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Adultery लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल...
#59
अब आगे..


इस तरह घर में जो चुदाई का खेल शुरू हुआ था वो अगले कुछ दिन यूं ही चलता रहा लेकिन खिलाड़ी सिर्फ दो ही थे...सरिता और राजू। रिशा चाह कर भी इस खेल में शामिल नहीं हो पा रही थी। एक तो सरिता ने पहला ही बोल दिया था कि हमारे इस राज़ का राजू को पता ना चले और दूसरा सरिता राजू को छोड़ ही नहीं रही थी. अब तो सरिता रोज रात को सोने से पहले लालाजी के दूध के गिलास में नींद की गोली मिला देती और जब लाला बिस्तर पर खर्राटे मार रहा होता है तो सरिता वही बिस्तर पर राजू से अपना चूत की आग ठंडी करवाती।

[Image: IMG-5863.jpg]

रिशा ने कई बार दरवाजे की ओट से उन दोनों को बिस्तर पर एक दूसरे से संभोग करते देखा था। वापीस कमरे में आ वो अपनी चूत को अपने हाथों से शांत करने की कोशिश करती थी लेकिन लंड की भूख उंगली से कहां शांत होने वाली थी.

[Image: IMG-6256.jpg]
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RE: लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल... - by nitya.bansal3 - 31-01-2026, 09:34 AM



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