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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
समझौते का दूसरा दिन, शाम का वक्त
 
शाम का समय था। डिनर टेबल पर सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे केवल बर्तनों के टकराने की आवाज़ तोड़ रही थी। राज ऑफिस की थकान उतारने के लिए चुपचाप खाना खा रहा था। तभी राज का हाथ निवाले के साथ बीच में ही रुक गया। उसकी नज़र अनीता की गोरी गर्दन पर जमी थी, जहाँ करीम की हवस का वह गहरा लाल निशान चमक रहा था।

 
राज: "अनीता, तुम्हारी गर्दन पर ये कैसा निशान है? कल तो यहाँ कुछ नहीं था।"

 
अनीता के शरीर में जैसे बर्फ का पानी दौड़ गया। उसने झटपट अपनी साड़ी का पल्लू ऊपर खींचते हुए उसे छिपाया और चेहरे पर एक फीकी मुस्कान लाई।

 
अनीता: "ओह, यह? पता नहीं राज... दोपहर में जब मैं सोई थी, तो शायद किसी बड़े मच्छर ने काट लिया होगा। बहुत खुजली हो रही थी, शायद इसीलिए निशान गहरा हो गया है।"

 
राज ने उसकी बातों पर सहज ही विश्वास कर लिया और वापस अपनी बातों में लग गया। अनीता के लिए उस वक्त राज से नज़रें मिलाना भारी पड़ रहा था, क्योंकि उसकी नाइटी के पिछले हिस्से पर अभी भी करीम की लार की वह घिनौनी नमी महसूस हो रही थी।

 
करीम उस वक्त दूर खड़ा राज को पानी परोस रहा था। वह इतना सयाना था कि राज के सामने वह दुनिया का सबसे आज्ञाकारी नौकर होने का ढोंग कर रहा था।

 
रात के सन्नाटे में, बिस्तर पर लेटी अनीता का बदन उस दोपहर की छुअन की आग में जल रहा था। राज उसके बगल में लेटा था, पर वह उससे बहुत दूर महसूस हो रही थी।

 
अनीता (राज के करीब जाते हुए): "राज... क्या तुम जाग रहे हो?"

 
राज : "अनीता, आज बहुत थक गया हूँ यार... ऑफिस में मीटिंग्स ने जान निकाल दी है। हम वीकेंड पर करेंगे, पक्का प्रॉमिस। अभी सोने दो।"

 
इतना कहकर राज ने करवट ली और गहरी नींद में सो गया।

 
अनीता छत को निहारती रही। उसका शरीर उत्तेजना और झुंझलाहट के बीच पिस रहा था। तभी उसे प्यास लगी। उसने पास रखा जग उठाया, तो वह खाली था। उसने सोचा कि करीम तो अपनी कोठरी में सो चुका होगा, इसलिए उसने चद्दर ओढ़ने की जहमत नहीं उठाई।

 
वह सिर्फ एक सफेद सैटिन की स्लिप  पहने हुए कमरे से बाहर निकली। वह छोटी सी स्लिप बमुश्किल उसके कूल्हों को ढक पा रही थी। सैटिन के उस महीन कपड़े के नीचे उसके सुडौल स्तनों की गोलाई साफ उभर रही थी।

 
जैसे ही वह रसोई में फ्रिज से पानी निकालने के लिए झुकी, उसकी स्लिप और भी ऊपर चढ़ गई, जिससे उसकी गोरी जांघें और कूल्हों का निचला हिस्सा पूरी तरह नंगा हो गया। तभी पीछे से एक भारी आवाज़ आई।

 
करीम: "मालकिन... आधी रात को इस हाल में? लगता है मालिक ने प्यासा ही छोड़ दिया?"

 
अनीता झटके से पलटी। सामने 6'2" का वह काला साया खड़ा था। उसकी नज़रें अनीता के जिस्म के हर उभार को ऐसे चाट रही थीं जैसे उसे कच्चा चबा जाना चाहती हों।

 
अनीता : "नहीं करीम... रुको! आज का कोटा पूरा हो चुका है। तुम... तुम मुझे अब नहीं छू सकते। जाओ यहाँ से, फौरन अपनी कोठरी में जाओ!"

 
करीम के चेहरे पर एक कुटिल और तेज़ मुस्कान उभरी। वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।

 
करीम: "नहीं मालकिन, आज का कोटा अभी बाकी है। दोपहर में मैंने सिर्फ 25 मिनट लिए थे, तो हिसाब से आज के 5 मिनट अभी बचे हुए हैं। सच कहूं तो आज मैं खुद ही पांच मिनट पहले रुक गया, नहीं तो मैं कुछ ऐसी वैसी हरकत कर बैठता कि आपको पिछले बार की तरह मुझे ज़ोरदार थप्पड़ मारना पड़ता। और मालकिन, मैं नहीं चाहता कि हमारे बीच की बात बिगड़े... मैं अपने करार  और अपनी मर्यादा में ही रहना चाहता हूँ।"

 
अनीता की आँखें फटी की फटी रह गई। वह इस नौकर की धूर्तता पर दंग थी।

 
अनीता: "करीम, यह... यह क्या बकवास है? कैसा हिसाब?"

 
करीम अब उसके इतने करीब आ चुका था कि उसकी साँसें अनीता के चेहरे पर महसूस हो रही थीं। उसने अपनी एक उंगली से अनीता की सैटिन स्लिप के किनारे को सहलाना शुरू किया।

 
करीम: "बकवास नहीं है मालकिन, एकदम पक्का हिसाब है। और पिछले दिन भी मैं 8 मिनट पहले ही  चला गया था, क्योंकि मेरा मन डोलने लगा था और मैं अपनी हद पार  नहीं करना चाहता था। तो वो कल के 8 और आज के 5... कुल मिलाकर अभी पूरे 13 मिनट बाकी हैं। मैं नहीं चाहता कि बाद में आप कहें कि करीम चोर है—चाहे वो वक्त की चोरी हो या आपकी ख़ामोशी की।"

 
अनीता की साँसें तेज़ हो गईं। करीम की नज़रें उसकी स्लिप के उस हिस्से पर जमी थीं जहाँ से उसके चुचियों की गहराई साफ़ दिख रही थी।

 
करीम (फुसफुसाते हुए): "अब बताइए मालकिन, क्या आप मेरा उधार रखना चाहेंगी? मालिक तो खर्राटे ले रहे हैं... और इन 13 मिनटों में मैं आपकी वो प्यास बुझा सकता हूँ जो मालिक नहीं बुझा पाए। बोलिए, क्या ये 13 मिनट मुझे अपनी पूजा करने देंगी?"

 
अनीता का पूरा शरीर कांपने लगा। उसे प्यास पानी की लगी थी, पर उसे डर था कि अब करीम उसे हवस का वो ज़हर पिलाने वाला है जिससे वह कभी उबर नहीं पाएगी।

 
अनीता: "करीम... अगर राज जाग गए तो?"

 
करीम (मुस्कुराते हुए): "वो नहीं जागेंगे मालकिन। और अगर जाग भी गए, तो कह दीजिएगा कि प्यास लगी थी... और करीम बस पानी पिला रहा था।"

 
करीम ने अनीता को उठाकर रसोई के पत्थर  पर बैठा दिया। सैटिन की वह झीनी स्लिप अनीता की जांघों से ऊपर सरक चुकी थी।

 
करीम ने अपने दोनों भारी हाथों से अनीता के चेहरे को दबोच लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी  चमक थी।

 
अनीता (सिर हिलाते हुए, कांपती आवाज़ में): "नहीं करीम... प्लीज़... किस नहीं... मैंने कहा था न, सिर्फ ऊपर से... उह्ह!"

 
करीम ने एक न सुनी। उसके मोटे और दहकते हुए होंठ सीधे अनीता के नाजुक गुलाबी होंठों पर जा टिके। वह किसी प्यासे की तरह अनीता के मुँह के रस को सोखने लगा। अनीता का दम घुटने लगा था; उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से करीम के पत्थर जैसे सख्त सीने पर वार किए, लेकिन करीम अपनी जगह से टस से मस न हुआ।

 
उसने अपनी जीभ जबरदस्ती अनीता के मुँह के भीतर धकेल दी। अनीता का विरोध धीरे-धीरे कमजोरी में बदलने लगा क्योंकि करीम का चुंबन गहरा और बेकाबू होता जा रहा था। वह उसके मुँह के हर कोने को अपनी जीभ से टटोल रहा था, मानो उसे पूरी तरह अपना बना लेना चाहता हो।

 
करीम (एक पल के लिए रुककर, फुसफुसाते हुए): "जब दोपहर में मैं आपके स्तन और गाँड को चूम रहा था, तब तो आपने मना नहीं किया मालकिन... अब क्यों नखरे कर रही हैं? चुपचाप मज़ा लीजिये।"

 
अनीता (हाँफते हुए): "उह्ह... राज... राज जाग जाएंगे... करीम, छोड़ो... कोई देख लेगा..."

 
करीम: "मालिक गहरी नींद में हैं बेटी। और हमारे पास सिर्फ 13 मिनट हैं... अपनी ये सिसकियाँ संभाल कर रखिये।"

 
करीम ने अनीता को संभलने का एक पल भी नहीं दिया। उसने अपने मजबूत हाथ उसकी कमर के घेरे में डाले और उसे अपनी ओर ऐसे खींचा कि अनीता का जिस्म उसके सख्त सीने से पूरी तरह चिपक गया।

 
करीम के होंठ फिर से अनीता के कांपते होंठों पर टूट पड़े। इस बार उसका अंदाज पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक और हावी था। उसकी गर्म जीभ अनीता के मुंह के भीतर किसी बेकाबू लहर की तरह घुस गई, जैसे वह वहां अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता हो। वह अनीता की सांसों को अपनी सांसों में सोख रहा था, उसके मुंह के हर कोने को अपनी जीभ से रौंदते हुए अपनी मर्दानगी का एहसास दिला रहा था।

 
अनीता (संघर्ष करते हुए, दबी हुई आवाज में): "ममम... न... नहीं..."

 
अनीता ने पहले तो अपना मुंह फेरने की कोशिश की, उसकी जीभ करीम के हमले को पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थी। लेकिन करीम की पकड़ और उसकी जीभ की हलचल इतनी तीव्र थी कि अनीता के प्रतिरोध की दीवार धीरे-धीरे ढहने लगी।

 
अनीता का डर अचानक एक अनजानी उत्तेजना में बदल गया। उसके हाथ जो पहले करीम को पीछे धकेल रहे थे, अब उसके बालों में कस गए।

 
करीम (भारी आवाज में): "हंऽऽ... अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे... लड़ो... और लड़ो हमसे..."

 
अनीता की जीभ अब भाग नहीं रही थी, बल्कि उसने करीम की जीभ का जवाब देना शुरू कर दिया था। दोनों की जीभों के बीच एक गीला और कामुक युद्ध छिड़ गया।

 
अनीता (चुंबन के बीच, हाँफते हुए): "करीम... तुम... तुम बहुत गंदे हो... उह्ह!"

 
करीम (ललचाते हुए): "गंदा तो अभी हुआ ही कहाँ हूँ मालकिन... अभी तो बस आपकी जुबान का स्वाद चखा है, असली दावत तो अभी बाकी है।"

 
करीम ने अब अपना ध्यान अनीता के होंठों से हटाकर उसकी सुराहीदार गर्दन की तरफ मोड़ा। वह किसी भूखे भेड़िए की तरह उसकी गर्दन की त्वचा को अपने दांतों और होंठों से कुरेदने लगा।

 
अनीता का सिर पीछे की ओर लटक गया और उसकी आँखें मदहोशी में मुंदने लगीं।

 
करीम ने बड़ी चालाकी से अपने चेहरे और ठोड़ी का इस्तेमाल करते हुए अनीता की सैटिन स्लिप की डोरी को कंधे से नीचे धकेला। स्लिप का चिकना कपड़ा सरक गया और अनीता का एक सुडौल, गोरा और गोल स्तन पूरी तरह बाहर निकल आया।

 
अनीता ने चौंककर खुद को छुड़ाने की कोशिश की।

 
अनीता: "आह्ह... करीम! यह क्या कर रहे हो? हमारे समझौते के हिसाब से तुम मेरे कपड़े नहीं उतार सकते... तुमने वादा किया था!"

 
करीम: (एक कुटिल मुस्कान के साथ) "अरे नहीं मालकिन... मैंने वादा नहीं तोड़ा। मैंने कहाँ उतारा आपका कपड़ा? यह स्लिप तो खुद-ब-खुद फिसल गई है... अब यह सैटिन का कपड़ा इतना चिकना है ,क्या करें?"

 
करीम की आँखें उस नंगे और थरथराते स्तन पर गड़ी थीं। 

 
करीम (गहरी सांस लेते हुए, गर्दन के पास फुसफुसाते हुए): "उफ़्फ़... ये सफेदी... ये तो जैसे मलाई का कटोरा हो बीवी जी। इसे देखकर तो अच्छे-अच्छे साधु अपनी तपस्या तोड़ दें।"

 
अनीता (कांपती हुई, अपने हाथ से खुद को ढकने की कोशिश करते हुए): "करीम... नहीं... तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो... प्लीज रुक जाओ!"

 
करीम: "अब जब यह नंगा हो ही गया है, तो इसे खाली क्यों छोड़ना? आज तो मैं अपनी अनीता बेटी का दूध पीयूंगा... बहुत दिनों से इस प्यास में जल रहा हूँ।"

 
अनीता: "उह्ह... नहीं करीम... यह गलत है... आह्ह-आह्ह!"

 
अनीता : "आह्ह... करीम! ये तुम क्या बोल रहे हो... उह्ह... शर्म करो... आह!"

 
करीम ने बिना देर किए अपना मुँह अनीता के उस नंगे और उभरे हुए स्तन पर टिका दिया और उसे जंगलीपन से चूसने लगा। उसकी दाढ़ी अनीता की मखमली त्वचा पर रगड़ खा रही थी।

 
अनीता (सिसकते हुए): "उह्ह... करीम... धीरे... बहुत ज़ोर से काट रहे हो... आह! ... उह्ह..."

 
करीम (मुँह में उसका मांस भरे हुए, दबी आवाज़ में): "काटूँगा नहीं तो क्या करूँ? इतना मीठा माल सामने रखा हो, तो भूख और बढ़ जाती है। आज तो मैं आपको पूरा चबा जाऊँगा।"

 
उसने अपनी जीभ के गरम सिरे से उस गोलाई के चारों ओर चक्कर लगाना शुरू किया, और फिर धीरे-धीरे उसे अपने पूरे मुँह के अंदर भरकर खींचने लगा।

 
 
करीम का एक हाथ उसके स्तन को बुरी तरह मसल रहा था, जबकि उसका दूसरा हाथ अब उसकी जंघाओं के बीच, उस महीन पैंटी के ऊपर से रगड़ बनाने लगा था।

 
करीम (स्तन चूसते हुए): "मालकिन, आपका ये रस तो अमृत जैसा है... मालिक को क्या पता कि उन्होंने घर में कैसी अप्सरा पाली है। आज तो मैं आपको पूरा निचोड़ कर ही दम लूँगा।"

 
अनीता अब पूरी तरह करीम के वश में थी। उसने मदहोशी में करीम के बालों को अपनी मुट्ठियों में भर लिया। तभी करीम ने अपनी एक मोटी उंगली अनीता की पैंटी के किनारे से अंदर डाल दी। जैसे ही वह उंगली उसकी योनि के द्वार से टकराई, अनीता एक झटके के साथ उछल पड़ी।

 
अनीता: (चिल्लाते हुए फुसफुसायी) "आह्ह्ह... करीम... नहीं! उंगली नहीं... ये वादा नहीं था... उह्ह! तुम... तुम मर्यादा पार कर रहे हो... आह्ह!"

 
करीम ने अपनी उंगली की गहराई को थोड़ा और बढ़ाया।

 
करीम: "अरे मालकिन, वादा तो कपड़े न उतारने का था। मैंने आपकी पैंटी कहाँ उतारी? वो तो अभी भी अपनी जगह पर है। अब करीम क्या करें जब आप ऐसे कपड़े पहनती हैं? मेरी उंगली तो बस फिसल गई ।"

 
करीम ने उंगली को हल्के से अंदर-बाहर करना शुरू किया, जिससे अनीता के पैरों के बीच से रस टपकने लगा।

 
करीम: "देखिए तो सही... कितनी गीली हो गई हो तुम।  भी तो सिर्फ एक उंगली अंदर गई है, और आपकी योनि तो अभी से इतना रस छोड़ रही है... जैसे सावन की झड़ी लग गई हो। लगता है मेरी बेटी सच में बहुत प्यासी थी।"

 
अनीता: "ओह्ह... करीम... उम्मम... बंद करो... आह्ह...  तुम... तुम बहुत गंदे हो..."

 
अनीता की गर्दन पीछे की ओर झुक गई और उसकी सांसें भारी हो गईं। करीम ने उंगली की रफ्तार बढ़ा दी।

 
करीम ने अपनी उस विशाल उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। अनीता की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह रसोई के स्लैब पर बेतहाशा अपने कूल्हे हिलाने लगी।

 
वह एक तरफ से उसके स्तन को चूस रहा था और दूसरी तरफ अपनी उंगली से उसकी गहराई नाप रहा था। अनीता की सिसकियाँ अब चीखों में बदलने ही वाली थीं कि तभी अचानक... करीम ने सब कुछ रोक दिया। उसने अपनी उंगली झटके से बाहर निकाली और दो कदम पीछे हट गया।

 
अनीता (हैरानी और तड़प के साथ): "करीम? क्या हुआ? तुम... तुम रुक क्यों गए? आह... मुझे... मुझे अधूरा मत छोड़ो..."

 
करीम (अपनी लुंगी ठीक करते हुए): "देखा मालकिन? 13 मिनट पूरे हो गए बेटी। मैं अपनी जुबान का पक्का मर्द हूँ। बाकी का कोटा अब कल दोपहर में पूरा करेंगे।"

 
अनीता (बेबसी से): "करीम... रुको! तुम मुझे इस हाल में... तुम मुझे ऐसे नहीं छोड़ सकते... प्लीज़... वापस आओ..."

 
करीम (मुस्कुराते हुए सिर झुकाकर): "क्यों नहीं मालकिन? नियम तो नियम होता है। अब ठंडा पानी पीजिये और जाके मालिक के पास सो जाइये। कल दोपहर फिर मिलेंगे।"
 
 
करीम अंधेरे गलियारे में गायब हो गया। रसोई में सिर्फ फ्रिज की गूँज और अनीता की तेज़ साँसों की आवाज़ बाकी थी। वह स्लैब पर अर्ध-नग्न अवस्था में बैठी रही, उसकी योनि से टपकता रस और उसके गीले स्तन उसे यह अहसास दिला रहे थे कि वह अब अपने ही नौकर की गुलाम बन चुकी है।

 
उस रात अनीता वापस राज के पास जाकर लेटी, पर उसकी आँखों में नींद नहीं थी। वह बस अपनी उंगलियों से उन जगहों को सहला रही थी जहाँ करीम की छुअन अभी भी दहक रही थी। उसे अब राज के जागने का डर नहीं था, उसे बस कल दोपहर के उन 'तीस मिनटों' का इंतज़ार था।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 06-02-2026, 02:30 PM



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