Thread Rating:
  • 230 Vote(s) - 4.7 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
करीम की चाल-2
 
अगली सुबह, जब अनीता रसोई में नाश्ता तैयार करने आई, तो उसने देखा कि करीम पहले से ही वहां खड़ा था। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखें झुकी हुई थीं और वह बहुत ही लाचार दिख रहा था। वह बिल्कुल वैसा 'वफादार नौकर' लग रहा था जिसे अपनी गलती का बेहद अफसोस हो।

 
जैसे ही अनीता अंदर आई, करीम फौरन पीछे हट गया, जैसे किसी पवित्र चीज़ को छूने से डर रहा हो।

 
"मेमसाब... हम रात भर सो नहीं पाए," करीम ने बेहद धीमी और रुआंसी आवाज़ में कहा। "हमका माफ़ कर दीजिए। हमरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। पर... पर मेमसाब, हम क्या करते? उस रात जो हमने देखा, वो हमरी आँखों से हटता ही नहीं है। जब भी आँख मूंदते हैं, आपका वो रूप... वो आपकी पुकार... हमरा नाम..."

 
उसने एक गहरी सांस ली और अपनी आवाज़ में थोड़ा दर्द और थोड़ी मिठास घोल दी।

 
"हम तो छोटे आदमी हैं हुज़ूर, गलती हो गई। पर गलती की शुरुआत तो आपने ही की थी न? वो दरवाज़ा खुला छोड़ के... हमरा नाम पुकार के... आपने हमरी मरदानगी को ललकारा था मालकिन। एक नौकर को 'मर्द' बनाने वाली आप ही थीं। अब हम रात-दिन बस वही देखते रहते हैं... आपकी वो बिना कपड़ों वाली मूरत हमरी आँखों में बस गई है। अब आप ही बताइए, हम कहाँ जाएँ?"

 
अनीता ने कांपते हाथों से गिलास को स्लैब पर रखा। करीम की आवाज़ में जो 'इल्ज़ाम' था, वह उसे भीतर तक छलनी कर रहा था। उसे लग रहा था जैसे करीम ने आईना दिखाकर उसे उसकी ही नज़रों में छोटा कर दिया हो। वह उस सच से भागना चाहती थी जिसे करीम बार-बार कुरेद रहा था।

 
उसने खुद को संभाला, चेहरे पर एक सख्त नकाब ओढ़ा और करीम की तरफ देखे बिना ही बहुत धीमी लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा।

 
अनीता: "बस करो करीम। मैं इस बारे में अब एक शब्द भी नहीं सुनना चाहती। जो हुआ, वो एक भयानक गलती थी... एक ऐसा हादसा जिसे मैं याद भी नहीं करना चाहती।"

 
करीम ने अपनी गर्दन थोड़ी झुकाई, पर उसकी आँखों की चमक कुछ और ही कह रही थी। अनीता ने अपनी बात जारी रखी।

 
अनीता: "बेहतर यही होगा कि तुम मुझसे दूर रहो। अपना काम करो और मेरे सामने आने की कोशिश मत करना। अगर तुम अपनी सीमा में रहोगे, तो शायद मैं उस सुबह की बात भूल जाऊं। वरना..."

 
उसने एक पल के लिए राज की उस पिछली रात वाली बात सोची—"बिना हाथ उठाए भी बर्बाद करने के तरीके हैं"और फिर करीम की ओर देखा।

 
अनीता: "वरना अंजाम तुम्हारे लिए बहुत बुरा होगा। साहब तुम्हें बहुत मानते हैं, पर जिस दिन उनका माथा फिरा, वो तुम्हें इस लायक भी नहीं छोड़ेंगे कि तुम कहीं मुँह दिखा सको। इसलिए कह रही हूँ, अपनी ये 'मजबूरी' और ये 'यादें' अपने पास ही रखो।"

 
करीम के चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उसने महसूस किया कि मेमसाब उसे राज साहब की ताकत से डराने की कोशिश कर रही हैं। उसने एक गहरी सांस ली और पीछे हट गया, जैसे कोई घाघ शिकारी अपना जाल थोड़ा ढीला कर देता है ताकि शिकार को लगे कि वह आज़ाद है।

 
करीम: "ठीक है मालकिन... जैसा हुकुम आपका। हम तो छोटे आदमी हैं, आप कहें तो हम अपनी आँखें ही फोड़ लें? पर ई यादें... ई तो हमरी मर्जी से नहीं आई थीं न? ई तो आपने ही दी थीं।

 
अगले तीन दिनों तक बंगले में एक भारी तनाव बना रहा। अनीता और करीम के बीच एक अनकही खामोशी थी, लेकिन उस खामोशी में उस रात के वाकये की गूँज साफ़ सुनाई दे रही थी। अनीता हर पल खुद को अपराधी मान रही थी, वहीं करीम ने खुद को पूरी तरह दूर कर लिया था।

 
तीसरे दिन दोपहर को करीम अनीता के कमरे में आया। उसकी हालत आज बदली हुई थी। उसकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे और चेहरा उतरा हुआ था, जैसे वह वाकई पिछले तीन दिनों से भयानक मानसिक पीड़ा से गुज़रा हो।

 
उसने अनीता की आँखों में देखने से परहेज किया, जिससे अनीता के अंदर दबी हुई ग्लानि और भी गहराने लगी। उसे लगने लगा कि उसने एक मासूम और वफादार इंसान की मानसिकता को अपनी फंतासी की बलि चढ़ा दिया है।

 
अनीता ने करीम की ओर देखा। उसकी आँखें अपराधबोध से भरी हुई थीं। पिछले तीन दिनों से करीम की वह उतरी हुई शक्ल और उसकी बेचैनी ने अनीता को अंदर तक झकझोर दिया था।

 
जब करीम चाय की ट्रे लेकर कमरे में आया, तो अनीता ने देखा कि उसकी आँखें थकान और अनिद्रा से लाल थीं। उसने गहरी साँस ली और दबी आवाज़ में बात शुरू की।

 
अनीता: "करीम... माफ़ कर देना मुझे। उस दिन जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मैं वाकई शर्मिंदा हूँ। मैंने तुम्हें तमाचा मारा, तुम्हें बुरा-भला कहा... मुझे अपनी गलती का अहसास है।"

 
करीम ने एक गहरी आह भरी और अपना चेहरा झुका लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन और दर्द था।

 
करीम: "माफ़ी मत माँगिये मालकिन... आपकी माफ़ी से मेरे दिमाग में छपी आपकी वो तस्वीर नहीं मिटेगी। मैं पिछली तीन रातों से सो नहीं पाया हूँ। जब भी आँखें बंद करता हूँ, आपका वो बदन... आपकी वो आवाज़ याद आती है। आपने मुझे ऐसी आग में झोंक दिया है जहाँ मैं हर पल जल रहा हूँ। साहब के लिए तो वो महज़ एक खेल था, पर मेरे लिए तो वो हकीकत बन गई।"

 
उसने अपनी आवाज़ को और भी भावुक और टूटा हुआ बनाया, जैसे वह अंदर से पूरी तरह बिखर चुका हो।

 
अनीता: (बेचैनी से) "करीम, मैं समझ सकती हूँ कि तुम..."

 
करीम: (बात काटते हुए, भावुक होने का नाटक करते हुए) "नहीं मालकिन, आप कुछ नहीं समझ सकतीं। हम एक मर्द हैं, और बरसों से बिना औरत के अकेले रह रहे हैं ।उस रात... उस रात जब हमारी आँखों ने आपको उस हाल में देखा, और हमारा नाम लेकर जब आप पुकार रही थीं... तब से हम पागल हो गए हैं।"

 
अनीता: (नज़रें झुकाते हुए) "वह... वह सिर्फ एक खेल था करीम।"

 
करीम: (करीब आते हुए, फुसफुसाकर) "आपके लिए खेल होगा मालकिन, पर हमारी आँखों के सामने तो आपकी ऊ नंगी मूरत बस गई है। हम जहाँ देखते हैं, हमें आप वैसी ही दिखती हैं... नीली चड्डी में तड़पती हुई। आपकी ऊ आवाज़ें हमारी नींद उड़ा दी हैं। 'अनीता मैडम, आपका ऊ खेल अब हमारा दिमाग खराब कर रहा है... हमारी रगों में जैसे खून नहीं, तेजाब दौड़ रहा है'।"

 
करीम अपनी आँखों में एक बनावटी बेबसी और छिपी हुई मांग लेकर अनीता को घूरता है।

 
करीम: "हम गरीब जरूर हैं मालकिन, पर इंसान हैं। 'बरसों की प्यास को आपने एक रात में जगा दिया और अब कहती हैं कि भूल जाओ'। हम कैसे भूलें? जब भी आँख मूंदते हैं, आपका ऊ रसीला बदन हमारी बाहों में होने का एहसास दिलाता है। हम तड़प रहे हैं मालकिन... आपकी उस रात की पुकार हमें जीने नहीं दे रही।"

 
करीम: "मालकिन जी, आपने मुझे गुनाहगार बना दिया, जबकि मैंने तो बस वही किया जो आपने पुकारा था। अब इस घुटन के साथ मैं यहाँ काम कैसे करूँगा? मेरा मन बहुत अशांत है। मुझे नहीं पता कि मैं खुद को कैसे सँभालूँ, लेकिन इस दर्द के बदले मुझे कुछ राहत तो चाहिए होगी..."

 
6'2" के उस विशाल आदमी की आँखों में आँसू और चेहरे पर ऐसी लाचारी देखकर अनीता का दिल पूरी तरह पसीज गया। उसे लगा कि उसने वाकई एक मासूम इंसान की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर दिया है। वह उसकी ओर एक कदम और करीब बढ़ी।

 
अनीता (भावुक होकर): "करीम... तुम्हारी यह हालत अब मुझसे और नहीं देखी जा रही। मुझे बताओ, मैं तुम्हारी इस बेचैनी को कम करने के लिए क्या कर सकती हूँ? तुम जो कहोगे मैं वो करने को तैयार हूँ, बस खुद को इस तरह जलाना बंद करो। आखिर तुम्हें राहत कैसे मिलेगी?"

 
करीम ने धीरे से अपनी नज़रें उठाईं और अनीता के चेहरे की ओर देखा। उसे अपनी जीत का अहसास होने लगा था।

 
करीम: "मालकिन... मैं आपसे कोई धन-दौलत नहीं चाहता। लेकिन मेरी रूह को जो प्यास लगी है, उसे बस आपका स्पर्श ही शांत कर सकता है।"

 
करीम ने बड़ी चालाकी से नज़रें झुकाईं और लाचारी का ऐसा ढोंग रचा कि अनीता का कलेजा मुँह को आ गया।

 
करीम: "मैं जानता हूँ कि मैं एक अदना सा नौकर हूँ, इसलिए मैं कभी आपसे मर्यादा तोड़ने को नहीं कहूँगा। मैं वादा करता हूँ कि मैं कभी आपके कपड़े नहीं उतारूँगा... लेकिन बस, जब हम अकेले हों, तो आप मुझे खुद को अपने हाथों से छूने की अनुमति दे दें। सिर्फ रोज़ के तीस मिनट के लिए। बस इतना सा सुकून चाहिए मुझे, ताकि मैं जी सकूँ।"

 
अनीता यह सुनकर सन्न रह गई। उसका गला सूख गया और शब्द जैसे उसके हलक में ही फंस गए।

 
अनीता: "करीम, तुम यह क्या कह रहे हो? यह... यह कैसे मुमकिन है? मैं तुम्हारी मालकिन हूँ और तुम... तुम होश में तो हो?"

 
करीम ने तुरंत अपना भावनात्मक दांव फिर से चला। उसने अपनी आँखों में नकली नमी लाते हुए उसे और भी असहाय महसूस कराया।

 
करीम: "बेटी, मैं एक अकेला मर्द हूँ... बरसों से किसी औरत का साथ नहीं मिला। पर उस रात के बाद से मेरा चैन छिन गया है। अब तो दिन-रात मेरे दिमाग में सिर्फ आपकी वही तस्वीरें घूमती हैं। मैं पागलों की तरह आपकी यादों के पीछे भाग रहा हूँ। क्या आप वाकई चाहती हैं कि मैं इसी तरह तड़प-तड़प कर मर जाऊँ?"

 
अनीता का दिल फिर से पसीजने लगा। उसे लगा कि करीम की माँग बहुत 'कम' है। उसने सोचा कि साड़ी और ब्लाउज के ऊपर से छूने देने में क्या हर्ज़ है, अगर इससे एक बूढ़े आदमी की जान बचती हो? उसे अंदाज़ा नहीं था कि करीम ने जानबूझकर यह शर्त रखी थी ताकि वह 'हाँ' कहने पर मजबूर हो जाए।
 
करीम ने धीरे से फुसफुसाते हुए अपना अंतिम वार किया।

 
करीम: "सिर्फ तीस मिनट मालकिन... सिर्फ कपड़ों के ऊपर से। क्या आप इस करीम के लिए इतना भी नहीं कर सकतीं?"

 
अनीता ने एक लंबी साँस ली और अपनी आँखें मूँद लीं। कमरे में छाए सन्नाटे को उसकी कांपती हुई आवाज़ ने तोड़ा।

 
अनीता: "ठीक है करीम... सिर्फ तीस मिनट। और याद रहे, तुम कपड़ों को हाथ नहीं लगाओगे... उन्हें उतारोगे नहीं।"

 
करीम के चेहरे विजयी मुस्कान फैल गई। उसका शिकार जाल में पूरी तरह फँस चुका था। उसने अपनी बड़ी-बड़ी और खुरदरी हथेलियों को देखा, जो अब अनीता के रेशमी बदन पर अपनी मनमानी करने के लिए आज़ाद थीं।

 
अनीता अंदाज़ा नहीं था कि करीम ने अपनी माँग को जानबूझकर इतना कम रखा था ताकि वह 'हाँ' कहने पर मजबूर हो जाए, और बाकी का काम उसके मज़बूत हाथ अनीता के बदन में आग लगाकर कर देंगे।
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
  2. सम्मान और बदला ( 5th-Book in hindi)
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना




[+] 4 users Like Deepak.kapoor's post
Like Reply


Messages In This Thread
RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 28-01-2026, 01:04 PM



Users browsing this thread: SilentSawarn, 9 Guest(s)