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Adultery लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल...
#44
राजू का लंड पकड़ कर उसे ऐसा लगा जैसे उसने कोई गरम लोहे की छड़ पकड़ ली हो पहली बार सरिता को मालूम पड़ा कि असली मर्द का लंड कैसा होता है. लाला का लंड तो किसी काम का था नहीं और उसके पहले पति का लंड भी कुछ खास नहीं था। हवस के मारे उसकी आंखें चमक उठी और उसने देर ना करते हुए लंड का टोपा चमड़ी से बाहर निकाला और फिर लंड के टोपे पर अपनी जीभ चला दी. सरिता ने लंड के टोपे पर पहले जीभ की नोक हल्की-हल्की सी घुमाई और उस के बाद जीभ से लंड के सुपारे को चाटने लगीं. फिर सरिता ने लंड को ऊपर से लेकर नीचे तक जीभ से चाटा और धीरे-धीरे अपने मुँह में लेने की कोशिश करने लगीं. लेकिन सरिता के मुँह में लंड ठीक से नहीं जा पा रहा था, तो जितना हो सका … उतना मुँह में लेकर चूसने लगीं. बीच-बीच में वे पूरे लंड को चाटतीं और गोटियों को भी मुँह भरकर चूसतीं-चाटतीं. जब भी सरिता मुँह में लंड लेतीं, राजू उसके बाल पकड़ कर उसके मुँह को चोदने लगता. राजू की तो मानो आज लॉटरी निकल गई हो। पहले मलकिन की जवान बहू और अब खुद जवान मलकिन उसका लंड चूस रही थी.
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RE: लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल... - by nitya.bansal3 - 23-01-2026, 05:41 PM



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