पाँव पर झुका दिया गया। गांड उठा हुआ, चूत खुल चुकी थी, और मिश्रा जी पीछे से तैयार थे।
उन्होंने गांड फैलाई, लंड रगड़ा, फिर एक जोरदार धक्का--चूत अब रस से टपक रही थी।
और फिर अचानक आखिरी धक्का -- लंड बाहर निकला, और गरम-गाढ़ा वीर्य सीधे कायला की गांड पर उँडेल दिया गया।
वीर्य की गरमी उसकी गांड से होते हुए जांघों पर बह रही थी -- कुछ बूँदें फर्श पर टपकीं।कायला अब भी उसी पोज़ में जमी हुई थी -- जैसे पूरे बदन का कंट्रोल निकल गया हो।
उसकी साँसें टूट-टूट कर बाहर आ रही थीं, और छातियाँ हर धड़कन पर हिल रही थीं।
मिश्रा जी ने धीमे से उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरा -- एक मर्द का मालिकाना स्पर्श।
'देख... ये अब सिर्फ मेरी नहीं रही,' उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, 'ये अब वो मादा है जिस पर मोहर लग चुकी है...'कायला ने कुछ नहीं कहा -- बस आँखें बंद कर लीं, जैसे उसने खुद को पूरी तरह सौंप दिया हो।
फिर थोड़ी देर बाद, उसने थरथराते हाथों से कपड़े उठाए -- और उठते वक्त उसकी जांघों के बीच से वीर्य की एक बूँद नीचे सरकती चली गई..."
कायला धीरे-धीरे उठी, कोई शब्द नहीं बोली। कपड़े पहनने लगी, बाल ठीक किए, बैग उठाया, और दरवाज़े की ओर बढ़ी।
कायला ने दरवाज़ा खोला, लेकिन उससे पहले एक बार पलटकर मिश्रा जी की ओर देखा -- उनकी नज़रें अब भी उसकी खुली जाँघों की तरफ थीं।
उसने कुछ नहीं कहा, बस आँखें झुका लीं।
फर्श पर गिरा वीर्य अब भी लिपका हुआ था -- और उसके अंदर की गरमी अब भी थमी नहीं थी।
मिश्रा जी चड्डी पहनकर सोफे पर बैठे रहे आँखें बंद कीं... और थकी सी आवाज़ में बस इतना कहा -- "ऐसे ही आती-जाती रहना..."
दरवाज़ा बंद हुआ, लेकिन उस कमरे की हवा अब भी उसी गंध से भारी थी...
एक और मादा की सब्मिशन की खुशबू।


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