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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
#62
र्बाथरूम में तूफ़ान --1

  
रात का सन्नाटा गहरा चुका था। सरताज अभी तक ऑफिस से नहीं लौटा था, और घर के बाकी हिस्से में खामोशी छाई थी। शेर अपने कमरे में था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। उसके दिमाग में दिन भर के वो तमाम दृश्य किसी फिल्म की तरह चल रहे थे—मीरा का वो नंगा पेट, उसकी गोल गाँड, और गाड़ी से उतरते वक्त दिखी उसकी गोरी टांगें।

 
उसे पता था कि मीरा सोने से पहले एक बार बाथरूम ज़रूर जाएगी। वह दबे पाँव, उस गलियारे में पहुँचा जहाँ बाथरूम की दीवार वाला वह गुप्त छेद था। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

 
जैसे ही वह उस छेद के पास पहुँचा, उसे अंदर से पानी गिरने की हल्की आवाज़ सुनाई दी। उसने अपनी कांपती हुई आँख उस बारीक सुराख से सटा दी।

 
 
शेर ने अपनी सूखी हुई जीभ होंठों पर फेरी और बुदबुदाया, "अरे यार... काश ये छेद थोड़ा और बड़ा होता। साला, कुछ साफ़-साफ़ दिखाई ही नहीं दे रहा। बस ज़रा सा और चौड़ा होता तो मज़ा आ जाता..."
 

उसने अपनी आँख को उस सुराख पर और ज़ोर से टिका दिया, जैसे उसे ही फाड़कर बड़ा कर देगा। पर फिर खुद को ही समझाया, "नहीं शेर, अभी के लिए यही सुराख तेरी किस्मत है। जो दिख रहा है, उसी में सबर कर, वरना ये भी हाथ से जाएगा।"

 
 
अंदर का नज़ारा देखते ही शेर की साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। मीरा ने अपनी गुलाबी साड़ी उतार दी थी और वह सिर्फ अपने ब्लाउज़ और पेटीकोट में खड़ी थी। वह आईने के सामने खड़ी होकर अपने बालों को खोल रही थी। ब्लाउज़ के पीछे की डोरियाँ खुली हुई थीं, जिससे उसकी पूरी गोरी और चिकनी पीठ शेर की आँखों के ठीक सामने थी।

 
मीरा ने धीरे से झुककर अपने पेटीकोट की नाड़ी ढीली की और उसे नीचे सरका दिया। जैसे ही पेटीकोट पैरों के पास ढेर हुआ, शेर की सांसें थम सी गईं। उस गिरते हुए कपड़े के नीचे मीरा ने एक गुलाबी रंग की महीन पैंटी पहन रखी थी, जो उसकी सुडौल गाँड को बमुश्किल ही ढंक पा रही थी।

 
गुलाबी रेशम के उस छोटे से टुकड़े से बाहर झांकता वह गोरा मांस और उसकी सुडौल बनावट अपनी पूरी शान में शेर के सामने थी। वह इतनी करीब, इतनी मादक लग रही थी कि शेर की आँखों में एक अजीब सी तड़प उतर आई।

 
उसका दिमाग पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी लार गटकते हुए दबी आवाज़ में बुदबुदाया:
 
"अरे बाप रे! मेमसाह ने तो भीतर इतनी छोटी सी कच्छी पहन रखी है कि बस नाम की है। साला, ये भला क्या ढकेगी? सारी गाँड तो बाहर ही है, बस नाम के लिए एक पट्टी लटकी हुई है। ये गोरा मांस तो जैसे बाहर आने को तड़प रहा है। क्या कसरती और गोल बनावट है, कसम से देख कर ही कलेजा मुँह को आ रहा है।"

 
उसने अपनी उंगलियों को हवा में ही मोड़ा, जैसे वह सच में उसे छू रहा हो, और उत्तेजना में फुसफुसाया, "बस एक बार... बस एक बार हाथ लगाने को मिल जाए, तो इस रेशम के नीचे दबे उस गोरे मांस को ऐसा मसल दूँ कि मेमसाह के मुँह से चीख निकल जाए... ऐसी कराह उठें कि सुनने वाले का रोम-रोम काँप जाए। हाय रे मल्लिका, क्या चीज़ है तू!"

 
तभी मीरा ने अपने पेट पर हाथ फेरा और उसे सहलाने लगी। वह अपने होने वाले बच्चे से जैसे मन ही मन बातें कर रही थी। शेर ने देखा कि उसका वह मखमली पेट अब और भी ज़्यादा चमक रहा था।

 
उसकी नज़रें मीरा के पेट पर जम गईं। "अरे! ये तो वही नंगा पेट है जिसे मैंने आज छुआ था..." उसने अपनी उंगलियों को आपस में रगड़ा, मानो उस छुअन को दोबारा महसूस करने की कोशिश कर रहा हो। "कितना मुलायम था, जैसे मखमल। मन तो कर रहा है कि अभी यहाँ से हाथ बढ़ाऊँ और फिर से उस चमकती हुई खाल को सहला दूँ। काश... काश एक बार फिर वो मौका मिल जाए।"

 
मीरा के हाथ ऊपर उठे और उसने धीरे-धीरे अपने ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। जैसे ही उसने ब्लाउज़ उतारकर एक तरफ रखा, शेर की धड़कनें और तेज़ हो गईं।

 
उसने नीचे गुलाबी रंग की एक तंग ब्रा पहन रखी थी, जो उसके सुडौल और उभरे हुए स्तनों के सैलाब को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। वह ब्रा इतनी छोटी थी कि उसके वक्षों की गोलाई ऊपर और नीचे से बाहर छलक रही थी, जैसे वे किसी भी पल उस रेशमी बंधन को तोड़कर आज़ाद हो जाएंगे।

 
मीरा ने एक झटके में अपनी पीठ के पीछे ब्रा का हुक खोल दिया। जैसे ही वह रेशमी बंधन ढीला हुआ, उसके सुडौल और भरे हुए स्तन किसी बांध के टूटने की तरह आज़ाद होकर बाहर गिर पड़े।

 
शेर ने अपनी आँखें फाड़कर देखा; वे स्तन किसी पके हुए रसीले फल की तरह लटके हुए थे, जिनके सिरों पर गुलाबी निप्पल अपनी पूरी रंगत और उभार के साथ चमक रहे थे।

 
इसके बाद मीरा धीरे से नीचे की ओर झुकी। उसकी सुडौल और रेशमी गाँड शेर की नज़रों के ठीक सामने ऊपर उठी, जबकि उसने अपनी गुलाबी पैंटी को धीरे-धीरे अपने पैरों से उतारकर अलग कर दिया। झुकने की उस मुद्रा में मीरा का शरीर एक कामुक चाप की तरह तन गया था—ऊपर से लटकते हुए वे सुडौल स्तन और पीछे की ओर उभरी हुई वह सुडौल गाँड।

 
शेर का 'लंड' अब उसकी पैंट फाड़कर बाहर आने को बेताब था। वह अपनी जगह पर खड़ा कांप रहा था। उसके सामने मीरा अब पूरी तरह नग्न थी, अपनी देह को पानी की फुहारों के नीचे ले जाने के लिए तैयार। वह वही रूप था जिसे शेर ने सुबह देखा था, लेकिन इस बार दिन भर के स्पर्श ने उसकी हवस को कई गुना बढ़ा दिया था।

 
शेर (मन ही मन फुसफुसाते हुए): "आह... मीरा मैडम... आज तो जान ही निकाल लोगी क्या? कास उस साब की जगह हम होते... तो रात भर तुम्हें चैन नहीं लेने देते।"

 
 
बाहर अचानक गाड़ी के रुकने की आवाज़ गूँजी। शायद सरताज वापस आ गया था। शेर ने तुरंत उस छेद से अपनी आँखें हटाईं और खुद को पीछे खींच लिया। उसका दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था, लेकिन वह फुर्ती से कमरे से बाहर निकल आया ताकि सरताज का स्वागत कर सके।

 
पर उस वक्त शेर के दिमाग में सिर्फ गालियां चल रही थीं। उसने दांत पीसते हुए फुसफुसाकर कहा:
 
"अबे इस साले सरताज की तो... माँ की चोद! साले को अभी आना था? सारा मज़ा कबाब कर दिया हरामजादे ने। बस दो मिनट और रुक जाता तो कुछ और ही नज़ारा मिल जाता।"

 
उसने अपने चेहरे पर आई हवस की लाली को पोंछा और गुस्से में पैर पटकते हुए बुदबुदाया, "साला रंडी का बच्चा, एकदम सही टाइम पर टाँग अड़ाने आ गया। इतनी बढ़िया गाँड देख रहा था और इसने अपनी गाड़ी का हार्न बजा दिया। साला कबाब में हड्डी!"
 

उसने दिल की धड़कन को काबू में करते हुए मन ही मन बोला, "जाता हूँ, वरना साले को शक हो जाएगा। पर याद रखूँगा बेटा, आज तूने मेरा बहुत बड़ा नुकसान किया है।"

 


 
 
सरताज ने भीतर कदम रखते हुए अपनी जैकेट उतारी और शेर की ओर देखते हुए पूछा, "और भाई शेर, क्या हाल-चाल है? सब ठीक तो है?"

 
शेर ने खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करते हुए जवाब दिया, "जी साहब, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बस आपका इंतज़ार कर रहा था, आज आप काफी लेट हो गए हैं।"

 
पर शेर के दिमाग के भीतर कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। जैसे ही उसने सरताज को देखा, उसके ज़हन में अभी-अभी बाथरूम के सुराख से देखा गया नज़ारा कौंध गया—मेमसाह की नंगी पीठ, उनकी उभरी हुई गांड और छलकती हुई सुडौल चुचियाँ

 
वह मन ही मन सोचने लगा, "हाँ साहब, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ, आखिर अभी-अभी तुम्हारी बीवी की चुचियाँ और गांड जो जी भर के देख कर आया हूँ... उस सुराख ने तो आज मेरी किस्मत ही खोल दी।"

 
सरताज ने एक थकी हुई मुस्कान बिखेरी और कहा, "हाँ, आज काम बहुत ज़्यादा था, वक्त का पता ही नहीं चला। अच्छा, मीरा मैडम कहाँ हैं?"

 
शेर ने धीरे से कहा, "जी, वो अपने कमरे में हैं।"

 
सरताज ने सिर हिलाया और "ठीक है" कहते हुए भारी कदमों से अपने बेडरूम की ओर बढ़ गया, बेखबर कि चंद लम्हों पहले उस कमरे की दीवार के पीछे शेर की दुनिया थमी हुई थी।

 
सरताज जैसे ही कमरे के भीतर दाखिल हुआ, उसे चारों तरफ खामोशी मिली। कमरा खाली था, लेकिन तभी उसे पास के बाथरूम से गिरते हुए पानी की छप-छप सुनाई दी।

 
उसके चेहरे पर एक गहरी और थकी हुई मुस्कान आ गई। वह जानता था कि मीरा अंदर है। अपनी थकान भूलकर, वह दबे पांव बाथरूम के दरवाजे की ओर बढ़ने लगा, उसकी आँखों में अपनी पत्नी के लिए चाहत साफ दिख रही थी।

 
दूसरी ओर, बाहर खड़ा शेर एक अजीब सी कशमकश में था। उसका दिमाग बार-बार उसे आगाह कर रहा था कि सरताज घर वापस आ चुका है और इस वक्त पकड़े जाने का अंजाम बहुत बुरा हो सकता है।

 
लेकिन मीरा के उस सुडौल शरीर, गोरी रंगत और उन गुलाबी निप्पल्स की याद ने उसके भीतर जो आग सुलगाई थी, वह सरताज के खौफ से कहीं ज़्यादा तेज़ थी।

 
उसकी वासना और बेकाबू होती उत्सुकता ने डर पर जीत हासिल कर ली थी। मीरा के उस नग्न और मादक रूप को दोबारा देखने की तलब उसे किसी नशे की तरह अपनी ओर खींच रही थी। उसने एक ठंडी सांस भरी, अपने कांपते हाथों को संभाला और दबे पांव वापस उसी छेद की ओर बढ़ गया।

 
सरताज घर में था, खतरा सिर पर था, मगर मीरा के बदन की वो एक झलक पाने की चाहत उसके लिए हर खतरे से बड़ी हो चुकी थी।

 
जैसे ही उसने दोबारा दीवार के उस बारीक छेद पर अपनी आँख गड़ाई, उसकी सांसें फिर से भारी होने लगीं।

 
उसकी आँख उस सुराख से ऐसे चिपकी थी जैसे वही उसकी दुनिया हो। अंदर मीरा अब पूरी तरह बेपर्दा थी। वह शावर के नीचे खड़ी थी और गर्म पानी की बूंदें उसके कंधों से फिसलकर उसकी रसीली देह के उतार-चढ़ाव को चूम रही थीं।

 
शेर की नज़रें सबसे पहले मीरा के उन  सुडौल चुचियों  पर टिकीं, जो पानी के स्पर्श से और भी उत्तेजित लग रहे थे। पानी की बूंदें उनके गुलाबी निप्पलों से टकराकर नीचे गिर रही थीं। मीरा ने अपने हाथों में साबुन लगाया और अपनी देह को सहलाने लगी।

 
जब उसके हाथ उसके चुचियों पर घूमने लगे, तो शेर के गले से एक दबी हुई कराह निकल गई। वह मंज़र इतना मादक था कि शेर का हाथ अनजाने में ही अपनी पैंट की जिप पर पहुँच गया।

 
मीरा ने अब अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ाया, उस नंगे पेट  पर, जिसे शेर ने दिन में छुआ था। पानी की वजह से वह हिस्सा किसी संगमरमर की तरह चमक रहा था। उसकी गहरी नाभि में पानी की कुछ बूंदें जमा हो गई थीं। जैसे-जैसे मीरा का हाथ नीचे की ओर सरका, शेर की धड़कनें बेकाबू होने लगीं।

 
तभी मीरा पानी के नीचे थोड़ा मुड़ी। अब शेर के सामने उसकी वह गोल और सुडौल गाँड थी। गीली होने की वजह से उसकी त्वचा पर रोशनी का ऐसा परावर्तन हो रहा था कि शेर का दिमाग सुन्न हो गया। वह हिस्सा इतना मांसल और कामुक था कि शेर को दिन भर का वह नज़ारा याद आ गया जब गाड़ी से उतरते वक्त उसने इस गोलाई को करीब से देखा था।

 
मीरा ने झुककर अपनी नंगी और चिकनी टांगों पर साबुन मलना शुरू किया, जिससे उसकी देह का वह पिछला हिस्सा और भी उभरकर सुराख के सामने आ गया। शेर की आँखें फटी की फटी रह गईं, वह उस बारीक छेद से लगभग चिपक ही गया।

 
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं और वह पागलपन की हद तक बुदबुदाया:
 
"ओह तेरी... क्या मस्त और चिकनी टांगें हैं! आज तो बस इसकी पिंडलियों को छुआ था और कलेजे में ठंडक पड़ गई थी, पर असली माल तो ऊपर है। काश... काश मेरा हाथ एक बार इस रेशमी जांघ पर पहुँच जाए। साला, मन तो ऐसा कर रहा है कि इसे कच्चा ही चबा जाऊं।"

 
उसने अपनी सूखी हुई जीभ से होठों को चाटा और उसकी आँखों में हवस का शैतान नाचने लगा। "क्या मांसल और गोरी जांघें हैं, कसम से देख कर ही बंदा पागल हो जाए। जी करता है कि अभी सारा डर-वर छोड़कर अंदर घुस जाऊं और इस गोरे मांस को अपने दाँतों से काट लूँ। एकदम मक्खन जैसी चीज़ है, साला चबाने का दिल करता है।"

 
वह पूरी तरह बेकाबू हो रहा था, उसका हाथ अनजाने में ही अपनी जांघों पर फिरने लगा जैसे वह कल्पना में मीरा की उन भारी और चिकनी जांघों को सहला रहा हो।

 
शेर (कांपते हुए होंठों से): "उफ़्फ़... क्या चीज़ बनाई है ऊपर वाले ने... ऐसी देह तो किसी महारानी की भी नहीं होगी।"

 
मीरा की देह जैसे-जैसे हरकत कर रही थी, शेर की नज़रों के सामने एक नया और बेहद निजी नज़ारा खुल गया। उसने देखा कि नीचे गुलाबी होंठों की वह कोमल लकीर साफ़ झलक रही थी, जो पूरी तरह से साफ़ और चिकनी थी। शेर की सांसें जैसे गले में ही अटक गईं। वह अपनी आँखें उस सुराख पर गड़ाए कभी मीरा के चेहरे वाले गुलाबी होंठों को देखता और कभी नीचे के उन मासूम और गीले गुलाबी होंठों को।

 
वह पूरी तरह से सुध-बुध खो चुका था और पागलपन में बड़बड़ाने लगा:
"अरे बाप रे! ये क्या देख लिया... नीचे के वो गुलाबी होंठ तो कयामत ढा रहे हैं। एकदम साफ़ और चिकने! ऊपर वाले होंठ भी गुलाबी और नीचे वाले भी... सच में, ये दोनों ही किसी को भी पागल कर देने के लिए काफी हैं। ऊपर देखूँ या नीचे, साला दिमाग चकरा रहा है।"

 
फिर उसके मन में सरताज के लिए जलन का एक और सैलाब उमड़ा। उसने दांत पीसते हुए ईर्ष्या में कहा:
 
"इस साले सरताज की तो सच में ऐश है भाई! क्या गजब की चीज़ हाथ लगी है इसके। पक्का ये साला रात-भर इन्हें ही चूसता होगा। क्या स्वाद लेता होगा हरामजादा... जी करता है कि सरताज की जगह मैं होता और इन दोनों गुलाबी होंठों का रस जी भरकर पीता। साला, किस्मत हो तो ऐसी!"

 
शेर का हाथ अब अपनी पैंट के अंदर तेज़ी से चलने लगा था। उसे बाहर सरताज के भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, जो शायद बाथरूम की ओर बढ़ रहे थे। सरताज अपनी पत्नी के पास पहुँचने वाला था, और यहाँ दीवार के पीछे उसका नौकर उसकी पत्नी की नग्नता को अपनी आँखों से पी रहा था।
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 31-01-2026, 12:30 PM



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