02-02-2026, 01:41 PM
समझौते का दूसरा दिन
करीम अपनी छोटी और अंधेरी कोठरी में अकेला बैठा था। उसके अंदर एक अलग ही किस्म का सुकून था। उसने अपने उन बड़े हाथों को गौर से देखा, जिनसे कुछ देर पहले उसने अपनी मालकिन के जिस्म की मलाईदार छुअन को महसूस किया था। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई।
उसने अपनी लुंगी ठीक की और मन ही मन बुदबुदाने लगा:
"अनीता बेटी... साला, आज तो तुम हमरी मुट्ठियों में किसी चिड़िया की तरह फड़फड़ा रही थीं। उह्ह... जब हम तुम्हारे उस चिकने पेट को सहला रहे थे, तो तुम्हारी धड़कनें हमारी उंगलियों को महसूस हो रही थीं। साला, मालकिन बनी फिरती हो, पर हमारी एक छुअन ने तुम्हारी सारी अकड़ ढीली कर दी। हमको लगा था कि तुम फिर से हाथ उठाओगी, पर तुम तो प्यासी हिरनी की तरह बस हमारी गर्मी पी रही थीं।"
करीम ने अपनी आँखें मूँद लीं और उस नज़ारे को फिर से जीने लगा जब उसने अनीता को बीच राह में अधूरा छोड़ दिया था।
"साला, असली मज़ा तो तब आया जब हम तुम्हें उस आग में जलता छोड़ के बाहर निकल आए। अब तड़पो! अब पूरी रात तुम छत को निहारोगी और सोचोगी कि ये काला करीम कल फिर कब आएगा। तुमको क्या लगा था कि उस तमाचे का हिसाब हम इतनी जल्दी भूल जाएंगे? ना बेटी... अभी तो हमने बस तुम्हारे कपड़ों को छुआ है। अभी तो असली खेल शुरू हुआ है। साला, अब तुम खुद तड़पोगी और जब कल हम आएंगे, तो तुम तीस मिनट क्या... तुम तो घंटों हमारी बाँहों में रहने की भीख माँगोगी।"
उसने एक गंदी हंसी और बोला:
"मालिक को लगता है कि उनके पास हीरा है, पर उनको क्या पता कि उस हीरे की चमक अब इस काले कोयले के हाथों में है।"
करीम अब अगले दिन की योजना बनाने लगा।
अगले दिन की दोपहर अनीता ने खुद को बचाने की एक आखिरी कोशिश की थी। उसने अलमारी के कोने से एक ऐसी काली नाइटी निकाली थी जो ऊपर से नीचे तक बंद थी, उसका गला बंद था और बाजू भी पूरी थी। उसे लगा था कि इस सख्त लिबास के पीछे वह करीम के हाथों से बच पाएगी।
उसे कल की वह दोपहर याद आ रही थी जब उसने साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के उस खुलेपन ने करीम के लिए रास्ते आसान कर दिए थे। उसे याद था कि कैसे करीम के खुरदरे और गर्म हाथ उसकी कमर के उस नंगे हिस्से पर रेंग रहे थे जहाँ ब्लाउज और साड़ी के बीच उसकी त्वचा पूरी तरह उजागर थी। उसकी उंगलियों का वह सीधा स्पर्श, बिना किसी कपड़े की रुकावट के, अनीता के शरीर में एक अजीब सी सिहरन और उत्तेजना पैदा कर रहा था।
करीम का हर स्पर्श उसे बहुत अधिक महसूस हो रहा था क्योंकि उसके और उन हाथों के बीच कुछ भी नहीं था। वह 'नंगा' अहसास, अनीता को भीतर तक झकझोर गया था। वह उस बेबसी और उस तीव्र शारीरिक खिंचाव से दोबारा नहीं गुजरना चाहती थी। उसे लग रहा था कि साड़ी की वह लचक और खुलापन ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई थी।
इसीलिए आज उसने इस बंद नाइटी को चुना था। वह चाहती थी कि उसके शरीर का एक-एक इंच कपड़े की मोटी परत के नीचे दबा रहे, ताकि अगर करीम दोबारा कोशिश भी करे, तो उसे वह सीधी और मखमली त्वचा न मिले जिसे छूकर वह उसे कल की तरह विवश कर सके।
जब राज ऑफिस के लिए निकल गए, तो रसोई की दहलीज करीम अपनी धोती ठीक करते हुए अंदर आया और अनीता को ऊपर से नीचे तक निहारा। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान और आँखों में एक गहरी शिकायत थी।
करीम: "मालकिन, यह नाइंसाफी है। आपने वादा किया था कि मैं आपको छू सकता हूँ, और अब आपने खुद को इस काले लिबास में पूरी तरह कैद कर लिया है? आपने कहा था कि मैं कपड़े नहीं उतार सकता, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आप मेरे लिए कोई जगह ही न छोड़ें।"
करीम ने झटके से अनीता की गोरी बाहों को अपनी पकड़ में जकड़ लिया।
अनीता: "करीम... छोड़ो मुझे... उह्ह... मैंने वादा निभाया है। देखो, मैं तुम्हारे सामने हूँ। पर तुमने कहा था सिर्फ स्पर्श... तुम... तुम डरा रहे हो मुझे।"
करीम: "डर तो उसे लगता है मालकिन जिसका मन साफ न हो। पर आपकी आँखें... आपकी आँखें तो कुछ और ही कह रही हैं। रात कैसी गुजरी? क्या राज साहब ने कल रात आपकी इस प्यास को बुझाया? या उन्होंने बस अपनी भूख मिटाई और सो गए?"
अनीता ने नज़रें झुका लीं।
करीम ने उसके चेहरे को ऊपर उठाया।
करीम: "कोई बात नहीं मालकिन... मैं तो आपका पुजारी हूँ, और पुजारी को तो बंद मंदिर के बाहर भी मत्था टेकना आता है। अगर आपने रास्ते बंद किए हैं, तो मैं नए रास्ते बनाना जानता हूँ।"
इतना कहते ही 6'2" के उस दानव ने अनीता को उठाकर रसोई की दीवार से सटा दिया। उसने अपनी गर्दन झुकाई और अनीता की सुराहीदार गर्दन पर अपनी गीली जीभ फेर दी।
अनीता : "आह! करीम... उह्ह... मत करो... छोड़ो... उह्ह!"
करीम ने उसकी गर्दन के एक खास हिस्से को अपने होंठों के बीच भरकर इतनी जोर से चूसा कि अनीता के मुंह से एक तीखी सिसकारी निकल गई। जब उसने अपना मुंह हटाया, तो वहाँ एक गहरा लाल निशान उभर आया था।
करीम (मदहोशी में): "ई निशान दुनिया को बताएगा कि इस बदन पर किसका हक है। आपकी महक... उफ़! ई नाइटी तो बस एक पर्दा है, जिसे फाड़ने का मन कर रहा है।"
करीम ने उसके कान की लौ (earlobe) को अपने दांतों के बीच दबाया और उसे चूसने लगा। अनीता का पूरा कांप उठा। उसके हाथ दीवार पर कस गए।
अनीता: "ओह गॉड... करीम... आह! तुम... तुम पागल हो गए हो... उह्ह... छोड़ो मुझे..."
करीम: "पागल तो आपने किया है मालकिन। रात भर सोए नहीं हैं हम। बस यही सोच रहे थे कि आज राज साहब ने कहाँ-कहाँ हाथ लगाया होगा।"
करीम नाइटी के उस पतले कपड़े के ऊपर से ही अनीता के दोनों सुडौल स्तनों को अपने बड़े-बड़े हाथों में भर लिया। उसने उन्हें इतनी बुरी तरह मसलना शुरू किया जैसे वह उनका सारा रस निकाल लेना चाहता हो। फिर उसने अपना मुंह झुकाया और नाइटी के कपड़े के ऊपर से ही एक स्तन को अपने मुंह में पूरा भर लिया।
अनीता : "उह्ह... आह! करीम... रुक जाओ... कपड़े गीले हो रहे हैं... आह! कोई देख लेगा... करीम... प्लीज़..."
करीम के मुंह की लार से नाइटी का सीने वाला हिस्सा पूरी तरह गीला होकर उसके बदन से चिपक गया, जिससे उसके निप्पल्स की गोलाई साफ झलकने लगी। करीम ने दूसरे स्तन को अपने हाथ से ज़ोर-ज़ोर से भींचा।
करीम: "देखने दो दुनिया को! ई जवानी हमारी पूजा के लिए बनी है।"
अनीता दीवार के सहारे खड़ी अपनी आँखें मींचे हुए बेबस थी। उसका शरीर अब विद्रोह करना छोड़ चुका था और वह करीम के हर स्पर्श पर ज़ोर-ज़ोर से आहें भर रही थी।
अचानक करीम ने उसे दीवार की तरफ घुमा दिया, जिससे उसकी पीठ करीम की ओर हो गई और उसका चेहरा दीवार से सट गया।
करीम (हाँफते हुए): "वाह मालकिन... असली खजाना तो यहाँ छिपा है। ई जो भारीपन है... उफ़! आज तो ई काला कपड़ा भी छोटा पड़ जाएगा।"
करीम ने नाइटी के ऊपर से ही उसकी गाँड के भारीपन और गोलाई को अपने दोनों विशाल हाथों से कसकर जकड़ लिया। उसने उन्हें अपनी मुट्ठियों में भरकर बुरी तरह निचोड़ना शुरू किया।
अनीता : "आह! करीम... उह्ह... वहाँ नहीं... प्लीज़... आह! तुम... तुम बहुत सख्त हो... उह्ह... छोड़ो..."
करीम: "कैसे छोड़ दूँ? ई जो आपके कूल्हों की थरथराहट है, ई हमसे कुछ कह रही है। क्या कल रात मालिक ने यहाँ हाथ लगाया था? बोलिए!"
अनीता कुछ बोल नहीं पा रही थी, उसका मुँह दीवार से सटा हुआ था और वह बस मदहोशी में अपना सिर हिला रही थी।
अनीता: "न... नहीं... उह्ह... राज... वो... वो बस... आह! करीम... तुम... तुम जो कर रहे हो... वो... उह्ह..."
करीम ने झुककर नाइटी के कपड़े के ऊपर से ही उसके गाँड को चाटना और चूमना शुरू कर दिया। उसकी उंगलियाँ अब गाँड के बीच के हिस्से में दबाव बना रही थीं। अनीता का पूरा शरीर इस नई तरह की 'पूजा' से कांप उठा।
करीम : "देखा? कपड़े के ऊपर से भी हम आपको वो आग दे रहे हैं जो मालिक नंगे बदन भी नहीं दे पाए। ई जो आपकी गाँड के बीच में मेरी उंगली का दबाव है... ई कैसा लग रहा है? बोलिए मालकिन!"
अनीता (बेकाबू होकर): "आह! बहुत... बहुत गहरा... उह्ह... करीम... और... और ज़ोर से... आह! मैं... मैं मर जाऊँगी... उह्ह!"
अनीता अब पूरी तरह से अपनी गरिमा भूल चुकी थी। वह दीवार पर अपने नाखूनों से खरोंचें मार रही थी। करीम उसे अहसास दिला रहा था कि भले ही बीच में कपड़ा है, लेकिन उसकी पहुँच अनीता के जिस्म की हर गहराई तक है। वह उसे कभी थपथपाता, कभी ज़ोर से काटता और कभी अपने हाथों से उसे बुरी तरह मसलता।
लगभग २5 मिनट बीत चुके थे। रसोई में सिर्फ अनीता की भारी साँसों और करीम के हाँफने की आवाज़ गूँज रही थी। अनीता का नाइटगाउन पसीने और करीम की लार से कई जगहों से पारदर्शी हो गया था।
तभी, करीम ने अचानक अपने हाथ हटा लिए। उसने अनीता को उस जलती हुई उत्तेजना के बीच एकदम अकेला छोड़ दिया।
करीम : "आज का कोटा पूरा हुआ मालकिन। अब जाइए, अपनी इस नाइटी को बदलिए... और शाम को जब मालिक आएँ, तो उन्हें ई लाल निशान दिखाइयेगा मत, वरना वो बेचारे सहम जाएँगे।"
अनीता वहीं दीवार के सहारे धीरे-धीरे फिसलती हुई फर्श पर बैठ गई। उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ था। वह चाहती थी कि करीम वापस आए, वह चाहती थी कि वह उन ३० मिनटों को और बढ़ा दे। लेकिन करीम एक मंझे हुए शिकारी की तरह बाहर निकल चुका था।
करीम आंगन में खड़ा होकर अपनी मूछों पर ताव दे रहा था। वह जानता था कि अब अनीता खुद अगले दिन का इंतज़ार करेगी।
करीम (मन ही मन): "अभी तो बस कपड़े के ऊपर से है मालकिन... जल्द ही ई काला मंदिर भी खुलेगा और ई पुजारी अपनी असली पूजा शुरू करेगा।"
रसोई के अंदर, अनीता अपनी उंगलियों से अपनी उसी गाँड को सहला रही थी जहाँ करीम के हाथों की जलन अभी भी बाकी थी।
Deepak Kapoor
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