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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
समझौते का पहला दिन
 
रसोई का सन्नाटा दोपहर की गर्मी में और भी गहरा हो गया था। राज ऑफिस के काम से शहर जा चुके थे। अनीता रसोई में सब्जी काट रही थी, लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसे पता था कि 'तीस मिनट' का समय शुरू होने वाला है।
 
तभी नंगे पैरों की दबी-दबी चाप सुनाई दी। करीम उसके बिल्कुल पीछे आकर खड़ा हो गया।
 
उसकी गर्म साँसें अनीता की नंगी गर्दन पर टकराईं।
 
करीम (फुसफुसाते हुए): "अनीता बेटी... आज आप इस पीली साड़ी में बिल्कुल आग की लपट लग रही हैं। हमरी आँखें तो कब से तरस रही थीं इस मंजर के लिए। क्या मैं रसोई में, आपके काम करते हुए आपको थोड़ा छू सकता हूँ? बस थोड़ा सा सुकून चाहिए इस तड़पते हुए बूढ़े दिल को।"
 
अनीता का हाथ चाकू पर ही ठिठक गया। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, जैसे वह खुद को किसी गहरी खाई में गिरने से रोक रही हो।
 
अनीता (कांपती आवाज़ में): "करीम... तुम... तुम जानते हो हम क्या कर रहे हैं? प्लीज़, अभी नहीं। राज कभी भी फोन कर सकते हैं या... आह!"
 
अनीता के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली जब करीम के बड़े, काले हाथों ने उसकी साड़ी के नीचे से उसके गोरे और चिकने पेट को छू लिया। उसकी उंगलियाँ अनीता की त्वचा पर रेंगने लगीं।
 
करीम: "मालिक अभी नहीं आएंगे मालकिन। और ई आग तो आपने ही उस रात जलाई थी, जब आप हमें देख के आहें भर रही थीं। अब इस भूखे को ऐसे जलता हुआ छोड़ कर कहाँ जाएंगी? आपने ही तो वादा किया था कि आप मेरी बेचैनी कम करेंगी। अब बस देखते जाइये करीम की सेवा।"
 
करीम ने अपनी पकड़ और मज़बूत की और उसे पीछे से अपनी मज़बूत बाँहों में जकड़ लिया। उसका सख्त, चौड़ा सीना अनीता की कोमल और नाजुक पीठ से पूरी तरह सट गया। अनीता को अपनी पीठ पर करीम के बदन की गर्मी साफ़ महसूस हो रही थी।
 
अनीता : "उह्ह... करीम, छोड़ो मुझे... ये... ये गलत है। तुम अपनी मर्यादा भूल रहे हो। ... आह! मत करो..."
 
करीम (गर्दन पर जीभ फेरते हुए): "मर्यादा तो उस दिन खत्म हो गई थी मेमसाहब, जब आपने इस गरीब को अपनी जवानी का जलवा दिखाया था।  हम तो बस आपकी इस कोमल त्वचा को महसूस कर रहे हैं। जो कंपन आपके बदन में है ना, वही तो हमें बता रहा है कि ई गोरा बदन भी हमरी इन काली उंगलियों का इंतज़ार कर रहा था।"
 
करीम ने अपनी दोनों भारी हथेलियाँ अनीता की चुचियों पर जमा दी थीं। वह उन्हें धीरे-धीरे महसूस कर रहा था। उसके हाथों की गर्मी और सख़्ती अनीता के ब्लाउज के कपड़े को चीरकर उसके मांस में उतर रही थी।
 
करीम: (अनीता के कान के लोलक को दांतों से हल्का सा दबाते हुए) "मालकिन... आप कितनी कोमल हैं। सच में... मालिक बहुत खुशनसीब हैं कि उन्हें रोज़ ई मक्खन जैसा बदन सोने को मिलता है। पर उन्हें का पता कि ई मक्खन तो असली आग देख के पिघलता है।"
 
अनीता: (सिसकते हुए और दीवार से सटते हुए) "आह! करीम... छोड़ो... प्लीज़... मैं कह रही हूँ न, हट जाओ!... उह्ह!"
 
करीम पर इन बातों का कोई असर नहीं हो रहा था। अगले दो मिनट तक वह बिल्कुल खामोश रहकर अपनी उंगलियों के जादू से अनीता के चुचियों को सहलाता रहा। उसके हाथ कभी नीचे से ऊपर की ओर भारी दबाव बनाते, तो कभी गोल-गोल घूमते हुए अनीता के निप्पलों को अपनी हथेली के नीचे कुचलते।
 
करीम के काले और मोटे होंठ अब अनीता की नंगी पीठ पर रेंग रहे थे। वह अपनी गीली जीभ से उसकी रीढ़ की हड्डी के पास वाले हिस्से को चाट रहा था, जिससे अनीता के शरीर में रह-रहकर बिजली के झटके लग रहे थे।
 
करीम: (अनीता के कान के पास अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए) "अनीता बेटी... याद है उस दिन? तुम कह रही थी ना कि तुम करीम से कहोगी—करीम, मसल दे इन्हें! ये अब तुम्हारे ही हैं... निचोड़ दे अपनी उन काली हथेलियों में।"
 
अनीता की आँखें मुँद गईं।
 
करीम: (अनीता के चूचों पर अचानक हल्का सा दबाव बढ़ाते हुए) "तो लो मालकिन... अब जब करीम सच में सामने है, तो शर्म काहे की? अब ई हमरी काली हथेलियाँ ही तोहरा इलाज करेंगी। ई जो तुम 'आह-आह' कर रही हो ना, ई मालिक के लिए नहीं, ई तो ई जंगली नौकर के लिए है।"
 
करीम ने अपनी पकड़ और मज़बूत की और अनीता के चूचों को अपनी मुट्ठियों में भरकर ज़ोर से भींच दिया।
 
अनीता: (एक लंबी और गहरी सिसकी भरते हुए, जिसे वह रोक नहीं पाई) "आह्ह्ह्ह्ह... करीम! उह्ह... माँ... तुम... तुम तो सच में जान निकाल दोगे! रुक जाओ... ई... ई जंगलीपन... आह्ह!"
 
अनीता का शरीर धनुष की तरह तन गया था। अनीता का पूरा शरीर शर्म और उत्तेजना के बीच झूल रहा था।
 
अनीता की सांसें उखड़ रही थीं। एक तरफ उसे लग रहा था कि वह गलत कर रही है, लेकिन करीम की छुअन उसके शरीर में एक ऐसी कामुक सनसनी पैदा कर रही थी जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पा रही थी।
 
करीम अपनी उंगलियों से ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से ही उसके निप्पलों को बुरी तरह मसलने लगता है। अनीता की सांसें उखड़ने लगती हैं और वह खुद को संभालने के लिए रसोई के पत्थर को कसकर पकड़ लेती है।
 
अनीता (हाँफते हुए): "ओह गॉड... करीम... रुक जाओ... उह्ह... तुम... तुम बहुत गंदे हो... आह! मेरे निप्पल्स... मत करो..."
 
करीम: "हम तो गंदे हैं ही मालकिन, गोबर में पले हैं। पर आप तो गुलाब हैं। देखिए तो सही, आपका यह पेट... कितना मखमली है। जी चाहता है यहीं खो जाऊं।"
 
करीम जीभ से उसकी नंगी पीठ को चाट रहा था। उसकी जीभ की नमी जब अनीता की त्वचा पर लगती, तो वह बुरी तरह सिहर उठती। करीम ने अपनी कमर को अनीता के सुडौल कूल्हों से सटा दिया था—अनीता अपनी पीठ पर उसके लंड की कठोरता और दबाव को साफ़ महसूस कर पा रही थी।
 
अनीता: "करीम... आह... तुम... तुम क्या कर रहे हो पीछे? हटो... उह्ह... मुझे डर लग रहा है..."
 
करीम : "डरिए मत मालकिन, ई तो बस उस प्यार की एक झलक है जो हम आपसे करना चाहते हैं। आपकी पीठ की ये ढलान... इतनी साफ़ और चिकनी है कि मेरा मन डोल रहा है।"
 
करीम के हाथ लगातार उसके चुचियों और उसके चिकने पेट पर घूम रहे थे। वह कभी उसके पेट की नरमी को सहलाता, तो कभी अपने हाथों से उसके चुचियों को बुरी तरह मसलने लगता। अनीता अब पूरी तरह टूट चुकी थी, उसके मुँह से बस बेतहाशा सिसकियाँ निकल रही थीं।
 
तभी, लगभग २२ मिनट बाद, जब अनीता उत्तेजना के उस मोड़ पर थी जहाँ वह कुछ भी करने को तैयार थी, करीम ने अचानक अपने हाथ खींच लिए और दो कदम पीछे हट गया।
 
करीम (शांत आवाज़ में): "आज के लिए इतना ही सुकून काफी है मालकिन... वरना मैं खुद पर काबू खो दूँगा और आप फिर से मुझे तमाचा जड़ देंगी। मैं नहीं चाहता कि मेरा दिल फिर से दुखे।"
 
अनीता वहीं स्लैब का सहारा लिए खड़ी रह गई। उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था।
 
करीम बहुत चालाक निकला। जब उसे लगा कि अनीता उत्तेजना के उस चरम बिंदु पर पहुँच गई है जहाँ वह पूरी तरह टूट सकती है और कुछ भी करने को तैयार है, उसने अचानक अपने हाथ खींच लिए। 22 मिनट के उस तूफानी और हवस भरे स्पर्श के बाद, उसने अनीता को एक झटके में उस जलती हुई आग के बीच अकेला छोड़ दिया।
 
पीछे खड़ी अनीता की हालत ऐसी थी जैसे किसी ने दहकती आग के बीच उसे बीचों-बीच छोड़ दिया हो। उसका सुडौल शरीर थरथरा रहा था, उसकी पीली साड़ी बेतरतीब हो चुकी थी और उसके सपाट पेट और नंगी पीठ पर अभी भी करीम के हाथों की छुअन और उसकी गीली जीभ की सनसनी बाकी थी। वह रसोई के स्लैब का सहारा लेकर वहीं खड़ी रह गई, उसकी सांसें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं और उसका सीना तेज़ी से धड़क रहा था।
 
करीम का इस तरह अचानक चले जाना अनीता को और भी ज़्यादा बेचैन कर गया। वह उस वक्त उत्तेजना के उस मोड़ पर थी जहाँ उसका शरीर किसी भी मर्यादा को भूलने के लिए तैयार था। लेकिन करीम का असली मकसद यही था—वह उसे सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ना चाहता था।
 
वह चाहता था कि अब अनीता खुद उसके पीछे आए और उस 'सुकून' की भीख माँगे जो उसने अभी अधूरा छोड़ दिया था। वह चाहता था कि अनीता खुद उससे कहे कि वह अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती।
 
अनीता की टांगों में जैसे जान ही नहीं बची थी; वह रसोई के ठंडे फर्श पर ही बैठ गई। उसे आज पहली बार महसूस हो रहा था कि अब वह अपनी मर्जी की मालकिन नहीं रही।
 
करीम ने अपनी चालाकी और अपने उस 'अधूरे स्पर्श' का गुलाम बना लिया था। वह उस ३० मिनट के कोटे के लिए अब अगले २४ घंटे का इंतज़ार कैसे करेगी, यही सोचकर उसका दम घुट रहा था।
 
रात का सन्नाटा बेडरूम में पसरा हुआ था, लेकिन अनीता के भीतर एक भीषण शोर मचा था। राज बेड पर उसके बगल में लेटे हुए थे और रोज़ की तरह प्यार जता रहे थे, लेकिन अनीता का मन कहीं और था।
 
एसी की ठंडक के बावजूद अनीता के शरीर में एक अजीब सी तपिश थी। राज ने धीरे से अपना हाथ अनीता की कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा।
 
राज: "अनीता... तुम आज कुछ खोई-खोई सी लग रही हो? सब ठीक तो है न?"
 
अनीता ने चौंककर राज की तरफ देखा और एक झूठी मुस्कान ओढ़ ली। "हाँ राज... बस थोड़ी थकान है।"
 
राज ने उसके माथे को चूमा और धीरे-धीरे उसके ब्लाउज की डोरियों से खेलने लगे। जैसे ही राज की उंगलियों ने उसकी त्वचा को छुआ, अनीता के दिमाग में बिजली की तरह दोपहर का वह मंजर कौंध गया। राज के हाथ बहुत कोमल और सलीके वाले थे, लेकिन उसकी त्वचा को अब उस 'जंगलीपन' की तलाश थी जो करीम ने उसे दोपहर में चखाया था।
 
अनीता ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसे राज के स्पर्श में वह बिजली महसूस नहीं हो रही थी। उसके ज़हन में बार-बार करीम के वे मोटे, खुरदरे हाथ और उसके पसीने की गंध घूम रही थी। उसे महसूस हो रहा था जैसे करीम के वे काले हाथ अभी भी उसके पेट को मरोड़ रहे हैं।
 
जब राज ने उसके करीब आकर उसके गले पर होंठ रखे, तो अनीता को करीम की वह गीली जीभ याद आ गई जो उसकी रीढ़ की हड्डी पर रेंग रही थी। उसके शरीर में एक थरथराहट हुई। राज को लगा कि यह उनके प्यार का असर है, लेकिन हकीकत में अनीता उस 'अधूरेपन' में जल रही थी जो करीम छोड़ कर गया था।
 
अनीता के मन में द्वंद्व चल रहा था—'मैं कितनी गिर गई हूँ? मेरा पति मुझे प्यार कर रहा है और मैं उस नौकर के बारे में सोच रही हूँ? उस गंदे इंसान के बारे में जिसने मुझे बेइज्जत किया? पर... पर उसके हाथों में वो जादू क्या था?'
 
राज: (फुसफुसाते हुए) "अनीता... तुम आज बहुत गर्म हो रही हो। तुम्हारी साँसें इतनी तेज़ क्यों हैं?"
 
अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस राज को कसकर गले लगा लिया। उसने अपनी आँखें बंद कीं और कल्पना करने लगी कि जो हाथ उसे छू रहे हैं, वे राज के नहीं बल्कि करीम के हैं। उसे याद आने लगा कि कैसे करीम ने उसकी चुचियों को अपनी मुट्ठियों में भींचा था। उस याद मात्र से अनीता का निचला हिस्सा गीला होने लगा।
 
वह राज के साथ चरम सुख की ओर बढ़ रही थी, लेकिन उसके दिमाग में तस्वीर करीम की थी। उसे महसूस हो रहा था कि करीम उसके कान में फुसफुसा रहा है— "ई जो तुम आह-आह कर रही हो ना, ई मालिक के लिए नहीं, ई तो ई जंगली नौकर के लिए है।"
 
जैसे ही वह चरमोत्कर्ष (climax) पर पहुँची, उसके मुँह से एक दबी हुई आवाज़ निकली—"करीम..."
 
उसने आखिरी पल में अपनी आवाज़ को गले में ही घोंट दिया ताकि राज सुन न लें। वह पसीने से तरबतर थी और उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। राज संतुष्ट होकर उसके बगल में लेट गए और कुछ ही देर में उनकी नींद की गहरी साँसें सुनाई देने लगीं।
 
लेकिन अनीता की नींद उड़ चुकी थी। वह अंधेरे में छत को तकती रही। करीम ने अपना मकसद पूरा कर लिया था। उसने अनीता के जिस्म को राज के पास छोड़ दिया था, लेकिन उसकी रूह और उसकी चाहत को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया था। अनीता को अब अगले दिन के उन '30 मिनटों' का बेसब्री से इंतज़ार था। वह खुद से नफरत कर रही थी।
 
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 30-01-2026, 08:59 PM



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