03-02-2026, 08:53 PM
चाची को कभी 'औरत' की नज़र से देखा नहीं... हमेशा 'चाची' को अपनी 'मम्मी' का ही दूसरा रूप माना. लेकिन 'चाची' और 'मम्मी' में अंतर तो होता ही है. यहाँ भी यही बात हुई. कितनी ही कोशिश किया की 'चाची' को इज़्ज़त वाली नज़रों से ही देखूँ ... पर एक तो उनका मेरे प्रति रूखा व्यवहार और दूसरा उनका एकदम माल वाला फिगर.!
कई बार उठते - बैठते, चलते या काम करते समय उनका जिस्म का कटाव कुछ यूँ प्रदर्शित हुआ है मेरे आँखों के सामने की अंग तो छोड़ो; एक - एक रोआं तक खड़ा हो जाता.
अपने ग्रुप के दोस्तों से सुन रखा था की एक आयु सीमा के पश्चात् हर महिला के जिस्म में बदलाव आता है और मन में कई खुमारियाँ कुलबुलाने लगातीं हैं.
चाची के मन में क्या चल रहा है, पता नहीं… खुमारी कुछ है भी या नहीं… ये भी पता नहीं.. पर दो बातें स्पष्ट दिख रही थीं जब से मैंने इनके यहाँ रहना शुरू किया था…
१) जिस्म कमाल का भरा हुआ है.
२) हिरणों की तरह ही काली, खिंचीं आँखें बरबस ही किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं… इनकी आँखें जैसे हर पल कुछ कहती हैं, कुछ चाहती हैं… बस, कोई समझने वाला नहीं है… मैं भी नहीं.
बावजूद इन सब के, मैंने अब तक चाची को ले कर अपने मन में किसी ग़लत विचार को कभी ठहरने नहीं दिया — चाचा जी के खातिर.
वैसे तो योग वगैरह बहुत पहले से करता आ रहा था पर चाचा ने एक तरह से फोर्स कर के मुझे क़रीब के एक जिम में भर्ती करवा दिया. इसी जिम से लग कर एक स्पोर्ट्स क्लब है जहाँ स्विमिंग, स्प्रिंटिंग, बैडमिंटन, इत्यादि सिखाया जाता है.. चाचा के ही एक मित्र का है ये क्लब और इनका बेटा यहाँ का हेड कोच है. इसी के अंडर में मुझे बॉक्सिंग के लिए भी भर्ती करवाया चाचा ने. पता नहीं क्यों उनको मुझसे ज़्यादा इनमें दिलचस्पी और जल्दी थी..
कारण पूछने पर इतना ही कहा उन्होंने की “सीख लो बेटा, पता नहीं कब, कहाँ क्या जरूरत पड़ जाए?”
ये उनकी एक नेक सलाह मान कर मैंने कोई आपत्ति नहीं की और बिना फिर कोई सवाल किए डेली जिम और क्लब जाने लगा.
जिसकी जरूरत बहुत जल्द पड़ी भी…
हुआ ये की एक दिन घर लौटने में चाचा को लेट हो गया था.. अमूमन साँझ 6:00 - 6:30 बजे तक लौट आते थे, उस दिन 8:00 बज गए…
अंदर आते ही सोफा पर धप्प से बैठ गए…
और नीचे फर्श की ओर देख कर कुछ सोचने लगे.
पहले तो चाची को लगा की दिन भर की थकान और ऑफिस का टेंशन होगा; लेकिन जब काफ़ी देर तक चाचा उठे नहीं अपनी जगह से तो चाची को चिंता हुई…
वो उनके पास आ कर बैठी;
बहुत केयरिंग टोन में पूछी,
“क्या हुआ है?”
“कुछ नहीं.” चाचा फर्श पर से अपनी नज़रें हटाए बिना जवाब दिया.
चाची कुछ सेकंड चुप रही इस आशा में की शायद चाचा आगे कुछ और भी बोलेंगे.. पर जब ऐसा नहीं हुआ तो वो खुद बोली,
“कुछ तो हुआ.. और जो कुछ भी हुआ है वो बहुत सीरियस है. है न?”
चाचा अब भी कहीं खोए हुए थे… सिर्फ़ एक “ह्म्म” में उत्तर दिया उन्होंने. हिले नहीं. वहीं बैठे रहे.
चाची कुछ देर तक उनके पास में ही बैठी रही. उनको देख कर लग रहा था की वो बहुत कुछ पूछना चाह रही है लेकिन पूछ नहीं पा रही. अंत में चाची चाचा को हाथ मुँह धो कर फ्रेश होने को बोल कर चली गई.
मैं पास ही के एक कमरे में पर्दे के ओट से सब देख व सुन रहा था.
डिनर के दौरान भी चाचा को गंभीर व चिंतित देखा… उस समय भी चाची दो बार पूछी, और मैंने भी पूछा पर उन्होंने कुछ नहीं बताया.
अगले दिन चाचा के ऑफिस चले जाने के बाद चाची से पूछने पर पता चला की कल दरअसल 3 - 4 लड़कों से थोड़ी बकझक हो गई थी गाड़ी पार्किंग को ले कर.
“लड़कों ने कुछ किया क्या? हाथ उठाया क्या चाचा पर?” मैंने पूछा.
“नहीं, पर वो (चाचा) कह रहे थे कि स्थिति बहुत ख़राब हो गई थी. कुछ भी हो सकता था.”
“ठीक कहाँ पर हुआ ये सब?”
“***** मिष्ठान्न नाम के दुकान के सामने.”
“चाचा वहाँ पे…??”
“हाँ, उनको उस दुकान की मिठाई बहुत पसंद है न, खरीदने गए थे; तुमको भी तो बहुत अच्छा लगता है वहाँ की मिठाई…”
“हम्म्म…” मैं आगे कुछ बोलूँ उसके पहले ही चाची खुद बताने लगी,
“बाइक दुकान के सामने लगा कर अंदर गए थे… पेमेंट कर के बाइक स्टार्ट कर के आगे बढ़ते की अचानक पीछे से एक बाइक आ कर बैलेंस खोते हुए इन के बाइक को ज़रा सा छू गई. इन्होंने बस इतना ही कहा कि ‘अरे देख के’... इसी बात पे वे लड़के इनसे झगड़ने लगे.”
“ओह!”
मैंने ज्यादा कुछ पूछा नहीं. पूछने लायक कुछ ख़ास था भी नहीं. थोड़ी देर चाची के साथ इधर - उधर की बातें कर के वापस अपने काम में लग गया.
![[Image: pl0SljdB_o.jpeg]](https://images2.imgbox.com/0b/21/pl0SljdB_o.jpeg)
पर जब तक उनसे बात कर रहा था तब तक चोर नज़रों से उनके लो - कट ब्लाउज से बाहर उभर कर निकले माँसल पीठ को देखता रहा. एक बार के लिए मेरे अंदर का जानवर कुछ यूँ जागा की लगभग उनकी गदराई पीठ पर अपने दाँत बिठा ही देता!
कैसे कंट्रोल किया मैंने खुद को ये मेरा भगवान ही जानता है.
रही बात चाचा और उन लड़कों के बीच की — मैंने सोचा की ये सब आजकल होता रहता है.. हालाँकि ऐसा होना तो नहीं चाहिए लेकिन अब अगर कभी हो जाए तो बीच का एक आसान रास्ता निकाल लेना चाहिए. एक बार हो गया चाचा के साथ… डेली थोड़े न होगा.
पर मेरा ऐसा सोचना गलत साबित हुआ…
एक बार फिर ऐसा ही हुआ…
चाचा के साथ…
उसी दुकान के सामने…
उन्हीं दो लड़कों के साथ…
लेकिन,
इस बार मैं भी था…
चाचा के साथ, उन्हीं के बाइक पर…
जब चाचा मिठाई के दो डिब्बे पैक करवा कर बाइक पर बैठने जा रहे थे तभी मैंने देखा दो लड़के जो हमारी जगह से कुछ कदम पीछे एक बाइक के साथ खड़े थे, टहलते हुए आए और चाचा की ओर देखते हुए बोले,
"नमस्ते अंकल, आज यहाँ... ?"
"हाँ, बस... मिठाई लेने.." चाचा ज़रा -सा मुस्करा कर जवाब दिया.
"अरे तो हमें भी खिलाईए कभी, अंकल. डेली देख रहे हैं की आप मिठाई ले जा रहे हैं. बाँट कर नहीं खाने से, अकेले - अकेले खाने से खाना पचता नहीं है... शुगर हो जाता है.. पता है न?" एक लड़का ये कह कर 'हो हो' से हँस पड़ा.
दूसरा लड़का भी हँसा लेकिन तुरंत पहले वाले को टोकते हुए अपने हिस्से का ज्ञान देते हुए बोला,
"अबे शुगर नहीं बे, डायबिटीज होता है."
पहला वाला 2 सेकंड सोचा और फिर बोला,
"वही.. अब जो हो... कुछ होता तो है न, है की नहीं अंकल..?"
चाचा अब तक बाइक स्टार्ट कर चुके थे; नज़रें घूमा कर मुझे इधर - उधर ढूँढ़ने लगे...
पहला वाला खुद को ज़्यादा फ्रेंडली दिखाने के चक्कर में था.. बोला,
"किसको ढूँढ़ रहे हैं..? कोई है का साथ में?"
इस पे दूसरा लड़का तपाक से बोला,
"अबे आँटी आयीं होंगी साथ में."
ये सुन कर पहला वाला दूसरे वाले को देख कर चौंकने की एक्टिंग करते हुए बोलता है,
"अबे का बात कर रहा है बे..?! आँटी भी आयीं हैं का?? कहाँ हैं??"
दूसरा वाला धीरे से बोला,
"कंपनी देने आई होगी..!"
"हम्म... या प्रोटेक्शन?!?"
पहले वाले का इतना कहना था की दोनों साथ में ज़ोर से 'हा हा हो हो' कर के हँसने लगे.
जब चाचा मिठाई लेने दुकान में घुसे थे तभी मैं बगल के एक दुकान जा कर एक डबल मिंट सिगरेट का पैकेट और चार पासपास लेने लगा था. वहीं खड़ा हो कर इन दोनों लड़कों की बकचोदी सुन रहा था इतनी देर. जब अंदर से एक फीलिंग आई की बहुत हो गया अब घर चलना चाहिए तब जल्दी से चाचा के पास पहुँच कर बाइक में पीछे बैठने लगा...
मुझे, एक लड़के को चाचा के साथ देख कर पहले तो वे दोनों लड़के हड़बड़ा गए... थोड़ा पीछे हुए... और फिर पहला वाला बोला,
"ओह बेटा साथ में है.."
दूसरा धीरे से बोला,
"ज़रूरी नहीं की बेटा ही हो..."
इस बात पे पहला वाला ऐसा खुश हुआ मानो कोई बहुत ही गुप्त बात उसे पता चल गया है...
थोड़ा आगे आ कर बोला,
"क्या अंकल... दूसरे शौक भी रखते हैं क्या...?!!"
अब तो चाचा और मेरा, दोनों का दिमाग बहुत गरम हो गया.
चाचा ज़ोर से, लगभग चीखते हुए बोले,
"क्या बोला रे तुम..??"
मैं बाइक पर से उतर चुका था... चाचा जी का मिजाज और आवाज़ सुन कर शायद दोनों की फट गई होगी इसलिए दोनों चूतियों की तरह हँसते हुए, कुछ कदम पीछे अपनी बाइक की तरफ बढ़ चुके थे.
मैं उनकी ओर गया और ज़ोर से बोला,
"इधर आ ना मादर***... बताते हैं की हम कौन हैं?"
मेरे मुँह से 'मादर***' सुन कर पहले वाले लड़के ने ऐसे रियेक्ट किया मानो उसका ईगो बहुत बुरी तरह चोटिल हुआ है. मेरी तरफ गुस्से से आँखें बड़ी - बड़ी करता हुआ बोला,
"क्या बोला रे तुम?"
"इधर आएगा तब न सुन पाएगा रे मादर***..." मैंने भी पुरज़ोर तरीके से चिल्ला कर कहा.
अब तक वहाँ भीड़ जमा होने लगा था. बच्चे, बूढ़े, जवान.. हर उम्र के लोग वहाँ हम लोगों को देखने लगे थे.
पहले वाले लड़के को हीरोगिरी करने की सूझी शायद...
वह मेरी तरफ़ आने लगा... पूरे ताव में... उसे देख कर लग रहा था की ये शायद मुझे कच्चा ही चबा जाएगा.... दूसरा लड़का बाइक स्टार्ट कर के पहले वाले को पीछे से बुलाने लगा,
"अबे आजा.. छोड़ उसको. देर हो रहा है... चलते हैं."
"रूक ना... इस मादर*** को बहुत जादे गर्मी चढ़ा है. तुम गाड़ी स्टार्ट रखो... इ साला को दुई मिनिट में समझाते हैं की किससे बात कर रहा है..?!"
कहते हुए जैसे ही मेरे बहुत पास आया मैंने सेकंड भर की भी देर न करते हुए 'तड़ाक' से उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया. इतना अचानक से मैंने मारा था की वो अपना गाल पकड़ कर 4 - 5 कदम पीछे हो कर लगभग गिरने से खुद को बचाया. जब थोड़ा होश आया की उसके साथ क्या हुआ है तब मारे गुस्से और अपमान से बेचारा रूआँसा हो कर दौड़ते हुए आकर मुझपे झपट पड़ा और मुझे मारने के लिए 4 - 5 बार हाथ घूमाया... जोकि बेकार ही गया.. कुछ दिनों की ट्रेनिंग के कारण मैं भी पूरे जोश में था.. इसलिए मौका मिलते ही उसका कॉलर पकड़ कर दो जोरदार मुक्का मारा.
फिर मुड़ कर चाचा के पास आ कर बाइक पे पीछे बैठ गया. चाचा जल्दी से बाइक स्टार्ट कर के घर की ओर चल दिए.
मैंने एक बार पीछे उस लड़के की ओर देखा.. दूसरा वाला लड़का अपने बेहोश पड़े दोस्त को सँभाल रहा था.
जारी है....
कई बार उठते - बैठते, चलते या काम करते समय उनका जिस्म का कटाव कुछ यूँ प्रदर्शित हुआ है मेरे आँखों के सामने की अंग तो छोड़ो; एक - एक रोआं तक खड़ा हो जाता.
अपने ग्रुप के दोस्तों से सुन रखा था की एक आयु सीमा के पश्चात् हर महिला के जिस्म में बदलाव आता है और मन में कई खुमारियाँ कुलबुलाने लगातीं हैं.
चाची के मन में क्या चल रहा है, पता नहीं… खुमारी कुछ है भी या नहीं… ये भी पता नहीं.. पर दो बातें स्पष्ट दिख रही थीं जब से मैंने इनके यहाँ रहना शुरू किया था…
१) जिस्म कमाल का भरा हुआ है.
२) हिरणों की तरह ही काली, खिंचीं आँखें बरबस ही किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं… इनकी आँखें जैसे हर पल कुछ कहती हैं, कुछ चाहती हैं… बस, कोई समझने वाला नहीं है… मैं भी नहीं.
बावजूद इन सब के, मैंने अब तक चाची को ले कर अपने मन में किसी ग़लत विचार को कभी ठहरने नहीं दिया — चाचा जी के खातिर.
वैसे तो योग वगैरह बहुत पहले से करता आ रहा था पर चाचा ने एक तरह से फोर्स कर के मुझे क़रीब के एक जिम में भर्ती करवा दिया. इसी जिम से लग कर एक स्पोर्ट्स क्लब है जहाँ स्विमिंग, स्प्रिंटिंग, बैडमिंटन, इत्यादि सिखाया जाता है.. चाचा के ही एक मित्र का है ये क्लब और इनका बेटा यहाँ का हेड कोच है. इसी के अंडर में मुझे बॉक्सिंग के लिए भी भर्ती करवाया चाचा ने. पता नहीं क्यों उनको मुझसे ज़्यादा इनमें दिलचस्पी और जल्दी थी..
कारण पूछने पर इतना ही कहा उन्होंने की “सीख लो बेटा, पता नहीं कब, कहाँ क्या जरूरत पड़ जाए?”
ये उनकी एक नेक सलाह मान कर मैंने कोई आपत्ति नहीं की और बिना फिर कोई सवाल किए डेली जिम और क्लब जाने लगा.
जिसकी जरूरत बहुत जल्द पड़ी भी…
हुआ ये की एक दिन घर लौटने में चाचा को लेट हो गया था.. अमूमन साँझ 6:00 - 6:30 बजे तक लौट आते थे, उस दिन 8:00 बज गए…
अंदर आते ही सोफा पर धप्प से बैठ गए…
और नीचे फर्श की ओर देख कर कुछ सोचने लगे.
पहले तो चाची को लगा की दिन भर की थकान और ऑफिस का टेंशन होगा; लेकिन जब काफ़ी देर तक चाचा उठे नहीं अपनी जगह से तो चाची को चिंता हुई…
वो उनके पास आ कर बैठी;
बहुत केयरिंग टोन में पूछी,
“क्या हुआ है?”
“कुछ नहीं.” चाचा फर्श पर से अपनी नज़रें हटाए बिना जवाब दिया.
चाची कुछ सेकंड चुप रही इस आशा में की शायद चाचा आगे कुछ और भी बोलेंगे.. पर जब ऐसा नहीं हुआ तो वो खुद बोली,
“कुछ तो हुआ.. और जो कुछ भी हुआ है वो बहुत सीरियस है. है न?”
चाचा अब भी कहीं खोए हुए थे… सिर्फ़ एक “ह्म्म” में उत्तर दिया उन्होंने. हिले नहीं. वहीं बैठे रहे.
चाची कुछ देर तक उनके पास में ही बैठी रही. उनको देख कर लग रहा था की वो बहुत कुछ पूछना चाह रही है लेकिन पूछ नहीं पा रही. अंत में चाची चाचा को हाथ मुँह धो कर फ्रेश होने को बोल कर चली गई.
मैं पास ही के एक कमरे में पर्दे के ओट से सब देख व सुन रहा था.
डिनर के दौरान भी चाचा को गंभीर व चिंतित देखा… उस समय भी चाची दो बार पूछी, और मैंने भी पूछा पर उन्होंने कुछ नहीं बताया.
अगले दिन चाचा के ऑफिस चले जाने के बाद चाची से पूछने पर पता चला की कल दरअसल 3 - 4 लड़कों से थोड़ी बकझक हो गई थी गाड़ी पार्किंग को ले कर.
“लड़कों ने कुछ किया क्या? हाथ उठाया क्या चाचा पर?” मैंने पूछा.
“नहीं, पर वो (चाचा) कह रहे थे कि स्थिति बहुत ख़राब हो गई थी. कुछ भी हो सकता था.”
“ठीक कहाँ पर हुआ ये सब?”
“***** मिष्ठान्न नाम के दुकान के सामने.”
“चाचा वहाँ पे…??”
“हाँ, उनको उस दुकान की मिठाई बहुत पसंद है न, खरीदने गए थे; तुमको भी तो बहुत अच्छा लगता है वहाँ की मिठाई…”
“हम्म्म…” मैं आगे कुछ बोलूँ उसके पहले ही चाची खुद बताने लगी,
“बाइक दुकान के सामने लगा कर अंदर गए थे… पेमेंट कर के बाइक स्टार्ट कर के आगे बढ़ते की अचानक पीछे से एक बाइक आ कर बैलेंस खोते हुए इन के बाइक को ज़रा सा छू गई. इन्होंने बस इतना ही कहा कि ‘अरे देख के’... इसी बात पे वे लड़के इनसे झगड़ने लगे.”
“ओह!”
मैंने ज्यादा कुछ पूछा नहीं. पूछने लायक कुछ ख़ास था भी नहीं. थोड़ी देर चाची के साथ इधर - उधर की बातें कर के वापस अपने काम में लग गया.
![[Image: pl0SljdB_o.jpeg]](https://images2.imgbox.com/0b/21/pl0SljdB_o.jpeg)
पर जब तक उनसे बात कर रहा था तब तक चोर नज़रों से उनके लो - कट ब्लाउज से बाहर उभर कर निकले माँसल पीठ को देखता रहा. एक बार के लिए मेरे अंदर का जानवर कुछ यूँ जागा की लगभग उनकी गदराई पीठ पर अपने दाँत बिठा ही देता!
कैसे कंट्रोल किया मैंने खुद को ये मेरा भगवान ही जानता है.
रही बात चाचा और उन लड़कों के बीच की — मैंने सोचा की ये सब आजकल होता रहता है.. हालाँकि ऐसा होना तो नहीं चाहिए लेकिन अब अगर कभी हो जाए तो बीच का एक आसान रास्ता निकाल लेना चाहिए. एक बार हो गया चाचा के साथ… डेली थोड़े न होगा.
पर मेरा ऐसा सोचना गलत साबित हुआ…
एक बार फिर ऐसा ही हुआ…
चाचा के साथ…
उसी दुकान के सामने…
उन्हीं दो लड़कों के साथ…
लेकिन,
इस बार मैं भी था…
चाचा के साथ, उन्हीं के बाइक पर…
जब चाचा मिठाई के दो डिब्बे पैक करवा कर बाइक पर बैठने जा रहे थे तभी मैंने देखा दो लड़के जो हमारी जगह से कुछ कदम पीछे एक बाइक के साथ खड़े थे, टहलते हुए आए और चाचा की ओर देखते हुए बोले,
"नमस्ते अंकल, आज यहाँ... ?"
"हाँ, बस... मिठाई लेने.." चाचा ज़रा -सा मुस्करा कर जवाब दिया.
"अरे तो हमें भी खिलाईए कभी, अंकल. डेली देख रहे हैं की आप मिठाई ले जा रहे हैं. बाँट कर नहीं खाने से, अकेले - अकेले खाने से खाना पचता नहीं है... शुगर हो जाता है.. पता है न?" एक लड़का ये कह कर 'हो हो' से हँस पड़ा.
दूसरा लड़का भी हँसा लेकिन तुरंत पहले वाले को टोकते हुए अपने हिस्से का ज्ञान देते हुए बोला,
"अबे शुगर नहीं बे, डायबिटीज होता है."
पहला वाला 2 सेकंड सोचा और फिर बोला,
"वही.. अब जो हो... कुछ होता तो है न, है की नहीं अंकल..?"
चाचा अब तक बाइक स्टार्ट कर चुके थे; नज़रें घूमा कर मुझे इधर - उधर ढूँढ़ने लगे...
पहला वाला खुद को ज़्यादा फ्रेंडली दिखाने के चक्कर में था.. बोला,
"किसको ढूँढ़ रहे हैं..? कोई है का साथ में?"
इस पे दूसरा लड़का तपाक से बोला,
"अबे आँटी आयीं होंगी साथ में."
ये सुन कर पहला वाला दूसरे वाले को देख कर चौंकने की एक्टिंग करते हुए बोलता है,
"अबे का बात कर रहा है बे..?! आँटी भी आयीं हैं का?? कहाँ हैं??"
दूसरा वाला धीरे से बोला,
"कंपनी देने आई होगी..!"
"हम्म... या प्रोटेक्शन?!?"
पहले वाले का इतना कहना था की दोनों साथ में ज़ोर से 'हा हा हो हो' कर के हँसने लगे.
जब चाचा मिठाई लेने दुकान में घुसे थे तभी मैं बगल के एक दुकान जा कर एक डबल मिंट सिगरेट का पैकेट और चार पासपास लेने लगा था. वहीं खड़ा हो कर इन दोनों लड़कों की बकचोदी सुन रहा था इतनी देर. जब अंदर से एक फीलिंग आई की बहुत हो गया अब घर चलना चाहिए तब जल्दी से चाचा के पास पहुँच कर बाइक में पीछे बैठने लगा...
मुझे, एक लड़के को चाचा के साथ देख कर पहले तो वे दोनों लड़के हड़बड़ा गए... थोड़ा पीछे हुए... और फिर पहला वाला बोला,
"ओह बेटा साथ में है.."
दूसरा धीरे से बोला,
"ज़रूरी नहीं की बेटा ही हो..."
इस बात पे पहला वाला ऐसा खुश हुआ मानो कोई बहुत ही गुप्त बात उसे पता चल गया है...
थोड़ा आगे आ कर बोला,
"क्या अंकल... दूसरे शौक भी रखते हैं क्या...?!!"
अब तो चाचा और मेरा, दोनों का दिमाग बहुत गरम हो गया.
चाचा ज़ोर से, लगभग चीखते हुए बोले,
"क्या बोला रे तुम..??"
मैं बाइक पर से उतर चुका था... चाचा जी का मिजाज और आवाज़ सुन कर शायद दोनों की फट गई होगी इसलिए दोनों चूतियों की तरह हँसते हुए, कुछ कदम पीछे अपनी बाइक की तरफ बढ़ चुके थे.
मैं उनकी ओर गया और ज़ोर से बोला,
"इधर आ ना मादर***... बताते हैं की हम कौन हैं?"
मेरे मुँह से 'मादर***' सुन कर पहले वाले लड़के ने ऐसे रियेक्ट किया मानो उसका ईगो बहुत बुरी तरह चोटिल हुआ है. मेरी तरफ गुस्से से आँखें बड़ी - बड़ी करता हुआ बोला,
"क्या बोला रे तुम?"
"इधर आएगा तब न सुन पाएगा रे मादर***..." मैंने भी पुरज़ोर तरीके से चिल्ला कर कहा.
अब तक वहाँ भीड़ जमा होने लगा था. बच्चे, बूढ़े, जवान.. हर उम्र के लोग वहाँ हम लोगों को देखने लगे थे.
पहले वाले लड़के को हीरोगिरी करने की सूझी शायद...
वह मेरी तरफ़ आने लगा... पूरे ताव में... उसे देख कर लग रहा था की ये शायद मुझे कच्चा ही चबा जाएगा.... दूसरा लड़का बाइक स्टार्ट कर के पहले वाले को पीछे से बुलाने लगा,
"अबे आजा.. छोड़ उसको. देर हो रहा है... चलते हैं."
"रूक ना... इस मादर*** को बहुत जादे गर्मी चढ़ा है. तुम गाड़ी स्टार्ट रखो... इ साला को दुई मिनिट में समझाते हैं की किससे बात कर रहा है..?!"
कहते हुए जैसे ही मेरे बहुत पास आया मैंने सेकंड भर की भी देर न करते हुए 'तड़ाक' से उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया. इतना अचानक से मैंने मारा था की वो अपना गाल पकड़ कर 4 - 5 कदम पीछे हो कर लगभग गिरने से खुद को बचाया. जब थोड़ा होश आया की उसके साथ क्या हुआ है तब मारे गुस्से और अपमान से बेचारा रूआँसा हो कर दौड़ते हुए आकर मुझपे झपट पड़ा और मुझे मारने के लिए 4 - 5 बार हाथ घूमाया... जोकि बेकार ही गया.. कुछ दिनों की ट्रेनिंग के कारण मैं भी पूरे जोश में था.. इसलिए मौका मिलते ही उसका कॉलर पकड़ कर दो जोरदार मुक्का मारा.
फिर मुड़ कर चाचा के पास आ कर बाइक पे पीछे बैठ गया. चाचा जल्दी से बाइक स्टार्ट कर के घर की ओर चल दिए.
मैंने एक बार पीछे उस लड़के की ओर देखा.. दूसरा वाला लड़का अपने बेहोश पड़े दोस्त को सँभाल रहा था.
जारी है....


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