24-01-2026, 02:53 PM
करीम की चाल
अनीता ने कांपते हाथों से कमरे की कुंडी चढ़ाई और बिस्तर पर ढेर हो गई। उसका रोम-रोम अपमान और आत्मग्लानि की आग में जल रहा था। करीम की कही एक-एक बात उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी—"मेरी हिम्मत अकेले नहीं बढ़ी थी... आपने खुद मुझे उकसाया था।"उसे रह-रह कर लग रहा था कि शायद करीम सही कह रहा था। अगर वह उस 'रोल-प्ले' में करीम का नाम न लेती, अगर वे दरवाज़ा खुला न छोड़ते, तो क्या एक नौकर की इतनी हिम्मत होती? वह बार-बार खुद को ही इस सब का गुनहगार मान रही थी।
दोपहर के करीब राज घर वापस लौटा। वह थका हुआ लग रहा था, पर अपनी पत्नी को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
"अनीता, तुम ठीक तो हो? चेहरा कुछ उतरा हुआ सा लग रहा है," राज ने उसके करीब आकर पूछा।
अनीता का दिल तेज़ी से धड़कने लगा, पर उसने अपनी घबराहट को छुपाते हुए एक झूठी मुस्कान ओढ़ ली। उसने तय किया था कि वह राज को कुछ नहीं बताएगी। उसे डर था कि अगर उसने सच बताया, तो राज गुस्से में करीम को मार ही न डाले।
"नहीं राज, बस नींद पूरी नहीं हुई और शायद गर्मी की वजह से सिर भारी है," उसने सामान्य दिखने की कोशिश करते हुए कहा।
"ओह, कोई बात नहीं। करीम बाबा! ज़रा एक कप ठंडी लस्सी लाना," राज ने आवाज़ दी।
करीम लस्सी लेकर आया, पर उसकी चाल और ढाल पूरी तरह बदल चुकी थी। उसने अपनी नज़रें झुका रखी थीं। उसने राज को लस्सी दी और बिना एक शब्द बोले, बिना अनीता की तरफ देखे, चुपचाप बाहर चला गया।
थकान की वजह से राज ने दोपहर का खाना खाया और गहरी नींद में सो गया। पूरा बंगला दोपहर के सन्नाटे में डूब गया था। राज तो बेसुध सो रहा था, लेकिन अनीता की आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह खिड़की के पास बैठी शून्य में ताकती रही।
वह बार-बार खुद को कोस रही थी, "मैंने वे शब्द कहे ही क्यों? मैंने उसका नाम क्यों लिया?" कल रात की वे सिसकियाँ और करीम का नाम लेना अब उसे किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा लग रहा था। उसे लग रहा था कि उसने खुद अपने हाथों से अपनी गरिमा की लक्ष्मण रेखा को धुंधला कर दिया है।
करीम बाहर बगीचे में खामोशी से अपना काम कर रहा था।
उसने खुद से एक ऐसा सवाल पूछा जिसे वह सुबह से दबाने की कोशिश कर रही थी—"क्या मैं सच में करीम की तरफ आकर्षित हूँ?"
जैसे ही यह विचार उसके मन में आया, उसकी रूह कांप गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन अंधेरे में भी उसे वही पल याद आने लगे। कल रात जब वह राज के साथ थी, उसने अपनी कल्पनाओं में राज की जगह करीम को क्यों रखा?
"अगर मैं आकर्षित नहीं थी," उसने खुद को आईने में देखते हुए बुदबुदाया, "तो फिर जब आज सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा, तो मेरे शरीर में वो बिजली सी क्यों दौड़ी? क्यों एक पल के लिए मेरा प्रतिरोध शिथिल पड़ गया था?"
लेकिन फिर उसे वह ज़ोरदार तमाचा याद आया जो उसने करीम के चेहरे पर जड़ा था।
"अगर मैं उसे चाहती हूँ, तो मैंने उसे थप्पड़ क्यों मारा?" वह बुरी तरह उलझ गई थी।
क्या वह तमाचा करीम के लिए था, या खुद की उस 'इच्छा' के लिए जिसे वह स्वीकार करने से डर रही थी?
शायद वह तमाचा एक ढाल था—अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और अपने चरित्र को बचाने की एक आखिरी कोशिश।
अनीता के मन का द्वंद्व गहराता जा रहा था। वह कोई ऐसी स्त्री नहीं थी जो अपनी मर्यादाओं को आसानी से भूल जाए।
उसे पता था कि वह सुंदर है, और उसे पुरुषों की प्रशंसा भरी नज़रों से कोई परहेज नहीं था। जब कभी किसी पार्टी में कोई पुरुष उसे छूकर गुज़रता या उसकी कमर पर हाथ रखता, तो उसे एक अजीब सा 'इगो बूस्ट' मिलता था।
उसे पुरुषों का उसे चाहना पसंद था, लेकिन उसने कभी भी राज को धोखा देने के बारे में नहीं सोचा था। राज उसका पति था।
पर करीम के साथ मामला बिल्कुल अलग और डरावना होता जा रहा था।
"तमाचा इसलिए मारना पड़ा," उसने खिड़की की ग्रिल को कसकर पकड़ते हुए सोचा, "क्योंकि वह सीमा पार कर रहा था। वह मुझे उस तरह से जान चुका था जैसे सिर्फ राज को हक था।"
कल रात की उस दुर्घटना ने सबकुछ बदल दिया था। करीम पहला ऐसा पुरुष था, राज के अलावा, जिसने उसे पूरी तरह नग्न अवस्था में देख लिया था। वह बेबसी, वह नग्नता और उस वक्त करीम की आँखों में उभरता हुआ वह आदिम भाव—अनीता के लिए यह सब असहनीय था।
उसे लग रहा था कि करीम ने सिर्फ उसे देखा नहीं है, बल्कि उसकी आत्मा पर कब्ज़ा कर लिया है। जब तक वह सिर्फ एक नौकर था जो चाय लाता था, तब तक सब ठीक था। पर अब, उसके और अनीता के बीच का वह 'पर्दा' गिर चुका था।
करीम बगीचे के कोने में बने अपने छोटे से कमरे में लकड़ी के तख़्त पर लेटा छत को ताक रहा था। हाथ में पकड़ी बीड़ी का धुंआ अंधेरे में छल्ले बना रहा था। उसके गाल पर अभी भी उस तमाचे की झनझनाहट महसूस हो रही थी, पर उस दर्द से कहीं ज़्यादा उसके दिमाग में उलझन मची थी।
उसने बीड़ी का एक लंबा कश खींचा और बड़बड़ाया, "साली इन औरतन को समझ पाना बहुत मुशकिल है... सच में!"
उसकी आँखों के सामने कल रात का वो नज़ारा घूम गया। उसने अपनी आँखों से देखा था और कानों से सुना था—अनीता मेमसाब राज साहब की बाहों में थीं, पर ज़ुबान पर नाम 'करीम' का था। वह सिसकियाँ, वो बेबसी और वो पुकार... करीम को लगा था कि उसने मेमसाब के दिल का दरवाज़ा खोल दिया है। उसे लगा था कि मेमसाब अंदर ही अंदर उसे चाहती हैं, बस राज साहब की वजह से रुकी हुई हैं।
"जब रात को हमरा नाम जप रही थीं, तब तो बड़ी लज्ज़त मिल रही थी उनको," करीम ने करवट बदलते हुए सोचा। "और आज जब हम असलियत में करीब गए, तो देवी बन गईं? “
“ई कैसा तमाचा था भाई? हमरी हिम्मत तो उन्होंने ही बढ़ाई थी।"
करीम को गुस्सा भी आ रहा था और ताज्जुब भी। उसने अपनी मर्दानगी पर इतना भरोसा था कि उसे लगा था अनीता उसके छूते ही पिघल जाएगी। पर उस थप्पड़ ने उसकी ईगो को चोट पहुँचाई थी।
"ई ऊँची जात की औरतें होती ही ऐसी हैं," उसने बीड़ी का टुकड़ा ज़मीन पर फेंक कर मसल दिया। "ऊपर से शरीफ और अंदर से पूरी आतिशबाज़ी। रात को नौकर चाहिए और दिन में वही नौकर पैर की जूती? पर मेमसाब, अब देर हो चुकी है। आपने हमें अपनी नग्नता दिखा के और हमरा नाम लेके जो खेल शुरू किया है, उसे खत्म तो हम ही करेंगे।"
करीम ने अपनी बीड़ी का आखिरी कश लिया और राख को फर्श पर झाड़ दिया। उसके चेहरे पर एक गहरी, सयानी मुस्कान दौड़ गई। उसने अपनी हथेली से गाल को सहलाया जहाँ सुबह तमाचा पड़ा था।
"जल्दबाजी कर दिए हम..." उसने खुद से फुसफुसाते हुए कहा। "शेरनी को पिंजरे में डालना है तो झपट्टा मारने से काम नहीं चलेगा, उसे धीरे-धीरे लालच देके पास बुलाना होगा। ई तमाचा हमरी गलती थी, हम कुछ ज़्यादा ही तेज़ भागने लगे थे।"
करीम तख़्त से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया, जहाँ से बंगले की मंज़िल की बत्तियां दिखाई दे रही थीं। उसके दिमाग में अब एक शतरंज की बिसात बिछ चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि अनीता मेमसाब का सबसे कमज़ोर पहलू क्या है—उनकी आत्मग्लानि ।
"सबसे अच्छी बात तो ई है कि मेमसाब ने राज साहब को कुछ बताया नहीं," करीम के मन में लड्डू फूटने लगे। "इसका मतलब है कि वो इस बात को यहीं दबाना चाहती हैं। वो डरी हुई हैं... और जो डरता है, उसे झुकाना सबसे आसान होता है।"
करीम ने अपनी योजना बदली। अब वह आक्रामक नहीं बनेगा। अब वह उसे यह एहसास दिलाएगा कि जो कुछ भी हो रहा है, उसकी गुनहगार वो खुद है। वह उसे हर पल यह याद दिलाएगा कि उसने उसे नंगा देखा है, पर इस तरह से जैसे वह खुद इस बोझ से दबा जा रहा हो।
वह आज सुबह के उस पल को बार-बार याद कर रहा था जब उसने अनीता को अपनी बाहों में जकड़ा था। "ओह, मेमसाब की वो कोमलता... जैसे रुई का गोला हो," उसने मन ही मन बड़बड़ाया। "जब हमने उनकी चूची को पकड़ा था, वो इतनी मुलायम थीं कि उंगलियां खुद-ब-खुद दब गईं। जैसे मक्खन हो, पिघलता हुआ, और वो गर्माहट... हाय, वो गर्माहट ने तो हमारी रगों में आग लगा दी थी।"
उसकी आँखें बंद हो गईं और वह उस स्पर्श को फिर से महसूस करने लगा। "और उनकी गर्दन? वो गर्दन तो जैसे रेशम की तरह चिकनी और नरम थी। जब हमने उसे चूमा था, तो लगा जैसे कोई स्वर्ग का फूल छू लिया हो। वो थरथराहट जो उनके शरीर में दौड़ी थी, वो हमारी बाहों में वो कांपना... वो बता रहा था कि वो भी कहीं न कहीं लुत्फ उठा रही थीं, भले ही बाद में थप्पड़ मार दिया।“
करीम की सांसें तेज हो गईं, और वह खुद से बोला, "अरे करीम, धीरज रख।"
उस रात बेडरूम का सन्नाटा बहुत भारी था। राज बिस्तर पर लेटा एक मैगजीन के पन्ने पलट रहा था, पर अनीता की बेचैनी उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। वह खिड़की के पास खड़ी बाहर के घने अंधेरे को देख रही थी, जहाँ करीम की कोठरी से एक हल्की सी रोशनी छनकर आ रही थी।
अनीता ने लंबी सांस ली और राज की ओर मुड़ी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गंभीरता और डर था।
अनीता: "राज... मुझे तुमसे कुछ पूछना है। कल रात... कल रात तुमने वो सब क्यों शुरू किया? मेरा मतलब है, वो 'रोल-प्ले' और वो सब?"
राज ने मैगजीन एक तरफ रखी और थोड़ा हैरान होकर अनीता को देखा।
राज: "क्या हुआ अनीता? अचानक ये सवाल क्यों? मैंने सोचा तुम्हें पसंद आ रहा था..."
अनीता: (बिस्तर के कोने पर बैठते हुए) "नहीं राज, बात पसंद आने की नहीं है। तुमने उस खेल में करीम का नाम क्यों लिया? क्या तुम वाकई अपनी पत्नी को एक नौकर के हाथों में देखना चाहते हो? क्या तुम्हें... क्या तुम्हें ऐसी चीजें पसंद हैं? क्या तुम सच में चाहते हो कि कोई और मुझे उस तरह छुए?"
राज का चेहरा सख्त हो गया। उसने अनीता का हाथ अपने हाथ में लिया, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद जलन और हवस का एक मिला-जुला भाव।
राज: "अनीता, देखो... कल डिनर टेबल पर जब हम बैठे थे, तो मैंने देखा था कि करीम तुम्हें किस तरह देख रहा था। उसकी आँखों में एक ऐसी भूख थी जैसे वो तुम्हें कच्चा चबा जाएगा। मुझे नहीं पता क्यों, पर उस पल उसे तुम्हें उस तरह देखते देख मुझे एक अलग ही तरह का 'ट्रिगर' मिला। मुझे गुस्सा भी आ रहा था और साथ ही साथ एक अजीब सा जोश भी महसूस हो रहा था। बस इसीलिए वो बातें मेरे मुंह से निकल गईं।"
राज: हाँ, मैं मानता हूँ... मैंने ही वो फैंटेसी शुरू की थी। मैंने ही करीम का नाम लिया था। लेकिन अनीता... तुमने भी तो उसका नाम लिया! जब तुम मेरी बाहों में थीं, तुम्हारी सिसकियों में, तुम्हारी पुकार में बार-बार 'करीम' का नाम क्यों आ रहा था? क्यों तुमने मेरे नाम की जगह उसका नाम जपना शुरू कर दिया? वो तो मैंने सिर्फ खेल के लिए कहा था, लेकिन तुम... तुम तो पूरी तरह उसमें खो गई थीं।"
अनीता का चेहरा लाल हो गया। उसने नज़रें झुका लीं, जैसे अपराधबोध की लहर उसके अंदर फिर से उठ रही हो। उसने धीमी, काँपती आवाज़ में जवाब दिया।
अनीता: "राज... मैं... मैंने तुम्हें देखा था। तुम्हारे चेहरे पर वो उत्साह, वो जोश... मुझे लगा कि तुम्हें ये फैंटेसी बहुत एक्साइट कर रही है। मैंने सोचा कि अगर मैं भी उसी में शामिल हो जाऊँ, अगर मैं भी वही नाम लूँ जो तुमने लिया है... तो शायद तुम्हें और ज़्यादा मज़ा आएगा। मैं बस तुम्हें खुश करना चाहती थी। मैंने सोचा कि तुम्हारी उत्तेजना देखकर... मैं भी उसी रास्ते पर चल पड़ी।"
राज ने अनीता का चेहरा दोनों हाथों से थामा और उसकी आँखों में गहराई से देखा। उसकी आवाज़ में अब गुस्सा कम था।
राज: "तो तुम कह रही हो कि तुमने सिर्फ मुझे खुश करने के लिए उसका नाम लिया? अनीता, क्या तुम्हें पता है कि उस पल मैं कितना उलझ गया था? एक तरफ मुझे गुस्सा आ रहा था कि मेरा नौकर मेरी बीवी को उस तरह देख रहा है... और दूसरी तरफ वो जोश... वो अजीब सा रोमांच... जो मुझे रोक नहीं पा रहा था। लेकिन अब जब सोचता हूँ, तो लगता है कि शायद मैंने ही आग लगाई थी। और तुमने उस आग को और भड़का दिया।"
अनीता ने राज के हाथों को कसकर पकड़ा और बोली, "राज, प्लीज़... मुझे माफ कर दो। मैंने गलती की। मैंने सोचा नहीं था कि ये इतना गहरा हो जाएगा। मैं बस... तुम्हारे साथ वो पल और खूबसूरत बनाना चाहती थी।"
राज ने एक लंबी सांस ली और अनीता को अपनी बाहों में खींच लिया।
अनीता: "तो इसका मतलब तुम्हें बुरा नहीं लगता अगर वो मुझे..."
राज: (उसे बीच में टोकते हुए) "नहीं! कभी नहीं! अनीता, मेरी बात ध्यान से सुनो। वो सिर्फ एक खेल था, एक फैंटेसी थी जो उस पल के पागलपन में पैदा हुई। लेकिन अगर उस साले करीम ने तुम्हें छूने की जुर्रत भी की, तो मैं उसे ज़िंदा गाड़ दूँगा। मैं उसकी जान ले लूँगा अगर उसने तुम्हारी तरफ आँख उठाकर भी देखा।"
राज की आवाज़ में वह सख्ती सुनकर अनीता एक पल के लिए सिहर गई। राज का यह रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
माहौल में फैले तनाव को थोड़ा कम करने के लिए उसने राज की आँखों में देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाने की कोशिश की।
अनीता: "राज, शांत हो जाओ। तुम तो बेकार में ही इतना गुस्सा कर रहे हो। पर सच कहूँ तो... क्या तुमने कभी करीम को करीब से देखा है? मेरा मतलब है उसकी बॉडी... वो दिन भर बाहर मेहनत करता है। क्या तुम्हें वाकई लगता है कि तुम शारीरिक रूप से उसे पछाड़ पाओगे?"
राज अनीता की बात सुनकर थोड़ा ठिठका, फिर उसके चेहरे पर एक गहरी और शातिर मुस्कान फैल गई। उसने अनीता को अपनी बाहों में थोड़ा और कस लिया।
राज: "शारीरिक ताकत? अनीता, अगर दुनिया सिर्फ जिस्मानी ताकत से चलती न, तो आज पूरी दुनिया पर अफ्रीकी लोगों का राज होता। ताकत सिर्फ बाजुओं में नहीं होती, दिमाग और रसूख में होती है।"
उसने अनीता के कान के पास झुककर बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
राज: "किसी को खत्म करने के लिए हमेशा हाथ उठाने की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे बहुत से तरीके हैं जिनसे किसी इंसान को बिना छुए ही बर्बाद किया जा सकता है या उसे रास्ते से हटाया जा सकता है। तुम बस एक बार उसका नाम लेना जो तुम्हें परेशान करे... मैं उसे ऐसी सज़ा दूँगा कि उसकी रूह काँप जाएगी।"
उसने अनीता के माथे को चूमा और उसकी आँखों में झाँकते हुए बड़े प्यार से कहा।
राज: "इतना याद रखो अगर किसी ने तुम्हें ठेस पहुँचाने की कोशिश भी की, तो वो अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती करेगा।"
राज ने अनीता को अपनी बाहों में और कसकर जकड़ लिया। राज ने धीरे से अनीता के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा।
राज: "अनीता... आज दोपहर जब करीम लस्सी लेकर आया था, मैंने नोटिस किया... वो तुम्हें बिल्कुल नहीं देख रहा था। नज़रें पूरी तरह झुकी हुई थीं। शायद मैंने उस रात सब कुछ ज़्यादा ही सोच लिया था। शायद मैं बस कल्पना कर रहा था कि वो तुम्हें उस तरह देख रहा है। हो सकता है सब मेरे दिमाग का वहम हो।"
अनीता का दिल एक झटके से धड़क उठा। उसने राज के सीने पर सिर टिका रखा था, लेकिन अब उसके मन में तूफान मच गया। वह मन ही मन बुदबुदाई, जैसे खुद से बात कर रही हो।
अनीता: (मन ही मन, बहुत धीमी आवाज़ में, जो सिर्फ उसे सुनाई दे रही थी) "कैसे बताऊँ तुम्हें राज... आज सुबह क्या हुआ था? वो कैसे मेरे मम्मों को इतनी ज़ोर से पकड़ ले गया था कि अभी भी दर्द हो रहा है। वो दबाव, वो गर्माहट... अभी भी महसूस हो रही है। अगर मैंने उसे थप्पड़ न मारा होता, तो क्या होता? शायद चीजें और भी बिगड़ जातीं। वो और आगे बढ़ जाता... और मैं... मैं क्या कर पाती? तुम्हें बताऊँ तो तुम उसे मार डालोगे... और अगर नहीं बताऊँ, तो ये राज़ मेरे अंदर ही जलता रहेगा।"
अनीता ने राज के सीने से चेहरा ऊपर उठाया और उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें नम थीं, पर उसने मुस्कान की कोशिश की।
अनीता: "हाँ राज... शायद तुम सही कह रहे हो। शायद सब कुछ सिर्फ एक पल का वहम था। आज वो बिल्कुल सामान्य था।"
अनीता ने सिर हिलाया, पर उसके अंदर एक अजीब सी कशमकश चल रही थी। राज का यह 'ठंडा गुस्सा' उसे करीम की धृष्टता से भी ज़्यादा डरावना लग रहा था। उसे अहसास हुआ कि वह एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरफ जलती आग के बीच खड़ी है।
अनीता: (मन ही मन) "राज कह रहा है कि वो उसे मार डालेगा... पर उसे क्या पता कि करीम पहले ही सीमा लांघ चुका है। उसे क्या पता कि मैं खुद को गुनहगार मान रही हूँ क्योंकि हम दोनों ने मिलकर ने ही उस रात वो बीज बोया था।"
रात के सन्नाटे में राज तो सो गया, पर अनीता को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह एक ऐसे जाल में फंस गई है जहाँ एक तरफ राज का है और दूसरी तरफ करीम।
Deepak Kapoor
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