20-01-2026, 05:25 PM
भाग ~ १७
मेरी धड़कनें बढ़ी हुई थीं और अंदर हलचल भी मची हुई थी लेकिन मैं अपने बर्ताव को और अपनी भावनाओं को उस पर जाहिर नहीं करना चाहता था इस लिए सामान्य भाव से पानी लिए मैं उसके पास आ गया।
"माटी लगा लिया तूने।" मैंने उससे पूछा─"अगर लगा लिया है तो बता...पानी डालूं तेरे ऊपर।"
"अभी रुक जा।" उसने हाथों पर लगी माटी को अच्छे से मलते हुए कहा─"पहले इसे मल लूं फिर डालना पानी। तब तक तू नहा न।"
मैंने बाल्टी का पानी अपने ऊपर डाल लिया और फिर से कुएं में जा कर बाल्टी डालने लगा। मैं चाहता था कि अनीता पूरी तरह मुझसे सहज हो जाए ताकि अगर मेरे कहने पर उसे दुबारा कभी अपना कुर्ता उतारना पड़े तो उसे सोचना न पड़े और न ही कोई झिझक हो।
दुबारा जब पानी खींच कर आया तो अनीता अपने पूरे बदन में माटी मल चुकी थी। जैसे ही मुझे पानी लाता देखा तो उसने मुझे पानी डालने का इशारा किया। मैं आगे बढ़ कर उसके ऊपर पानी डालने लगा। वो फिर से अपने पूरे बदन में जल्दी जल्दी हाथ फेरते हुए गिरते पानी से माटी धोने लगी। इस चक्कर में एक बार फिर से मुझे उसकी छातियां स्पष्ट दिखने लगीं और उसके हाथों और कलाइयों से टकराने की वजह से अजीब तरह हिलते व पिचकते उसके दूध दिखने लगे। एक बार फिर से मेरा पूरा बदन सनसना उठा। कच्छे में कैद लंड में हलचल हुई।
"अब कैसा लग रहा है तुझे।" मैंने उसे सहज करने के लिए पूछा─"माटी लगा कर नहाने से अच्छा लग रहा है न।"
"हां राजू।" अनीता खुशी से बोली─"अब बहुत अच्छा लग रहा है। ये चिकनी माटी लगा कर नहाने से अब एकदम तरोताजा लग रहा है। एक बाल्टी और डाल दे न मेरे ऊपर।
"अभी ले।" मैं झट बोला─"अपनी प्यारी और सुंदर बहन के हर हुकुम का पालन करूंगा मैं।"
वो मेरी इस बात पर मुस्कुरा उठी। इधर मैं भी मुस्कुराते हुए कुएं से पानी खींचने लगा। थोड़ी ही देर में मैं पानी ले कर आया और उसके ऊपर डालने लगा। इस बार वो खुल कर अपने हाथ बदन पर घुमा फिरा रही थी। शायद अब वो सहज हो गई थी और उसकी शर्म भी दूर हो गई थी। ऐसा अक्सर होता है....शुरुआत में इस तरह का जब कोई काम करना होता है तो उसमें शर्म और झिझक महसूस होती ही है मगर एक बार जब ऐसा कर लिया जाता है तो सारी शर्म और झिझक दूर हो जाती है।
अनीता के साथ यही हो रहा था। दूसरे, शायद वो ये भी सोचती रही होगी कि मैं कोई गैर मर्द या लड़का तो हूं नहीं....मतलब उसका अपना भाई ही हूं और जब मैं खुद ही कह रहा हूं ऐसा करने के लिए तो इतना क्या सोचना। तीसरी बात...उसे अपना प्यार भी तो साबित करना था....तो अगर ऐसा करने से प्यार साबित हो जाता है तो यही सही।
"मजा आ गया राजू।" बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने अपने चेहरे का पानी पोंछते हुए लेकिन खुशी से मुस्कुरा कर कहा─"मन तो अभी भी कर रहा है कि बस नहाती ही रहूं लेकिन देर होने से मां डांटेगी और बापू भी न आ जाएं कहीं इस लिए अब नहीं नहाऊंगी। एक काम कर तू....एक बाल्टी और पानी खींच दे ताकि मैं अपना ये कुर्ता धो लूं। फिर कुर्ता लपेट कर चली जाऊंगी।"
"ठीक है।"
मैं जल्दी ही कुएं से पानी खींच कर लाया और उसके सामने रख दिया। उसने अपने कुर्ते को उठाया और इस बार बेझिझक मेरे सामने अपनी छातियों के इस तरह उजागर हो जाने की परवाह किए बिना कुर्ते को बाल्टी के पानी में डुबाया और उसे रगड़ने लगी। रगड़ने की क्रिया में उसकी छातियां हल्के हल्के हिलने लगीं। ये देख मेरे अंदर सिहरन होने लगी। कच्छे में कैद लंड फिर से हरकत करने लगा। मैं उसकी हिलती छातियों से नजर हटाने की पूरी कोशिश कर रहा था मगर अब जब वो मेरी आंखों के सामने ही थीं तो क्या करता।
मन में कई तरह के खयाल उभर रहे थे। एक खयाल ऐसा था जो बार बार मुझे उकसा रहा था कि मैं इस बारे में कुछ बोलूं मगर मैं पूरी बेदर्दी से उस घटिया खयाल को दबा दे रहा था।
"अच्छा अनीता।" तभी एकाएक मैंने उससे पूछा─"अब से तू रोज मेरे साथ ऐसे ही नहाएगी न।"
"हां क्यों नहीं।" उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा─"अगर इस तरह का मौका रोज मिलेगा तो जरूर नहाऊंगी...पर इससे तुझे ही तो मेहनत करनी पड़ेगी। मुझे तो तू पानी खींचने ही नहीं देता।"
"हां तो क्या हुआ।" मैंने भोलापन और अपना प्यार दिखाया─"तू मेरी छोटी बहन है। ऊपर से तुझे मैं बहुत प्यार करता हूं तो तुझे मेहनत कैसे करने दे सकता हूं। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह और तेरे लिए मैं कुछ भी करूं।"
"राजू.... क्या सच में तू मुझसे बहुत प्यार करता है।"
उसने पता नहीं क्या सोच कर ये पूछा। मैं समझ न सका लेकिन उसकी आँखें और उसका मासूम चेहरा इस वक्त अलग ही तरह की चमक बिखेर रहा था। मेरा दिल फिर से तेज तेज धड़कने लगा।
"क्या तुझे भरोसा नहीं है मुझ पर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"तू जो इतना कुछ मेरे लिए कर रहा है उससे तो यही लगता है कि तू सच में मुझसे यानी अपनी बहन से बहुत प्यार करता है।" अनीता ने कहा─"लेकिन जाने क्यों ऐसा भी लगता है कि ये बहुत अजीब है।"
"अ...अजीब क्यों लगता है तुझे।"
"पता नहीं।" अनीता ने कहा─"शायद उस लिए कि ये सब कुछ एकदम से होने लगा है। इसके पहले कभी तूने इतने प्यार से मुझसे बातें नहीं की और न ही कभी मेरे लिए इतना कुछ किया है।"
"हां समझता हूं मैं।" उसकी बात से मैं पूरी तरह सहमत था─"और सच कहूं तो मैंने भी कई बार ये सोचा है मगर हर बार यही खयाल आता है कि इसके पहले शायद मैं नासमझ था....बल्कि हम दोनों ही नासमझ थे। फिर जब श्यामू काका ने हमें वो सब बताया तो सोचने लगा कि उनकी बात भी सही है। मतलब हम झगड़ा करते हैं मगर सच में उस झगड़े में एक दूसरे के दुश्मन नहीं होते हम। हर भाई बहन में झगड़े होते हैं तो हम भी करते थे....पर इस झगड़े में दुश्मनी जैसी कोई बात नहीं होती थी। अगर कुछ था तो सिर्फ ये कि बिना झगड़ा किए हम दोनों को ही खुशी नहीं मिलती थी। बिना झगड़ा किए चैन ही नहीं मिलता था। तो जब काका के अनुसार ये हमारा आपस का प्यार ही है तो क्यों न इस प्यार को बिना कोई झगड़ा किए आगे बढ़ाया जाए। जिस प्यार से अंजान हो के हम दोनों आपस में झगड़ते थे उस प्यार के बारे में जान कर क्यों न अब हम प्यार से ही रहें....एक दूसरे से प्यार से बातें करें....एक दूसरे के सुख दुख को समझें। बस....जब ऐसे खयाल आए तो मैंने सोच लिया अब से यही करूंगा।"
"सही कह रहा है तू।" अनीता ने कहा─"माना कि ये थोड़ा अजीब लगता है मगर उससे भी ज्यादा ये अच्छा लगता है। और पता है....मेरा दिल करता है कि हम दोनों हमेशा ऐसे ही रहें....क्या कहता है तू।"
"मैंने तो सोच ही लिया है कि अब से हमेशा ऐसा ही रहूंगा और तुझसे कभी झगड़ा नहीं करूंगा।" मैंने कहा─"बाकी तू क्या करेगी ये तेरे ऊपर है। मैं तुझे किसी बात के लिए न तो कुछ बोलूंगा और न ही मजबूर करूंगा। मैं बस ये चाहता हूं कि अब से मेरी प्यारी बहन मुझसे खुश रहे।"
मेरी बात सुन कर अनीता अपलक देखने लगी मुझे। एकाएक उसकी आंखों में आंसू झलकने लगे। अचानक जाने उसे क्या हुआ कि वो एक झटके से खड़ी हो गई। उसे अपनी नग्नता का जरा भी खयाल न आया। फिर लपक कर मेरे करीब आई और एकदम से मुझसे लिपट गई।
"अरे....क्या हुआ।" मैं उसकी इस क्रिया से चौंक पड़ा।
"कुछ नहीं।" उसने मुझसे लिपटे हुए ही भारी गले से कहा─"बस मेरा मन किया कि तेरे सीने से लिपट जाऊं।"
उसकी गीली कमीज में कैद उसकी ठोस और हल्की मुलायम चूचियां मेरे सीने में धंस गईं थी। यहां तक कि उसके निप्पल साफ साफ मुझे महसूस हो रहे थे। ठंडे पानी में नहाने के कारण वो एकदम खड़े हो गए थे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई नुकीली चीज मेरे सीने में चुभ गई हो। मेरा पूरा बदन थरथरा गया था। दिल की धड़कनें तो एक पल के लिए रुक ही गईं थी। एक सुखद अनुभूति हुई थी जिससे मेरी आँखें बंद हो गईं थी।
"हां ठीक है।" फिर एकदम से मैं बोला─"चल अब दूर हो मुझसे। अगर किसी ने देख लिया तो गड़बड़ हो जाएगी।"
"थोड़ी देर चिपके रहने दे न राजू।" अनीता और भी ज्यादा कस के चिपक गई मुझसे─"तुझसे ऐसे छुपकी हूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।"
"अगर ऐसा है तो कमरे में जहां सिर्फ हम दोनों हों वहां छुपक लेना।" मैंने उसे खुद से अलग करते हुए कहा─"लेकिन यहां ये ठीक नहीं है। घर वालों के अलावा किसी और ने देख लिया तो गलत ही सोचेगा और मैं नहीं चाहता कि हम दोनों के इस प्यार को कोई गलत सोचे....क्या तू ऐसा चाहती है।"
"न..नहीं नहीं राजू।" अनीता झट बोली─"मैं भी ऐसा नहीं चाहती।"
"चल अब तू अपना कुर्ता ले कर जा।" मैंने एक नजर उसकी भीगी चूचियों पर डाली। एकाएक मुझे शरारत सूझी तो बोला─"अरे ये क्या...तेरे दूध की नोक कितना ज्यादा कमीज में उठी हुई दिख रही है।"
ये सुन अनीता बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसने झट से अपनी चूचियों को देखा। मेरी बात सच जानते ही उसे बड़े जोर की शर्म आई। उसने झट से अपने हाथों की कैंची बना कर अपनी छातियों को छुपा लिया।
"तू न सच में बहुत गंदा है।" फिर वो शर्म से लाल होते हुए और थोड़ा झूठा गुस्सा दिखा कर बोली─"तू बस यही देखता है न और इसी लिए तूने मेरा कुर्ता उतरवाया था न....बेशर्म कहीं का...बोल अब।"
"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने एकदम से गंभीर शक्ल बना ली─"क्या तुझे लगता है कि मैं अपनी बहन के बारे में ऐसा सोच सकता हूं।"
मुझे एकदम से गंभीर हो गया देख और मेरी गंभीर बातें सुन कर अनीता का वो झूठा गुस्सा और शर्म दोनों ही कपूर की तरह गायब हो गए।
"अरे...मैं तो छेड़ रही थी तुझे...बुद्धू।" फिर वो हल्के से मुस्कुराई─"चल अब तू भी मुस्कुरा।"
मैं मुस्कुराने लगा।
"चल अब मैं जा रही हूं मैं।"
उसने अपने हाथों की कैंची हटा ली जिससे उसकी चूचियां फिर से दिखने लगीं। उसने फौरन मेरी नजरों को पकड़ लिया। उसे फिर से शर्म आई लेकिन इस बार उसने कुछ नहीं कहा मुझे। बल्कि मुस्कुराते हुए वापस पाट पर गई और फिर झुक कर बाल्टी में पड़े अपने कुर्ते को धोने लगी। झुकने के कारण उसकी कमीज के अंदर छुपी उसकी चूचियां आधे से ज्यादा दिखने लगीं मुझे। मेरी आँखें फैल गईं और हलक सूखने लगा।
मैंने झट से उसकी चूचियों से नजरें हटा ली। एकाएक ही मुझे एहसास होने लगा था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। वो तो नादान और मासूम है...उसे ध्यान ही नहीं आया कि झुकने से उसकी लाज दिखने लगी है मगर मुझे तो बार बार इसका फायदा नहीं उठाना चाहिए।
खैर थोड़ी देर में वो गीला कुर्ता अपने सीन में लपेट कर चली गई। उसके जाने के बाद मैं भी फौरन नहा धो के अंदर चला आया। कपड़े वगैरह बदल कर मैं आंगन में ही खाट पर लेट गया।
अभी मैं लेटा ही था कि तभी बबलू आ गया। उसके साथ में नरेश भी था।
"क्या रे आज कल कहां गायब रहता है तू।" बबलू ने मुझे आँखें दिखाते हुए कहा─"दो दिन से खेलने नहीं आया।"
"हां वो खेतों में गहाई चालू है न।" मैंने बताया─"तो दोनों जून गहाई करनी पड़ती है मुझे इस लिए खेलने आने का समय ही नहीं मिलता।"
"अच्छा छोड़....चल नदी तरफ चलते हैं।"
नरेश ने कहा और कहने के साथ ही कोई इशारा करने लगा। मैं समझ तो गया लेकिन तभी मुझे याद आया कि अनीता ने मुझे इन दोनों के साथ जाने से मना किया था। अब अगर मैं गया तो निश्चित ही वो नाराज हो जाएगी मुझसे।
"बहुत थक गया हूं यार।" मैंने बुरी सी शक्ल बना के कहा─"दोनों जून बैलों के पीछे पीछे घंटों चलना पड़ता है जिसकी वजह से पांव बहुत ज्यादा दुख रहे हैं।"
"क्या यार।" बबलू ने बुरा सा मुंह बनाया─"सब मजा खराब कर दिया तूने।"
"सही कहा।" नरेश बोल पड़ा─"आज अच्छा मौका था इसको दिखाने का मगर ये तो पांव दुखने का बहाना बना रहा है।"
"देख राजू....बड़ी मुश्किल से ऐसा मौका मिला है।" बबलू ने धीमे से कहा─"इस लिए पाव का दर्द भूल जा और चल हमारे साथ।"
"नहीं यार।" मैंने कहा─"सच में पांव में जान नहीं है। अभी नहा धो के आया हूं और अब सिर्फ खाट में लेट कर आराम करना चाहता हूं। तुम दोनों जाओ और जो मौका मिला है उसका फायदा उठाओ। मैं फिर कभी देख लूंगा।"
तभी मां रसोई से बाहर आती दिखी। उसने मेरे पास बबलू और नरेश को खड़ा देखा तो हमारे पास ही आने लगीं।
"तुम दोनों इस समय यहां?" मां ने दोनों को देखते ही पूछा─"क्या राजू को खेल खिलाने के लिए लेने आए हो।"
"हां काकी।" नरेश झट बोल पड़ा।
"पर वो नहीं जा सकता।" मां ने स्पष्ट कहा─"तुम दोनों को पता है...मेरा राजा बेटा दो दिन से सारा दिन खेतों में गहाई करवा रहा है अपने काका लोगों के साथ। एक बार भी नहीं कहा कि वो ये काम नहीं करेगा...जानते हो क्यों....क्योंकि अब वो समझदार हो गया है। उसे समझ आ गया है कि गांव में फालतू आवारा बागने से कहीं अच्छा है जिम्मेदारियों को समझ कर घर और खेतों के काम करना। मेरा राजा बेटा अब तुम दोनों की तरह गांव में आवारागर्दी नहीं करेगा। तुम दोनों भी मेरे बेटे से सीखो कि कैसे जिम्मेदारी से घर और खेतों का काम किया जाता है।"
"हम भी काम करते हैं काकी।" नरेश को मां की बात और उसका ताना अच्छा नहीं लगा इस लिए बोला─"हम दिन भर गांव नहीं घूमते हैं। खेलने भी तभी जाते हैं जब घर और खेतों के काम से समय मिलता है।"
"नरेश सही कह रहा है काकी।" बबलू भी बोल पड़ा─"समय मिलने पर ही हम खेलने जाते हैं।"
"ये बात उन्हें जा कर बताओ जो तुम्हारे बारे में कुछ जानता ही न हो।" मां को एकाएक गुस्सा आ गया─"मुझे अच्छे से पता है कि तुम दोनों कितना अपने घर और खेतों का काम करते हो। मालती और चंदा से अक्सर भेंट होती है मेरी....वो दोनों सारी करतूतें बताती हैं मुझे कि तुम क्या करते हो और क्या नहीं करते।"
बबलू और नरेश एकदम चुप रह गए। चेहरे का रंग उड़ गया था उनका। मैं भी मन ही मन ये सोच के घबरा उठा कि कहीं मां को मेरे बारे में भी तो कुछ उल्टा सीधा पता नहीं चल गया है।
"छोड़ न मां....और जा यहां से।" मैंने कहा─"और तू चिंता न कर...मैं कहीं नहीं जाने वाला। मैंने इन दोनों को बोल दिया है कि सारा दिन खेत में गहाई करने से मेरे पांव बहुत दुख रहे हैं तो मैं खेलने नहीं जाऊंगा।"
"क्या सच में तेरे पांव बहुत दुख रहे हैं बेटा।" मां ने एकाएक फिक्रमंद हो कर पूछा।
"हां मां।" मैंने कहा─"पर तू चिंता मत कर। आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।"
"अरे ऐसे कैसे ठीक हो जाएगा भला।" मां ने कहा─"तेल से मालिश करनी होगी। अच्छा सुन....जब सब खा पी लेंगे तो मैं तेल से मालिश कर दूंगी तेरे पांवों में। फिर तुझे अच्छे से आराम मिल जाएगा।"
"अच्छा राजू....हम अब जा रहे हैं।" बबलू ने धीमे से कहा और नरेश को चलने का इशारा किया।
मैंने भी उन्हें नहीं रोका। मां के सामने ऐसा कर भी नहीं सकता था। मैं नहीं चाहता था कि उनकी वजह से मां मुझसे नाराज हो जाए।
***********
रात में जब सबका खाना पीना हो गया तो मां ने मुझे मालिश करवाने के लिए कहा। मैं आंगन में अलग खाट पर लेटा हुआ था जबकि मां और अनीता एक साथ दूसरी खाट पर लेटती थीं। बापू घर के बाहर नीम के पास खाट पर लेटे हुए थे।
मां खुद रसोई में जा कर सरसों के तेल में लहसुन डाल कर तेल को हल्का गुनगुना कर के लाई थी। वो मेरे पास ही खाट पर पांवों की तरफ बैठ गई।
"गुनगुने तेल से मालिश कर दूंगी तो जल्द आराम मिल जाएगा तुझे।" फिर वो मेरी एक टांग पर तेल से मालिश करते हुए बोली─"दो दिन से तू दोनों जून लगातार मेहनत कर रहा है इस लिए थकान ज्यादा हो गई है तुझे।"
"मां...मैं भी राजू की मालिश कर दूं।" बगल से ही मां की खाट पर लेटी अनीता बोल पड़ी।
"नहीं रहने दे।" मां ने कहा─"तू भी तो थक गई है। इसकी मालिश कर दूं...फिर तेरे भी पांव की मालिश कर दूंगी।"
"थकी तो तू भी है मां।" अनीता ने कहा─"तुझे भी तो मालिश करवाने की जरूरत है।"
"अरे मेरी तो काम करने की आदत पड़ी हुई है।" मां ने कहा─"इस लिए अब इतना ज्यादा थकान का अनुभव नहीं होता।"
"हां...पर फिर भी मां थक तो जाती ही है तू।" अनीता ने कहा─"अब ऊपर से सोने के समय पर तू राजू की मालिश कर रही है...फिर मेरी भी मालिश करने को कह रही है। ऐसे में और भी तो थक जाएगी। एक काम करती हूं....जब तू राजू और मेरी मालिश कर देगी तो मैं तेरे पांव की मालिश कर दूंगी।"
"अरे नहीं नहीं।" मां झट बोली─"तुझसे अपने पांव थोड़े न छुवाऊंगी मैं। हमारे यहां बेटियों से पांव नहीं छुआएं जाते बल्कि खुद उनके पांव छुए जाते हैं।"
"तो फिर मैं मां की मालिश कर दूंगा।" मैं एकदम से बोल पड़ा─"ठीक है न मां।"
"अच्छा...मेरा राजा बेटा अपनी मां की मालिश करेगा?" मां ने बड़े स्नेह से मुस्करा कर कहा।
"हां क्यों नहीं।" मैंने कहा─"मैं तेरी मालिश कर दूंगा। जब तू इतना थके होने पर भी हमारी मालिश कर रही है तो मुझे भी तो तेरे बारे में सोचना होगा न मां।"
"मेरा राजा बेटा।" मां ने थोड़ा सा आगे सरक कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया─"अपनी मां से बहुत प्यार करता है न।"
"हां मां।" मैंने कहा─"मैं तुझे बहुत चाहता हूं और हां....अनीता को भी बहुत प्यार करता हूं।"
"अच्छा।" मां को थोड़ी हैरानी हुई─"कब से भला।"
"बस अभी कल से ही मां।" मैं मुस्कुरा उठा─"और पता है मां...अनीता भी मुझे बहुत प्यार करती है। अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते।"
"अरे वाह।" मां को इस बार आश्चर्य हुआ─"तुम दोनों में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे हो गया। कल तक तो तुम आपस में झगड़ते ही रहते थे। फिर एक दूसरे से इतना प्यार कैसे हो गया।"
कहने के साथ ही मां अनीता की तरफ घूमी फिर उससे पूछा─"क्या राजू सही कह रहा है। क्या सच में तुम दोनों अब झगड़ा नहीं करते।"
"हां मां।" अनीता मुस्कुरा कर बोली─"हमने परसों से झगड़ा नहीं किया।"
"हाय दय्या क्या सच में।" मां की आश्चर्य से आँखें फैल गईं─"पर...पर इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कैसे।"
"मैं बताता हूं मां।"
कहने के साथ ही मैंने मां को श्यामू काका वाली बात विस्तार से बता दी। फिर ये भी बताया कि उनकी बातों के बाद हम दोनों ने क्या सोचा और फिर कैसे अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते बल्कि एक दूसरे से प्यार से बात करते हैं। इतना ही नहीं एक दूसरे का खयाल भी रखते हैं।
"अरे मोरी दय्या।" मां ने आश्चर्य से खुले अपने मुंह पर हथेली रख के कहा─"ये..ये तो सच में अचरज की बात हो गई।"
"कल तक हमें भी ये अचरज ही लग रहा था मां।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"लेकिन सच यही है।"
"चल....अगर तुम दोनों अब एक दूसरे से अच्छे से मिलजुल के रह रहे हो तो ये बहुत अच्छी बात है।" मां ने फिर से मालिश करना शुरू कर दिया─"मैं भी सोचती थी कि कब तुम दोनों को अकल आएगी और कब तुम दोनों प्यार से मिलजुल के रहोगे। खैर ऊपर वाले का लाख लाख धन्यवाद कि उसने समय रहते तुम दोनों को अकल दे दी। इससे मेरे अंदर की भी अब ये चिंता दूर हो गई।"
"अब से हमारे कारण तुझे कोई परेशानी नहीं होगी मां।" अनीता बोल पड़ी─"और न ही हमसे तंग आ कर तुझे हम पर चिल्लाना पड़ेगा।"
"ओह मेरी प्यारी बिटिया आ तो जरा मेरे पास।" मां ने उसे प्यार से बुलाया और जब अनीता मुस्कुराते हुए उसके पास आ गई तो उसने उसके भी चेहरे को प्यार से सहलाया। फिर बोली─"अब जा के तुझमें समझदारी वाली बात आई है। मैं बहुत खुश हूं अब। जा खाट पर बैठ....मैं जल्दी से तेरे भाई की मालिश कर के तेरी भी मालिश करती हूं।"
अनीता खुशी खुशी वापस अपनी खाट पर जा के बैठ गई। इधर मैं सोचने लगा था कि सचमुच हमारे इस रवैए से कितना परिवर्तन आ गया है। जो मां कल तक हमारे झगड़े पर सिर्फ अनीता को ही डांटती थी वो अब उसे भी मेरी तरह प्यार से दुलारने लगी थी। ये सब सोचते ही मुझे अंदर से बड़ी खुशी हुई।
मैंने गर्दन घुमा कर अनीता की तरफ देखा। उसने भी मुझे देखा और हम दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे। जाने क्यों एकाएक मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
थोड़ी देर बाद जब मेरी मालिश हो गई तो मां ने उठ कर अनीता की भी मालिश की। उसके बाद मैं उसी तेल से मां की मालिश करने लगा। बीच बीच में अनीता भी मां के घुटनों के थोड़ा ऊपर मालिश कर देती थी। मां ने उससे कहा था कि अगर उसे मालिश ही करना है तो वो बस घुटनों के ऊपर करे। मां के अनुसार घुटनों के नीचे मालिश करने से खुद मां को पाप लगेगा कि उन्होंने बेटी से पांव की मालिश करवाई।
मैंने और अनीता ने मिल के काफी देर तक मां की मालिश की। मां इतनी थकी हुई थी कि हमारे मालिश करते करते ही खाट पर सो गई। अनीता ने एक दो बार उसे पुकारा मगर मां की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न हुई। जाहिर है उसे मालिश से जब आराम मिला तो वो गहरी नींद में सो गई थी।
"मां तो गहरी नींद सो गई राजू।" अनीता ने धीमे से कहा─"चल अब बंद कर देते हैं मालिश करना।"
"हां ठीक है।" मैंने कहा─"तू ये तेल की कटोरी कहीं रख दे। उसके बाद तू भी मां के साथ सो जा। कल सुबह हमें खेतों पर फिर से गहाई करने जाना है।"
"कल तो सुनीता और रानी भी जाएंगी।" अनीता ने कहा─"उनके रहने से शायद हमें कम मेहनत करनी पड़े।"
"हां...पर वो छोटी हैं तो जल्दी थक भी जाएंगी।" मैंने कहा─"ऐसे में हमें ही करना होगा।"
"चल कोई बात नहीं।" अनीता ने कहा─"बीच बीच में थोड़ा बहुत तो आराम मिलेगा ही हमें।"
"हां सही कहा।" मैंने सिर हिलाया─"खैर चल अब सो जा तू....और वो तेल की कटोरी कहीं दूसरी जगह रख दे।"
अनीता ने कटोरी उठा कर रसोई के पास बनी एक पट्टी पर रख दी और फिर जा के मां के साथ लेट गई। कुछ देर तक तो हम जागते ही रहे मगर फिर जाने कब हमारी आंख लग गई।
जारी है.............
मेरी धड़कनें बढ़ी हुई थीं और अंदर हलचल भी मची हुई थी लेकिन मैं अपने बर्ताव को और अपनी भावनाओं को उस पर जाहिर नहीं करना चाहता था इस लिए सामान्य भाव से पानी लिए मैं उसके पास आ गया।
"माटी लगा लिया तूने।" मैंने उससे पूछा─"अगर लगा लिया है तो बता...पानी डालूं तेरे ऊपर।"
"अभी रुक जा।" उसने हाथों पर लगी माटी को अच्छे से मलते हुए कहा─"पहले इसे मल लूं फिर डालना पानी। तब तक तू नहा न।"
मैंने बाल्टी का पानी अपने ऊपर डाल लिया और फिर से कुएं में जा कर बाल्टी डालने लगा। मैं चाहता था कि अनीता पूरी तरह मुझसे सहज हो जाए ताकि अगर मेरे कहने पर उसे दुबारा कभी अपना कुर्ता उतारना पड़े तो उसे सोचना न पड़े और न ही कोई झिझक हो।
दुबारा जब पानी खींच कर आया तो अनीता अपने पूरे बदन में माटी मल चुकी थी। जैसे ही मुझे पानी लाता देखा तो उसने मुझे पानी डालने का इशारा किया। मैं आगे बढ़ कर उसके ऊपर पानी डालने लगा। वो फिर से अपने पूरे बदन में जल्दी जल्दी हाथ फेरते हुए गिरते पानी से माटी धोने लगी। इस चक्कर में एक बार फिर से मुझे उसकी छातियां स्पष्ट दिखने लगीं और उसके हाथों और कलाइयों से टकराने की वजह से अजीब तरह हिलते व पिचकते उसके दूध दिखने लगे। एक बार फिर से मेरा पूरा बदन सनसना उठा। कच्छे में कैद लंड में हलचल हुई।
"अब कैसा लग रहा है तुझे।" मैंने उसे सहज करने के लिए पूछा─"माटी लगा कर नहाने से अच्छा लग रहा है न।"
"हां राजू।" अनीता खुशी से बोली─"अब बहुत अच्छा लग रहा है। ये चिकनी माटी लगा कर नहाने से अब एकदम तरोताजा लग रहा है। एक बाल्टी और डाल दे न मेरे ऊपर।
"अभी ले।" मैं झट बोला─"अपनी प्यारी और सुंदर बहन के हर हुकुम का पालन करूंगा मैं।"
वो मेरी इस बात पर मुस्कुरा उठी। इधर मैं भी मुस्कुराते हुए कुएं से पानी खींचने लगा। थोड़ी ही देर में मैं पानी ले कर आया और उसके ऊपर डालने लगा। इस बार वो खुल कर अपने हाथ बदन पर घुमा फिरा रही थी। शायद अब वो सहज हो गई थी और उसकी शर्म भी दूर हो गई थी। ऐसा अक्सर होता है....शुरुआत में इस तरह का जब कोई काम करना होता है तो उसमें शर्म और झिझक महसूस होती ही है मगर एक बार जब ऐसा कर लिया जाता है तो सारी शर्म और झिझक दूर हो जाती है।
अनीता के साथ यही हो रहा था। दूसरे, शायद वो ये भी सोचती रही होगी कि मैं कोई गैर मर्द या लड़का तो हूं नहीं....मतलब उसका अपना भाई ही हूं और जब मैं खुद ही कह रहा हूं ऐसा करने के लिए तो इतना क्या सोचना। तीसरी बात...उसे अपना प्यार भी तो साबित करना था....तो अगर ऐसा करने से प्यार साबित हो जाता है तो यही सही।
"मजा आ गया राजू।" बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने अपने चेहरे का पानी पोंछते हुए लेकिन खुशी से मुस्कुरा कर कहा─"मन तो अभी भी कर रहा है कि बस नहाती ही रहूं लेकिन देर होने से मां डांटेगी और बापू भी न आ जाएं कहीं इस लिए अब नहीं नहाऊंगी। एक काम कर तू....एक बाल्टी और पानी खींच दे ताकि मैं अपना ये कुर्ता धो लूं। फिर कुर्ता लपेट कर चली जाऊंगी।"
"ठीक है।"
मैं जल्दी ही कुएं से पानी खींच कर लाया और उसके सामने रख दिया। उसने अपने कुर्ते को उठाया और इस बार बेझिझक मेरे सामने अपनी छातियों के इस तरह उजागर हो जाने की परवाह किए बिना कुर्ते को बाल्टी के पानी में डुबाया और उसे रगड़ने लगी। रगड़ने की क्रिया में उसकी छातियां हल्के हल्के हिलने लगीं। ये देख मेरे अंदर सिहरन होने लगी। कच्छे में कैद लंड फिर से हरकत करने लगा। मैं उसकी हिलती छातियों से नजर हटाने की पूरी कोशिश कर रहा था मगर अब जब वो मेरी आंखों के सामने ही थीं तो क्या करता।
मन में कई तरह के खयाल उभर रहे थे। एक खयाल ऐसा था जो बार बार मुझे उकसा रहा था कि मैं इस बारे में कुछ बोलूं मगर मैं पूरी बेदर्दी से उस घटिया खयाल को दबा दे रहा था।
"अच्छा अनीता।" तभी एकाएक मैंने उससे पूछा─"अब से तू रोज मेरे साथ ऐसे ही नहाएगी न।"
"हां क्यों नहीं।" उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा─"अगर इस तरह का मौका रोज मिलेगा तो जरूर नहाऊंगी...पर इससे तुझे ही तो मेहनत करनी पड़ेगी। मुझे तो तू पानी खींचने ही नहीं देता।"
"हां तो क्या हुआ।" मैंने भोलापन और अपना प्यार दिखाया─"तू मेरी छोटी बहन है। ऊपर से तुझे मैं बहुत प्यार करता हूं तो तुझे मेहनत कैसे करने दे सकता हूं। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह और तेरे लिए मैं कुछ भी करूं।"
"राजू.... क्या सच में तू मुझसे बहुत प्यार करता है।"
उसने पता नहीं क्या सोच कर ये पूछा। मैं समझ न सका लेकिन उसकी आँखें और उसका मासूम चेहरा इस वक्त अलग ही तरह की चमक बिखेर रहा था। मेरा दिल फिर से तेज तेज धड़कने लगा।
"क्या तुझे भरोसा नहीं है मुझ पर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"तू जो इतना कुछ मेरे लिए कर रहा है उससे तो यही लगता है कि तू सच में मुझसे यानी अपनी बहन से बहुत प्यार करता है।" अनीता ने कहा─"लेकिन जाने क्यों ऐसा भी लगता है कि ये बहुत अजीब है।"
"अ...अजीब क्यों लगता है तुझे।"
"पता नहीं।" अनीता ने कहा─"शायद उस लिए कि ये सब कुछ एकदम से होने लगा है। इसके पहले कभी तूने इतने प्यार से मुझसे बातें नहीं की और न ही कभी मेरे लिए इतना कुछ किया है।"
"हां समझता हूं मैं।" उसकी बात से मैं पूरी तरह सहमत था─"और सच कहूं तो मैंने भी कई बार ये सोचा है मगर हर बार यही खयाल आता है कि इसके पहले शायद मैं नासमझ था....बल्कि हम दोनों ही नासमझ थे। फिर जब श्यामू काका ने हमें वो सब बताया तो सोचने लगा कि उनकी बात भी सही है। मतलब हम झगड़ा करते हैं मगर सच में उस झगड़े में एक दूसरे के दुश्मन नहीं होते हम। हर भाई बहन में झगड़े होते हैं तो हम भी करते थे....पर इस झगड़े में दुश्मनी जैसी कोई बात नहीं होती थी। अगर कुछ था तो सिर्फ ये कि बिना झगड़ा किए हम दोनों को ही खुशी नहीं मिलती थी। बिना झगड़ा किए चैन ही नहीं मिलता था। तो जब काका के अनुसार ये हमारा आपस का प्यार ही है तो क्यों न इस प्यार को बिना कोई झगड़ा किए आगे बढ़ाया जाए। जिस प्यार से अंजान हो के हम दोनों आपस में झगड़ते थे उस प्यार के बारे में जान कर क्यों न अब हम प्यार से ही रहें....एक दूसरे से प्यार से बातें करें....एक दूसरे के सुख दुख को समझें। बस....जब ऐसे खयाल आए तो मैंने सोच लिया अब से यही करूंगा।"
"सही कह रहा है तू।" अनीता ने कहा─"माना कि ये थोड़ा अजीब लगता है मगर उससे भी ज्यादा ये अच्छा लगता है। और पता है....मेरा दिल करता है कि हम दोनों हमेशा ऐसे ही रहें....क्या कहता है तू।"
"मैंने तो सोच ही लिया है कि अब से हमेशा ऐसा ही रहूंगा और तुझसे कभी झगड़ा नहीं करूंगा।" मैंने कहा─"बाकी तू क्या करेगी ये तेरे ऊपर है। मैं तुझे किसी बात के लिए न तो कुछ बोलूंगा और न ही मजबूर करूंगा। मैं बस ये चाहता हूं कि अब से मेरी प्यारी बहन मुझसे खुश रहे।"
मेरी बात सुन कर अनीता अपलक देखने लगी मुझे। एकाएक उसकी आंखों में आंसू झलकने लगे। अचानक जाने उसे क्या हुआ कि वो एक झटके से खड़ी हो गई। उसे अपनी नग्नता का जरा भी खयाल न आया। फिर लपक कर मेरे करीब आई और एकदम से मुझसे लिपट गई।
"अरे....क्या हुआ।" मैं उसकी इस क्रिया से चौंक पड़ा।
"कुछ नहीं।" उसने मुझसे लिपटे हुए ही भारी गले से कहा─"बस मेरा मन किया कि तेरे सीने से लिपट जाऊं।"
उसकी गीली कमीज में कैद उसकी ठोस और हल्की मुलायम चूचियां मेरे सीने में धंस गईं थी। यहां तक कि उसके निप्पल साफ साफ मुझे महसूस हो रहे थे। ठंडे पानी में नहाने के कारण वो एकदम खड़े हो गए थे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई नुकीली चीज मेरे सीने में चुभ गई हो। मेरा पूरा बदन थरथरा गया था। दिल की धड़कनें तो एक पल के लिए रुक ही गईं थी। एक सुखद अनुभूति हुई थी जिससे मेरी आँखें बंद हो गईं थी।
"हां ठीक है।" फिर एकदम से मैं बोला─"चल अब दूर हो मुझसे। अगर किसी ने देख लिया तो गड़बड़ हो जाएगी।"
"थोड़ी देर चिपके रहने दे न राजू।" अनीता और भी ज्यादा कस के चिपक गई मुझसे─"तुझसे ऐसे छुपकी हूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।"
"अगर ऐसा है तो कमरे में जहां सिर्फ हम दोनों हों वहां छुपक लेना।" मैंने उसे खुद से अलग करते हुए कहा─"लेकिन यहां ये ठीक नहीं है। घर वालों के अलावा किसी और ने देख लिया तो गलत ही सोचेगा और मैं नहीं चाहता कि हम दोनों के इस प्यार को कोई गलत सोचे....क्या तू ऐसा चाहती है।"
"न..नहीं नहीं राजू।" अनीता झट बोली─"मैं भी ऐसा नहीं चाहती।"
"चल अब तू अपना कुर्ता ले कर जा।" मैंने एक नजर उसकी भीगी चूचियों पर डाली। एकाएक मुझे शरारत सूझी तो बोला─"अरे ये क्या...तेरे दूध की नोक कितना ज्यादा कमीज में उठी हुई दिख रही है।"
ये सुन अनीता बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसने झट से अपनी चूचियों को देखा। मेरी बात सच जानते ही उसे बड़े जोर की शर्म आई। उसने झट से अपने हाथों की कैंची बना कर अपनी छातियों को छुपा लिया।
"तू न सच में बहुत गंदा है।" फिर वो शर्म से लाल होते हुए और थोड़ा झूठा गुस्सा दिखा कर बोली─"तू बस यही देखता है न और इसी लिए तूने मेरा कुर्ता उतरवाया था न....बेशर्म कहीं का...बोल अब।"
"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने एकदम से गंभीर शक्ल बना ली─"क्या तुझे लगता है कि मैं अपनी बहन के बारे में ऐसा सोच सकता हूं।"
मुझे एकदम से गंभीर हो गया देख और मेरी गंभीर बातें सुन कर अनीता का वो झूठा गुस्सा और शर्म दोनों ही कपूर की तरह गायब हो गए।
"अरे...मैं तो छेड़ रही थी तुझे...बुद्धू।" फिर वो हल्के से मुस्कुराई─"चल अब तू भी मुस्कुरा।"
मैं मुस्कुराने लगा।
"चल अब मैं जा रही हूं मैं।"
उसने अपने हाथों की कैंची हटा ली जिससे उसकी चूचियां फिर से दिखने लगीं। उसने फौरन मेरी नजरों को पकड़ लिया। उसे फिर से शर्म आई लेकिन इस बार उसने कुछ नहीं कहा मुझे। बल्कि मुस्कुराते हुए वापस पाट पर गई और फिर झुक कर बाल्टी में पड़े अपने कुर्ते को धोने लगी। झुकने के कारण उसकी कमीज के अंदर छुपी उसकी चूचियां आधे से ज्यादा दिखने लगीं मुझे। मेरी आँखें फैल गईं और हलक सूखने लगा।
मैंने झट से उसकी चूचियों से नजरें हटा ली। एकाएक ही मुझे एहसास होने लगा था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। वो तो नादान और मासूम है...उसे ध्यान ही नहीं आया कि झुकने से उसकी लाज दिखने लगी है मगर मुझे तो बार बार इसका फायदा नहीं उठाना चाहिए।
खैर थोड़ी देर में वो गीला कुर्ता अपने सीन में लपेट कर चली गई। उसके जाने के बाद मैं भी फौरन नहा धो के अंदर चला आया। कपड़े वगैरह बदल कर मैं आंगन में ही खाट पर लेट गया।
अभी मैं लेटा ही था कि तभी बबलू आ गया। उसके साथ में नरेश भी था।
"क्या रे आज कल कहां गायब रहता है तू।" बबलू ने मुझे आँखें दिखाते हुए कहा─"दो दिन से खेलने नहीं आया।"
"हां वो खेतों में गहाई चालू है न।" मैंने बताया─"तो दोनों जून गहाई करनी पड़ती है मुझे इस लिए खेलने आने का समय ही नहीं मिलता।"
"अच्छा छोड़....चल नदी तरफ चलते हैं।"
नरेश ने कहा और कहने के साथ ही कोई इशारा करने लगा। मैं समझ तो गया लेकिन तभी मुझे याद आया कि अनीता ने मुझे इन दोनों के साथ जाने से मना किया था। अब अगर मैं गया तो निश्चित ही वो नाराज हो जाएगी मुझसे।
"बहुत थक गया हूं यार।" मैंने बुरी सी शक्ल बना के कहा─"दोनों जून बैलों के पीछे पीछे घंटों चलना पड़ता है जिसकी वजह से पांव बहुत ज्यादा दुख रहे हैं।"
"क्या यार।" बबलू ने बुरा सा मुंह बनाया─"सब मजा खराब कर दिया तूने।"
"सही कहा।" नरेश बोल पड़ा─"आज अच्छा मौका था इसको दिखाने का मगर ये तो पांव दुखने का बहाना बना रहा है।"
"देख राजू....बड़ी मुश्किल से ऐसा मौका मिला है।" बबलू ने धीमे से कहा─"इस लिए पाव का दर्द भूल जा और चल हमारे साथ।"
"नहीं यार।" मैंने कहा─"सच में पांव में जान नहीं है। अभी नहा धो के आया हूं और अब सिर्फ खाट में लेट कर आराम करना चाहता हूं। तुम दोनों जाओ और जो मौका मिला है उसका फायदा उठाओ। मैं फिर कभी देख लूंगा।"
तभी मां रसोई से बाहर आती दिखी। उसने मेरे पास बबलू और नरेश को खड़ा देखा तो हमारे पास ही आने लगीं।
"तुम दोनों इस समय यहां?" मां ने दोनों को देखते ही पूछा─"क्या राजू को खेल खिलाने के लिए लेने आए हो।"
"हां काकी।" नरेश झट बोल पड़ा।
"पर वो नहीं जा सकता।" मां ने स्पष्ट कहा─"तुम दोनों को पता है...मेरा राजा बेटा दो दिन से सारा दिन खेतों में गहाई करवा रहा है अपने काका लोगों के साथ। एक बार भी नहीं कहा कि वो ये काम नहीं करेगा...जानते हो क्यों....क्योंकि अब वो समझदार हो गया है। उसे समझ आ गया है कि गांव में फालतू आवारा बागने से कहीं अच्छा है जिम्मेदारियों को समझ कर घर और खेतों के काम करना। मेरा राजा बेटा अब तुम दोनों की तरह गांव में आवारागर्दी नहीं करेगा। तुम दोनों भी मेरे बेटे से सीखो कि कैसे जिम्मेदारी से घर और खेतों का काम किया जाता है।"
"हम भी काम करते हैं काकी।" नरेश को मां की बात और उसका ताना अच्छा नहीं लगा इस लिए बोला─"हम दिन भर गांव नहीं घूमते हैं। खेलने भी तभी जाते हैं जब घर और खेतों के काम से समय मिलता है।"
"नरेश सही कह रहा है काकी।" बबलू भी बोल पड़ा─"समय मिलने पर ही हम खेलने जाते हैं।"
"ये बात उन्हें जा कर बताओ जो तुम्हारे बारे में कुछ जानता ही न हो।" मां को एकाएक गुस्सा आ गया─"मुझे अच्छे से पता है कि तुम दोनों कितना अपने घर और खेतों का काम करते हो। मालती और चंदा से अक्सर भेंट होती है मेरी....वो दोनों सारी करतूतें बताती हैं मुझे कि तुम क्या करते हो और क्या नहीं करते।"
बबलू और नरेश एकदम चुप रह गए। चेहरे का रंग उड़ गया था उनका। मैं भी मन ही मन ये सोच के घबरा उठा कि कहीं मां को मेरे बारे में भी तो कुछ उल्टा सीधा पता नहीं चल गया है।
"छोड़ न मां....और जा यहां से।" मैंने कहा─"और तू चिंता न कर...मैं कहीं नहीं जाने वाला। मैंने इन दोनों को बोल दिया है कि सारा दिन खेत में गहाई करने से मेरे पांव बहुत दुख रहे हैं तो मैं खेलने नहीं जाऊंगा।"
"क्या सच में तेरे पांव बहुत दुख रहे हैं बेटा।" मां ने एकाएक फिक्रमंद हो कर पूछा।
"हां मां।" मैंने कहा─"पर तू चिंता मत कर। आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।"
"अरे ऐसे कैसे ठीक हो जाएगा भला।" मां ने कहा─"तेल से मालिश करनी होगी। अच्छा सुन....जब सब खा पी लेंगे तो मैं तेल से मालिश कर दूंगी तेरे पांवों में। फिर तुझे अच्छे से आराम मिल जाएगा।"
"अच्छा राजू....हम अब जा रहे हैं।" बबलू ने धीमे से कहा और नरेश को चलने का इशारा किया।
मैंने भी उन्हें नहीं रोका। मां के सामने ऐसा कर भी नहीं सकता था। मैं नहीं चाहता था कि उनकी वजह से मां मुझसे नाराज हो जाए।
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रात में जब सबका खाना पीना हो गया तो मां ने मुझे मालिश करवाने के लिए कहा। मैं आंगन में अलग खाट पर लेटा हुआ था जबकि मां और अनीता एक साथ दूसरी खाट पर लेटती थीं। बापू घर के बाहर नीम के पास खाट पर लेटे हुए थे।
मां खुद रसोई में जा कर सरसों के तेल में लहसुन डाल कर तेल को हल्का गुनगुना कर के लाई थी। वो मेरे पास ही खाट पर पांवों की तरफ बैठ गई।
"गुनगुने तेल से मालिश कर दूंगी तो जल्द आराम मिल जाएगा तुझे।" फिर वो मेरी एक टांग पर तेल से मालिश करते हुए बोली─"दो दिन से तू दोनों जून लगातार मेहनत कर रहा है इस लिए थकान ज्यादा हो गई है तुझे।"
"मां...मैं भी राजू की मालिश कर दूं।" बगल से ही मां की खाट पर लेटी अनीता बोल पड़ी।
"नहीं रहने दे।" मां ने कहा─"तू भी तो थक गई है। इसकी मालिश कर दूं...फिर तेरे भी पांव की मालिश कर दूंगी।"
"थकी तो तू भी है मां।" अनीता ने कहा─"तुझे भी तो मालिश करवाने की जरूरत है।"
"अरे मेरी तो काम करने की आदत पड़ी हुई है।" मां ने कहा─"इस लिए अब इतना ज्यादा थकान का अनुभव नहीं होता।"
"हां...पर फिर भी मां थक तो जाती ही है तू।" अनीता ने कहा─"अब ऊपर से सोने के समय पर तू राजू की मालिश कर रही है...फिर मेरी भी मालिश करने को कह रही है। ऐसे में और भी तो थक जाएगी। एक काम करती हूं....जब तू राजू और मेरी मालिश कर देगी तो मैं तेरे पांव की मालिश कर दूंगी।"
"अरे नहीं नहीं।" मां झट बोली─"तुझसे अपने पांव थोड़े न छुवाऊंगी मैं। हमारे यहां बेटियों से पांव नहीं छुआएं जाते बल्कि खुद उनके पांव छुए जाते हैं।"
"तो फिर मैं मां की मालिश कर दूंगा।" मैं एकदम से बोल पड़ा─"ठीक है न मां।"
"अच्छा...मेरा राजा बेटा अपनी मां की मालिश करेगा?" मां ने बड़े स्नेह से मुस्करा कर कहा।
"हां क्यों नहीं।" मैंने कहा─"मैं तेरी मालिश कर दूंगा। जब तू इतना थके होने पर भी हमारी मालिश कर रही है तो मुझे भी तो तेरे बारे में सोचना होगा न मां।"
"मेरा राजा बेटा।" मां ने थोड़ा सा आगे सरक कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया─"अपनी मां से बहुत प्यार करता है न।"
"हां मां।" मैंने कहा─"मैं तुझे बहुत चाहता हूं और हां....अनीता को भी बहुत प्यार करता हूं।"
"अच्छा।" मां को थोड़ी हैरानी हुई─"कब से भला।"
"बस अभी कल से ही मां।" मैं मुस्कुरा उठा─"और पता है मां...अनीता भी मुझे बहुत प्यार करती है। अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते।"
"अरे वाह।" मां को इस बार आश्चर्य हुआ─"तुम दोनों में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे हो गया। कल तक तो तुम आपस में झगड़ते ही रहते थे। फिर एक दूसरे से इतना प्यार कैसे हो गया।"
कहने के साथ ही मां अनीता की तरफ घूमी फिर उससे पूछा─"क्या राजू सही कह रहा है। क्या सच में तुम दोनों अब झगड़ा नहीं करते।"
"हां मां।" अनीता मुस्कुरा कर बोली─"हमने परसों से झगड़ा नहीं किया।"
"हाय दय्या क्या सच में।" मां की आश्चर्य से आँखें फैल गईं─"पर...पर इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कैसे।"
"मैं बताता हूं मां।"
कहने के साथ ही मैंने मां को श्यामू काका वाली बात विस्तार से बता दी। फिर ये भी बताया कि उनकी बातों के बाद हम दोनों ने क्या सोचा और फिर कैसे अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते बल्कि एक दूसरे से प्यार से बात करते हैं। इतना ही नहीं एक दूसरे का खयाल भी रखते हैं।
"अरे मोरी दय्या।" मां ने आश्चर्य से खुले अपने मुंह पर हथेली रख के कहा─"ये..ये तो सच में अचरज की बात हो गई।"
"कल तक हमें भी ये अचरज ही लग रहा था मां।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"लेकिन सच यही है।"
"चल....अगर तुम दोनों अब एक दूसरे से अच्छे से मिलजुल के रह रहे हो तो ये बहुत अच्छी बात है।" मां ने फिर से मालिश करना शुरू कर दिया─"मैं भी सोचती थी कि कब तुम दोनों को अकल आएगी और कब तुम दोनों प्यार से मिलजुल के रहोगे। खैर ऊपर वाले का लाख लाख धन्यवाद कि उसने समय रहते तुम दोनों को अकल दे दी। इससे मेरे अंदर की भी अब ये चिंता दूर हो गई।"
"अब से हमारे कारण तुझे कोई परेशानी नहीं होगी मां।" अनीता बोल पड़ी─"और न ही हमसे तंग आ कर तुझे हम पर चिल्लाना पड़ेगा।"
"ओह मेरी प्यारी बिटिया आ तो जरा मेरे पास।" मां ने उसे प्यार से बुलाया और जब अनीता मुस्कुराते हुए उसके पास आ गई तो उसने उसके भी चेहरे को प्यार से सहलाया। फिर बोली─"अब जा के तुझमें समझदारी वाली बात आई है। मैं बहुत खुश हूं अब। जा खाट पर बैठ....मैं जल्दी से तेरे भाई की मालिश कर के तेरी भी मालिश करती हूं।"
अनीता खुशी खुशी वापस अपनी खाट पर जा के बैठ गई। इधर मैं सोचने लगा था कि सचमुच हमारे इस रवैए से कितना परिवर्तन आ गया है। जो मां कल तक हमारे झगड़े पर सिर्फ अनीता को ही डांटती थी वो अब उसे भी मेरी तरह प्यार से दुलारने लगी थी। ये सब सोचते ही मुझे अंदर से बड़ी खुशी हुई।
मैंने गर्दन घुमा कर अनीता की तरफ देखा। उसने भी मुझे देखा और हम दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे। जाने क्यों एकाएक मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
थोड़ी देर बाद जब मेरी मालिश हो गई तो मां ने उठ कर अनीता की भी मालिश की। उसके बाद मैं उसी तेल से मां की मालिश करने लगा। बीच बीच में अनीता भी मां के घुटनों के थोड़ा ऊपर मालिश कर देती थी। मां ने उससे कहा था कि अगर उसे मालिश ही करना है तो वो बस घुटनों के ऊपर करे। मां के अनुसार घुटनों के नीचे मालिश करने से खुद मां को पाप लगेगा कि उन्होंने बेटी से पांव की मालिश करवाई।
मैंने और अनीता ने मिल के काफी देर तक मां की मालिश की। मां इतनी थकी हुई थी कि हमारे मालिश करते करते ही खाट पर सो गई। अनीता ने एक दो बार उसे पुकारा मगर मां की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न हुई। जाहिर है उसे मालिश से जब आराम मिला तो वो गहरी नींद में सो गई थी।
"मां तो गहरी नींद सो गई राजू।" अनीता ने धीमे से कहा─"चल अब बंद कर देते हैं मालिश करना।"
"हां ठीक है।" मैंने कहा─"तू ये तेल की कटोरी कहीं रख दे। उसके बाद तू भी मां के साथ सो जा। कल सुबह हमें खेतों पर फिर से गहाई करने जाना है।"
"कल तो सुनीता और रानी भी जाएंगी।" अनीता ने कहा─"उनके रहने से शायद हमें कम मेहनत करनी पड़े।"
"हां...पर वो छोटी हैं तो जल्दी थक भी जाएंगी।" मैंने कहा─"ऐसे में हमें ही करना होगा।"
"चल कोई बात नहीं।" अनीता ने कहा─"बीच बीच में थोड़ा बहुत तो आराम मिलेगा ही हमें।"
"हां सही कहा।" मैंने सिर हिलाया─"खैर चल अब सो जा तू....और वो तेल की कटोरी कहीं दूसरी जगह रख दे।"
अनीता ने कटोरी उठा कर रसोई के पास बनी एक पट्टी पर रख दी और फिर जा के मां के साथ लेट गई। कुछ देर तक तो हम जागते ही रहे मगर फिर जाने कब हमारी आंख लग गई।
जारी है.............


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