03-02-2026, 09:50 AM
हेलो दोस्तों, मेरा नाम राइटर (काल्पनिक) है. बहुत समय से अपने जीवन के एक अध्याय को आप सब के साथ शेयर करने का सोच रहा था.. आज अवसर मिला तो सोचा बिना देर किए ये शुभ कार्य कर डालता हूँ.
बहुत समय से मैं अपने चाचा के घर पर उन्हीं के परिवार के साथ रह रहा हूँ… और अब भी रहता हूँ... क्यों? ये आपको कहानी के अंत में पता चल ही जाएगा. दरअसल मास्टर्स के लिए यहीं के एक कॉलेज में दाखिला मिला था. मेरे कहीं और भाड़ा ले कर रहने के आईडिया पर चाचा को बहुत गुस्सा आया था --- पापा तक को कड़े शब्दों में कहा था उन्होंने की जब तक उस शहर में वो या उनकी फैमिली है तब तक मुझे उसी शहर में रहने के लिए कोई कमरा भाड़े पे लेने की आवश्यकता नहीं है.
मैं काफ़ी खुश हुआ था. मेरे मम्मी - पापा भी. पापा को तो अपने छोटे भाई पर बड़ा गर्व भी हुआ था.. रह - रह कर मेरी मम्मी और मुझे कहते रहते की 'देखो, इसे कहते हैं सँस्कार. अपने परिवार के लिए, भाई, बड़े भाई के लिए कुछ भी करने की सोचना; हर किसी को नहीं मिलता --- ना ये सँस्कार और ना ऐसा भाई.'
चाचा के इसी दयालुता की भरपाई करने के लिए ही पापा ने न जाने मुझे कितने तरह की घुट्टी पिलाई... 'चाचा और उनके परिवार का अपने सामर्थ्य -अनुसार ध्यान रखना, चाचा की सेवा करना, समय - समय पर चाची की मदद करते रहना, उनके बच्चों को परेशान नहीं करना, उनको सताना नहीं,' इत्यादि.
मम्मी और पापा के इसी तरह के कई सीख व उपदेशों की गाँठ बाँध कर एक दिन चाचा जी के यहाँ आ गया.
हालाँकि एक बात तो तय नज़र आई कि चाची कुछ खास खुश नहीं थी. सामने से कुछ बोली भी नहीं, लेकिन उनके हाव भाव से स्पष्ट दिख गया की घर में एक अतिरिक्त सदस्य के बढ़ जाने से और चाहे कुछ हो न हो, वो कम से कम खुश तो नहीं थी.
चाचा और दोनों बच्चों से बहुत प्यार व अपनापन मिला; पर चाची से उतना नहीं.
चाची मेरे लगभग सभी बातों का जवाब सिर्फ़ चार शब्दों में देती,
'हाँ', 'ठीक है', 'अच्छा', 'हम्म'.
चाचा के कारण सामने से विरोध न जता कर अच्छे से पेश आती किंतु बड़े शालीन तरीक़े से मुझे ये जता देती की इस घर में तो मैं आ गया लेकिन उनके दिल में मेरा रत्ती भर भी 'स्वागत' नहीं है.
खैर, मैं चाचा से ज़्यादा मतलब रखता था.. क्योंकि देखा जाए तो मैं तो चाचा के घर आया था, और घर के मालिक तो चाचा ही हैं इसलिए एक चाचा के अलावा किसी और ने मेरे बार में क्या सोचा और उसे / उन्हें कैसा लगा, इन सब बातों से मुझे कुछ खास फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए था.
पर धीरे - धीरे ही सही, मैंने चाची के दिल में भी जगह बनाना शुरू कर दिया था… नहीं, मैं कोई शौक से उनके दिल में जगह नहीं बनाया और ना ही कोई कोशिश किया.. मैं तो चाहे सुबह हो या शाम, बच्चों और चाचा जी के साथ समय बिताता था; बच्चे मुझसे बहुत प्यार करने लगे थे. वे चाहे घर में रहे या कॉलेज के लिए निकले, खेले या होमवर्क बनाए, हर समय मुझे ही अपने पास चाहते… और चूंकि मैं भी उन पर अच्छे से ध्यान देता था तो उनके होमवर्क समय पे होने लगे थे और उनकी हैंडराइटिंग भी पहले से काफ़ी सुधर चुकी थी. इस बात की तारीफ़ खुद इनके टीचर चाचा - चाची से पेरेंट - टीचर मीटिंग में करते.
हाँ, ये सब कोई दो तीन दिन या सप्ताह में नहीं हुआ.. समय लगा. तकरीबन तीन महीने. दिन थोड़ा कम ज़्यादा हो सकता है…
साथ ही, घर के कई कामों में भी हाथ बंटाता था…
इन सभी कारणों से चाची का मन मेरे प्रति नर्म होने लगा था.
इसी तरह दो साल बीत गए…
कॉलेज के एग्जाम्स में मैंने अभी तक बहुत अच्छा रिज़ल्ट लाया था. आसपास के मोहल्लों के लड़के - लड़कियों को ट्यूशन भी देने लगा था और मुझसे पढ़ कर उनके परीक्षा परिणाम भी बहुत बढ़िया आने लगे थे. साथ ही मेरा एक छोटा - सा फ्रेंड्स ग्रुप भी बन गया था और मेरे कुछेक गुणों के कारण सब मेरे कायल भी हो गए थे. इन सबकी ख़बर चाचा - चाची को बराबर मिलती रहती… चाचा को तो बहुत गर्व होता, पर चाची का.... पता नहीं!
इन सब के बावजूद भी मैं बहुत अच्छे से जानता था की चाचा के कारण ही मुझे इस घर में स्थान मिला है; जाने अंजाने मुझसे हुई एक भी ग़लती चाची के मन में मेरे प्रति खटास भर सकती है. दो साल कोई कम समय नहीं होता लेकिन करियर के नज़रिए से अभी मैं बहुत निश्चिंत नहीं था. आज के समय में सिर्फ़ कॉलेज पास ऑउट होना ही किसी भी तरह की नौकरी की गारंटी नहीं है. मेरे ग्रुप के निशांत की बात ही कर लूँ; उसके बाप को रिटायर होने में अब बस साल भर का समय रह गया है.. छोटा भाई अब भी पढ़ाई कर रहा है... कुछ समय पहले ही इसके बड़ी बहन की शादी हुई थी; अपर मिडिल क्लास वाले घर में शादी कराने के चक्कर में इसके बाप को 2 - 3 जगह से क़र्ज़ लेना पड़ा था. वो क़र्ज़ अभी पूरा चुकता हुआ नहीं है. थोड़ा - थोड़ा कर के चुकाया जा रहा है और अब निशांत के माँ - बाप को निशांत से भी कुछ उम्मीदें हैं. इसलिए बेचारा पिछले चार महीने से नौकरी के लिए मारा - मारा फिर रहा है. पढ़ने में कितना अच्छा या बुरा था ये मुझे नहीं मालूम लेकिन ये खुद कहता रहा है कि,
“अपन को कभी पढ़ाई में मन लगा ही नहीं.”
अब चूँकि कुछ ज़िम्मेदारियाँ इस पे भी आने लगीं थीं इसलिए एक कंप्यूटर कोचिंग सेंटर से ADCA कोर्स कर लिया
था; उस पे भी DTP में ख़ास ध्यान दिया था… अब जहाँ भी नौकरी के लिए अप्लाई करता वहाँ या तो वैकेंसी नहीं होती या फिर अँग्रेज़ी, हिंदी टाइपिंग के अलावा दो और भाषा टाइपिंग में सिद्धहस्त होने का बिन माँगा सुझाव दिया जाता. कभी Word per minute ज़्यादा होने की माँग होती तो कभी टैली जानकार होने की माँग होती…. और अगर टैली आती भी है तो कॉमर्स बैकग्राउंड होने की शर्त लग जाती!
ठीक ऐसी समस्याओं से मुझे भी दो चार होना पड़ता है.. फ़िलहाल फूल टाइम नौकरी की जरूरत है नहीं मुझे लेकिन अगर कभी पार्ट टाइम नौकरी करने की नौबत आ गई तो तब मेरी क्या और कैसी परिस्थिति होगी; यही सोच - सोच कर अक्सर बहुत डर जाता हूँ.
बहुत समय से मैं अपने चाचा के घर पर उन्हीं के परिवार के साथ रह रहा हूँ… और अब भी रहता हूँ... क्यों? ये आपको कहानी के अंत में पता चल ही जाएगा. दरअसल मास्टर्स के लिए यहीं के एक कॉलेज में दाखिला मिला था. मेरे कहीं और भाड़ा ले कर रहने के आईडिया पर चाचा को बहुत गुस्सा आया था --- पापा तक को कड़े शब्दों में कहा था उन्होंने की जब तक उस शहर में वो या उनकी फैमिली है तब तक मुझे उसी शहर में रहने के लिए कोई कमरा भाड़े पे लेने की आवश्यकता नहीं है.
मैं काफ़ी खुश हुआ था. मेरे मम्मी - पापा भी. पापा को तो अपने छोटे भाई पर बड़ा गर्व भी हुआ था.. रह - रह कर मेरी मम्मी और मुझे कहते रहते की 'देखो, इसे कहते हैं सँस्कार. अपने परिवार के लिए, भाई, बड़े भाई के लिए कुछ भी करने की सोचना; हर किसी को नहीं मिलता --- ना ये सँस्कार और ना ऐसा भाई.'
चाचा के इसी दयालुता की भरपाई करने के लिए ही पापा ने न जाने मुझे कितने तरह की घुट्टी पिलाई... 'चाचा और उनके परिवार का अपने सामर्थ्य -अनुसार ध्यान रखना, चाचा की सेवा करना, समय - समय पर चाची की मदद करते रहना, उनके बच्चों को परेशान नहीं करना, उनको सताना नहीं,' इत्यादि.
मम्मी और पापा के इसी तरह के कई सीख व उपदेशों की गाँठ बाँध कर एक दिन चाचा जी के यहाँ आ गया.
हालाँकि एक बात तो तय नज़र आई कि चाची कुछ खास खुश नहीं थी. सामने से कुछ बोली भी नहीं, लेकिन उनके हाव भाव से स्पष्ट दिख गया की घर में एक अतिरिक्त सदस्य के बढ़ जाने से और चाहे कुछ हो न हो, वो कम से कम खुश तो नहीं थी.
चाचा और दोनों बच्चों से बहुत प्यार व अपनापन मिला; पर चाची से उतना नहीं.
चाची मेरे लगभग सभी बातों का जवाब सिर्फ़ चार शब्दों में देती,
'हाँ', 'ठीक है', 'अच्छा', 'हम्म'.
चाचा के कारण सामने से विरोध न जता कर अच्छे से पेश आती किंतु बड़े शालीन तरीक़े से मुझे ये जता देती की इस घर में तो मैं आ गया लेकिन उनके दिल में मेरा रत्ती भर भी 'स्वागत' नहीं है.
खैर, मैं चाचा से ज़्यादा मतलब रखता था.. क्योंकि देखा जाए तो मैं तो चाचा के घर आया था, और घर के मालिक तो चाचा ही हैं इसलिए एक चाचा के अलावा किसी और ने मेरे बार में क्या सोचा और उसे / उन्हें कैसा लगा, इन सब बातों से मुझे कुछ खास फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए था.
पर धीरे - धीरे ही सही, मैंने चाची के दिल में भी जगह बनाना शुरू कर दिया था… नहीं, मैं कोई शौक से उनके दिल में जगह नहीं बनाया और ना ही कोई कोशिश किया.. मैं तो चाहे सुबह हो या शाम, बच्चों और चाचा जी के साथ समय बिताता था; बच्चे मुझसे बहुत प्यार करने लगे थे. वे चाहे घर में रहे या कॉलेज के लिए निकले, खेले या होमवर्क बनाए, हर समय मुझे ही अपने पास चाहते… और चूंकि मैं भी उन पर अच्छे से ध्यान देता था तो उनके होमवर्क समय पे होने लगे थे और उनकी हैंडराइटिंग भी पहले से काफ़ी सुधर चुकी थी. इस बात की तारीफ़ खुद इनके टीचर चाचा - चाची से पेरेंट - टीचर मीटिंग में करते.
हाँ, ये सब कोई दो तीन दिन या सप्ताह में नहीं हुआ.. समय लगा. तकरीबन तीन महीने. दिन थोड़ा कम ज़्यादा हो सकता है…
साथ ही, घर के कई कामों में भी हाथ बंटाता था…
इन सभी कारणों से चाची का मन मेरे प्रति नर्म होने लगा था.
इसी तरह दो साल बीत गए…
कॉलेज के एग्जाम्स में मैंने अभी तक बहुत अच्छा रिज़ल्ट लाया था. आसपास के मोहल्लों के लड़के - लड़कियों को ट्यूशन भी देने लगा था और मुझसे पढ़ कर उनके परीक्षा परिणाम भी बहुत बढ़िया आने लगे थे. साथ ही मेरा एक छोटा - सा फ्रेंड्स ग्रुप भी बन गया था और मेरे कुछेक गुणों के कारण सब मेरे कायल भी हो गए थे. इन सबकी ख़बर चाचा - चाची को बराबर मिलती रहती… चाचा को तो बहुत गर्व होता, पर चाची का.... पता नहीं!
इन सब के बावजूद भी मैं बहुत अच्छे से जानता था की चाचा के कारण ही मुझे इस घर में स्थान मिला है; जाने अंजाने मुझसे हुई एक भी ग़लती चाची के मन में मेरे प्रति खटास भर सकती है. दो साल कोई कम समय नहीं होता लेकिन करियर के नज़रिए से अभी मैं बहुत निश्चिंत नहीं था. आज के समय में सिर्फ़ कॉलेज पास ऑउट होना ही किसी भी तरह की नौकरी की गारंटी नहीं है. मेरे ग्रुप के निशांत की बात ही कर लूँ; उसके बाप को रिटायर होने में अब बस साल भर का समय रह गया है.. छोटा भाई अब भी पढ़ाई कर रहा है... कुछ समय पहले ही इसके बड़ी बहन की शादी हुई थी; अपर मिडिल क्लास वाले घर में शादी कराने के चक्कर में इसके बाप को 2 - 3 जगह से क़र्ज़ लेना पड़ा था. वो क़र्ज़ अभी पूरा चुकता हुआ नहीं है. थोड़ा - थोड़ा कर के चुकाया जा रहा है और अब निशांत के माँ - बाप को निशांत से भी कुछ उम्मीदें हैं. इसलिए बेचारा पिछले चार महीने से नौकरी के लिए मारा - मारा फिर रहा है. पढ़ने में कितना अच्छा या बुरा था ये मुझे नहीं मालूम लेकिन ये खुद कहता रहा है कि,
“अपन को कभी पढ़ाई में मन लगा ही नहीं.”
अब चूँकि कुछ ज़िम्मेदारियाँ इस पे भी आने लगीं थीं इसलिए एक कंप्यूटर कोचिंग सेंटर से ADCA कोर्स कर लिया
था; उस पे भी DTP में ख़ास ध्यान दिया था… अब जहाँ भी नौकरी के लिए अप्लाई करता वहाँ या तो वैकेंसी नहीं होती या फिर अँग्रेज़ी, हिंदी टाइपिंग के अलावा दो और भाषा टाइपिंग में सिद्धहस्त होने का बिन माँगा सुझाव दिया जाता. कभी Word per minute ज़्यादा होने की माँग होती तो कभी टैली जानकार होने की माँग होती…. और अगर टैली आती भी है तो कॉमर्स बैकग्राउंड होने की शर्त लग जाती!
ठीक ऐसी समस्याओं से मुझे भी दो चार होना पड़ता है.. फ़िलहाल फूल टाइम नौकरी की जरूरत है नहीं मुझे लेकिन अगर कभी पार्ट टाइम नौकरी करने की नौबत आ गई तो तब मेरी क्या और कैसी परिस्थिति होगी; यही सोच - सोच कर अक्सर बहुत डर जाता हूँ.


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