25-01-2026, 03:50 AM
सरताज सिंह की गरज
सरताज सिंह खड़ा था—6 फुट 2 इंच की लंबाई, चौड़ी छाती, कंधों पर वर्दी का बोझ। भारतीय सिक्युरिटी सेवा का अधिकारी, जिसकी जिंदगी इंसाफ की लड़ाई में बीती थी।
उसका चेहरा सख्त था, दाढ़ी साफ-सुथरी, पगड़ी नीली—सिख धर्म की शान। वो अपने घर के ऑफिस में खड़ा था, फोन कान से लगाए, सामने वाले ऑफिसर से बात कर रहा था। आवाज में वो दृढ़ता थी जो दुश्मन को कांपा देती।
सरताज: (फोन पर, आवाज में गरजते हुए) "सुनो... मैं दोबारा नहीं कहूंगा। उस शख्स को जिंदा या मुर्दा, मुझे फर्क नहीं पड़ता। वो कितना ताकतवर है, कौन-सा मंत्री उसकी ढाल बन रहा है—ये सब बकवास है। मुझे बस उसकी गिरफ्तारी चाहिए... या उसकी लाश। समझे?"
दूसरी तरफ से कुछ हिचकिचाहट सुनाई दी। सरताज ने फोन को और कसकर पकड़ा, उसकी नसें उभर आईं।
सरताज: (और तेज आवाज में) "मैं सरताज सिंह हूं। सिख हूं। हमारा धर्म हमें सिखाता है कि अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाना। अगर जरूरत पड़ी तो अपनी जान देने से भी नहीं डरते। लेकिन अन्याय करने वाले को जिंदा नहीं छोड़ते। ये मेरी आखिरी बात है—उसे ढूंढो, पकड़ो, या खत्म करो। कल सुबह तक रिपोर्ट चाहिए।"
फोन रखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। सरताज ने एक गहरी सांस ली, अपनी पगड़ी को ठीक किया, और खिड़की की ओर मुड़ा। बाहर बारिश हो रही थी, लेकिन उसके मन में तूफान था।
वो जानता था कि जिस शख्स की बात हो रही थी—एक बड़ा गैंगस्टर, मंत्री का चहेता—वो आसानी से नहीं पकड़ा जाएगा। लेकिन सरताज सिंह कभी पीछे नहीं हटा। उसकी जिंदगी में इंसाफ सबसे ऊपर था।
उसी वक्त, घर में शेर चुपके से फोन पर सरताज की बात सुन रहा था। सरताज ने घर के लैंडलाइन पर ही बात की थी। शेर रूम के पास खड़ा था, फोन का रिसीवर कान से लगाए, सांस रोककर। सरताज की हर बात उसके कानों में तीर की तरह चुभ रही थी।
शेर का चेहरा सफेद पड़ गया। उसकी हथेलियां पसीने से भीग गईं। वो जानता था कि सरताज सिंह कोई आम आदमी नहीं है। वो सिक्युरिटीवाला है जिसने शंकर भाई को खत्म किया था—बिना किसी डर के।
शेर [आंतरिक विचार]: (कांपते हुए, दांत पीसते हुए) 'हे रब्बा... ये सरताज सिंह... ये तो शेर है असली वाला। मैंने सोचा था कि वो बस मीरा की हिफाजत करता है, लेकिन ये तो मौत का फरमान पढ़ रहा है। अगर इसे मेरी हवस का पता चला... अगर इसे मेरे छेद का, मेरी नजरों का, मेरी योजना का... तो मैं खत्म। जिंदा या मुर्दा—ये फर्क नहीं करता। ये मुझे मार डालेगा, और मीरा को बचाने के नाम पर खुशी-खुशी कर देगा।'
शेर का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वो फोन रखकर पीछे हटा, दीवार से टेक लगाकर बैठ गया। उसकी हवस अब भी जल रही थी—मीरा का नंगा बदन, वो स्तन, वो कूल्हे, वो गुप्त जगह—सब उसके दिमाग में घूम रहे थे। लेकिन अब उस हवस के साथ एक डर भी जुड़ गया था।
शेर [आंतरिक विचार]: (सिर पकड़कर) 'शंकर भाई... तूने कहा था कि मीरा सोना है, बस तपाना आना चाहिए। लेकिन तूने ये नहीं बताया कि सोने की रखवाली करने वाला शेर कितना खतरनाक है। सरताज सिंह... अगर ये जान गया कि मैं उसकी मेमसाब को अपनी आंखों से, अपनी हवस से निगल रहा हूं... तो मेरी लाश भी नहीं मिलेगी।'
उसने अपनी सांवली हथेलियों को देखा—वो हथेलियां जो मीरा के बदन को छूने के लिए तड़प रही थीं। लेकिन अब उनमें एक कंपकंपी थी। वो उठा, रूम से बाहर निकला।
शेर के लिए अब खेल बदल गया था। हवस अभी भी थी, लेकिन अब उसके साथ एक डर भी था—सरताज सिंह का डर।
शेर ने मन ही मन कसम खाई: 'अभी रुकना होगा... । सरताज सिंह को पता नहीं चलना चाहिए। लेकिन मीरा... तू मेरी होगी। बस थोड़ा और सब्र।'
लेकिन उसके मन में वो ठंडी सिहरन बनी रही—सरताज सिंह की वो आवाज, "मैं सिख हूं... हम अन्याय के सामने नहीं झुकते।" वो आवाज शेर के कानों में गूंजती रही, जैसे मौत की घंटी।
सरताज का घर से निकलना
सरताज सिंह ऑफिस रूम से बाहर निकलते हैं। उनका चेहरा अभी भी फोन वाली बातचीत की गंभीरता से भरा हुआ है, लेकिन जैसे ही वो लिविंग रूम में आते हैं, उनकी नजर मीरा पर पड़ती है। मीरा बाथरोब में है—सफेद रेशमी बाथरोब, बाल अभी भी गीले, कुछ बूंदें कंधों पर टपक रही हैं। वो ज्योति को गोद में लिए हुए है, हल्की मुस्कान के साथ। सरताज का चेहरा नरम पड़ जाता है।
सरताज: (अपनी आवाज़ नर्म करते हुए, मीरा की तरफ बढ़ते हुए) "मीरा... खुदा की कसम, जैसे ही तुम्हें देखा, सारी थकान कहीं धुएँ की तरह उड़ गई। अभी-अभी नहाकर निकली हो? गीले बालों की ये खुशबू... और तुम्हारे चेहरे का ये नूर... तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुम इस वक्त कितनी कयामत ढा रही हो।"
मीरा: (शर्माते हुए, बालों को पीछे करते हुए) सरताज... तुम आ गए? हाँ, थोड़ी देर पहले। आज ऑफिस में क्या हुआ? लग रहा है कुछ परेशान हो।
सरताज: (सिर हिलाते हुए, मीरा के पास आकर ज्योति के गाल पर हल्का सा चूमते हुए) कुछ नहीं... बस एक केस का। पर अब छोड़ो वो सब। सुनो, तैयार हो जाओ। हमें चंदन के घर जाना है। वो अभी भी बीमार है, मैं खुद जाकर हाल-चाल पूछना चाहता हूं। और हाँ... कुछ पैसे भी देना है उसे। मदद की जरूरत होगी।
मीरा: ठीक है, मैं तैयार हो जाती हूं। ज्योति को भी साथ ले चलें?
सरताज: (सोचते हुए) नहीं, ज्योति को यहां छोड़ देते हैं। पड़ोस वाली आंटी वो देख लेंगी। तुम बस जल्दी तैयार हो जाओ। साड़ी पहन लो, जो भी तुम्हें अच्छी लगे।
तभी शेर किचन की तरफ से आता है, हाथ में एक ट्रे में चाय का कप लिए। वो चुपचाप खड़ा हो जाता है, लेकिन आंखें मीरा के बाथरोब पर टिक जाती हैं—रेशम उसके बदन पर लिपटा हुआ, हल्का गीला, उभार साफ झलक रहे। शेर सिर झुकाता है, लेकिन मन में तूफान।
सरताज: (शेर को देखकर) शेर... तुम भी तैयार हो जाओ। हमारे साथ चलना है। चंदन तुम्हारा भी पुराना दोस्त है न? वो खुश होगा तुम्हें देखकर।
शेर: (विनम्रता से) जी साब... चंदन भाई? हाँ जी, वो तो मेरे लिए भाई जैसा है। मैं तैयार हूं। बस कपड़े बदल लूं?
सरताज: हाँ, जल्दी करो। हम आधे घंटे में निकलेंगे। मीरा तैयार हो जाएगी, फिर हम तीनों चलेंगे। चंदन के घर के बाद मैं सीधे ऑफिस चला जाऊंगा। मीरा, तुम वापस शेर के साथ आ जाना।
मीरा: (मुस्कुराते हुए) ठीक है सरताज। मैं बस दस मिनट में तैयार हो जाती हूं।
सरताज: (मीरा का हाथ पकड़कर, प्यार से) अच्छा। और हाँ... आज शाम को जल्दी घर आऊंगा। तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताना है।
मीरा: (आंखों में चमक, शर्माते हुए) हाँ... मैं इंतजार करूंगी।
सरताज मीरा के माथे पर हल्का सा चुंबन देते हैं, फिर ज्योति को गोद में लेकर खेलते हैं। शेर चुपचाप खड़ा देखता है—उसकी आंखों में जलन, डर, और हवस का मिश्रण। वो मन ही मन सोचता है—‘सरताज साब... तुम मीरा को इतना प्यार करते हो, लेकिन मैं... मैं उसे अपनी आंखों से पहले ही निगल चुका हूं। लेकिन अब... अब सावधानी बरतनी होगी।’
मीरा अंदर जाती है। सरताज खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखते हैं। शेर अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद करता है, और दीवार पर सिर टिका लेता है—उसकी सांसें तेज, मन में सरताज की वो गरज गूंज रही है। लेकिन मीरा का बाथरोब में वो नजारा... वो अभी भी उसकी आंखों में है।
Deepak Kapoor
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