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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
अनीता की सहनशक्ति की सीमा
 
शाम का सन्नाटा बंगले के कमरों में पसरा था। राज सोफे पर बैठकर अपने जूनियर के साथ फाइलों में उलझा था। अनीता काली और सफेद साड़ी में बेहद स्टाइलिश लग रही थी।

 
राज ने फाइल से नज़रें हटाए बिना कहा, "अनीता, ज़रा इनके लिए भी चाय और बिस्कुट तैयार कर दो। तब तक मैं ये कागजात देख लेता हूँ।"

 
अनीता "ठीक है" कहकर रसोई की ओर बढ़ गई। जैसे ही उसने रसोई का पर्दा हटाया, उसके होश उड़ गए। करीम वहाँ पहले से घात लगाए खड़ा था और अपनी कलाई की घड़ी देख रहा था।

 
करीम : "बेटी, देर कर दी आपने। बाहर बहुत काम है न? पर यहाँ मेरा 15 मिनट का उधार अभी बाकी है।"

 
अनीता (घबराकर फुसफुसाते हुए): "करीम, अभी नहीं! बाहर मेहमान बैठे हैं, राज यहीं है। तुम अभी जाओ यहाँ से, वरना अनर्थ हो जाएगा।"

 
करीम: "मेहमान बैठे हैं तो क्या हुआ मालकिन? आप अपना काम कीजिये, मैं अपना हिसाब पूरा करूँगा। अगर आपने एक भी आवाज़ निकाली, तो नुकसान आपका ही होगा। राज साहब को क्या जवाब देंगी?"

 
अनीता थर-थर कांपने लगी। उसने कांपते हाथों से पतीला गैस पर रखा। जैसे ही वह झुकी, करीम ने उसे पीछे से अपनी विशाल बाँहों में दबोच लिया।

 
अनीता (दांतों तले होंठ दबाकर, दबी सिसकी में): "उफ्… करीम! हट जाओ… कोई आ जाएगा… आह!"

 
करीम ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उसने अपने होंठों का इस्तेमाल करते हुए अनीता की साड़ी के पल्लू को धीरे से उसके कंधे से साइड में सरका दिया, जिससे अनीता की पूरी पीठ और कमर का हिस्सा बे पर्दा हो गया। करीम ने अपना चेहरा झुकाया और अनीता की नंगी कमर पर अपने गर्म और गीले होंठ टिका दिए।

 
करीम ने किसी भूखे कुत्ते की तरह अनीता की गर्दन को चाटना शुरू कर दिया, उसकी गीली ज़ुबान अनीता की मखमली त्वचा पर रेंग रही थी। साथ ही, उसके विशाल हाथों ने आगे बढ़कर अनीता की दोनों चुचियों को अपनी मजबूत गिरफ्त में दबोच लिया।

 
करीम (हौले से): "मालकिन, ध्यान चाय बनाने पे लगाइये... कहीं दूध उबल न जाए। पर ई जो आपने आज सुबह किया ना... ई सारा बदन जींस और मोटे स्वेटर में ढक के... ई आपने अच्छा नहीं किया। हमारा मन बहुत दुखी है।"

 
अनीता (हाँफते हुए): "करीम… आह! वह… वह बस सुरक्षा के लिए था… उह्ह!"

 
करीम अब फुर्ती से घूमकर किचन स्लैब और अनीता के बीच आ गया। अनीता स्लैब से सटी खड़ी थी और करीम का विशाल शरीर उसके ठीक सामने था। करीम की भूखी नज़रें अनीता के उस गोरे और मखमली नंगे पेट पर जम गईं जो साड़ी के सरकने से पूरी तरह बेपर्दा हो चुका था।

 
करीम ने अपनी जीभ बाहर निकाली और अनीता के उस गोरे और मखमली पेट पर, नाभि के चारों ओर किसी प्यासे कुत्ते की तरह चाटना शुरू किया। उसकी गीली ज़ुबान का अहसास अनीता के बदन में बिजली की लहरें दौड़ा रहा था।

 
करीम (हौले से बुदबुदाते हुए): "सुरक्षा? हमसे? मालकिन, ई काला करीम तो आपका पुजारी है। पर पुजारी को जब मंदिर के द्वार बंद मिलते हैं, तो वो और भी भूखा हो जाता है।"

 
करीम ने अपनी नाक अनीता की गहरी नाभि में रगड़ी और वहाँ का सारा पसीना अपनी ज़ुबान से चाटने लगा। अनीता के हाथ गैस के नॉब पर कांप रहे थे, पतीले में चाय उबल रही थी पर उसका अपना बदन उस काली जीभ के स्पर्श से कहीं ज्यादा उबल रहा था।

 
करीम (हवस भरी आवाज़ में): "मजा लीजिये मालकिन... देखिये तो ई पेट कितना फड़क रहा है। क्या राज साहब ने कभी इस धुन्नी में अपना मुँह गड़ाया है? नहीं ना? उ तो बस ऊपर-ऊपर का मज़ा जानते हैं, पर ई असली स्वाद तो इस गहराई में छुपा है।"

 
करीम की जीभ अब नाभि के भीतर गहराई तक जाने की कोशिश कर रही थी। अनीता ने मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लीं और उसके हाथ स्लैब के किनारों को मजबूती से भींचने लगे। बाहर राज और उसके मेहमानों की बातों की आवाज़ें आ रही थीं, पर यहाँ रसोई के भीतर अनीता अपने ही नौकर की जीभ के नीचे पिघल रही थी।

 
करीम (चाटना जारी रखते हुए): "आज सुबह जो आपने ई बदन को जींस-स्वेटर में कैद किया था ना, उसका जुर्माना है मालकिन। जितना छुपाएंगी, उतना ही बेदर्दी से चखेंगे हम।"

 
करीम (नाभि पर होंठ रगड़ते हुए): "उफ़... ये महक! बेटी, राज साहब पूछ रहे थे चाय कितनी देर में तैयार होगी? बोल दूँ कि मालकिन अभी हिसाब चुकता कर रही हैं?"

 
अनीता (सिसकते हुए): "आह्ह... नहीं... करीम... छोड़ो... उह्ह... चाय उबल रही है... राज... राज आ जाएंगे... प्लीज़!"

 
करीम ने अपने दोनों बड़े हाथों का इस्तेमाल करते हुए अनीता की साड़ी को और नीचे धकेल दिया; अब उसके पेट का विशाल हिस्सा  पूरी तरह से नंगे होकर करीम की आँखों के सामने थे। साटन की साड़ी अब उसकी कूल्हे के पास किसी ढेर की तरह लटकी हुई थी, जिससे उसकी गहरी नाभि ऊपरी हिस्से की गोराई साफ़ चमक रही थी।

 
करीम की आँखें उस नंगेपन को देखकर जंगली हो गईं। उसके होंठ एक बार फिर हरकत में आए और उसने अनीता की मखमली त्वचा पर अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए कहा:
 
 
करीम (पसीने से लथपथ और भारी आवाज़ में): "अनीता बेटी... आज तो हम ई सब चाट जाएंगे। एक-एक कोना, एक-एक इंच... आज कुछ भी सूखा नहीं बचेगा। आपने आज सुबह अच्छा नहीं किया, मालकिन… इस पूरे बदन के कपड़ों के पीछे छुपाकर आपने हमारी भूख और बढ़ा दी है। अब देखिए, ये कुत्ता कैसे अपनी मालकिन के गोरे बदन का रस पीता है।"

 
यह कहते ही करीम ने अपना मुँह अनीता के पेट के निचले हिस्से पर गड़ा दिया। वह किसी जानवर की तरह उसके चिकने मांस को अपने होंठों और दांतों से कुरेदने लगा। अनीता का पूरा शरीर झटके लेने लगा; वह किचन स्लैब को पीछे से कसकर पकड़े हुए थी, उसकी उंगलियाँ पत्थर पर निशान बना रही थीं।

 
करीम: "ई जो आपके कूल्हों की लचक है ना... ई हमें पागल कर रही है। राज साहब तो बस ऊपर-ऊपर हाथ फेरते होंगे, पर आज ई काला करीम आपकी नाभि तक सारा पसीना पी जाएगा।"

 
अनीता (सिसकते हुए और आवाज़ दबाते हुए): "आह्ह... करीम... बस करो... उह्ह! राज... बाहर राज इंतज़ार कर रहे हैं... करीम, कोई देख लेगा... सिसss!"

 
करीम ने अपनी जीभ अनीता के पेट के निचले हिस्से से ऊपर की ओर रगड़ते हुए उसकी छाती के पास तक ले आया और फिर उसके कान के पास फुसफुसाया।

 
करीम: "चाय उबल के बाहर गिर रही है मालकिन... बिल्कुल वैसे ही जैसे आपकी ई जवानी आज बाहर छलक रही है। अगर आप चाहती हैं कि राज साहब यहाँ न आएँ और ई तमाशा न देखें, तो हमरी एक बात माननी होगी।"

 
अनीता (काँपते हुए और हाँफते हुए): "उह्ह... क्या... क्या चाहते हो तुम? करीम, जल्दी बोलो... राज कभी भी अंदर आ सकते हैं... आह!"

 
करीम ने अपने होंठ अनीता के गले पर रगड़ते हुए अपनी आवाज़ को और भी गंदा और भारी बना लिया।
करीम: "कल... कल जब साहब काम पे जाएँगे, तो हम नहीं चाहते कि आप ई साड़ी या जींस पहनें। कल ई पुजारी अपनी मालकिन को एक 'कॉलेज जाने वाली छोटी बच्ची' के रूप में देखना चाहता है। वही छोटी फ्रॉक, वो सफेद मोज़े और दो चोटियाँ। कल आपको हमरी 'बेटी' बनके हमारे सामने आना होगा।"

 
अनीता की आँखों में आँसू आ गए। बाहर से राज की आवाज़ आई, "अनीता, कितनी देर है?"

 
अनीता : "ठीक है करीम... उह्ह... कल वही पहनूँगी... आह! बस अब छोड़ दो मुझे... राज आ रहे हैं..."

 
करीम (एक आखिरी बार उसके चुचियों को मसलते हुए): "ज़ुबान की पक्की रहिये मालकिन... कल मैं अपनी कॉलेज जाने वाली बेटी का इंतज़ार करूँगा।"

 
करीम दबे पाँव बाहर निकल गया।

 
उसी शाम, अपनी जीत से उत्साहित करीम सीधे बाज़ार पहुँचा। उसके दिमाग में एक बहुत ही गंदी और सोची-समझी योजना चल रही थी। वह एक ऐसी दुकान पर गया जहाँ कॉलेज की यूनिफॉर्म मिलती थी। उसे अनीता के 5'7" के छरहरे और सुडौल बदन का पूरा अंदाज़ा था, लेकिन उसने जानबूझकर अनीता के असली साइज़ से एक नंबर छोटा  ड्रेस चुना।

 
उसने जो सफेद शर्ट चुनी, वह इतनी महीन थी कि वह लगभग पारदर्शी थी। करीम ने साइज़ का चुनाव इस तरह किया था कि शर्ट इतनी टाइट हो कि अनीता उसके नीचे ब्रा न पहन सके, वरना बटन बंद होना नामुमकिन होता। उसे पता था कि जब वह उस शर्ट को पहनेगी, तो कपड़े का तनाव उसके भारी स्तनों के उभारों को और भी बेबाक बना देगा और उसके निप्पलों की सख्ती साफ़ झलकेगी।

 
साथ ही, उसने जो नीली स्कर्ट चुनी, वह इतनी छोटी थी कि वह बमुश्किल उसके कूल्हों को ढक पा रही थी—एक हल्का सा झुकाव भी उसके पूरे पिछले हिस्से को नंगा कर देता।

 
रात के अंधेरे में, जब राज सो गया, करीम दबे पाँव गलियारे में आया। अनीता पानी पीने बाहर निकली तो करीम ने एक थैला उसकी ओर बढ़ा दिया।

 
उसने अपनी आवाज़ को धीमा और खुरदरा रखते हुए फुसफुसाकर कहा:
 
"बेटी, कल की तैयारी कर ली है मैंने। यह रही आपकी वर्दी।" करीम की आँखों में एक भूखी वासना थी। "इसे पहन कर कल दोपहर में मेरा इंतज़ार कीजियेगा। याद रखियेगा मालकिन, ई कपड़ा इतना तंग है कि भीतर कुछ और पहनने की जगह नहीं बचेगी। मैं अपनी मालकिन के उन मखमली चूचों को इस पतली कमीज़ के पीछे फड़फड़ाते हुए देखना चाहता हूँ। कल जब ई बेटी हमारी गोद में बैठेगी, तब असली पढ़ाई शुरू होगी।"
 
 
अनीता ने जैसे ही उस थैले के भीतर से वे छोटे और झीने कपड़े देखे, उसका माथा ठनक गया। उसने कांपती हुई आवाज़ में करीम की ओर देखा।

 
अनीता: (फुसफुसाते हुए) "करीम, यह... यह बहुत ज़्यादा हो रहा है। तुम अपनी सीमा पूरी तरह भूल चुके हो। मैं यह तंग और पारदर्शी फ्रॉक कभी नहीं पहनूँगी। यह पागलपन है!"

 
करीम ने एक पल की भी देरी नहीं की। वह एक कदम और करीब आया और अनीता की आँखों में अपनी नज़रें गड़ा दीं। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो यह बता रही थी कि अब बाज़ी उसके हाथ में है।

 
करीम (खुरदरी और ठंडी आवाज़ में): "ज़्यादा हो रहा है? बेटी, ई सब शुरू हमने नहीं किया था। ई खेल तो आपने उस रात शुरू किया था जब आपने अपना दरवाज़ा खुला छोड़ के राज साहब की बाँहों में मेरा नाम पुकारा था। 'करीम-करीम' चिल्ला के आपने ही तो उस रात ई रोल-प्ले का बीज बोया था।"

 
उसने अनीता के कांपते हुए हाथ पर अपना भारी हाथ रखा और उसे दबाया।

 
करीम: "तब तो आपको बड़ा मज़ा आ रहा था, पर अब जब मेरी बारी आई है, तो आपको ई 'ज़्यादा' लग रहा है? अब खेल हमारी मर्ज़ी से चलेगा, मालकिन। कल जब आप ई छोटी वर्दी पहन के हमरी गोद में बैठेंगी, तब आपको पता चलेगा कि असली 'करीम' का खेल कैसा होता है।"

 
अनीता निरुत्तर रह गई। करीम की बातों में जो कड़वी हकीकत थी, वह उसे आईने की तरह चुभ रही थी। वह समझ गई कि जिस आग को उसने अपनी फंतासी के लिए सुलझाया था, अब वही आग उसे भस्म करने के लिए तैयार खड़ी है। उसने भारी मन से वह थैला अपने सीने से लगा लिया और दबे पाँव अपने कमरे की ओर लौट गई।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 11-02-2026, 02:43 PM



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