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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
#84
र्बाथरूम में तूफ़ान --2
 
 
बाथरूम के अंदर गिरते हुए पानी की बूंदों के बीच जैसे ही दरवाज़ा खुला, मीरा एक पल के लिए वहीं जम गई। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा, उसके गीले बदन पर पानी की धारें फिसल रही थीं।
 
सरताज को वहां खड़ा देख उसके चेहरे पर बनावटी गुस्सा और शर्म की एक मिली-जुली लकीर उभरी। उसने अपने हाथ अपने वक्षों पर रखने की कोशिश करते हुए कहा, "तुमें शर्म नहीं आती? ऐसे ही किसी के बाथरूम में घुस जाते हो?"
 
सरताज, जो अभी भी अपनी वर्दी में था, अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसकी आँखों में एक  चमक थी। उसने मीरा के चेहरे से लेकर उसके पैरों तक, उसके उस सुडौल और गीले जिस्म का बड़े इत्मीनान से जायजा लिया।
 
मीरा का वह गोरा बदन और उस पर उभरते गुलाबी निप्पल्स सरताज के भीतर के जुनून को भड़का रहे थे। उसने एक धीमी सी सीटी बजाई और अपनी जैकेट उतारते हुए बोला, "मीरा, तेरे को ऐसा देखने के लिए मैं शर्म बाहर ही छोड़ आया हूँ। इतनी खूबसूरती देखने के बाद शर्म कैसी?"
 
सरताज ने अपनी वर्दी के बटन खोलते हुए अपनी बाँहें मीरा के लिए फैला दीं। उसकी आँखों में एक ऐसी मांग थी जिसे मीरा बखूबी समझती थी। मीरा ने एक शरारती मुस्कान के साथ शॉवर के नीचे से कदम बाहर निकाला और सीधे सरताज की बाँहों में समा गई।
 
उसका गोरा और सुडौल बदन अभी भी पानी से तरबतर था। जैसे ही उसका वह भीगा, रेशमी शरीर सरताज की वर्दी से सटा, पानी की बूंदें सरताज के कपड़ों को भिगोने लगीं। शेर ने सुराख से देखा कि मीरा के सुडौल स्तन सरताज के सीने से दब गए थे और उसके हाथ सरताज के कंधों पर कस गए थे।
 
सरताज: (मीरा के गीले गले और कंधों में अपना चेहरा छुपाते हुए, एक गहरी और मदहोश आवाज़ में) "मीरा... तेरी ये खुशबू और ये गीला बदन... सारा दिन का तनाव एक पल में गायब हो गया।"
 
 
सरताज ने मीरा को अपनी ओर घुमाया और उसकी मदहोश आँखों में देखते हुए उसके भीगे बदन की इबादत शुरू की।
 
सरताज: (मीरा के कांपते होंठों को अपने अंगूठे से मसलते हुए) "ये होंठ... जैसे कोई शहद से भरा रसीला फल हों, मीरा।"
 
उसने झुककर मीरा के होंठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें पूरी शिद्दत से चूसने लगा। मीरा के मुँह से एक दबी हुई आह निकली और उसने अपने गीले हाथ सरताज के बालों में फंसा दिए। सरताज के होंठ नीचे सरककर उसकी सुराहीदार गर्दन पर आए, जहाँ उसने अपनी जुबान से पानी की बूंदों को चाटा और फिर एक गहरा लव-बाइट दिया।
 
मीरा: "आह्ह... सरताज... उम्म्म... धीरे..." उसकी सिसकियाँ अब बाथरूम की दीवारों से टकराकर बाहर शेर के कानों तक पहुँच रही थीं।
 
बाहर सुराख पर आँखें गड़ाए शेर का हाथ अपनी पैंट के अंदर पागलों की तरह चलने लगा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। उसने देखा कि सरताज के हाथ अब नीचे उतर रहे थे। सरताज ने अपनी हथेलियों में मीरा की उन सुडौल और आज़ाद चुचियों को भर लिया और उन्हें मसलने लगा।
 
सरताज: (अपनी आवाज़ में बढ़ती उत्तेजना के साथ) "कितने सुडौल और कितने गरम हैं ये... ऐसा लगता है जैसे सारा शहर इनकी प्यास में जल रहा हो और ये सिर्फ मेरे लिए बने हैं।"
 
इतना कहते ही सरताज का चेहरा नीचे की ओर झुका। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और अपने होंठ सीधे मीरा के उन तनते हुए गुलाबी निप्पल्स पर टिका दिए। उसने एक गहरा और गीला चुंबन लिया और फिर उन्हें अपने दाँतों के बीच हल्का सा भींचते हुए चूसने लगा।
 
मीरा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली, "आह्ह... सरताज... ज़रा धीरे..."
 
बाहर सुराख से चिपककर देख रहे शेर की हालत खराब हो रही थी। उसने देखा कि कैसे सरताज के होंठ उस गोरे मांस पर अपनी छाप छोड़ रहे थे। शेर ने अपनी मुट्ठी को दीवार पर पटका और जलते हुए मन में बुदबुदाया:
 
"साला... ये हरामजादा तो सच में उन्हें कच्चा चबा जाएगा। कैसे मज़े ले रहा है कुत्ता! काश वो होंठ मेरे होते... काश मैं उस जगह होता और इस मलाई का स्वाद चखता। साला, देख-देख कर मेरा कलेजा फटा जा रहा है।"
 
सरताज ने एक पल के लिए मीरा को खुद से थोड़ा दूर किया और अपनी भूखी नज़रों से उसके उन भारी और लरजते हुए वक्षों को घूरने लगा। उसने अपनी एक हथेली से उनके उभार को तौला और गर्व भरी आवाज़ में बोला:
 
सरताज: "क्या लाजवाब चीज़ है... देख कर ही रूह काँप जाए। ये गोरे पहाड़... यही तो मेरी आने वाली औलाद को दूध पिलाएंगे। मेरा वारिस इन्हीं को पी-पीकर जवान होगा।"
 
उसने आव देखा न ताव, और दोबारा उन पर टूट पड़ा
 
वह उन्हें बारी-बारी से अपने मुँह में भरता और पूरी ताक़त से चूसने लगता। मीरा का पूरा बदन झटके खा रहा था और वह सरताज के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाकर उसके सिर को अपने सीने पर और भी ज़ोर से भींच रही थी।
 
बाहर सुराख से देख रहे शेर की आँखों में खून उतर आया था। उसने दांत पीसते हुए अपनी देहाती अंदाज़ में बुदबुदाया:
 
"अरे साले! ये तो दूध पिलाने की बात कर रहा है और खुद अभी से बछड़ा बना हुआ है। हरामजादा... कैसे पागलों की तरह मुँह मार रहा है, जैसे सारा रस आज ही निचोड़ लेगा। मेरी तो छाती फटी जा रही है ये देख के। काश मेमसाह ने मुझे एक बार मौका दिया होता, तो मैं भी दिखाता कि असली दूध कैसे पिया जाता है।"
 
सरताज के हाथ अब मीरा के उस चमकते हुए मखमली पेट पर आए। उसकी उंगलियाँ मीरा की गहरी नाभि के चारों ओर घूमते हुए धीरे-धीरे नीचे की ओर रेंगने लगीं। सरताज ने एक उंगली मीरा की नाभि के अंदर डाल दी और उसे घुमाने लगा।
 
सरताज: "ये पेट... जहाँ मेरा खून पल रहा है... कितना पाक और कितना कामुक है।"
 
वह वहीं नहीं रुका। सरताज घुटनों के बल नीचे झुकने लगा। उसके हाथ मीरा की मखमली और गीली जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़े।
 
शेर की आँखें फटने को हो गईं और उसकी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं जब उसने देखा कि सरताज की उंगलियाँ मीरा की चूत के लबालब भरे हुए होंठों के बीच रास्ता बना रही हैं। जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस गर्म और रेशमी गहराई को छुआ, मीरा के मुँह से एक चीख जैसी आह निकली और उसने सरताज के कंधों को अपनी उंगलियों से नोंच लिया।
 
सरताज: "उफ़्फ़... कितनी नमी... कितनी ज़्यादा गर्माहट है यहाँ... मीरा।"
 
वह मीरा की जांघों के बीच अपना चेहरा ले गया और उस भीगी हुई गहराई को अपनी जुबान से सहलाने लगा। मीरा की सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं, "आह्ह्ह... सरताज... मैं मर जाऊँगी... उम्म्म... और... और तेज़..."
 
शेर सुराख से अपनी आँख चिपकाए बैठा था, उसका शरीर उत्तेजना से थरथरा रहा था। उसके दिमाग में बस एक ही ख्याल बार-बार कौंध रहा था, "काश! ये सुराख थोड़ा और बड़ा होता... तो इस जन्नत का नज़ारा और भी साफ दिखता।" उसे मलाल था कि वह उस दीवार की वजह से मीरा के उस भीगे और सुडौल बदन के हर इंच को एक साथ नहीं देख पा रहा था।
 
उसका हाथ अपनी पैंट के भीतर बड़ी बेरहमी से चल रहा था। उसने एक ठंडी आह भरी और बुदबुदाया, "आज तो इसी से काम चलाना पड़ेगा शेर... जो दिख रहा है वही किसी कयामत से कम नहीं है।"
 
अंत में सरताज ने मीरा को दीवार की तरफ घुमाकर झुका दिया। अब शेर के ठीक सामने, दीवार के उस बारीक सुराख के बिल्कुल पार मीरा की वह  सुडौल और रेशमी गाँड अपनी पूरी गोलाई के साथ मौजूद थी। सरताज ने अपने दोनों हाथों के पंजों से उन मांसल चूतड़ों को जकड़ा और उन्हें अलग करते हुए अपना चेहरा उस गर्म गहराई के बीच टिका दिया।
 
सरताज: (गहरी और दबी हुई आवाज़ में) "उफ़्फ़ मीरा... ये मोड़... ये सुडौलता... तू किसी जन्नत की हूर से कम नहीं है। तेरा ये बदन मुझे पागल कर देगा!"
 
मीरा ने एक लंबी और तीखी आह भरी, "आह्ह्ह... सरताज... उम्म्म... क्या कर रहे हो... !"
 
बाहर खड़ा शेर थर-थर कांप रहा था। उसके मालिक के हाथ उस देह को निचोड़ रहे थे जिसे वह सिर्फ छूने के सपने देखता था।
 
सरताज ने अब अपनी वर्दी उतारने में और भी तेज़ी दिखाई। जैसे ही उसने अपनी शर्ट उतारी, मीरा ने अपनी मदहोश आँखें उसकी आँखों में गड़ा दीं। उसकी सिसकियाँ अब एक गहरे और बेकाबू आमंत्रण में बदल चुकी थीं। मीरा ने अपने गीले और कांपते हाथों से सरताज की बेल्ट खोली और सरताज के चौड़े, बालों से भरे मज़बूत सीने पर अपनी उंगलियाँ फेरने लगी।
 
मीरा: (मदहोश आवाज़ में) "आज तुम बहुत देर से आए... मुझे लग रहा था जैसे ये प्यास मुझे जला देगी।"
 
सरताज ने कोई जवाब नहीं दिया, उसने बस मीरा के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा और उसके होंठों पर टूट पड़ा। उनकी जुबानें एक-दूसरे के मुँह के भीतर ऐसे उलझ रही थीं। शेर ने देखा कि मीरा की पीठ दीवार से चिपकी थी और सरताज का भारी वजन उसे कुचल रहा था।
 
तभी सरताज ने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे गिरा दिए। जैसे ही उसका 10 इंच का विशाल लंड आज़ाद होकर बाहर आया, वह किसी मज़बूत लोहे की गरम छड़ की तरह सीधा तना हुआ था।
 
शेर की आँखें उसे देखकर फटने को हो गईं—इतना लंबा, मोटा और भयावह औज़ार उसने आज तक नहीं देखा था। उस पर उभरी हुई नसें उसकी मर्दानगी और ताकत की गवाही दे रही थीं।
 
सरताज: (मीरा के कान के पास फुसफुसाते हुए) "देख मीरा... ये तेरे लिए कितना तड़प रहा है। आज ये तुझे हिलाकर रख देगा।"
 
मीरा ने नीचे झुककर उस विशाल अंग को देखा और उसके मुँह से एक ठंडी आह निकली। उसकी आँखों में खौफ और चाहत का एक अजीब मेल था।
 
उसने अपनी कोमल और भीगी हुई उंगलियों से उस 10 इंच के दहकते हुए फौलाद को छुआ और उसे धीरे से सहलाया। उसकी छुअन मात्र से सरताज के मुँह से एक सिसकारी निकल गई।
 
मीरा ने अपना चेहरा और करीब किया और उस विशाल अंग के लाल सुर्ख और तनाव भरे 'हेड' पर एक छोटा सा, मगर बहुत ही गहरा चुंबन दिया। उसने अपनी जुबान की नोक से उसे धीरे से छुआ, जिससे सरताज की कमर में एक झटका सा लगा।
 
सरताज: (दाँत भींचते हुए) "आह्ह मीरा... तू जान ले लेगी मेरी... उम्म्म..."
 
मीरा: (ऊपर देख शरारती नज़रों से) "ये तो अभी से इतना गर्म है... जब अंदर जाएगा तो मेरा क्या हाल होगा सरताज?"
 
सरताज ने मीरा को अपनी गोद में उठाया और उसे बाथरूम के संगमरमर के स्लैब पर बैठा दिया। उसने मीरा की जांघों को इतना चौड़ा फैला दिया कि उसकी चूत  का गुलाबी और गीला द्वार पूरी तरह से खुल गया। शेर सुराख से देख पा रहा था कि मीरा की कामुकता की बूंदें वहां से टपक रही थीं।
 
सरताज ने अपने लंड की सुपारी को मीरा के उस गीले द्वार पर रगड़ना शुरू किया।
 
सरताज: "बताओ मीरा... क्या तुम्हें ये महसूस हो रहा है? ये गर्माहट... ?"
 
मीरा: (आँखें बंद करके, सिसकते हुए) "हाँ... आह... ये बहुत गरम है... सरताज, प्लीज... अब और तड़पाओ मत... अंदर डालो... मुझे पूरा भर दो।"
 
मीरा: "आह... सरताज... ये... ये तो मुझे पागल कर देगा।"
 
सरताज ने बहुत ही धीरे से, सधे हुए अंदाज़ में दबाव बनाया। जैसे ही उस 10 इंच के दहकते हुए लंड का ऊपरी हिस्सा मीरा के भीतर समाया, मीरा का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। उसकी जांघें सरताज की कमर के चारों तरफ शिकंजे की तरह कस गईं।
 
सरताज: (दाँत भींचते हुए और मीरा की आँखों में आँखें डाल कर) "उफ़्फ़ मीरा... तेरी ये योनि कितनी तंग है... तूने इसे कितनी बार लिया है, लेकिन हर बार ऐसा लगता है जैसे मैं पहली बार तुझे भोग रहा हूँ। ये अंदर से इतनी गरम और तंग है कि चारों तरफ से मेरे औज़ार को जकड़ रही है, जैसे मुझे छोड़ना ही नहीं चाहती।"
 
मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और सरताज के कंधों को अपनी उंगलियों से नोंच लिया। उसकी सिसकियाँ अब बाथरूम की दीवारों में गूँज रही थीं।
 
मीरा: "आह्ह्ह... सरताज... उम्म्म... ये बहुत बड़ा है... धीरे..."
 
सरताज ने अपनी कमर को पीछे खींचा और फिर एक ज़ोरदार धक्का मारा। इस बार वह विशाल अंग  8 इंच तक मीरा की गहराई में समा गया। मीरा के गले से एक ऐसी चीख निकली जो दर्द और बेइंतहा आनंद का मिश्रण थी। वह दीवार पर अपने हाथ पागलों की तरह मार रही थी।
 
मीरा: "ओह गॉड... सरताज... तुम बहुत बड़े हो... आह... मुझे महसूस हो रहा है कि तुम मेरे पेट के ऊपरी हिस्से तक पहुँच रहे हो... आह, मसल डालो मुझे!"
 
सरताज के धक्कों की रफ्तार अब बढ़ने लगी थी। गीले जिस्मों के आपस में टकराने की 'चप-चप' की आवाज़ और मीरा की मदहोश कर देने वाली आहें बाहर सुराख पर चिपके शेर को पागल कर रही थीं।
 
शेर ने देखा कि हर धक्के के साथ मीरा के सुडौल स्तन किसी लहर की तरह उछल रहे थे। सरताज का वह विशाल औज़ार हर बार जब बाहर निकल कर दोबारा भीतर जाता, तो मीरा का पूरा शरीर थरथरा उठता।
 
सरताज: "बता मीरा... कैसा लग रहा है?"
 
मीरा: "हाँ... सरताज... आह्ह्ह... और ज़ोर से... मुझे और गहराई तक महसूस करना है... उम्म्म... और... और!"
 


 
शेर बाहर खड़ा अपनी पैंट के भीतर खुद को इतनी तेज़ी से रगड़ रहा था कि उसे लग रहा था उसका दम निकल जाएगा। उसका पूरा बदन पसीने से भीग चुका था और उसकी आँखें उस सुराख से ऐसे चिपकी थीं जैसे वह कोई जादुई मंज़र देख रहा हो।
 
 
सरताज अब अपनी पूरी लय पकड़ चुका था। उसने मीरा की सुडौल गाँड को नीचे से सहारा दिया, उसे थोड़ा ऊपर उठाया और फिर अपनी पूरी मर्दाना ताकत से झटके देने शुरू किए। हर धक्के के साथ मीरा के सुडौल स्तन पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे और सरताज कभी उन्हें अपनी मुट्ठियों में भींचता तो कभी उन्हें अपने मुँह में भरकर पागलों की तरह काट रहा था।
 
सरताज: (हौंकते हुए और मीरा के चेहरे के करीब जाकर) "मीरा... आई लव यू मीरा! मुझे... मुझे अपने अंदर पूरी तरह समेट ले... अपनी इस तंग गहराई में मुझे दफन कर दे!"
 
मीरा का चेहरा चरम सुख की दहलीज पर था, उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं और वह सरताज के धक्कों के साथ अपनी कमर ऊपर उठा रही थी।
 
मीरा ने अपनी गोरी बाहें सरताज के गले में पूरी ताक़त से लपेट लीं और उसे अपने और भी करीब खींच लिया। उन दोनों के जिस्म पसीने और पानी की बूंदों से लथपथ होकर एक-दूसरे में इस कदर समा गए थे कि उनके बीच हवा के गुजरने की भी जगह नहीं बची थी। उनकी धड़कनें और सांसें पूरी तरह से एक लय में थीं।
 
मीरा: (पागलपन की हद तक चिल्लाते हुए) "हाँ... हाँ... सरताज! आई टू लव यू... आह्ह्ह! मैं तुम्हारी हूँ... सिर्फ तुम्हारी! मुझे और गहराई तक भरो... मुझे अपना बना लो!"
 
भाप और गिरते पानी के बीच उनके पसीने से लथपथ जिस्म एक-दूसरे में इस तरह गुंथ गए थे कि पता ही नहीं चल रहा था कि कहाँ सरताज खत्म हो रहा है और कहाँ मीरा शुरू।
 
शेर सुराख के उस पार यह सब देख रहा था—हवस, जलन और एक अजीब सी दीवानगी उसके दिमाग पर हावी हो रही थी। सरताज के उस 10 इंच के फौलाद को मीरा के भीतर बार-बार उतरते देख शेर का गला सूख गया था।
 
शेर (हाफते हुए): "हाँ मैडम... चिल्लाओ... ऐसे ही चिल्लाओ। काश ये धक्के मेरे होते... मैं तुम्हें आज रात भर सोने नहीं देता।"
 
सरताज: (गहरी और कांपती आवाज़ में) "मीरा... मैं... मैं आने वाला हूँ! मैं अपना सारा प्यार तेरे अंदर उड़ेलने वाला हूँ!"
 
मीरा का बुरा हाल था, उसकी साँसें उखड़ रही थीं और उसका गोरा बदन पसीने और पानी की बूंदों से चमक रहा था। उसने सरताज की गर्दन को अपनी बाँहों में कस लिया और उसके कान के पास पागलों की तरह फुसफुसाने लगी।
 
मीरा: "हाँ... सरताज... आह्ह्ह! डाल दो... सब कुछ मेरे अंदर डाल दो... ! मुझे महसूस करना है कि तुम मेरे कितने अंदर तक जा सकते हो... ओ गॉड, ये बहुत... बहुत सुखद है!"
 
सरताज ने एक आखिरी, सबसे ज़ोरदार और गहरा धक्का मारा, जिससे उसका पूरा 10 इंच का अंग मीरा की आखिरी गहराई तक धंस गया। उसी पल सरताज का शरीर अकड़ गया और उसने एक लंबी, दहाड़ मारी।
 
उसका सारा गरम लावा एक ज्वालामुखी की तरह मीरा के भीतर फटने लगा। मीरा ने भी अपनी आँखें ऊपर की ओर चढ़ा लीं और एक तीखी चीख के साथ अपना पूरा शरीर ढीला छोड़ दिया।
 
शेर सुराख के उस पार पागल हो चुका था। वह अपनी पैंट के भीतर पागलों की तरह हरकत कर रहा था। उसके दिमाग में बस एक ही ख्याल था—कि वह सरताज नहीं, बल्कि वह खुद है जो मीरा की कोख के दरवाज़े खटखटा रहा है।
 
शेर (कांपती आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "आह... मैडम... ये मेरा है... ये सब मेरा है... काश मैं आपके अंदर होता..."
 
बाहर सुराख पर चिपके शेर का भी बांध टूट गया। उसने एक गहरी आह भरी और उसका शरीर भी झटकों के साथ शांत होने लगा।
 
सरताज: "तुम ठीक तो हो, जान?"
 
मीरा: (बुझी हुई, मदहोश आवाज़ में) "तुमने... तुमने आज मुझे सच में मार ही डाला था... बहुत... बहुत मज़ा आया, सरताज।"
 
बाथरूम के भीतर का तूफान अब शांत पड़ गया था, लेकिन पानी की फुहारों के नीचे दोनों अभी भी एक-दूसरे से चिपके हुए थे।
 
सरताज ने बड़े प्यार से मीरा के गीले बदन को फिर से नहलाया, जैसे वह उस अनमोल देह की थकान मिटा रहा हो। कुछ देर तक पानी के नीचे एक-दूसरे को सहलाने के बाद, सरताज ने एक बड़ा तौलिया मीरा के बदन पर लपेटा और उसे अपनी मज़बूत बाँहों में किसी नवजात बच्चे की तरह उठा लिया।
 
मीरा ने अपना सिर सरताज के सीने पर टिका दिया, उसकी आँखों में अभी भी उस मिलन की मदहोशी थी। सरताज उसे उठाकर सीधे बेडरूम की ओर ले गया, और उसके कदमों की आहट से साफ था कि वह आज की रात इतनी जल्दी थमने वाला नहीं था।
 
शेर अँधेरे गलियारे में दीवार से सटा बैठा था, उसकी पैंट की ज़िप के पास का हिस्सा मीरा के बदन की गर्मी की कल्पना से तर हो चुका था।
 
शेर ने एक लंबी और कांपती हुई सांस ली। उसने अपनी पैंट की बेल्ट ढीली की और बाहर झांकते हुए उस लंड को देखा जो अब शांत पड़ चुका था। अंदर चल रहे उस जबरदस्त तूफान के शोर और मीरा की उन मादक कराहों ने शेर के सब्र को जवाब दे दिया था। उसकी मर्दानगी अब अपनी वो पहली वाली सख्ती और लंबाई खो चुकी थी।
 
शेर ने अपनी भीगी हुई पैंट की ओर देखा और एक गहरी हसरत के साथ धीमे से बुदबुदाया:
 
"अरे रे... सारा माल यहीं गिर गया। बेकार में इस कपड़े की भेंट चढ़ गया सब कुछ।"
 
उसने अपनी उन उंगलियों से उस गीलेपन को महसूस किया और बड़ी मासूमियत भरी तड़प के साथ अपनी सोई हुई रगों को सहलाते हुए बोला, "तुझे यहाँ नहीं होना चाहिए था रे... तेरा असली ठिकाना तो मीरा की उस रेशमी और गुलाबी चुत के अंदर था। अगर तू वहां गिरता, तो आज मेरी और तेरी दोनों की जिंदगी सफल हो जाती। वहां तुझे जो गर्माहट और सुकूँ मिलता, वो इस गंदी पैंट में कहाँ नसीब होगा?"
 
उसने एक आखिरी बार ललचाई नज़रों से उस सुराख की ओर देखा जहाँ सरताज और मीरा अभी भी अपनी दुनिया में खोए हुए थे। उसका मन अभी भी वहीं अटका था, यह सोचते हुए कि काश ये सारा 'खजाना' उस गुलाबी गुफा की गहराई में समाया होता।
 
अचानक, शेर के शरीर में फिर से एक बिजली सी दौड़ी और उसके उस अंग ने फिर से अपनी खोई हुई लंबाई और ताक़त बटोरनी शुरू कर दी। देखते ही देखते वह फिर से अपने पूरे 7 इंच के फौलादी आकार में तनकर खड़ा हो गया।
 
शेर की आँखें चमक उठीं। उसने अपने उस सुलगते हुए अंग को बड़े गर्व और अचंभे से देखा और एक शरारती मुस्कान के साथ बुदबुदाया:
 
"अरे ओ तेरी... लगता है इसने मेरी आवाज़ सुन ली! अभी तो बिल्कुल सुस्त पड़ा था, और अब देखो कैसे फन फैलाकर खड़ा हो गया है।"
 
उसने अपनी मुट्ठी में उस सख्त होते मांस को भींचा और मरोड़ते हुए बोला, "लगता है ये भी हार मानने को तैयार नहीं है। साला, ये भी मीरा की उस गुलाबी चुत में ही जाना चाहता है। इसे भी समझ आ गया है कि असली मज़ा तो वहीं है। क्यों रे? बड़ी जल्दी तैयार हो गया मेमसाह की गुफा में घुसने के लिए?"
 
शेर: ( दबी और दरिंदी आवाज़ में) "माना कि ये उस सरदार के 10 इंच के लट्ठ से 3 इंच छोटा है... पर इसमें जो हवस की आग है, जो तड़प है, वो उस वर्दी वाले के पास कहाँ? उसने तुझे सिर्फ अपनी बीवी समझकर भोगा है मीरा, पर जब ये 7 इंच का काल तेरे जिस्म की गहराई नापेगा, तब तुझे पता चलेगा कि मर्द का असली ज़ोर क्या होता है।"
 
उसे मीरा की वो चीखें याद आ रही थीं, जो मज़े में निकली थीं, लेकिन अब शेर का इरादा उस मजे को एक खौफनाक लज्जत में बदलने का था।
 
शेर: "सरताज ने तो तुझे प्यार से रखा है मीरा मैडम... पर जब मेरा ये मज़बूत अंग तेरी उस तंग योनि के भीतर अपना रास्ता बनाएगा, तब तू प्यार के लिए नहीं, अपनी जान बचाने के लिए रोएगी। मैं तुझे वो मीठा दर्द दूँगा जिसे सहते-सहते तू मेरी हवस की गुलाम बन जाएगी। सरताज तुझे सीने से लगाता है, पर मैं तुझे अपने पैरों के नीचे झुकाकर उस गाँड को चीर दूँगा।"
 
उसने अपने लंड को एक आखिरी बार अपनी मुट्ठी में ज़ोर से दबाया और उसे झटके से सहलाया, जिससे उसकी नसों में एक करंट सा दौड़ गया। उसके दिमाग में अब साफ़ नक्शा था—उसे पता था कि सरताज को कब ड्यूटी पर निकलना है और मीरा कब अपने बेडरूम में अकेले तड़पती है।
 
शेर: "जिस पेट को आज मैंने सिर्फ बाहर से सहलाया है, उसके आखिरी छोर तक अपनी पहुँच बनाऊंगा। तुझे ऐसी लत लगाऊंगा कि तू सरताज के उस 10 इंच को भूलकर मेरे इस 7 इंच के कहर के लिए तरसेगी। बस थोड़ा और इंतज़ार मीरा मैडम... तेरा ये सुडौल बदन जल्द ही मेरे नीचे होगा।"
 
उसने अपनी पैंट ठीक की और दबे पाँव अपने कमरे की ओर बढ़ गया। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर कोई भी थरथरा जाए।
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
  2. सम्मान और बदला ( 5th-Book in hindi)
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना




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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 04-02-2026, 03:59 AM



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