10-02-2026, 03:02 AM
मीरा की यादों का कारवां उस सबसे दुखद और काली रात पर आकर ठहर गया, जब आरव की एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। वह याद करके मीरा का दिल आज भी कांप उठता था।
"आरव के अचानक चले जाने से मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी, सरताज। मैं उस सदमे में ऐसी डूबी थी कि मुझे अपने आस-पास का कुछ होश नहीं था। पर जैसे ही तुम्हें खबर मिली, तुम चंद घंटों के भीतर नागपुर से यहाँ मेरे पास पहुँच गए थे।"
मीरा ने ठंडी सांस ली और उन दिनों को याद किया जब सरताज एक मज़बूत ढाल बनकर उसके परिवार के आगे खड़ा हो गया था। "मेरे ससुर जी अपने जवान बेटे को खोकर पूरी तरह टूट चुके थे। तुमने सारी कागजी कार्रवाई से लेकर अंतिम संस्कार तक की हर ज़िम्मेदारी ऐसे निभाई जैसे तुम इस घर के सगे बेटे हो।"
उसने याद किया कि कैसे सात दिनों तक सरताज ने साये की तरह सबका ख्याल रखा और जब सब कुछ थोड़ा सामान्य हुआ, तब वह चुपचाप अपनी ड्यूटी पर वापस लौट गया।
मीरा की आँखों में अपने ससुर जी के लिए सम्मान उभरा जब उसने उनके शब्द याद किए। "तुम्हारे जाने के बाद पापा जी ने मुझसे कहा था—'मीरा, सरताज बिल्कुल एक सगे बेटे की तरह है। उसने बिना कहे वो सारी ज़िम्मेदारियाँ उठा लीं जो शायद आरव के होने पर उसे उठानी पड़तीं। वह सच में समझता था कि हम और तुम किस दौर से गुजर रहे हैं।' तुम्हारी उस निस्वार्थ सेवा ने मेरे ससुराल वालों के दिल में तुम्हारी वो जगह बना दी थी जिसे कोई और कभी नहीं ले सकता था।"
मीरा ने तस्वीर को बार चूमकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह उन छह महीनों को कभी नहीं भूल सकती थी, जब वह एक ज़िंदा लाश बनकर रह गई थी।
"मैं छह महीने तक जैसे किसी गहरे अंधे कुएं में गिरी हुई थी, सरताज। मुझे न दुनिया का होश था, न अपनी सुध। जब तुमने पापा जी से मेरी हालत के बारे में सुना, तो तुमने ही रिया को मेरे पास भेजा और हम दोनों को नागपुर बुलाया ताकि मैं उस घर की दीवारों से बाहर निकल सकूँ।"
उसने याद किया कि कैसे सरताज ने एक-एक तिनका जोड़कर उसका घोंसला फिर से आबाद किया था। "वहाँ तुमने मेरा ऐसा ख्याल रखा जैसे कोई कांच की गुड़िया को संभालता है। और फिर एक शाम... तुमने अपनी सालों की खामोशी तोड़ी। तुमने मुझसे कहा कि तुम मुझे ताउम्र अपनी पलकों पर बिठाकर रखना चाहते हो। तुमने न सिर्फ मुझे मनाया, बल्कि मेरे ससुराल वालों के पास जाकर उन्हें भी अपनी नेकनीयती का यकीन दिलाया कि तुम मुझे एक मुकम्मल परिवार दोगे।"
"शेर... तुम पूछ रहे थे न कि मेरी आँखों में प्यार से भी बढ़कर क्या है? वो मेरा सब कुछ है। मेरी ज़िंदगी, मेरी इज़्ज़त, मेरा वजूद... सब सरताज की बदौलत है। वह सिर्फ़ मेरा पति नहीं, मेरा भगवान है।"
उधर अपने क्वार्टर में बैठा शेर अपनी उस जादुई शीशी को चमका रहा था। उसे मीरा की इस गहरी वफादारी का अंदाज़ा तो था, पर उसे यकीन था कि उसकी जड़ी-बूटियों में वो दम है जो इस 'महानता' और 'सम्मान' के परदे को हटा देगा।
शेर ने शीशी को चूमते हुए कहा, "बड़े शरीफ बने फिरते हो दरोगा जी! पर ये शेर इतना शरीफ नहीं है। जो मलाई आपने अहसान के नाम पर छोड़ दी, उसे ये शेर अब अपनी दवा के दम पर चख कर रहेगा। मेमसाह को पता भी नहीं चलेगा कि कब उनका 'रक्षक' बदला और कब ये 'भक्षक' उनके बिस्तर तक पहुँच गया।"
"आरव के अचानक चले जाने से मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी, सरताज। मैं उस सदमे में ऐसी डूबी थी कि मुझे अपने आस-पास का कुछ होश नहीं था। पर जैसे ही तुम्हें खबर मिली, तुम चंद घंटों के भीतर नागपुर से यहाँ मेरे पास पहुँच गए थे।"
मीरा ने ठंडी सांस ली और उन दिनों को याद किया जब सरताज एक मज़बूत ढाल बनकर उसके परिवार के आगे खड़ा हो गया था। "मेरे ससुर जी अपने जवान बेटे को खोकर पूरी तरह टूट चुके थे। तुमने सारी कागजी कार्रवाई से लेकर अंतिम संस्कार तक की हर ज़िम्मेदारी ऐसे निभाई जैसे तुम इस घर के सगे बेटे हो।"
उसने याद किया कि कैसे सात दिनों तक सरताज ने साये की तरह सबका ख्याल रखा और जब सब कुछ थोड़ा सामान्य हुआ, तब वह चुपचाप अपनी ड्यूटी पर वापस लौट गया।
मीरा की आँखों में अपने ससुर जी के लिए सम्मान उभरा जब उसने उनके शब्द याद किए। "तुम्हारे जाने के बाद पापा जी ने मुझसे कहा था—'मीरा, सरताज बिल्कुल एक सगे बेटे की तरह है। उसने बिना कहे वो सारी ज़िम्मेदारियाँ उठा लीं जो शायद आरव के होने पर उसे उठानी पड़तीं। वह सच में समझता था कि हम और तुम किस दौर से गुजर रहे हैं।' तुम्हारी उस निस्वार्थ सेवा ने मेरे ससुराल वालों के दिल में तुम्हारी वो जगह बना दी थी जिसे कोई और कभी नहीं ले सकता था।"
मीरा ने तस्वीर को बार चूमकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह उन छह महीनों को कभी नहीं भूल सकती थी, जब वह एक ज़िंदा लाश बनकर रह गई थी।
"मैं छह महीने तक जैसे किसी गहरे अंधे कुएं में गिरी हुई थी, सरताज। मुझे न दुनिया का होश था, न अपनी सुध। जब तुमने पापा जी से मेरी हालत के बारे में सुना, तो तुमने ही रिया को मेरे पास भेजा और हम दोनों को नागपुर बुलाया ताकि मैं उस घर की दीवारों से बाहर निकल सकूँ।"
उसने याद किया कि कैसे सरताज ने एक-एक तिनका जोड़कर उसका घोंसला फिर से आबाद किया था। "वहाँ तुमने मेरा ऐसा ख्याल रखा जैसे कोई कांच की गुड़िया को संभालता है। और फिर एक शाम... तुमने अपनी सालों की खामोशी तोड़ी। तुमने मुझसे कहा कि तुम मुझे ताउम्र अपनी पलकों पर बिठाकर रखना चाहते हो। तुमने न सिर्फ मुझे मनाया, बल्कि मेरे ससुराल वालों के पास जाकर उन्हें भी अपनी नेकनीयती का यकीन दिलाया कि तुम मुझे एक मुकम्मल परिवार दोगे।"
"शेर... तुम पूछ रहे थे न कि मेरी आँखों में प्यार से भी बढ़कर क्या है? वो मेरा सब कुछ है। मेरी ज़िंदगी, मेरी इज़्ज़त, मेरा वजूद... सब सरताज की बदौलत है। वह सिर्फ़ मेरा पति नहीं, मेरा भगवान है।"
उधर अपने क्वार्टर में बैठा शेर अपनी उस जादुई शीशी को चमका रहा था। उसे मीरा की इस गहरी वफादारी का अंदाज़ा तो था, पर उसे यकीन था कि उसकी जड़ी-बूटियों में वो दम है जो इस 'महानता' और 'सम्मान' के परदे को हटा देगा।
शेर ने शीशी को चूमते हुए कहा, "बड़े शरीफ बने फिरते हो दरोगा जी! पर ये शेर इतना शरीफ नहीं है। जो मलाई आपने अहसान के नाम पर छोड़ दी, उसे ये शेर अब अपनी दवा के दम पर चख कर रहेगा। मेमसाह को पता भी नहीं चलेगा कि कब उनका 'रक्षक' बदला और कब ये 'भक्षक' उनके बिस्तर तक पहुँच गया।"
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना
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