09-02-2026, 10:04 PM
अगले एक हफ्ते तक वही चार लड़के हमारे घर के सामने से एक खास समय पर गुज़रते रहें. क्यों गुज़रते रहें…? इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था मेरे लिए. एक ऐसी विवाहिता महिला जो हर उस जगह से मीट और चर्बी से भरपूर हो जहाँ से होने की कामना की जाती है, कौन नहीं देख - देखकर अपनी आँखें नहीं सेकना चाहेगा... भले ही वो कपड़ों से पूरी तरह पैक्ड हो.
मनुष्य की, उसमें भी खासकर मर्दजात की कल्पना -शक्ति बहुत तेज़ व विकसित होती है… कई सारी बातों को, जो अभी हुई ही नहीं है या होने की कोई संभावना है.. या नहीं है... उसमें भी न जाने क्या से क्या और कहाँ से कहाँ तक सोच लेते हैं. और बात जब कुछ गलत सोचने की हो, तब तो कोई सीमा रह ही नहीं जाती. यही हाल आजकल के बेरोज़गार, लफ़ूआ, मनचले लौंडों का है. जिस सोच से लाइफ बने वह तो सोचना नहीं है लेकिन उसके अलावा दुनिया की हर चीज़, हर बात,... जिनमें से अधिकतर गलत, अमर्यादित होती हैं; वो सब सोच लेना है. फिर लड़कियों, महिलाओं को लेकर गलत कैसे और क्यों ही न सोचा जाए…? वैसे सभ्य, शिक्षित कहलाने वाले भी कुछ कम नहीं होते.
यहाँ इस मामले में भी उन लड़कों ने चाची की मादक शरीर के दर्शन के बाद गलत ही सोचा होगा… साला खुद मैं चाची के नाम पर उस दिन के बाद एक - एक दिन कई - कई बार हिलाया हूँ... इन लड़कों की बात ही क्या करना?
लेकिन उन बेचारों को मायूसी ही हाथ लगी. ऐसा इसलिए क्योंकि मेरी बुद्धिमति चाची ने पौधों को पानी देने का अपना समय ही बदल लिया था.
यहाँ एक और बात नोटिस की मैंने. उस एक दिन के बाद से चाची का कपड़ा पहनने का स्टाइल थोड़ा अलग हो गया --- उनके कपड़े पहले कहीं अधिक अच्छे ढंग से उनके जिस्म से चिपकने और ढकने लगे हैं. ब्लाउज तो अभी भी वही डीप बैक कट वाले हैं लेकिन अब मेरे आसपास होने पर चाची अपने जिस्म को साड़ी से अच्छे से ढक लेती है. जहाँ तक संभव हो, वह अपना पेट भी ढककर रखने लगी. कोशिश करती मेरे सामने उनको कोई चीज़ या किसी बात पे झुकना न पड़े... सामने से जिससे उनकी चूचियाँ और क्लीवेज न दिखें और पीछे से भी ताकि उनकी गाँड प्रदर्शित न हो जाए.
और तो और, अब तो शायद मेरे इस घर में होने से फिर से अनकम्फर्टेबल फील करने लगी. जो भी थोड़ा - बहुत मेरे प्रति उनके हृदय में कोमल भावना जागने लगी थी; वो शायद अब धीरे - धीरे गायब होना शुरू हो गई.
ये सब हुआ उन गाँडूओं के कारण.
कुछ महीनों बाद ही मेरा ग्रेजुएशन का फाइनल एग्जाम है... साथ ही इधर कुछ समय पहले अलग - अलग इंस्टिट्यूट में स्किल डेवलपमेंट और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी भी शुरू कर दिया था मैंने. चाचा ने पहले ही घोषणा कर दिया था कि मैं नौकरी के लिए प्रयास उन्हीं के यहाँ रहते हुए करूँगा. मम्मी-पापा ने पहले तो नाजुक-सी आपत्ति की थी, पर बाद में मान भी गए. इसका मतलब ये हुआ की अब सिर्फ पढ़ाई पूरी करने तक नहीं, बल्कि नौकरी नहीं लगने तक मुझे चाचा - चाची के साथ रहना है.
पर उस दिन के बाद से चाची जी का बदला हुआ व्यवहार कहीं मेरे सपने पर पानी न फेर दे!
जारी है....
मनुष्य की, उसमें भी खासकर मर्दजात की कल्पना -शक्ति बहुत तेज़ व विकसित होती है… कई सारी बातों को, जो अभी हुई ही नहीं है या होने की कोई संभावना है.. या नहीं है... उसमें भी न जाने क्या से क्या और कहाँ से कहाँ तक सोच लेते हैं. और बात जब कुछ गलत सोचने की हो, तब तो कोई सीमा रह ही नहीं जाती. यही हाल आजकल के बेरोज़गार, लफ़ूआ, मनचले लौंडों का है. जिस सोच से लाइफ बने वह तो सोचना नहीं है लेकिन उसके अलावा दुनिया की हर चीज़, हर बात,... जिनमें से अधिकतर गलत, अमर्यादित होती हैं; वो सब सोच लेना है. फिर लड़कियों, महिलाओं को लेकर गलत कैसे और क्यों ही न सोचा जाए…? वैसे सभ्य, शिक्षित कहलाने वाले भी कुछ कम नहीं होते.
यहाँ इस मामले में भी उन लड़कों ने चाची की मादक शरीर के दर्शन के बाद गलत ही सोचा होगा… साला खुद मैं चाची के नाम पर उस दिन के बाद एक - एक दिन कई - कई बार हिलाया हूँ... इन लड़कों की बात ही क्या करना?
लेकिन उन बेचारों को मायूसी ही हाथ लगी. ऐसा इसलिए क्योंकि मेरी बुद्धिमति चाची ने पौधों को पानी देने का अपना समय ही बदल लिया था.
यहाँ एक और बात नोटिस की मैंने. उस एक दिन के बाद से चाची का कपड़ा पहनने का स्टाइल थोड़ा अलग हो गया --- उनके कपड़े पहले कहीं अधिक अच्छे ढंग से उनके जिस्म से चिपकने और ढकने लगे हैं. ब्लाउज तो अभी भी वही डीप बैक कट वाले हैं लेकिन अब मेरे आसपास होने पर चाची अपने जिस्म को साड़ी से अच्छे से ढक लेती है. जहाँ तक संभव हो, वह अपना पेट भी ढककर रखने लगी. कोशिश करती मेरे सामने उनको कोई चीज़ या किसी बात पे झुकना न पड़े... सामने से जिससे उनकी चूचियाँ और क्लीवेज न दिखें और पीछे से भी ताकि उनकी गाँड प्रदर्शित न हो जाए.
और तो और, अब तो शायद मेरे इस घर में होने से फिर से अनकम्फर्टेबल फील करने लगी. जो भी थोड़ा - बहुत मेरे प्रति उनके हृदय में कोमल भावना जागने लगी थी; वो शायद अब धीरे - धीरे गायब होना शुरू हो गई.
ये सब हुआ उन गाँडूओं के कारण.
कुछ महीनों बाद ही मेरा ग्रेजुएशन का फाइनल एग्जाम है... साथ ही इधर कुछ समय पहले अलग - अलग इंस्टिट्यूट में स्किल डेवलपमेंट और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी भी शुरू कर दिया था मैंने. चाचा ने पहले ही घोषणा कर दिया था कि मैं नौकरी के लिए प्रयास उन्हीं के यहाँ रहते हुए करूँगा. मम्मी-पापा ने पहले तो नाजुक-सी आपत्ति की थी, पर बाद में मान भी गए. इसका मतलब ये हुआ की अब सिर्फ पढ़ाई पूरी करने तक नहीं, बल्कि नौकरी नहीं लगने तक मुझे चाचा - चाची के साथ रहना है.
पर उस दिन के बाद से चाची जी का बदला हुआ व्यवहार कहीं मेरे सपने पर पानी न फेर दे!
जारी है....


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